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१. पिताश्री स्वर्गीय जगत नारायण तिवारी जी को सादर समर्पण
१. दहेज प्रथा
बेचते जो लाल निज, माँगते जो नोट भारी,
लोभ की वे आग में ही, लाज को गँवाते रे।
बेटी का जनक रोए, सोच-सोच रात-दिन,
कर्ज के ही जाल में जो, लोग डूब जाते रे।
२. नशाखोरी
पी के विष रात-दिन, खो रहे हैं होश लोग,
घर का उजाला बेच, कीच में सो जाते रे।
रोती है जननी पास, भूखे बाल बिलखते,
नाश की वे राह चल, प्राण को गँवाते रे।
३. दिखावा और पाखंड
भीतर है पाप भरा, मुख से जो जाप करते,
साधु का जो चोला ओढ़, लोक को ठगाते रे।
दान का दिखावा भारी, नाम को छपाते सदा,
फर्जी-फर्जी मान पा के, मोद में समाते रे।
४. जातिवाद
मानव से भेद भाव, जाति का विवाद छोड़ो,
बाँटते जो लोग यहाँ, देश को डराते रे।
भूल कर प्रेम-मार्ग, वैर का जो बीज बोए,
'मानस' रे छोड़ो भेद, समता बढ़ाओ रे।
५. बाल विवाह
खेलने की उम्र बीच, ब्याह जो कराए लोग,
गुड़िया को छोड़ बेटी, बोझ को उठाती रे।
रोत है मासूम मन, खो गया जो बालपन,
रीति के ही नाम पर, मेधा मुरझाती रे।
६. अंधविश्वास
टोना और टोटका पे, जो भरोसा आज करते,
फर्जी बाबा लोग देखो, लूट को मचाते रे।
छोड़ कर ज्ञान-मार्ग, मूढ़ता में लीन रहते,
सत्य को न जान पाते, जाल में फँसते रे।
७. वृद्धों की उपेक्षा
पाल-पोस बड़ा किया, खून को पसीना किया,
वृद्ध जो माता और पिता, आज वे अकेले रे।
छोड़ते अनाथालय, भूल कर त्याग सारा,
कलियुग के कपूत, पाप को समेटे रे।
८. कन्या भ्रूण हत्या
कोख में ही मार देते, काल जो बनत लोग,
आने न दिया जो जग, बेटी को रुलाते रे।
भूल गए जन्मदात्री, नारी का ही रूप होती,
पाप का घड़ा भरा, वंश को डुबाते रे।
९. प्रकृति दोहन
काटते हैं पेड़ सारे, कंक्रीट का ही बाग,
धुआँ जो उड़ाए सदा, साँस ही घुटती रे।
नदियाँ मलीन कीन्हीं, भूमि को बंजर किया,
लोभ के ही चक्कर में, सृष्टि ही रुठती रे।
१०. भ्रष्टाचार
बिना ले दे काम नाहीं, फाइल जो अटकी रहे,
बाबू बैठा दफ्तर में, जेब को भरता रे।
गरीब का खून चूसे, लाज नहीं आए उसे,
पाप की कमाई खा के, मौत से डरता रे।
११. अंधी आधुनिकता
अंग ही उघाड़ कर, फैशन जो नाम देते,
मर्यादा को भूल लोग, लाज को गँवाते रे।
देखा-देखी दौड़ बीच, रीति सब भूल गए,
पश्चिम की राह चल, गरिमा डूबाते रे।
१२. सोशल मीडिया की विकृति
रील्स में अश्लील नाच, लाज को बेचत लोग,
फर्जी व्यूज पा के यहाँ, मोद में समाते रे।
बालक और वृद्ध सारे, देख रहे दिन-रात,
ज्ञान की जो बातें छोड़, जाल में फँसते रे।
१३. गंदगी फैलाना
खा के पान थूक देते, गली और सड़क बीच,
कचरा जो फेंक लोग, रोग को बढ़ाते रे।
कहने को बड़े लोग, अक्ल की कमी भारी,
स्वच्छता की बातें छोड़, कीच को सजाते रे।
१४. संवेदनहीनता
राह में जो गिरे कोई, फिल्म ही बनाते लोग,
मदद की राह छोड़, फोन को चलाते रे।
अपनों का प्यार छूटा, स्वार्थ का जो जाल फैला,
'मानस' रे जागो अब, मानव बचाओ रे।
१५. चुनावी वादे
हाथ जोड़ आए नेता, पैर भी छुए ही जावे,
वोट पा के पाँच साल, ईद का जो चाँद रे।
झूठे-झूठे वादे सारे, जनता को हैं सुनाते,
जीत कर दिल्ली जा के, कुर्सियों पै सोते रे।
१६. मुफ़्तखोरी की लत
मुफ़्त का जो माल पा के, दौड़े सब लोग आज,
काम-धाम छोड़ कर, लाइन लगाते रे।
मेहनत भूल गए, आलस में लीन रहते,
फोकट का खा के बाबू, तोंद को बढ़ाते रे।
१७. डॉक्टर की फ़ीस
हल्की सी खाँसी होवे, जाँच लिख देते भारी,
लूट का बाज़ार खुला, जेब को चबाते रे।
लिखें जो दवाई ऐसी, कीड़ा मकोड़ा जैसे,
पर्चा न पढ़ पाए, लोग सिर धुनते रे।
१८. रौब जमाना (चाचा विधायक हैं)
गाड़ी पै लिखाय नाम, रोब जो दिखाएँ भारी,
नियम को तोड़ लोग, रौब को जमाते रे।
चाचा हैं विधायक जी, बात-बात पे जो बोलें,
'मानस' हँसो रे भाई, जेल में पधारते रे।
१९. अमीर और गरीब की खाई
महल में दूध बहे, कुत्ता भी मजे में सोए,
झोपड़ी का बाल देखो, भूख से बिलखता रे।
एक ओर धन भारी, मौज की बहार छाए,
दूजी ओर आम जन, पाई को तरसता रे।
२०. अंग्रेजी का भूत
हिंदी को न जान पाए, अंग्रेजी में रौब झाड़े,
'मम्मी-डैडी' बोल-बोल, खुद को सँवारते रे।
निज भाषा छोड़ कर, नकल में लीन रहते,
गौरव को भूल लोग, अपनी ही हारते रे।
२१. न्याय में देरी
तारीख पे मिले तारीख, बाल सब श्वेत होवे,
चक्कर लगा के थके, लोग ही बेचारे रे।
धनवान छूट जाए, सीधा ही मजे उड़ाए,
निर्धन की सुने कौन, कंत को पुकारे रे।
२२. योग्यता की विषमता
कागजों की दौड़ बीच, मेधा खड़ी रोए आज,
चमचों को मिले मान, कुर्सी पै बैठते रे।
हुनर जो हाथ बीच, डगर-डगर भटके,
'मानस' रे देख खेल, योग्य लोग रोते रे।
२३. सोशल मीडिया का दिखावा
होटलों में जा के बैठे, खाना कम खाए लोग,
फोटो ही खिंचाय पहले, नेट पै चढ़ाते रे।
भाड़े की गाड़ी के पास, बाबू बन खड़े होवे,
फर्जी-फर्जी रोब झाड़, दुनिया ठगाते रे।
२४. किश्तों (EMI) का दिखावा
जेब में न ढेला पास, गाड़ी लाए बड़ी आज,
कर्ज के ही जाल बीच, कंत को फँसाते रे।
किश्त जो न भर पाए, बाबू जी की नींद उड़े,
बाहर दिखाएँ ठाठ, भीतर सुबकते रे।
२५. भक्ति में दिखावा
लाउड-स्पीकर लगाए, शोर जो मचाए भारी,
भक्ति का दिखावा कर, लोग को जगाते रे।
मन में तो मैल भरा, चोला पहने श्वेत आज,
फर्जी-फर्जी संत बन, जाल को बिछाते रे।
२६. ब्रांडेड कपड़ों का ढोंग
नाम का ही ठप्पा देख, महँगा जो लिबास लाए,
अक्ल का ठिकाना नहीं, ठाठ ही दिखाते रे।
सादा जो मिज़ाज छोड़े, फैशन में लीन रहे,
'मानस' रे जागो अब, सच को छुपाते रे।
२७. डाइट और वीगन का ढोंग
घास-पात खाए बाबू, डाइट का नाम देवे,
वीगन के चक्कर में, जान को सुखाते रे।
भीतर तो भूख लगी, बाहर दिखाएँ रोब,
चोरी-चोरी रात बीच, समोसा चबाते रे।
२८. जिम का क्रेज
डंबल उठाए हाथ, शीशा जो निहारते ही,
पाउडर खा के लोग, तोंद को छुपाते रे।
मेहनत कम होवे, फोटो ही खिंचाए सदा,
फर्जी-फर्जी ढोंग कर, रौब को जमाते रे।
२९. अवसाद का बहाना
काम-धाम कुछ नहीं, बैठे-बैठे बोर होवे,
बात-बात बीच बाबू, उदासी बताते रे।
रील्स जो न चल पाए, लाइक्स की कमी होवे,
फर्जी डिप्रेसन का, रोना जो रुलाते रे।
३०. प्री-वेडिंग शूट का नाटक
ब्याह से ही पहले देखो, बाग में जो दौड़ भागे,
कैमरा के आगे लोग, नाटक रचाते रे।
फिल्म के जो हीरो जैसे, पोज़ ही बनाएँ खड़े,
'मानस' हँसो रे भाई, पैसा जो उड़ाते रे।
३१. सखी गोष्ठी (किटी पार्टी का दिखावा)
त्याग कर काम छोड़, नारी सब पास आए,
मिल कर गप मार, लाज को गँवाए रे।
रेशम का चीर धार, रूप का दिखावा भारी,
फर्जी सब हँस-हँस, बात को उड़ाए रे।
३२. जन्म दिन (उत्सव का पाखंड)
बालक का जन्म दिन, मोद जो मनावे लोक,
फूँक मार दीप को ही, गाल को फुलावे रे।
आदर का भाव छोड़, गाल पर दूध मले,
शोर जो मचावे भारी, समझ को गँवावे रे।
३३. सुबह की सैर (मॉर्निंग वॉक का ढोंग)
हाथ में जो लाठी ले के, भोर ही जो दौड़ भागे,
सैर के जो नाम पर, बात ही बनावे रे।
राह बीच बैठ लोग, जगत का हाल बोले,
चरबी न घट पावे, पेट को बढ़ावे रे।
३४. बिन बुलाए मेहमान (दावतों के मुफ़्तखोर)
सुघड़ लिबास पहन, दावत में जा के घुसे,
नाम जो पूछे कोई, मामा को बतावे रे।
जेब में न धन होवे, पेट को भरेगा पूरा,
'मानस' हँसो रे भाई, चुपके से जावे रे।
३५. पानी की बोतल
शुद्ध जल छोड़ लोग, बोतल को लावे आज,
बीस नोट दे के बाबू, रौब को जमावे रे।
गाँव का जो कुआँ भूले, नल का न पानी पीवे,
प्लास्टिक का पानी पी के, खुद को सँवारे रे।
३६. स्क्रीनशॉट की बीमारी
बात-बात बीच देखो, फोटो जो खींचे ही जावे,
फोन की मेमोरी फुल, ध्यान न लगावे रे।
भेज के सबूत सदा, जाल जो बिछावे भारी,
चोरी-चोरी रख पास, कंत को डरावे रे।
३७. ऑनलाइन शॉपिंग
दिन-रात फोन बीच, माल जो मँगावे लोग,
देख-देख डब्बा खुश, मन में समावे रे।
काम का न काज कुछ, फालतू का कबाड़ लाए,
जेब खाली होवे जब, बैठ के पछतावे रे।
३८. लोन की ज़िंदगी
बैंक से निकाल धन, मौज जो उड़ावे भारी,
घूम कर देश-विदेश, फोटो को खिंचावे रे।
बाद में जो चिट्ठी आए, होश ही उड़ जावे तब,
रो-रो कर काटे दिन, लाज को गँवावे रे।
३९. हेलमेट से परहेज़ (चालान का डर)
शीश पै न टोपी धरे, बाल को सँवारे भारी,
पुलिस को देख दूर, गाड़ी को घुमावे रे।
जान की न फिक्र कोई, नोट का ही डर बड़ा,
कटता चालान जब, आँसू को बहावे रे।
४०. दिखावे की वातानुकूलित (AC) ज़िंदगी
भीतर है आग लगी, बाहर जो ठंड चाहे,
महीने का बिल देख, होश ही उड़ावे रे।
कुदरत की हवा छोड़े, बंद कमरे में सोए,
बदले मिज़ाज जब, देह को दुखावे रे।
४१. शादी में लिफ़ाफ़े का गणित
खाए जो कचौड़ी चाट, रसगुल्ला तोड़े भारी,
सूट और बूट पहन, रोब को जमावे रे।
देने की जो बारी आए, सौ का नोट रख सोचे,
नाम न लिखाए भाई, चुपके से जावे रे।
४२. सुबह देर से उठने की आधुनिक लत
रात भर जगे बाबू, फोन पै जो आँख मीचे,
भोर का उजाला डूबा, सूरज डरावे रे।
चाय मिले बेड बीच, ठाठ ही निराला भारी,
दिन भर आलस में, जीवन गँवावे रे।
४३. कर्ज लेकर आलीशान शादी (खोखली शान)
बैंक से निकाल लोन, ब्याह में उड़ावे धन,
चार दिन की जो मौज, रात-दिन रोवे रे।
रिश्तेदार खा के चले, कमी ही निकालें सौ-सौ,
जिंदगी भर बाबू, कर्ज ही जो ढोवे रे।
४४. बचपन पर ट्यूशन का बोझ (पढ़ाकू माता-पिता)
सुबह ही स्कूल भेजे, दोपहर को जो कोचिंग,
रात को भी मास्टर जी, घर पै पढ़ावे रे।
खेलने की उम्र बीच, बस्ते का ही बोझ भारी,
बालपन छीन लोग, चश्मा चढ़ावे रे।
४५. कुत्ता टहलाने का रोब (आधुनिक ठाठ)
हाथ में जो रस्सी पकड़े, कुत्ता को घुमावे गली,
बगल से निकले जो, सबको डरावे रे।
घर के जो वृद्ध लोग, पानी को तरसते हैं,
टॉमी को बिस्कुट दे, ठाठ को दिखावे रे।
४६. चुनाव में मुफ्त की शराब (वोट का सौदा)
वोट का जो मौसम आए, बोतल की बाढ़ आवे,
मुफ्त की जो पी के पौवा, नाली में सो जावे रे।
पाँच साल रोवे फिर, नेता को ही गाली देवे,
एक रात के ही लोभ, भाग्य को गँवावे रे।
४७. नेताओं का दलबदल (आया राम, गया राम)
सुबह इस पार बैठे, शाम को जो उस पार,
न न कोई लाज-शर्म, कुर्सी पै मरते रे।
बदले जो दल ऐसे, गिरगिट शर्मा जाए,
जनता पै मार मार, जेब को ही भरते रे।
४८. गाड़ी पर जाति और पद का बोर्ड (सड़क का रौब)
गाड़ी पै लिखाय नाम, जाति का जो बोर्ड भारी,
नियम को तोड़ लोग, रौब को जमावे रे।
चाचा हैं विधायक जी, बात-बात पे जो बोले,
थानेदार देख जब, चालान थमावे रे।
४९. हॉस्टल की ज़िंदगी और मेस का खाना
घर का जो स्वाद भूले, मेस में जो दाल खावे,
पानी जैसी तरी देख, मन ही सुबकते रे।
रात को मँगावे मैगी, यार सब मिल बैठ,
घर की जो याद आए, आँसू हैं उबलते रे।
५०. बात-बात पर सोशल मीडिया का ज्ञान (व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी)
पढ़े न किताब कोई, ज्ञान जो बघारे भारी,
फॉरवर्ड कर पोस्ट, दुनिया हिलावे रे।
झूठ और सच का न, ज्ञान है रत्ती भर,
फर्जी नेता बन लोग, देश को लड़ावे रे।
५१. सरकारी दफ़्तर और बाबूगीरी
आज नहीं कल आना, बाबू जी ही बोलें सदा,
फाइल पै फाइल दबी, चक्कर लगावे रे।
चाय-पानी देवे जब, काम होवे पल बीच,
बिना ले-दे के यहाँ, कंत ही रुलावे रे।
५२. मेट्रो और बस की धक्का-मुक्की
भीड़ भारी खड़ी राह, धक्का जो लगावे लोग,
पाँव पै जो पाँव धरे, सीट को झपत्ते रे।
चढ़ने का होश नहीं, उतरने की आफत है,
दफ्तर जो पहुँचे बाबू, कपड़े सँवारते रे।
५३. भगवन के दरबार में वीआईपी दर्शन (महँगी भक्ति)
पैसे दे के मिले पास, आगे खड़ा होवे जा के,
निर्धन जो खड़ा दूर, कंत को पुकारे रे।
भगवान के भी द्वार, भेद-भाव भारी आज,
माया का जो खेल देख, मन ही सुबकते रे।
५४. ऑनलाइन गेमिंग और सट्टे की लत
टीम जो बनावे फोन, रातों-रात अमीर बनना,
जीतने की चाह बीच, पूँजी को गँवावे रे।
लोभ का जो जाल ऐसा, बालक भी लीन आज,
कंगाल जो होवे कंत, माथ को धुनत रे।
५५. टीवी डिबेट का हुड़दंग (मूर्खता का शोर)
चार लोग बैठें आ के, चिल्लाएँ जो एक साथ,
मुद्दे की जो बात छोड़, आपस में लड़ते रे।
एंकर जो आग लावे, टीआरपी के चक्कर में,
देख-देख आम जन, सिर को पकड़ते रे।
५६. प्रॉपर्टी डीलर के हवाई वादे (कागज़ी स्वर्ग)
बाग और बगीचा होगा, पास में ही मॉल होगा,
कागज़ पै स्वर्ग दिखा, प्लाट को बेचते रे।
जा के जो देखे कंत, झाड़ी और कीच मिले,
धोखे का जो जाल देख, आँसू हैं उबलते रे।
५७. सड़कों के गड्ढे और मॉनसून की आफत
पहली ही धार गिरे, झील बनी सड़क सब,
नाव जैसी चले कार, हिचकोले खावे रे।
नेता जी का विकास देखो, बह गया पानी बीच,
जनता जो गड्ढे गिने, सरकार को सुनावे रे।
५८. जिम सप्लीमेंट और नकली प्रोटीन का भूत
खाए जो डिब्बा भर, देह को फुलावे आज,
भीतर से खोखला है, रोग को बुलावे रे।
दाल-रोटी दूध छोड़, पाउडर पै जिए बाबू,
उम्र से ही पहले देखो, ताकत गँवावे रे।
५९. ब्यूटी पार्लर का कायाकल्प (चमत्कार का ढोंग)
सांवली सी सूरत लेके, पार्लर में जावे नारी,
घंटों जो अंदर बैठ, रूप को बदलती रे।
चूना और गारा जैसे, परत चढ़ावे मुख,
पहचान पाए नहीं, दुनिया जो जलती रे।
६०. ब्याह के बाद पतिदेव की दशा (सदाबहार व्यंग्य)
ब्याह से ही पहले बाबू, राजा बन घूमते थे,
जोड़ू का जो गुलाम बने, बर्तन सँवारते रे।
सब्जी का जो थैला हाथ, राशन की पर्ची जेब,
शाम को जो घर आके, पैर को दबाते रे।
६१. नेताओं का सुरक्षा काफिला (जनता पै आफत)
काली-काली गाड़ी दौड़े, सायरन बाजे भारी,
रोक देते राह सारी, जनता रुलाते रे।
सेवा का जो नाम लेके, रौब को जमावे ऐसा,
अस्पताल जाती एम्बुलेंस, राह में तड़पती रे।
६२. क्रेडिट कार्ड की माया (प्लास्टिक का फंदा)
जेब में न पैसा होवे, कार्ड जो घिसावे बाबू,
मौज-मस्ती कर आज, कल को भुलावे रे।
महीने का बिल जब, बनके पहाड़ आवे,
किश्त को चुकाने हेतु, दूजा लोन लावे रे।
६३. हर मोड़ पर सेल्फी का भूत (स्मार्टफोन की सनक)
खाना और पीना छोड़, दुर्घटना बीच खड़े,
दाँत को दिखावे पहले, फोटो जो खिंचावे रे।
शमशान घाट जाके, सेल्फी जो खींचे लोग,
लाइक के चक्कर में, लाज को गँवावे रे।
६४. आधुनिक थीम शादियाँ (रस्मों का तमाशा)
रीति और रिवाज भूले, डीजे पै जो नाच कूद,
कॉरपोरेट स्टाइल बीच, ब्याह को रचाते रे।
फेरों के जो मंत्र छोड़, लाइट और धुआँ भारी,
पवित्र जो बंधन छोड़, नाटक दिखाते रे।
६५. बच्चों के हाथों में मोबाइल (बचपन की कैद)
लोरी और कहानी छूटी, दादी का जो प्यार छूटा,
छोटा सा जो बच्चा आज, स्क्रीन को निहारे रे।
खेलने की उम्र बीच, उँगलियाँ चले तेज,
आँख का उजाला खोके, चश्मा चढ़ावे रे।
६६. दिखावे की समाजसेवा (एनजीओ की माया)
एक केला हाथ दे के, फोटो जो खिंचावे चार,
फेसबुक पै डाल पोस्ट, दानी जो कहावे रे।
भीतर से स्वार्थ भरा, सेवा का जो चोला ओढ़े,
फंड के ही चक्कर में, दुनिया ठगावे रे।
६७. वर्क फ्रॉम होम (घर से नौकरी का आलस)
सोफे पै जो लेटे बाबू, लैपटॉप रख पास,
काम-धाम कम होवे, नींद को बुलावे रे।
मीटिंग में ऑन वीडियो, ऊपर से कोट पहने,
नीचे तो पजामा ढीला, ठाठ को दिखावे रे।
६८. रिश्तेदारों के तीखे ताने (सदाबहार आफत)
पास जब आएँ बैठ, परीक्षा का हाल पूछें,
रिजल्ट का नाम ले के, छाती को जलावे रे।
बेटा क्या कमाता है, बेटी का जो ब्याह कब,
फर्जी चिंता दिखा के, घाव को बढ़ावे रे।
६९. शादी के रिसेप्शन की लंबी लाइन (भूखे मेहमान)
दूल्हा और दुल्हन खड़े, मंच पै जो थक आज,
मिलने को लोग यहाँ, लाइन में कतार रे।
भूख से जो पेट रोए, आँखों में समोसा घूमे,
फोटो के चक्कर बीच, समय गँवावे रे।
७०. महँगे प्राइवेट स्कूलों की लूट (शिक्षा का व्यापार)
डोनेशन माँगते हैं, फीस जो बढ़ाते भारी,
किताब और ड्रेस भी, खुद ही बेचते रे।
शिक्षा का बाज़ार खुला, बाबू जी का तेल निकले,
लोन ले के बाप यहाँ, नाम को लिखावे रे।
७१. आर्गेनिक और शुद्ध के नाम पर धोखा
खेत का जो अन्न छोड़, पैकेट का माल लावे,
आर्गेनिक नाम लिख, दोगुना कमाते रे।
केमिकल घोल-घोल, शुद्धता का बोर्ड टाँगे,
सेहत को बेच बाबू, जेब को ही भरते रे।
७२. डाइट फ़ूड का ढोंग (महँगा बुलावा)
घी और मलाई छोड़, फीकी-फीकी घास खावे,
डाइट के जो नाम पर, जेब को कटावे रे।
भूख से जो पेट रोए, आँखों में जलेबी घूमे,
ग्रीन-टी को पी-पी के, जी को जलावे रे।
७३. मुफ़्त की चुनावी रेवड़ियाँ (जनता को लालच)
बिजली और पानी मुफ्त, नेता जी जो बाँटें आज,
कर्ज में जो डूबा देश, कोई न विचारे रे।
टैक्स की कमाई सारी, रेवड़ी में बह जावे,
बाद में जो आफत आए, जनता ही हारे रे।
७४. डॉक्टरों की लिखावट (रहस्यमयी पर्ची)
कागज़ पै ऐसी मारे, चींटी जैसी टाँग खींचे,
दुनिया का कोई बंदा, पढ़ न ही पावे रे।
मेडिकल वाला देख, चुपके से दवा देवे,
क्या लिखा है पर्ची बीच, राम ही बचावे रे।
७५. प्री-वेडिंग शूट का भूत (शादी से पहले का नाटक)
ब्याह से ही पहले बाबू, नदी और पहाड़ भागे,
कैमरे के आगे खड़े, पोज़ को बनावे रे।
फर्जी प्यार दिखा-दिखा, वीडियो बनाएँ भारी,
लाखों का जो खर्चा कर, रौब को जमावे रे।
७६. हाईवे पर टोल टैक्स की कतार
लंबी-लंबी लाइन खड़ी, गाड़ी जो रेंगती धीरे,
फास्टैग के चक्कर में, कंत जो चिल्लावे रे।
पैसा भी जो कड़े लेवें, सड़क पै गड्ढे मिलें,
सफर के नाम पर, समय गँवावे रे।
७७. रिटायरमेंट के बाद की गप्पबाज़ी (बुज़ुर्गों की चौपाल)
दफ्तर की नौकरी छूटी, पेंशन का हाथ साथ,
पार्क बीच बैठ लोग, दुनिया हिलावे रे।
हमारे ज़माने बीच, ऐसा जो विकास होता,
अपनी ही गाथा गा के, वक्त को बितावे रे।
७८. मल्टीप्लेक्स के महँगे पॉपकॉर्न (सिनेमा की लूट)
टिकट से महँगा यहाँ, मक्के का जो दाना मिले,
सौ-सौ के नोट टूटे, जेब को रुलावे रे।
इंटरवल बीच बाबू, शान जो दिखावे भारी,
पॉपकॉर्न खा के कंत, माथ को धुनत रे।
७९. शादियों में कैमरे वाले ड्रोन का आतंक
उड़ता है सिर ऊपर, मक्खी जैसा शोर करे,
पूरी और कचौड़ी खाते, फ़ोटो को खिंचावे रे।
हवा में जो चक्कर काटे, चील जैसा झपट्टा मारे,
डर के जो मारे लोग, मुँह को छुपावे रे।
८०. लिफ्ट का शिष्टाचार (बटन दबाने की होड़)
खड़े हैं कतार बीच, लिफ्ट का जो रास्ता रोके,
भीतर जो घुसें लोग, धक्का जो लगाते रे।
शीशे में जो सूरत देखें, बटन दबावे बार-बार,
पास जो खड़ा है कोई, आँख ही दिखाते रे।
८१. पार्लर के बाहर पतियों का अंतहीन इंतज़ार
बाहर जो बैचेन बैठे, घड़ी को निहारे बार-बार,
भीतर जो बीवी बैठी, रूप को सँवारती रे।
घंटों का जो बिल बने, बटुआ ही खाली होवे,
थक कर कंत यहाँ, आह ही भरत रे।
८२. नया घर लेते ही वास्तु-दोष का वहम
लाखों का जो घर लिया, पंडित जी आए देखने,
बोले इस कोने बीच, राहु का ही वास रे।
तोड़ो तुम दीवार यहाँ, खिड़की को बंद करो,
वहम के जो जाल बीच, सुख का विनाश रे।
८३. बच्चों का फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन (माता-पिता की होड़)
बच्चा बने पेड़-पौधा, माँ-बाप जो दौड़ें पीछे,
झाँकी को बनाने हेतु, रातों को जगाते रे।
स्कूल में जो नंबर कम, मैडम से लड़े जा के,
अपनी ही शान हेतु, बाल को थकाते रे।
८४. शेयर बाज़ार का चस्का (रातों-रात अमीर)
दिन भर स्क्रीन देखे, लाल और हरा रंग,
'मानस' जो पूँजी लगा, करोड़पति बनना।
डूब गया पैसा जब, कंपनी ही भाग गई,
बैठ के जो रोवे बाबू, माथ को धुनत ना।
८५. ऑनलाइन रिव्यू की बीमारी (रेटिंग का चश्मा)
पाँच स्टार देख लोग, माल को मँगावे आज,
'मानस' जो डब्बा खुला, कचरा ही पावे रे।
होटल और खाना छोड़, रेटिंग के पीछे भागे,
धोखे का जो जाल देख, आँसू को बहावे रे।
८६. शादी का कार्ड न आने पर नाराज़गी (फर्जी मान-सम्मान)
व्हाट्सएप पै भेजा कार्ड, पत्रिका न घर आई,
'मानस' जो फूफा जी का, पारा चढ़ जावे रे।
दावत में नहीं जाऊँ, मान मेरा घटा दिया,
रूठ कर बैठें कोने, कंत को डरावे रे।
८७. हर बात पर गूगल सर्च की लत (इंटरनेट का ज्ञान)
सिर में जो दर्द होवे, गूगल पै बीमारी खोजे,
'मानस' जो लक्षण देख, डर ही जो जावे रे।
कैंसर ही मान बैठे, छोटी सी जो बात को ही,
हकीम का ज्ञान लेके, होश को गँवावे रे।
८८. लाफ्टर क्लब का नकली ठहाका (बनावटी हँसी)
पार्क बीच खड़े होकर, ज़बरदस्ती हाथ उठा,
'मानस' जो फर्जी हँस, दुनिया हँसावे रे।
भीतर है दुःख भरा, बाहर जो ढोंग भारी,
योगा के जो नाम पर, गाल को फुलावे रे।
८९. अलार्म बंद करके फिर सो जाना (सुबह का संघर्ष)
पाँच बजे घंटी बाजे, बंद करे हाथ मार,
'मानस' जो सोए फिर, पाँच मिनट कह के।
आठ बजे खुले आँख, दफ्तर की छूटे बस,
भागे फिर नंगे पाँव, चाय छोड़ रह के।
९०. पुराने कपड़ों के बदले बर्तन (कबाड़ी की कला)
फटी हुई साड़ी दे के, चमचमाता टोप लेवे,
'मानस' जो घर की नारी, खुश हो ही जावे रे।
तौलने की बारी आए, डंडी मारे चालाकी से,
सस्ते में जो माल लूटे, कंत को ठगावे रे।
९१. बिजली कटते ही कॉलोनी का नज़ारा
बत्ती गुल होवे जब, उमस जो बढ़े भारी,
'मानस' जो छज्जे ऊपर, जनता ही आवे रे।
अपनी जो छोड़ लोग, दूजे का ही घर देखें,
पूरे मोहल्ले में अँधेरा, देख सुख पावे रे।
९२. नया कुत्ता पालने वालों की अंग्रेज़ी (दिखावे की भाषा)
ठेठ हिंदी बोलने वाले, टॉमी को जो पास ला के,
'मानस' जो 'कम-हियर', 'सिट-डाउन' बोलते।
कुत्ता भी जो चकित है, मालिक की भाषा सुन,
पूँछ को हिलावे चुप, भेद को न खोलते।
९३. सोशल मीडिया के डिजिटल त्यौहार (बनावटी बधाई)
मातृ-पितृ दिवस पै, फोटो जो लगावे सुंदर,
'मानस' जो वृद्धाश्रम, हाल न ही पूछे रे।
व्हाट्सएप पै स्टेटस, स्टेटस पै ज्ञान भारी,
रिश्तों की जो डोर टूटी, दिखावे में रीझे रे।
९४. शादी के बफ़े में पनीर पर मची लूट
दाल और तंदूरी छोड़, जनता जो दौड़े उधर,
'मानस' जहाँ पै शुद्ध, पनीर जो सजे रे।
चम्मच और प्लेट मार, टूट पड़े लोग सारे,
ग्रेवी-ग्रेवी हाथ आए, टुकड़ों को खोजे रे।
९५. मंदिर के बाहर चप्पल चोरी का डर (भक्ति में भटकाव)
हाथ जोड़ मूँदे आँख, भीतर जो ध्यान धरे,
'मानस' जो चित्त लेकिन, बाहर ही डोले रे।
बाटा वाली चप्पल को, कोई न चुरा ले जाए,
आरती की धुन बीच, जूता ही जो खोजे रे।
९६. राजनीतिक रैलियों की भाड़े की भीड़
बस में बिठाए लोग, पूड़ी और नोट दे के,
'मानस' जो नेता जी की, रैली में ले जावे रे।
भाषण जो शुरू होवे, जनता जो सोवे उधर,
जिंदाबाद बोल-बोल, कंत ही अघावे रे।
९७. मोहल्ले के व्हाट्सएप ग्रुप का क्लेश
सुप्रभात रोज़ भेज, कचरे की फोटो डाले,
'मानस' जो ग्रुप बीच, जंग छिड़ जावे रे।
मंत्री और संतरी बन, आपस में लड़ें लोग,
एडमिन जो डाँट मारे, होश ही उड़ावे रे।
९८. शादी की सालगिरह का फेसबुकिया प्यार
साल भर झगड़ा हो, बात भी न करें सीधे,
'मानस' जो सालगिरह, फोटो जो सजावे रे।
'माय-लाइफ', 'माय-वर्ल्ड', लिख-लिख ओढ़ें ढोंग,
दुनिया को दिखा प्यार, रौब को जमावे रे।
९९. बैंक का सदाबहार लंच टाइम (उपभोक्ता की आफत)
पैसे को जमा कराने, लाइन में खड़ा है बंदा,
'मानस' जो काउंटर पै, बाबू ही न पावे रे।
पूछो तो वो आँख तरे, बोलता है लंच टाइम,
चक्कर लगावे रोज़, जनता रुलावे रे।
१००. नई गाड़ी की पूजा और नींबू-मिर्ची का वहम
लाखों की जो कार लाए, शोरूम से बाहर ही,
'मानस' जो चक्के नीचे, नींबू को दबावे रे।
मिर्ची का जो टाँग धागा, नज़र से बचाना चाहे,
नियम को तोड़ खुद, खंभे से भिड़ावे रे।
१०१. ट्रेन की मिडिल बर्थ का महा-संग्राम
लोअर पै बैठ लोग, चाय और गप्प मारें,
'मानस' जो मिडिल वाला, नींद में जो डोले रे।
खोलूँ मैं जो बर्थ भाई, आठ ही जो बजे अभी,
सीट के जो नाम पर, झगड़ा ही बोले रे।
१०२. ऑफिस में बॉस की चमचागिरी (तरक्की का शॉर्टकट)
काम-धाम छोड़ बाबू, साहब के पीछे घूमे,
'मानस' जो जी-हुज़ूरी, दिन-रात करते रे।
चाय का जो कप थामे, जोक पै जो फर्जी हँसे,
बिना किसी मेहनत के, पद को ही भरते रे।
१०३. ब्याह-शादी में मुफ़्त की सलाह (ज्ञानी फूफा जी)
काम में न हाथ बंटा, टेंट की जो कमियाँ ढूँढे,
'मानस' जो हर कोने, राय को बहावे रे।
हलवाई के पास जाके, चीनी को जो कम बोले,
बिना काम बैठे-बैठे, रौब को जमावे रे।
१०४. कड़कती धूप और नेताओं का वीआईपी दौरा
धूप भारी तपे बाहर, नेता जी जो एसी छोड़,
'मानस' जो क्षेत्र बीच, दौरा को लगावे रे।
पीछे-पीछे चले भीड़, धूल जो उड़ावे भारी,
फोटो खिंचवा के सीधे, कार में समावे रे।
१०५. ऑनलाइन वीडियो देख खुद का इलाज (फर्जी डॉक्टर)
वैद्य और हकीम छोड़, फोन पै जो नुस्खा ढूँढे,
'मानस' जो काढ़ा पी-पी, जी को जलावे रे।
छोटी सी जो खाँसी होने, बड़ी सी बीमारी माने,
गूगल के ज्ञान बीच, होश को गँवावे रे।
१०६. बच्चों का स्कूल प्रोजेक्ट (माता-पिता की आफत)
थर्मोकोल शीट लावे, रात भर कैंची चलावे,
'मानस' जो होमवर्क, खुद ही बनाते रे।
बच्चा तो जो सोए सुख, बाप की जो पीठ दुखे,
स्कूल में जो नंबर मिले, अपनी शान जताते रे।
१०७. नई बहू की पहली रसोई (हलवे का इम्तिहान)
सासू जी खड़ी हैं पास, हाथ में जो चम्मच थाम,
'मानस' जो नई बहू, मन में डरावे रे।
नमक की जो जगह चीनी, भूल से जो डाल देवे,
पहली रसोई बीच, आफत ही आवे रे।
१०८. विवाह से पूर्व कुंडली मिलान (ग्रहों का खेल)
गुण जो मिलाने बैठ, पंडित जी पोथी खोलें,
'मानस' जो राहु-केतु, बीच में डरावे रे।
मंगल का दोष बता, महँगी जो पूजा माँगे,
सच्चा जो होवे प्यार, वहम ही छुड़ावे रे।
१०९. मॉल के बाहर महँगी पार्किंग (बटुए पर डाका)
शॉपिंग की चाह बीच, गाड़ी को जो अंदर मोड़े,
'मानस' जो पर्ची हाथ, गार्ड ही थमावे रे।
सौ का नोट लेवे पहले, घंटे के हिसाब से ही,
सामान से महँगा यहाँ, खड़ा करना पावे रे।
११०. हर बात पर कोर्ट-कचहरी की धमकी (फर्जी रौब)
बात-बात बीच बोले, केस मैं करूँगा तुमपे,
'मानस' जो थानेदार, चाचा को बतावे रे।
कागज़ का नोटिस भेज, रौब जो जमावे भारी,
वकील की फीस देख, होश को गँवावे रे।
१११. चुनाव का रंग-बिरंगा घोषणा-पत्र (हवाई महल)
रंग-बिरंगा कागज़ छाप, वादे जो हजार लिखें,
'मानस' जो जनता को, जाल में फंसावे रे।
जीतने के बाद बाबू, फाइल अलमारी बंद,
पाँच साल तक फिर, शक्ल न दिखावे रे।
११२. त्योहारों पर सोनपापड़ी का चक्रव्यूह (सदाबहार तोहफा)
दीपावली का जो पर्व, डिब्बा जो मँगावे लोग,
'मानस' जो सोनपापड़ी, घर-घर डोले रे।
वही डिब्बा घूम-घूम, वापस ही पास आए,
तोहफे के नाम पर, खेल ही जो बोले रे।
११३. नई नौकरी में पहला दिन (दफ्तर का संकोच)
नया-नया बैग टाँग, दफ्तर में जा के बैठे,
'मानस' जो कोने बीच, चुप ही जो साधे रे।
पास कोई आए नहीं, खुद ही जो चाय पीवे,
काम-धाम कुछ नहीं, वक्त को ही बांधे रे।
११४. सोसायटी की मीटिंग का क्लेश (अपार्टमेंट की पंचायत)
सजी है जो सभा आज, पार्क बीच बैठ लोग,
'मानस' जो मेंटेनेंस, बात पे जो अड़ते रे।
रूफ और लिफ्ट छोड़, कुत्ता और गाड़ी बीच,
सभ्य लोग बन-बन, आपस में लड़ते रे।
११५. परीक्षा की सुबह का अंधा रट्टा (विद्यार्थी की आफत)
भोर ही जो आँख खुले, पोथी को उठावे हाथ,
'मानस' जो पन्ना-पन्ना, रट्टा ही जो मारे रे।
प्रश्न जो बदल आया, बुद्धि ही जो चकराए,
परीक्षा के हॉल बीच, माथ को धुनारे रे।
११६. ब्याह के वीडियो की अजीब मिक्सिंग (फर्जी सिनेमा)
दूल्हा और दुल्हन का, हाथ थाम उड़ना जो,
'मानस' जो वीडियो बीच, हेलीकॉप्टर लावे रे।
हॉलीवुड स्टाइल मिक्स, गानों का जो शोर भारी,
ब्याह का जो सीन छोड़, सर्कस दिखावे रे।
११७. आधुनिक रसोई में मिक्सी का हुड़दंग
मसाला जो पीसने को, बटन दबावे नारी,
'मानस' जो मिक्सी ऐसा, शोर को मचावे रे।
बाजे जैसे रेलगाड़ी, काँपे सारा घर बार,
आस-पास खड़ा कोई, बहरा हो जावे रे।
११८. सरकारी राशन की दुकान (लंबा इंतज़ार)
थैला हाथ कतार खड़ी, धूप बीच रेंगती जो,
'मानस' जो राशन वाली, दुकान पै डोले रे।
गेहूँ और तेल बीच, कंकड़ जो मिले भारी,
तौलने की बारी आए, डंडी ही जो बोले रे।
११९. चाय की टपरी पै विश्व-राजनीति (हवाई ज्ञान)
हाथ में जो कुल्हड़ ले, बेंच पै जो बैठ लोग,
'मानस' जो देश-विदेश, चर्चा चलाते रे।
रूस और चीन बीच, युद्ध को जो रोक देते,
ज्ञान का जो सागर बहा, रौब को जमाते रे।
१२०. ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरी (भूख और इंतज़ार)
स्क्रीन पै जो नज़र टिकी, नक्शा को निहारे आँख,
'मानस' जो लड़का अभी, मोड़ पै ही आया रे।
भूख से जो पेट रोए, ठंडा जो मिला है माल,
पैसे भी जो कड़े ले के, आफत कमाया रे।
१२१. बैंक में केवाईसी (KYC) का अंतहीन झंझट
कागज़ का टुकड़ा हाथ, फोटो और फॉर्म लेके,
'मानस' जो लाइन बीच, दौड़ को लगावे रे।
बाबू बोले लिंक फेल, कल तुम आना भाई,
खाता चालू करने हेतु, चप्पल घिसावे रे।
१२२. नई गाड़ी पर पहली खरोंच (मालिक का दर्द)
चाव से जो साफ़ करी, कपड़े से पोंछ-पोंछ,
'मानस' जो गली बीच, कोई मार गया रे।
लंबी सी जो लीक देख, छाती पै जो सांप चले,
पहली खरोंच देख, चैन ही जो गया रे।
१२३. शादियों में नागिन डांस का हुड़दंग (सड़क का सर्कस)
रूमाल को मुँह दबा, धरती पै लोट जाए,
'मानस' जो डीजे बीच, नागिन जो बनत रे।
पैरों की जो ताल भूले, कपड़ों की लाज छूटी,
पी के जो पौवा भाई, नाली में गिरत रे।
१२४. मोबाइल पर स्पैम कॉल्स की आफत (लोन वाले बाबू)
घंटी बजी फोन बीच, ज़रूरी जो काम छोड़,
'मानस' जो हैलो बोले, रौब को दिखावे रे।
लोन ले लो सर आप, क्रेडिट कार्ड ले लो,
फालतू का ज्ञान दे के, भेजा को पकावे रे।
१२५. शादी के बफ़े में महँगी कुल्फी का धोखा
लंबी सी कतार खड़ी, मलाई की चाह बीच,
'मानस' जो अंत में ही, डंडी हाथ आई रे।
दूध का न स्वाद कुछ, बर्फ का जो गोला निकला,
मीठे के जो नाम पर, आफत ही खाई रे।
१२६:
व्यंग्य के ये बाण सारे, पूर्ण हुए चाव बीच,
'मानस' जो सुधी जन, शीश को झुकावे रे।
पिंगल की शुद्ध रीति, छंद को सँवार दिया,
पारखी जो आँख देख, मोद को मनावे रे।
१२७:
काव्य की ये कड़ियाँ जो, जग को आईना देंगी,
दोषमुक्त वाणी आज, ग्रंथ रूप सोहे रे।
कवि की ये लघु भेंट, सुपुर्द समाज के है,
'मानसचर्चा' की तान, जन-मन मोहे रे।
🏁 ग्रंथ का अंतिम शास्त्रीय वाक्य (पुष्पिका):
।। इति श्री गिरिजाशंकर तिवारी 'मानस' विरचिते "मानस के व्यंग्य-बाण: रूपघनाक्षरी शतक" संपूर्णम्
मंगल-कामना
काव्य का ये ग्रंथ आज, पूर्ण हुआ देव कृपा,
'मानस' जो हाथ जोड़, मंगल को चाहे रे।
दूर होवे द्वेष सारा, प्रीत की बहे जो धार,
जग का कल्यान होवे, मोद सब पाहे रे।
कवि परिचय
कवि का नाम: श्री गिरिजाशंकर तिवारी शांडिल्य 'मानस'
साधना और रुचि: पिंगल शास्त्र (छंद शास्त्र) का गूढ़ ज्ञान, छंदोबद्ध /स्वच्छंद छंद में काव्य-सृजन और समसामयिक विषयों पर ओजस्वी एवं व्यंग्यपरक लेखन।
निवास भूमि: मारवाड़- मूंडवा, नागौर , (राजस्थान)।
कृतज्ञता ज्ञापन (आभारोक्ति)
साहित्यिक आभार
"मानस के व्यंग्य-बाण: रूपघनाक्षरी शतक" की इस दीर्घ और कठिन काव्य-यात्रा के पूर्ण होने पर मैं उन सभी सुधी पाठकों, साहित्य-मनीषियों और गुणी समीक्षकों के प्रति अंतःकरण से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने एक-एक वर्ण की शुद्धि पर कड़ा पहरा रखने में मेरा मार्गदर्शन किया।
पिंगल के कड़े तराजू पर छंदों को तौलने, त्रुटियों को तत्काल टोकने और मेरी लेखनी को संबल देने वाले समस्त सहृदय मित्रों का यह ऋण साहित्यिक मर्यादा के रूप में इस ग्रंथ की आत्मा में सदैव सुरक्षित रहेगा।
संवत्: — श्री विक्रमी संवत् २०८३
संवत्सर: — रौद्र नामक संवत्सर
शके: — श्री शालिवाहन शक १९४८
अयन: — उत्तरायण
ऋतु: — ग्रीष्म ऋतु
मास: —प्रथम ज्येष्ठ मास
पक्ष: — शुक्ल पक्ष
तिथि: — तृतीया तिथि (आज संध्याकाल तक, तत्पश्चात चतुर्थी)
वासर: — भौमवासर (मंगलवार)
दिनांक: १९ मई २०२६ (19 May 2026)