रविवार, 28 अप्रैल 2024

मानस चर्चा " देव एकु गुनु धनुष हमारें।

मानस चर्चा " देव   एकु   गुनु  धनुष हमारें।
नव गुन  परम पुनीत तुम्हारें"॥
     ब्राह्मण और ब्राह्मण के गुणों  को जानने के लिए  हम 
मानस में प्रभु श्रीरामजी ने जो भगवान श्रीपरशुराम जी से कहा उन पंक्तियों पर चर्चा करते हैं जो बहुत ही प्रसिद्ध हैं।
देव   एकु   गुनु  धनुष हमारें।
नव गुन  परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। 
छमहु   बिप्र  अपराध  हमारे॥
   प्रभु श्री राम भगवान परशुराम से निवेदन कर रहे हैं:   हे देव ! हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण अर्थात धनुष ही है । धनुष की एक ढोरी/सूत्र पुनीत तो है पर ,आप ब्राह्मण हैं आप में परम पवित्र 9 गुण हैं।यहाँ यज्ञोपवीत के नौ सूत्रों की ओर संकेत जो परम पुनीत हैं क्यो, क्योंकि इसके हर सूत्र में एक-एक देवता वास करते हैं और तो और जो तीन  सूत्र/धागें साफ-साफ दिखते हैं वे त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं और इनके अंतर निहित 3×3=9 सूत्रों में जो 9 देव वास करते हैं उन्हें देखें-
ओंकारः प्रथमे सूत्रे द्वितीयेअग्निः प्रकीर्तितः।
तृतीये कश्यपश्चैव चतुर्थे सोम एव च।
पञ्चमे पितृदेवाश्च षष्ठे चैव प्रजापतिः।
सप्तमे वासुदेवः स्यादष्टमे रविरेव च।
नवमे सर्व देवास्तु  इत्यादि संयोगात्।।
अतः हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिए। यहाँ हमें प्रसंगवश 
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।
और यज्ञोपवीत उतारने का मंत्र
एतावद्दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया।
जीर्णत्वात्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम्।।
को भी अपने जीवन मे उतार लेना चाहिए।
आखिर ये नव गुन जो परम पुनीत हैं वे कौन-कौन हैं उनको तो हमें जानना ही चाहिए।आइये इस श्लोक को देखते हैं-
ऋजुस्तपस्वी संतुष्टः शुचिः दान्तो जितेन्द्रियः।
दाता विद्वान दयालुश्च ब्राह्मणो  नवभिर्गुणैः   ।। 
 अर्थात् ब्राह्मण के अन्दर ये नव गुण होने ही चाहिए:
ब्राह्मण 1-ऋजु: = सरल हो ।
ब्राह्मण 2-तपस्वी = तप करनेवाला हो। 
ब्राह्मण 3-संतुष्ट:= मेहनत की कमाई पर  सन्तुष्ट रहनेवाला हो ।
ब्राह्मण 4-शुचिः=शुद्ध,पवित्र,उज्ज्वल, योग्य हो।
ब्राह्मण 5-दान्तो=संयमी, मन को वश में रखने वाला हो।
ब्राह्मण 6-जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो।
ब्राह्मण 7-दाता= दान करनेवाला हो।
ब्राह्मण 8-विद्वान= विद्या वान हो, अपने विषय में पारंगत हो, पांडित्य हासिल किया हो। 
ब्राह्मण 9-दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो।     
  श्रीमद् भगवतगीता  में भी ब्राह्मण के 9 गुण/कर्म इस प्रकार बताए गये हैं-
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।
अर्थात् 
(1)  शमः– शान्तिप्रियता    (2)   दमः– आत्मसंय
(3)   तपः– तपस्या;  तप- तपस्या-श्रम करना तपस्या करना किसके लिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो हमारा सबसे ताकतवर पक्ष है तभी तो गोस्वामीजी ने लिखा- तपबल बिप्र सदा बरिआरा। और भी देखें- तप अधार सब सृष्टि भवानी।  (4)शौचं - शुद्धता- पवित्रता-बाहर और भीतर से शुद्ध रहना (5)  क्षान्तिः– सहिष्णुता (6) आर्जवम्- सत्यनिष्ठा-शरीर, मन आदि में सरलता रखना (7) ज्ञानं-ज्ञान- वेद शास्त्र आदि का ज्ञान होना (8) विज्ञानं-विज्ञान- विशेष ज्ञान भी अलग से होना ही चाहिये (9) आस्तिक्यम्– धार्मिकता-   आस्तिकता - परमात्मा वेद आदि में आस्था रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं जो हर ब्राह्मण में के लिए हैं।
श्लोक में आये "ब्रह्म कर्म स्वभावजम्" के अनुसार ये सब ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न   स्वाभाविक कर्म हैं ।  स्वभाव के कर्म हमारे गुण बन जाते हैं। अतः हमें अपने कर्म पथ पर ही रहना है क्योंकि work is worship -कर्म ही पूजा है।
यहाँ हमारे एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गुण की बात भी प्रभु श्रीराम करते है-छमहु   बिप्र  अपराध  हमारे- वह है हमारा दसवाँ और सबसे महत्त्वपूर्ण गुण क्षमा, क्षमा कौन कर सकता है? देखें राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की इन पंक्तियों को-
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।
  हमें यह भी सदा ध्यान रखना है कि-
देवाधीनाजगत सर्वं , मन्त्राधीनाश्च  देवता:। 
ते मंत्रा: ब्राह्मणाधीना: , तस्माद्  ब्राह्मण देवता:।। 
अर्थात देवताओं के अधीन संसार, मंत्रों के अधीन देवता और ब्राह्मणों के अधीन मंत्र  होते हैं।अतः मन्त्रों को जानने वाले ब्राह्मण देवता ही हैं। तभी तो-
विश्वामित्रजी को वशिष्ठजी से हारने के बाद स्वीकार ही करना पड़ा  कि-
धिग्बलं क्षत्रिय बलं ,  ब्रह्म तेजो बलम बलम् ।
एकेन ब्रह्म दण्डेन  ,   सर्वास्त्राणि   हतानि मे ।। 
इस श्लोक में भी गुण से हारे ; त्याग, तपस्या, गायत्री  के बल से  हारे और आज  हम  उसी को त्यागते जा रहे हैं। यह बात हमें जानना ही चाहिए कि- 
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll
अर्थात ब्राह्मण एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल (जड़), सन्ध्या (गायत्री मन्त्र का जाप) करना है, चारों वेद उसकी शाखायें हैं, तथा  वैदिक धर्म के  आचार विचार का पालन करना उसके पत्तों के समान हैं । अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि वह सन्ध्या रूपी मूल गायत्री मन्त्र'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' का नित्य जाप करे जिससे उसका मूल सुरक्षित रहे।जब मूल सुरक्षित रहेगा तो स्वयं ब्राह्मण-वृक्ष सुरक्षित रहेगा इस हेतु सभी ब्राह्मण बंधुओं को रहीम का दोहा
एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥ 
को ध्यान में रखते हुवे अपने लिए ही सही गायत्री मंत्र का जाप तो करना ही चाहिये जिससे स्वयं के साथ-साथ,अपनो की,सबकी रक्षा हो। इसके साथ ही साथ हमें भगवान परशुराम जी को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुवे प्रभु श्रीराम के इस कथन -
देव   एकु   गुनु  धनुष हमारें।
नव गुन  परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे।  इस कथन को भी हम सभी ब्राह्मणों को हेमेशा सही बनाए रखना चाहिए।।जय श्री राम।।

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