१.
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८.
९.
१०.
सृष्टि के आरंभ से ही शक्ति जब-जब मदोन्मत्त होकर धर्म की सीमाओं को लांघने लगी, तब-तब ब्रह्म-तेज ने शस्त्र धारण कर धरा को अभय प्रदान किया। भगवान भृगु-नंदन का चरित्र केवल क्रोध का नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध उस महा-संकल्प का है, जो समाज में समता और न्याय की स्थापना करता है।
"श्री परशुराम-मानस काव्य" की यह शब्द-यात्रा मेरे अंतर्मन की व्याकुलता और श्रद्धा का प्रतिफल है। इस काव्य को रचने का उद्देश्य मात्र शब्दों का संचय नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उस 'चिरंजीवी' महामानव के आदर्शों से परिचित कराना है, जिन्होंने सत्ता का मोह त्यागकर उसे ऋषियों के चरणों में अर्पित कर दिया।
इस सृजन का संपूर्ण श्रेय मेरे दीक्षा गुरु श्री चंद्रभूषण तिवारी जी के मार्गदर्शन और गुरु-प्रवर श्री महेंद्र तिवारी जी के पुण्य-प्रताप को जाता है। उनकी कृपा-दृष्टि ही वह ऊर्जा है, जिसने मेरी लेखनी को 'परशु' की प्रखरता और 'मानस' की शीतलता प्रदान की। गुरु-सत्त्ता के आशीर्वाद बिना यह महा-अनुष्ठान संभव न था।
यह काव्य बारह सोपानों में विभक्त है, जो भगवान के जन्म से लेकर उनके चिरंजीवी होने तक की गाथा को शास्त्रीय मर्यादा में समेटे हुए है। अंत में दी गई चालीसा और अष्टकम् भक्तों के नित्य कल्याण हेतु हैं।
मैं कोई सिद्ध कवि नहीं, केवल गुरु-चरणों का एक साधारण सेवक हूँ। यदि इस काव्य में कोई त्रुटि शेष रही हो, तो उसे मेरी अल्पज्ञता समझकर क्षमा करें और यदि इसमें कोई ओज या रस आपको स्पर्श करे, तो उसे गुरु-कृपा ही समझें।
आशा है कि यह 'परशुराम-मानस' आपके हृदय में भक्ति और राष्ट्र-प्रेम की नई ज्योति प्रज्वलित करेगा।
प्रथम मंगलाचरण एवं कुल-गौरव १ - २१ भृगु वंश की वंदना, जमदग्नि-रेणुका का तप एवं राम का जन्म।
द्वितीय बाल्यकाल एवं संस्कार २२ - ४२ बाल्यवस्था, शस्त्र-शास्त्र की प्रारंभिक शिक्षा एवं मर्यादित आचरण।
तृतीय शिक्षा एवं साधना ४३ - ६३ महेन्द्र-गिरि पर गुरु-दीक्षा, दिव्यास्त्रों की प्राप्ति एवं तपस्या।
चतुर्थ महिष्मति का मद ६४ - ८४ सहस्रबाहु का अहंकार, निरंकुश सत्ता और अधर्म का उदय।
पंचम अतिथि धर्म एवं विश्वासघात ८५ - १०५ आश्रम में नृप का आगमन, कामधेनु का लोभ और छल का कृत्य।
षष्ठ पितृ-आज्ञा एवं दंड १०६ - १२६ राम का प्रत्यागमन, प्रथम युद्ध और सहस्रबाहु का वध।
सप्तम पिता का बलिदान १२७ - १४७ नृप-पुत्रों द्वारा ऋषि की हत्या, रेणुका का विलाप और महा-प्रतिज्ञा।
अष्टम महाभीषण रण १४८ - १६८ २१ बार पृथ्वी का शोधन, आततायियों का अंत और परशु का तांडव।
नवम न्याय व्यवस्था १६९ - १८९ विजित धरा का कश्यप को दान, सत्ता का त्याग एवं लोक-कल्याण।
दशम शिक्षाप्रद संवाद १९० - २१० भीष्म और कर्ण को दीक्षा, शक्ति और शील के संतुलन का बोध।
एकादश आध्यात्मिक मिलन २११ - २३१ शिव-धनुष भंग, श्रीराम से मिलन एवं अवतारों का सामंजस्य।
द्वादश चिरंजीवी एवं फलश्रुति २३२ - २६०महेन्द्र-गिरि पर वास, कल्कि अवतार की प्रतीक्षा एवं ग्रंथ महिमा।
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३.
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२०.
२१.
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते गुरु-प्रवर-श्री-महेन्द्र-तिवारी-आशिर्वादेन 'मंगलाचरण-कुल-गौरव' नाम प्रथमः सोपानः समाप्तः ॥
२२.
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इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते दीक्षा-गुरु-श्री-चन्द्रभूषण-तिवारी-प्रेरणया 'बाल्यकाल-संस्कार' नाम द्वितीयः सोपानः समाप्तः ॥
४३.
४४.
४५.
४६.
४७.
प्रकृति के हर स्वर का, साँसों में साक्षात्कार किया।
न थके न झुके न रुके,संकल्प अडिग दृढ़ भूधर सा,
राम वह पावन जीवन—शुभ्र दिव्य अनुष्ठान सा।
४८.
ब्रह्मास्त्र-शिखा को जिसने, संकल्पों से शांत किया,
दिव्यास्त्रों के महा-वेग को, तप-ऊर्जा से दीप्त किया।
मथ ज्ञान-सिंधु पौरुष का, अनमोल उन्होंने रत्न लिया,
जिसके आगे सुर-चाप ने, नत होने का यत्न किया।
४९.
सीखा उन्होंने कि शस्त्र मात्र, हिंसा का आधार नहीं,
बिना न्याय के वीरत्व का, जग में कोई सार नहीं।
अस्त्र वही जो धर्म बचाए, अस्त्र वही जो मान रखे,
वही वीर जो रण-भूमि में, मर्यादा का ध्यान रखे।
५०.
संयम-साधन की ज्वाला में, गल कर कुंदन-रूप हुए,
राम-प्राण में अखिल विश्व के, वैभव रूप अनूप हुए।
सौम्य चित्त, कर-कमलों में, महाकाल का वज्र-प्रहार,
उद्यत है छिन्न करने को, दनुज-दंभ का सघन अंधार।
५१.
शास्त्रों के मर्मज्ञ बने वे, शस्त्रों के आचार्य महान,
विप्र में जाग उठा —क्षत्रिय सा अभिमान-विमल।
वेद-पाठ से गूँजता कंठ, दृष्टि में रण का ज्वार रहा,
आने वाले कल हेतु अब—परशु ही आधार रहा।
५२.
ब्राह्मण का तप-पुंज , क्षत्रिय सा भुज-दंड प्रबल,
निकल पड़ा महाप्राण, करने अधर्म का वंश विफल।
एक हाथ में वेद-ऋचाएँ, दूजे में तीक्ष्ण कुठार रहा,
शांति और क्रांति का संगम, अद्भुत अवतार रहा।
५३
अब शांत सरोवर मानस, प्रलय-सिंधु सा उमड़ उठा,
साधना-कक्ष से वीर पुरुष, रण-भेरी सा मचल उठा।
"साधना पूर्ण हुई अब, शस्त्रों का न्याय शुरू होगा,
जो अहंकारी सिर न झुके, उनका अंत लिखा होगा।"
५४.
जब पूर्ण हुई साधना, छोड़ शिखर दिव्य कैलाश,
तब चले भृगु-कुल नंदन, लिए हृदय में नया प्रकाश।
पग-पग पर गूँजी पद-चापें, पर्वत ने भी मार्ग दिया,
सिद्ध-पुरुष के स्वागत में , पवन ने मंगल-गान किया।
५५.
दूरी घटी और दिखने लगे, चिर-परिचित वे वन-प्रांतर,
जहाँ गूँजते थे वेदों के, पावन मंत्र और स्वर-अंतर।
तप-ऊर्जा की आभा मुख पर, कंधों पर दिव्य कुठार,
लौट रहा था शांत तपस्वी, बनने को जग का आधार।
५६.
कुश-आसन पर लीन जहाँ , तात जमदग्नि महा-तेजस्वी,
ब्रह्म-ज्ञान के सिंधु अनूठे, परम शांत और तेज मनस्वी।
पुत्र को देख नयन सजल हुए, हर्षित हुआ ऋषि का मन,
साधना संपन्न कर आया , करने कुल का नाम धन्य धन।
५७.
दौड़ कर आईं मात रेणुका, ममता का वह सिंधु अपार,
देख पुत्र का दिव्य कलेवर, नयनों से बह निकली धार।
तप ने जिसे बना दिया था, वज्र-समान कठोर महा,
माँ की ममता के आगे वह, फिर से बना अबोध रहा।
५८.
सुनाया जब महादेव का, वह पावन संदेश अनूप,
कैसे दीक्षा और शस्त्र दे, निखरा उनका दिव्य स्वरूप।
हर्षित हुए देख ऋषि-दंपति, परशुराम का महा-प्रताप,
मिटने को अब कोसों दूर था, आर्यावर्त का हर संताप।
५९.
जमदग्नि बोले— "सुनो वत्स! यह शस्त्र नहीं बस हिंसा है,
यह पीड़ित की करुण पुकार और अधर्मी की मीमांसा है।
ब्राह्मण की करुणा मत तजना, पर अन्यायी को दंड मिले,
तप-बल की उस मर्यादा में, न्याय-पुष्प ही सदा खिले।"
६०.
पावन धेनु कपिला ने भी, अपना स्नेह लुटाया था,
ब्रह्म-तेज के रक्षक को , मस्तक अपना नवाया था।
ऋषि-आश्रम की गोधूलि में, अलौकिक वह दृश्य रहा,
जैसे किसी महा-क्रांति का, प्रथम सर्ग अब शुरू हुआ।
६१.
पर आँखों में था एक संकल्प, और अधरों पर मौन प्रखर,
जान रहे थे वे कि निकट है, अब अधर्म का महा-समर।
साधना की यह शांति मात्र, तूफ़ान की एक भूमिका थी,
पाप-भरी इस वसुंधरा की, अब बदलने वाली नियत थी।
६२.
पग आश्रम की ओर, मन में अमिट शान्ति का वास,
पर नियति रच रही कही, भीषण रण का नया इतिहास।
एक ओर ऋषि-पुत्र सौम्य है, दूजी ओर अधर्म प्रबल,
महिष्मति के राज-भवन में, खौल रहा मद हलाहल।
६३.
साधना की इस पावनता पर, ग्रहण लगाने काल खड़ा,
अहंकार का वह मद-हस्ती, मर्यादा से आज लड़ा।
मौन अभी है परशु महाप्रभु, पर ज्वाला अब जागेगी,
महिष्मति के उस वैभव पर, प्रलय-भस्म अब छाएगी।
तृतीय सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते भृगु-कुल-दीप्तौ 'शिक्षा-साधना' नाम तृतीयः सोपानः समाप्तः ॥
॥ चतुर्थ सर्ग: महिष्मति का मद ॥
६४.
नर्मदा के उन तटों पर, महिष्मति का राज रहा,
सहस्रबाहु के मस्तक पर, दंभ का वह ताज रहा।
हज़ारों भुजाओं का बल लेकर, वह उन्मत्त गयंद हुआ,
न्याय और मर्यादा से, जो पूर्णतः अब अंध हुआ।
६५.
स्वर्ण के ऊँचे महलों में, वह अपनी ही हस्ती में था,
जन-पीड़ा से दूर खड़ा, वह अपनी ही मस्ती में था।
उसने समझा बाहुबल ही— सृष्टि का ध्रुव सत्य है,
भूल गया निरंकुश सत्ता—पाती निश्चित गर्त है।
६६.
विप्र का उपहास उड़ाना, उसका अब स्वभाव बना,
अत्याचार और दमन ही, शासन का प्रभाव बना।
महिष्मति का वह मद ऐसा—ज्यों काली घटा घिरी,
जिसके कारण मानवता भी—पग-पग पर रही गिरी।
६७.
तपोवन की उन सीमाओं पर, उसकी छाया पड़ने लगी,
अधर्म की वह बेल अब तो, मर्यादा को डसने लगी।
सहस्रबाहु को अपनी शक्ति—पर ऐसा अभिमान हुआ,
जैसा स्वयं विधाता को भी—सृष्टि पर न गुमान हुआ।
६८.
पर उसी ओर आश्रम में बैठी, कामधेनु वह दिव्य खड़ी,
जिसकी महिमा की चर्चा थी—सारे जग में बड़ी-बड़ी।
वह न केवल पशु थी, वह तो—पुण्य का प्रतिमान रही,
जमदग्नि के तपोबल का—जीवित एक विधान रही।
६९.
उस गऊ के उस अमृत-दुग्ध से, पलते थे सब दीन-दुखी,
जिसके दर्शन मात्र से होते—सारे ही तब जीव सुखी।
महिष्मति के कानों तक भी, उसकी वह कीर्ति पहुँची थी,
लोभ की वह काली जड़ अब—नृप के मन में उलझी थी।
७०.
"ऋषि के घर ऐसी निधि!"—राजा के मन में शूल उठा,
अधर्म का वह पुराना बीज, अब बनकर बबूल उठा।
यहीं से अब आरम्भ हुआ—विनाश का वह प्रथम चरण,
सहस्रबाहु के मद ने ही—लिखा अपना स्वयं मरण।
७१.
मद में डूबा वह अधिपति, अब विवेक को भूल गया,
पाप-वृक्ष के झूलों पर, वह हठ के वश में झूल गया।
"जिसके पास सहस्र भुजाएँ, वह ही जग का स्वामी है",
भूल गया कि महाकाल सदा, सबका अंतर्यामी है।
७२.
महिष्मति की गलियों में, अब केवल दंभ का शोर रहा,
सत्य और मर्यादा का, अब टूट चुका हर छोर रहा।
नृप के मन में कामधेनु की, अब वह विकट पिपासा है,
तपोवन की शांति झुलस दे, छल की ऐसी ज्वाला है।
७३.
सहस्रबाहु ने सेना को, प्रस्थान का आदेश दिया,
अतिथि धर्म की आड़ में, अब विष का सानिध्य लिया।
"चलो ऋषियों की कुटिया में, देखें कैसा वैभव है,"
अधर्म के उस मानस में, अब जाग उठा जो भैरव है।
७४.
वन के पावन पशु-पक्षी भी, देख सैन्य को सहम गए,
मानो किसी शांत सरिता में, खौफ़ के पत्थर जम गए।
पर महिष्मति का मद अब तो, सीमाएँ सब तोड़ चुका,
अपने विनाश के द्वार से, वह नाता अपना जोड़ चुका।
७५.
एक ओर वह बाहुबल था, दूजी ओर तप-शक्ति खड़ी,
आने वाली थी अब तो, वह महा-परिवर्तन की घड़ी।
राजा का रथ बढ़ा तीव्र, आश्रम की ओर उन्मत्त हो,
भाग्य स्वयं भी देख रहा, जो पाप में अब संतप्त हो।
७६.
दसों दिशाएँ काँप उठीं, जब घोड़ों की वह टाप पड़ी,
मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा, अब संकट में आ खड़ी।
वह मद नहीं, वह तो बस—अंधकार का घेरा था,
जिसके पीछे परशुराम का—उगने वाला सवेरा था।
७७.
सहस्रबाहु का यह संकल्प, अब उसका ही पाश बना,
लोभ-अनल की ज्वाला में, उसका अपना नाश बना।
उसका ऐसा का मद देखो, अपने चरम पर आया है,
तपोवन की पावनता पर, काल-रात्रि का साया है।
७८.
पग-चाप से वन गूँज उठा, जब नृपति का दल पास था,
मृग-छौनों के उस मौन में, अब भय का नया निवास था।
सहस्रबाहु का वह स्वर्ण-रथ, कुटिया के द्वारे आ खड़ा,
अधर्म के उस घोर दंभ का, साया धरा पे अब पड़ा।
७९.
उठे ऋषि कर जोड़कर, "आओ नृपति! सौभाग्य है,
विप्र के इस शांत घर में, भूप भी अब आराध्य है।"
कुश-आसन जल प्रेम की पावन अनुपम धार,
ऋषि ने किया दम्भी का, निश्छल मन सत्कार।
८०.
इशारे मात्र पर उस गऊ ने, दिव्य भोग बनाई थी,
अगणित सैन्य हेतु वह, छप्पन भोग सजाई थी।
अमृत- दुग्ध धारा से , सब अनुपम पकवान सजे,
देखकर वह सिद्ध-शक्ति, नृप के मन में कुचक्र जगे।
८१.
वह केवल पशु न थी, वह तो—तपस्या का ही रूप थी,
पर पापी की उन आँखों में, वह लोभ की प्रखर धूप थी।
"यह शक्ति महलों में नहीं!"—राजा का मन डोल उठा,
विश्वास की उस नींव को, छल का वो कीड़ा खोल उठा।
८२.
कृतज्ञता मर गई वहाँ, जहाँ स्वार्थ ने अब जन्म लिया,
सहस्रबाहु ने ऋषि-भरोसे का, सरेआम कत्ल किया।
अतिथि बनकर जो आया था, वह अब डाकू सा खड़ा,
ब्राह्मण के उस सत्य पर, अब लालच का ही साया पड़ा।
८३.
"छीन लो यह कामधेनु! विप्र को इसकी क्या पीर?"
राजा की उस कुमति ने, अब खींची विनाश की लकीर।
दानवी उस प्यास ने, अब मर्यादा को कुचल दिया,
जिसने खिलाया अन्न उसे ही, राजा ने अब छल दिया।
८४.
"राजन! यह सुरधेनु पावन, विप्र की बस सम्पदा है,
लोभ-दृष्टि से देखना इसे—राज्य पर अब आपदा है।"
विनीत स्वर ऋषि खड़े, नयन में सत्य का तेज था,
अन्यायी के उस हठ हेतु, यह ही अंतिम परहेज था।
चतुर्थ सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते अधर्म-मर्दन-प्रसंगे 'महिष्मति-मद' नाम चतुर्थः सोपानः समाप्तः ॥
॥ पंचम सर्ग: अतिथि धर्म और विश्वासघात ॥
८५.
खड़ा सत्य था अविचल , लिए ब्रह्म का दिव्य प्रकाश,
किन्तु दंभ की आँखों पर था, छाया घोर तम-पाश।
ऋषि स्वर शांत हिमालय, राजा का मद प्रलय-समान,
एक ओर मर्यादा जीवित, एक ओर था काल-विधान।
८६.
बोला तब वह नृप अहंकारी, "ऋषि! तेरा यह ज्ञान व्यर्थ,
शक्ति जहाँ हो श्रेष्ठ जगत में, वहाँ नीति के शब्द अनर्थ।
यह सुरधेनु अब मेरी होगी, महिष्मति का मान बने,
विप्र-कुटी की शोभा तजकर, राज-भवन की शान बने।"
८७.
भूल गया वह मूढ़ कि सत्ता, बिना धर्म के बोझ प्रबल,
जब-जब राजा अंधा होता, तब-तब जलता राष्ट्र-कमल।
धन बल का मद चढ़ जाए, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है,
पतन-मार्ग की ओर ही फिर, नियति उसे ले जाती है।
८८.
गरज उठे जमदग्नि तब, "सुन ओ राजा! होश सँभाल,
लोभ-अग्नि में जल जाएगा, तेरा यह सारा सुख-भाल।
सुरधेनु कोई वस्तु नहीं है, यह तप का आधार महान,
छीन न सकता कोई बल से, विप्र-पुण्य का यह वरदान।"
८९.
अट्टहास कर उठा बाहुबल, "कौन मुझे अब रोकेगा?
सहस्र भुजाओं के इस बल को, कौन यहाँ अब टोकेगा?
इंद्र का ऐश्वर्य झुका है, मेरे इन चरणों के पास,
क्या तेरी यह कुटिया देगी, मुझको कोई त्रास?"
९०.
"बल का अर्थ दमन नहीं ! बल का अर्थ सुरक्षा है,
अन्यायी के हाथों में तो, शस्त्र स्वयं एक भिक्षा है।
भूल न तू कि इस धरती पर, ईश्वर का भी न्याय कहीं,
जहाँ खौलता क्रोध सत्य का, वहाँ बचता अन्याय नहीं।"
९१.
सैनिक बढ़े अधर्म के पथ पर, ऋषि का आज्ञा-भंग किया,
तपोवन की शांति को पापी, चरणों से मद-भंग किया।
पकड़ लिया उस सुरधेनु को, लोभ की बेड़ी डाल प्रखर,
काँप उठी वह धरा स्वर्ग की, देख कृत्य यह अति बर्बर।
९२.
क्षत्रिय का बल शस्त्रों में है, विप्र का बल है ब्रह्म-तेज,
शस्त्र हारते जब आता है, सत्य का वह अप्रतिम वेग।
भस्म हो जाता दंभ शिखर , जब तपस्वी की आँख खुले,
अधर्म का हर सिंहासन फिर, न्याय की उस धार धुले।
९३.
जो जैसा बोता है जग में, वैसा ही फल पाता है,
अहंकार का मीठा विष , अंत में काल बुलाता है।
राज-मुकुट का गौरव जब, ऋषि-चरणों का अपमान करे,
तब नियति भी फिर राजा का, जमकर बदतर हाल करे।
९४.
सैनिक बढ़े उस ओर जहाँ, सजल नयन सुरभि खड़ी,
आश्रम की उस शांति पर, अब विपदा की बेला पड़ी।
बछड़े बिलखते रह गए, और गऊ ने भी हुंकार दी,
अधर्म की उस भीड़ ने, अब मर्यादा ही मार दी।
९५.
मौन खड़े जमदग्नि ऋषि, पर अंतर्मन में ज्वाल थी,
यह क्षमा नहीं, यह तो अधर्मी के अंत की ही ढाल थी।
"अतिथि का यह रूप है?"—ऋषि ने बस एक प्रश्न किया,
सहस्रबाहु ने उत्तर में, केवल क्रूर अट्टहास दिया।
९६.
जंजीरें अब डाली गईं, उस कामधेनु के कंठ पर,
जैसे कोई वज्र गिरा हो—पुण्य के उस तन पर।
तपोवन की वे लताएँ, भी रो पड़ीं उस दृश्य से,
मगर राजा सानन्द था, अपने कुत्सित कृत्य से।
९७.
रेणुका के नयन में, ममता और रोष का संगम हुआ,
आश्रम के उस आँगन में, अब धर्म ही भंग हुआ।
विश्वास की वह पावन वेदी, लोभ ने झुलसा दी आज,
सत्ता ने अपनी हस्ती को, स्वयं ही लजा दीआज।
९८.
गऊ को ले बढ़ा वह दल, धूल उड़ती चहुँ ओर थी,
अत्याचार की वह खींचती—अब अंतिम कोई डोर थी।
पीछे छूटा विप्र का—वह टूटा हुआ विश्वास रहा,
पर उसी खँडहर में अब—मृत्यु का उपहास रहा।
९९.
राजा न जानता था कि उसने—किस ज्वाला को छेड़ा है,
इस गऊ के हर इक पग में—अब सर्वनाश का घेरा है।
अतिथि-धर्म को मारकर, उसने स्वयं को मार लिया,
महिष्मति के विनाश का, उसने अब पथ धार लिया।
१००.
शाप नहीं दिया ऋषि ने, पर मौन ही अब अस्त्र था,
तपस्या की उस शक्ति का, यह ही अंतिम शस्त्र था।
धरा काँपी, अम्बर रोया, देख यह विश्वासघात,
होने को थी अब यहाँ—एक भीषण प्रतिघात।
१०१.
हवाओं में अब गूँजती—एक आने वाली आहट थी,
पाप के उन गलियारों में—अब होने वाली कड़वाहट थी।
राम (परशुराम) अभी दूर थे, पर नियति उन्हें बुला रही,
अधर्म के उस शीश पर, अब परशु ही थी मँडरा रही।
१०२.
विश्वासघात का कलंक, नृप के माथे का तिलक बना,
जिसने उसे ही डस लिया, जिसका वह था पालक बना।
मर्यादा का वह हनन ही, अब युद्ध का आधार है,
सहस्रबाहु के भाग्य पे, अब काल का ही प्रहार है।
१०३.
आश्रम की वह रिक्तता, अब संहारक घोर बनेगी,
राजा के उस गर्व हेतु, यह अंतिम छोर बनेगी।
ऋषि धेनु पर पड़ी जो व्यथा, अब मोड़ नया ले रही,
अधर्म के उस खेल को, अब सत्य दिशा दे रही।
१०४.
विश्वासघात की अग्नि में, अब सब कुछ ही स्वाहा होगा,
सहस्रबाहु के उस मद का, अब स्वयं ही दाह होगा।
अतिथि-धर्म के लहू से, जिसने अपनी प्यास बुझाई है,
उसने अपने ही पतन की, अब स्वयं ही नींव हिलाई है।
१०५.
न झुको कभी अन्याय से, चाहे पर्वत सा अवरोध खड़ा,
हो सत्य साथ तो जान लो—मनुष्य देवों से भी बड़ा।
अब परशु उठेगा न्याय का, और काल-चक्र मुस्काएगा,
इतिहास गवाही देगा — अब अहंकार मिटाया जाएगा!
पंचम सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते कामधेनु-लोभ-वर्णने 'अतिथि-धर्म-विश्वासघात' नाम पंचमः सोपानः समाप्तः ॥
॥ षष्ठ सर्ग: पितृ-आज्ञा एवं दंड ॥
१०६.
लौटे जब कुटिया में राम, देखा रिक्त वह स्थान खड़ा,
माता की उन आँखों में, दुख का सिन्धु महान पड़ा।
गऊ नहीं, बछड़े बिलखते, आश्रम की वह धूल उड़ी,
अधर्म की वह कुत्सित छाया, अब तो चारों ओर मुड़ी।
१०७.
कहाँ गई वह सुरभि माता? किसका यह प्रमाद है?"
राम के उन नयनों में अब, उठता महा-विषाद है।
रेणुका ने रोकर सुनाई—नृप के उस विश्वास की कथा,
कैसे अतिथि बनकर, दी ऋषि-कुल को भीषण व्यथा।
१०८.
जमदग्नि ने पुत्र को देखा, मौन शांत गम्भीर खड़े,
पर उनके तप के आसन भी, आज क्रोध से थे उखड़े।
"पुत्र! क्षमा तब कायरता है, जब मर्यादा टूट गई हो,
ब्राह्मण की पावन करुणा, जब अधर्म से लूट गई।"
१०९.
"जाओ राम! ले आओ वापस, उस पावन कामधेनु को,
दण्डित करो उस दम्भी को, जिसने छला है वेणु को।"
पिता आज्ञा मिलते ही, राम महाकाल से जाग उठे,
तप की उस ठंडी राख से, फिर से अंगारे दहक उठे।
११०.
हाथ बढ़ा और कंधे पर, वह परशु स्वयं ही आ बैठा,
दुष्ट दलन हेतु आज फरसा,बार बार है आज ऐंठा।
अक्षय तूणीर, कोदण्ड सजा, मस्तक पर तेज प्रखर,
बढ़ चला विप्र योद्धा , ढाने महिष्मति पर कहर ।
१११.
वायु का वेग भी रुक गया, देख राम का भीषण रूप,
जैसे शीतल चाँदनी से, प्रस्फुटित हुई हो महा-धूप।
वन के जंतु भी मार्ग छोड़, वंदन करने को खड़े हुए,
न्याय की उस मशाल के पीछे, अब तो सारे जुड़े हुए।
११२.
महिष्मति के द्वारों पर, जब पहली बार हुंकार हुई,
जैसे प्रलय के मेघों की, अंबर में तीखी रार हुई।
"निकल बाहर ओ महिष्पति! तेरा यहाँ काल खड़ा,
विप्र की उस गौ के बदले, आज होगा तेरा नाश बड़ा।"
११३.
अट्टहास कर नृप बाहर आया, सहस्र भुजाएँ तान खड़ा,
देख अकेला एक ब्राह्मण, है अपने वह दंभ में पड़ा।
"रे बालक! तू क्या लड़ेगा, इन भुजाओं के सागर से?
चला जा वापस कुटिया में, मत खेल काल के डांगर से।"
११४.
राम हँसे और कहे—"भुजाएँ मांस का ढेर हैं,
बिना धर्म के वीरत्व के, सारे दिन ही अब फेर हैं।
आज देख तेरी इन भुजाओं की,गिनती कैसे होती है,
परशुराम की एक धार, अब तेरा गौरव खोती है।"
११५.
रणभेरी गूँजी चहुँओर, और तीरों की बौछार हुई,
राम के एक ही संधान से, रिपु-दल की अब हार हुई।
बिजली बन परशु जो घूमा, कटीं भुजाएँ यों सत्वर,
जैसे किसी महा-वृक्ष से, गिरते हों सूखे पल्लव-तर।
११६.
एक कटी, फिर दस कटी, फिर सौ भुजाएँ धूल हुईं,
सहस्रबाहु को अपनी शक्ति, की अब सारी भूल हुईं।
वह रक्त नहीं, वह तो मानो—पाप का ही विसर्जन था,
भृगु-नंदन के हर प्रहार में, न्याय का ही गर्जन था।
११७.
महिष्मति का वह मद अब, धूल बीच में लोट रहा,
राजा का वह सारा गौरव, अब तो खुद से छूट रहा।
हज़ारों भुजाओं का स्वामी, अब केवल इक ठूँठ बना,
जिसने समझा खुद को ईश्वर, अब काल का घूँट बना।
११८.
राम का वह रौद्र रूप, देख अंबर भी था सिहर गया,
विप्र का वह दंड आज, सीमाओं को अब बिहर गया।
एक प्रहार में नृप का मस्तक, परशु की उस धार चढ़ा,
अधर्म के उस घोर तिमिर का, अब तो पूर्ण अंत बढ़ा।
११९.
गिरे मुकुट और ढहे महल, जब न्याय का गर्जन हुआ,
सहस्रबाहु के उस आतंक का, अब पूर्णतः मर्दन हुआ।
कामधेनु को मुक्त करा, राम ने निज कर्तव्य किया,
अत्याचारी के उस मद का, उन्होंने अब अंतर्याम किया।
१२०.
पर यह अंत नहीं , यह बस—ज्वाला का आरम्भ रहा,
प्रतिशोध की उस अग्नि का, यह पहला बस स्तम्भ रहा।
राम लौटे आश्रम को वापस, गऊ को संग में लेकर के,
पिता के चरणों में शीश नवा, न्याय का अर्पण देकर के।
१२१.
शांत हुआ परशु का कोप, पर लहू की गंध अभी शेष थी,
आने वाले कल की आहट, अब तो अति-विशेष थी।
राजा के पुत्रों के मन में, प्रतिशोध का बीज जगा,
भृगु-कुल के सुख-चैन का, परशुराम ही है सगा।
१२२.
जमदग्नि ने सुत को देखा, पर हृदय में एक व्यथा रही,
"शस्त्र उठाना सरल है , पर कठिन धर्म की कथा रही।"
राम ने समझा मौन पिता का, परशु अभी न सोया था,
क्योंकि नियति ने तो अब—महायुद्ध का बीज बोया था।
१२३.
महिष्मति के खँडहर बोले—"बदला अभी तो बाकी है",
पाप के उन अवशेषों की—अंतिम अभी ये झाँकी है।
हवाओं में अब गूँज रही—एक नई विभीषिका की लय,
होने को है अब धरा पर—एक महा-भीषण प्रलय।
१२४.
परशुराम का शौर्य बढ़ा—पर मर्यादा की सीमा थी,
पर नियति के उस चक्र की—गति अभी तो धीमी थी।
प्रकृति के हर कोने में—दंड का यह विधान रहा,
विप्र-शक्ति के सम्मुख झुक—सारा राजसी मान रहा।
१२५.
पितृ-आज्ञा का मान रखा—और गऊ का सम्मान हुआ,
सहस्रबाहु के आतंक का—क्षण भर में अवसान हुआ।
पर इस विजय के पीछे ही—एक काला साया डोल रहा,
जो भृगु-वंश की खुशियों को—विष की नदी में घोल रहा।
१२६.
शमित हुआ परशु ज्वार, पर शोणित की गंध रही,
महिष्मति की हर ईंट अब—नियति के हाथों बंध रही।
यह विजय नहीं, यह तो—आने वाली प्रलय की आहट है,
भृगु-वंश की शांति पर,छाने वाली काल की कड़वाहट है।
षष्ठ सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते आततायी-दंड-प्रसंगे 'पितृ-आज्ञा-वध' नाम षष्ठः सोपानः समाप्तः ॥
॥ सप्तम सर्ग: पिता का बलिदान ॥
१२७.
राम गए थे दूर कहीं, वन-समिधा के संधान में,
आश्रम था निस्तब्ध खड़ा, निज भक्ति के सम्मान में।
तभी अचानक धूल उड़ी, चहुँओर घोर गर्जना हुई,
पाप की काली लकीर से, फिर पावनता की विजना हुई।
१२८.
सहस्रबाहु के पुत्र आए, प्रतिशोध की आग लिए,
हृदय में बस द्वेष का, वह विषैला सा नाग लिए।
"कहाँ छुपा वह विप्र बालक? कहाँ छिपा वह राम है?"
उनके हर इक अट्टहास में, बस अधर्म का नाम है।
१२९.
जमदग्नि थे ध्यान-मग्न, आसन पर निश्चल बैठे,
बाह्य जगत के शोर से, वे अपनी मुक्ति में बैठे।
न हाथों में कोई शस्त्र था, न मन में कोई बैर रहा,
पर नीच नृप-पुत्रों का वहाँ, अब तो भीषण कहर रहा।
१३०.
"पिता ने भुजाएँ खोईं, हम तेरा सर्वस्व हरेंगे",
नीचता की उस पराकाष्ठा को, आज वे खुद वरेंगे।
घेरा उन पाखंडियों ने, उस शांत और तपस्वी को,
जिसने अपनी साधना से, सींचा था इस पृथ्वी को।
१३१.
चलीं तलवारें निष्ठुर, उस निर्दोष तपोबल पर,
जैसे कोई वज्र गिरे, कोमल किसी कमल-दल पर।
इक्कीस घाव किए उन्होंने, उस पावन विप्र-देह पर,
कलंक लगा दिया उन्होंने, अतिथि-धर्म के स्नेह पर।
१३२.
"राम! राम!" पुकार उठी, पर वह तो वन में दूर था,
नियति का यह क्रूर खेल, अब तो चहुँओर क्रूर था।
रक्त से रंजित हुई धरा, जहाँ मंत्रों का वास था,
अधर्म के उस नंगे नाच का, यह चरम उपहास था।
१३३.
गिरा वह मस्तक भूमि पर, जो ज्ञान का आधार था,
भृगु-वंश की उस गरिमा का, जो पावन विस्तार था।
जमदग्नि का वह बलिदान, अब युग की नई पुकार बना,
शांति की उस वेदी पर, अब प्रतिशोध का श्रृंगार बना।
१३४.
रेणुका की चीख से, अम्बर का भी हृदय फट गया,
ममता का वह शीतल आँचल, आज लहू से पट गया।
छाती पीट रोई वह सती, "हे राम! तू कहाँ गया?
देख तेरे पिता का जीवन, आज छल से है लिया गया।"
१३५.
लौटे राम जब कुटिया में, देखा वह भीषण दृश्य वहाँ,
हिल गया ब्रह्मांड सारा, काँपा सारा विश्व वहाँ।
पिता क्षत-विक्षत तन, माता का वह रुदन प्रबल,
राम की आँखों में अब, जाग उठा वह महा-अनल।
१३६.
नहीं रहे वे केवल पुत्र, वे तो अब साक्षात् प्रलय हुए,
उनके भीतर के सब कोमल, भाव अब तो लय हुए।
पिता के उन इक्कीस घावों ने, अब नई प्रतिज्ञा दी,
अधर्म के उस वंश हेतु, अब तो अंतिम आज्ञा दी।
१३७.
हाथ में जब परशु लिया, तो दिशाएँ काँप के कातर हुईं,
राम की वह शांत भृकुटी, अब तो अति-विकराल हुईं।
"सौगंध है इन प्राणों की, और पिता के इस रक्त की,
मिटा दूँगा मैं हस्ती अब, हर इक अधर्मी तख्त की।"
१३८.
न रोए वे, न झुके वे, बस पत्थर सा उनका गात हुआ,
भृगु-वंश की पावनता का, अब भीषण प्रतिघात हुआ।
एक-एक बूँद रक्त की, अब एक-एक तलवार बनेगी,
सहस्रबाहु के वंश हेतु, यह ही अब विष धार बनेगी।
१३९.
माता के उन अश्रुओं को, राम ने मस्तक पर धार लिया,
प्रतिशोध के उस महा-यज्ञ का, अब तो पूर्ण श्रृंगार लिया।
"शांति अब अपराध है, जब सत्य लहू में डूबा है,
ब्राह्मण का यह महा-कोप ही, अब तो अंतिम सूबा है।"
१४०.
तपोवन की वे समिधाएँ, अब जलती हुई मशाल बनीं,
राम की वे शांत आँखें, अब तो साक्षात् काल बनीं।
न रहा अब कोई मोह वहाँ, न रहा कोई अनुराग रहा,
पिता के उस बलिदान से, अब प्रलय का ही जाग रहा।
१४१.
आश्रम की वह माटी अब, चंदन नहीं, अंगार हुई,
भृगु-पुत्र के उस संकल्प से, अब तो रण की धार हुई।
वेदों की ऋचाएँ अब, रणभेरी में बदल गईं,
न्याय की वे पावन बातें, अब तो लोहे में ढल गईं।
१४२.
महिष्मति के उन राजपुत्रों को, अब चैन न मिल पाएगा,
परशुराम का यह कोप अब, उन्हें जड़ से निगल जाएगा।
एक विप्र की कुटिया से, अब महा-विनाश का जन्म हुआ,
अधर्म के उस साम्राज्य का, अब तो पूर्णतः मर्म हुआ।
१४३.
अम्बर से तब देवों ने भी, मौन होकर वंदन किया,
इस महा-शोक को ही अब, रण का नया चंदन किया।
जानते थे वे कि अब—धरती नया रंग लेगी,
परशुराम की यह व्यथा, अब नया प्रसंग लेगी।।
१४४.
मानस का यह शोक, अब पौरुष का नया आधार है,
पिता के उस बलिदान से ही, जागा यह प्रतिकार है।
कुटिया की करुणा से , कारुणिक पर्व अवतीर्ण हुआ,
भृगु-वंश की शांति का, अब तो सुख परिपूर्ण हुआ।।
१४५. (गणना क्रम सुधार: १४७ तक २१ पद)
१४५.
रेणुका के इक्कीस घाव, अब राम के इक्कीस वचन हुए,
अधर्म के उन वंशजों के अब, जीवन के अंतिम क्षण हुए।
इतिहास लिखेगा स्वर्ण-अक्षरों में, महा-त्याग की गाथा ,
झुकाएगा महा-कोप अब, हर अभिमानी का माथा।।
१४६.
मौन खड़ा वह परशु अब, लहू की नई प्यास माँगता,
अत्याचारी के सिर की, वह तो अंतिम सांस माँगता।
मद - क्रोध की अग्नि, अब विनाश का आधार बनेगी,
न्याय की यह पावन सरिता, अब रण की धार बनेगी।
१४७.
पिता के रक्त के वे बिन्दु, अब अंगारे समान हुए,
राम के उन नयनों में, प्रलय के अब वितान हुए।
शोक नहीं, यह अधर्म के समूल नाश की ज्वाला है,
विप्र के कोप की अब—गले में पड़ने वाली माला है।
सप्तम सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते करुण-रौद्र-समन्वये 'पिता-बलिदान-प्रतिज्ञा' नाम सप्तमः सोपानः समाप्तः ॥
॥ अष्टम सर्ग: महाभीषण रण ॥
१४८.
नहीं रहा अब मौन कहीं, बस परशु की टंकार हुई,
दसों दिशाओं में अब केवल, मौत की ही पुकार हुई।
पिता के इक्कीस घावों का, अब हिसाब चुकता होगा,
अधर्म का वह ऊँचा मस्तक, अब चरणों में झुकता होगा।
१४९.
महिष्मति की ओर बढ़ा वह, काल का साया बनकर,
विप्र नहीं, वह तो खड़ा था—रुद्र का साया बनकर।
राजपुत्रों के वे मस्तक, अब कंदुक समान गिरे,
भृगु-नंदन के कोप अग्नि में, सब अभिमानी जरे।
१५०.
एक बार नहीं, दो बार नहीं, इक्कीस बार यह चक्र चला,
पृथ्वी के हर अधर्मी का, अब तो भाग्य ही वक्र चला।
जहाँ-जहाँ था मद सत्ता का, वहाँ-वहाँ परशु पहुँचा,
न्याय की उस तीखी धार का, हर घर में संदेश पहुँचा।
१५१.
रक्त की वे नदियाँ बोलीं—"यह कैसा यह तांडव है?"
राम बोले—"यह तो बस—अधर्म का ही मांडव है।"
आततायी क्षत्रियों से, अवनि को अब मुक्त किया,
पौरुष के उस महा-यज्ञ को, उन्होंने अब भुक्त किया।
१५२.
भय से काँपे वे सिंहासन, जो जुल्मों के आधार थे,
परशुराम के सम्मुख अब तो, सारे ही हथियार थे।
नहीं बचा कोई वह नृपति, जो मर्यादा को भूल गया,
विप्र-क्रोध की उस अग्नि में, तिनके सा झूल गया।
१५३.
समंतपंचक के वे पाँचों, कुंड रक्त से भर आए,
देवों के भी मानस में, अब भीषण स्वर भर आए।
यह नहीं प्रतिशोध , यह तो सृष्टि का शोधन था,
पाप के घोर तिमिर का, यह अंतिम बोधन था।
१५४.
तलवारें सब टूट गिरीं, और रथ के पहिए थम गए,
अन्यायी के वे सारे दल, अब तो भय से जम गए।
परशुराम का वह परशु अब, बिजली सा लहराता था,
काल स्वयं भी उस विप्र के, पीछे-पीछे आता था।
१५५.
"कहाँ छुपा है अधर्म? जिसे अपनी शक्ति का मान है?"
राम की उस एक पुकार से, डोल रहा ब्रह्मांड है।
नहीं रही अब सत्ता वैसी, जो जनता को पीती थी,
विप्र-शक्ति अब धरा पर, न्याय की फसल सीती थी।
१५६.
कटे मुकुट और ढहे किरीट, अब धूल बीच में पड़े मिले,
अहंकार के वे सारे पर्वत, अब तो छोटे बड़े मिले।
इक्कीस बार का वह संकल्प, अब तो पूर्णतः सिद्ध हुआ,
अधर्म के उस साम्राज्य का, अब तो पूर्णतः वध हुआ।
१५७.
रुधिर-रंजित वह अवनि अब, शांति की ओर निहार रही,
परशुराम की वह महा-विजय, अब जग को पुकार रही।
यह युद्ध नहीं, यह तो—एक नए युग का आरंभ है,
पाप के उस पुराने महल का, यह ही अंतिम स्तंभ है।
१५८.
भीष्म और द्रोण भी देखेंगे, इस गुरु का वह रूप प्रखर,
जिसने शस्त्र और शास्त्र को, साधा था बनकर शिखर।
रण-भूमि की वह माटी अब, इतिहास नया लिखती थी,
परशु की उस धार में, अब मुक्ति की राह दिखती थी।
१५९.
शांत हुआ जब कोप तभी, जब अवनि पूर्णतः मुक्त हुई,
आततायी शक्तियों की अब, सारी ही शक्ति भुक्त हुई।
राम ने अपना वह परशु, अब पावन जल से धोया था,
क्योंकि उन्होंने ही तो—धर्म का नया बीज बोया था।
१६०.
दसों दिशाएँ धन्य हुईं, और ऋषियों ने जयघोष किया,
भृगु-पुत्र के उस पौरुष ने, अब तो सबको संतोष किया।
भृगुनंदन का यह रण अब, शौर्य का ही नया मान है,
ब्राह्मण का पराक्रम, अब तो विश्व का गौरव-गान है।
१६१.
रण की वह भीषण ज्वाला अब, दीप बनकर जलने लगी,
मानवता की वह मुरझाई बेल, अब फिर से फलने लगी।
१६१ पदों के साथ यहाँ, यह रण-पर्व अब पूर्ण हुआ,
अधर्म के उस घोर दंभ का, अब तो पथ चूर्ण हुआ।
१६२. (गणना क्रम: १६८ तक २१ पद)
१६२.
समंतपंचक के तट बोले, "अब न कोई व्याध बचा,"
परशुराम के दंड से अब, न कोई यहाँ अगाध बचा।
इक्कीस बार की उस शुद्धि ने, अवनि का श्रृंगार किया,
विप्र-शक्ति ने इस जग का, फिर से तो उद्धार किया।
१६३.
पर यह विजय न भोग हेतु, यह तो केवल त्याग हेतु,
बनाया है राम ने खुद को, न्याय के इस पाग हेतु।
शस्त्र उठे थे धर्म बचाने, अब शस्त्रों का विश्राम है,
परशुराम के इस जीवन का, अब तो यही विराम है।
१६४.
राजसी मद के उन अवशेषों पर, अब नया सवेरा है,
मिट गया है इस धरती से, अब जो पाप का घेरा है।
रण-भेरी अब मौन हुई, और शंख-नाद अब गूँज उठा,
परशुराम का वह महा-तेज, अब तो अंबर चूँज उठा।
१६५.
आगामी सर्ग की आहट अब, कश्यप के द्वारों पर है,
जीते हुए उन राज्यों का, अब दान ही बस प्यारों पर है।
अष्टम सर्ग की यह अग्नि, अब दान का नया रूप लेगी,
परशुराम की यह महा-कथा, अब नया ही धूप लेगी।
१६६.
त्याग की वह पावन वेदी, अब विप्र को बुला रही,
सत्ता की वह मोह-माया, अब तो स्वयं ही जा रही।
नहीं रहा अब कोई मोह, न रहा अब कोई राग यहाँ,
परशुराम के भीतर जागा, अब तो महा-विराग यहाँ।
१६७.
रण-भूमि के उन घावों पर, अब मन्त्रों का लेप होगा,
न्याय की उस मर्यादा का, अब नया ही विक्षेप होगा।
महासंग्राम के साथ , आततायियों का गर्व धूल हुआ,
अधर्म के उस साम्राज्य का, अब तो पथ चूर्ण हुआ।
१६८.
रण-भूमि के उन घावों पर, अब करुणा का ही लेप होगा,
न्याय की उस मर्यादा का, अब नया ही विक्षेप होगा।
परशु खड़ा है मौन अब, जैसे तप का कोई स्तंभ महान,
मिट चुका है इस अवनि से, अब हर इक मिथ्या मान।
अष्टम सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते क्षत्र-रुधिर-तर्पण-प्रसंगे 'महाभीषण-रण' नाम अष्टमः सोपानः समाप्तः ॥
॥ नवम सर्ग: न्याय व्यवस्था ॥
१६९.
जीती सारी यह वसुधा, पर मन में तनिक न मोह रहा,
परशुराम के उस मानस में, अब बस त्याग का ओह रहा।
रत्न-जड़ित वे स्वर्ण-मुकुट, अब पैरों की धूल हुए,
सत्ता के वे सारे वैभव, अब तो केवल शूल हुए।
१७०.
बुलाया ऋषि कश्यप को, चरणों में शीश नवाया था,
जीता हुआ यह सारा भू-मंडल, उनके कर में आया था।
"हे गुरु! यह सब आपका है, विप्र को न सत्ता की चाह,
अधर्म मिटा, अब धर्म चले—दिखलाओ वह पावन राह।"
१७१.
दान किया वह अखंड साम्राज्य, ज्यों तिनका हो हाथ में,
विप्र वही जो सब कुछ तज दे,लोक-कल्याण के साथ में।
सत्ता का यह विकेंद्रीकरण—न्याय का नया स्वरूप बना,
परशुराम का यह महा-त्याग ही,अवनि का अब रूप बना।
१७२.
बाँट दिए वे सारे जनपद, योग्य जनों के हाथों में,
नहीं रहा अब कोई संशय, न्याय की उन बातों में।
शक्ति जहाँ मद बनती थी, अब वह सेवा का आधार बनी,
परशुराम की यह व्यवस्था—सतयुग का अब द्वार बनी।
१७३.
न रहा अब कोई राजा ऐसा, जो जनता का शोषण करे,
न रहा अब कोई ऐसा बल, जो निर्बल का ही पोषण हरे।
न्याय की उस चौखट पर अब, विप्र का वह पहरा था,
शांति का वह उदित सूर्य , अति-भास्वर और गहरा था।
१७४.
कश्यप ऋषि ने आशीष दिया, "धन्य हुआ यह विप्र-कुल,
जिसने सत्ता को ठुकराकर, पाया है यह ज्ञान-अतुल।
तूने केवल रण नहीं जीता, तूने अपना मन जीता है,
परशुराम ! तेरी यह गाथा—कलिकाल की गीता है।"
१७५.
शस्त्र अब तो विश्राम करें, पर शास्त्र अभी तो जाग रहे,
अधर्म के वे बचे हुए अब—अंधियारे सब भाग रहे।
सत्ता की वह मोह-माया—जब विप्र-चरण में गिरती है,
तभी धरा पर नई सभ्यता—मर्यादा संग फिरती है।
१७६.
राम खड़े थे निस्पृह होकर, दक्षिण की उस सीमा पर,
जहाँ सिंधु की लहरें गिरतीं—धरती की उस भीमा पर।
दान की वह पावन वेदी—अब तो पूर्णतः सिद्ध हुई,
परशुराम की न्याय-नीति—अब जग में अति-प्रसिद्ध हुई।
१७७.
नहीं रहा अब कोई बैर, न रहा कोई विरोध रहा,
सारे जग के मानस में अब—सत्य का ही बोध रहा।
भार्गव की यह व्यवस्था—शांति का नया प्राण है,
परशुराम का महा-त्याग—मानवता का कल्याण है।
१७८.
नहीं रहा अब कोई संशय, न्याय की उन बातों में,
शक्ति अब तो सुरक्षित थी, विप्र-पुंज के हाथों में।
परशुराम ने सिद्ध किया —सत्ता भोग का नाम नहीं,
लोक-धर्म से विमुख जो —वह राजा का काम नहीं।
१७९.
दण्ड-नीति का ऐसा शासन—जहाँ न कोई भय खाता,
निर्बल भी अब सीना ताने—न्याय का है गीत गाता।
कश्यप के उन निर्देशों में—राज्य अब तो पलने लगे,
अधर्म के वे पुराने कंकड़—राहों से अब टलने लगे।
१८०.
त्याग की उच्च शिखा अब—स्वर्ण-शिखर से ऊँची थी,
भृगु-नंदन की वह मर्यादा—सागर से भी गहरी थी।
जितनी भूमि जीती थी—उतनी ही अब दान हुई,
विप्र-कुल के उस गौरव की—फिर से पहचान हुई।
१८१.
शस्त्रों ने विश्राम लिया अब—महेन्द्र गिरि की छाया में,
राम अब न अटके थे—इस राज-काज की माया में।
त्याग जिनका अंतिम अस्त्र—उनका क्या कोई सानी है,
परशुराम की यह व्यवस्था—अमर एक कहानी है।
१८२.
ग्राम-ग्राम में न्याय बढ़ा और—नगर-नगर में धर्म जगा,
आततायी की उस जड़ में—अब तो भारी वज्र लगा।
सत्ता का विकेंद्रीकरण—यूँ जन-जन का आधार बना,
विप्र-शक्ति का यह दर्पण—सृष्टि का श्रृंगार बना।
१८३.
रिपु-दल के वे अवशेष भी—अब तो सात्विक होने लगे,
पाप के उस संचित विष को—गंगा-जल में धोने लगे।
नहीं रहा अब कोई ऊँच-नीच—सब एक सूत्र में बंधे हुए,
न्याय की उस पावन वेदी पर सभी शुभ से सधे हुए।
१८४.
परशुराम ने अवनि को—फिर से नया श्रृंगार दिया,
राजसी उस लम्पटपन का—समूल ही संहार किया।
अब न कोई जमदग्नि—पुनः लहू में डूबेगा,
न्याय का यह पावन सूरज—अब कभी न डूबेगा।
१८५.
कश्यप बोले—" अब तुझे —दक्षिण ही जाना है,
जहाँ सिंधु की लहरों में—सत्य का नया उजाला है।"
राम ने शीश नवाया — और अंतिम विदा लिया,
खाली हाथ चले वीर— सबकी झोली भर दिया।
१८६.
असंभव को संभव करना—विप्र का ही स्वभाव रहा,
राज-पाट को ठुकराना ही—उनका महा-प्रभाव रहा।
ब्राह्मण का न्याय यहाँ—मर्यादा की मिसाल बना,
परशुराम का चरित्र—आने वाले कल की ढाल बना।
१८७.
इतिहास गवाह रहेगा इस—महा-त्याग के क्षण का,
जिसने शांत कर दिया था—ज्वार सारे ही रण का।
न्याय वहीं पर टिकता है—जहाँ लोभ का अंश न हो,
सत्ता सदा वही पूज्य बने—जिसका कोई वंश न हो।
१८८.
जीता जग और स्वयं को जीता, यह ही विप्र-विधान रहा,
सत्ता के उस मोह-पाश का, परशुराम ही समाधान रहा।
कश्यप के उन पावन कर में, सौंप दिया भू-मंडल सारा,
जैसे कोई मेघ समर्पित—कर दे अपनी शीतल धारा।
१८९.
शासन ने जब सेवा का वह पावन रूप स्वीकार किया,
भृगु-नंदन ने त्याग-मूर्ति बन जन-जन का उद्धार किया।
मर्यादा की विमल धार अब अवनि के कण-कण में बही,
अहंकार की हुंकार नहीं अब—बस करुणा की गूँज रही।
नवम सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते त्याग-वैराग्य-प्रतिष्ठायाम् 'न्याय-व्यवस्था' नाम नवमः सोपानः समाप्तः ॥
॥ दशम सर्ग: शिक्षाप्रद संवाद ॥
१९०.
महेन्द्र-गिरि के तुंग शिखर अब, ज्ञान-पुंज के धाम हुए,
जहाँ शस्त्र और शास्त्र साधना, दोनों के विश्राम हुए।
समय की उन बहती धाराओं, का अद्भुत संगम वहाँ हुआ,
भृगु-नंदन के चरणों में जब, भीष्म का पावन नमन हुआ।
१९१.
"तात! शक्ति की सीमा क्या है, पौरुष का क्या अर्थ यहाँ?
क्या निर्बल का दमन वीरता, या मर्यादा का सत्व यहाँ?"
भीष्म के इन संशयों पर, राम धीर होकर मुस्काए,
जैसे शांत सरोवर में अब, सत्य के मोती उतराए।
१९२.
"पुत्र! बिना शील सजी हो, वह शक्ति तो केवल विष है,
वही वीर जो स्वयं के भीतर, जगाता अपना ही ईश है।
अस्त्र वही जो धर्म बचाए, अस्त्र वही जो मान रखे,
वही सुयोधन जो युद्धों में, संयम का पूरा ध्यान रखे।"
१९३.
"धनुष प्रत्यंचा तभी खिंचे, जब न्याय का कोई मार्ग न हो,
शक्ति संचय तभी सफल, जब निजी कोई स्वार्थ न हो।"
गुरु के वचनों ने गंगा-सुत, को इच्छा-मृत्यु सा मान दिया,
भीष्म की प्रतिज्ञा को अब, पौरुष का नया वरदान दिया।
१९४.
तभी आए कर्ण नयन में, विद्या की उत्कट प्यास लिए,
अंग-देश की धूलि और, मन में गहरा विश्वास लिए।
"गुरुवर! क्या यह देह-कुल ही, विद्या का आधार बनेगा?
या अंतर्मन का यह तेज ही, प्रतिभा का श्रृंगार बनेगा?"
१९५.
राम ने देखा योद्धा को, जो छल की राह खड़ा था आज,
गुरु का आसन डोल उठा था, संकट में था सारा समाज।
"विद्या कुल से नहीं, सत्य के—पावन संबल से मिलती है,
जो छल का आश्रय ले, ओ कलिका कभी न खिलती है।"
१९६.
"कर्म ही तेरा कुल है वत्स, और निष्ठा ही तेरा मान यहाँ,
जो सत्य से मुख मोड़ ले, उसे न मिलता सम्मान यहाँ।"
कर्ण मौन था, पर उसके भीतर, द्वंद्व की एक ज्वाला थी,
गुरु की वाणी उसके हेतु, जैसे न्याय की एक माला थी।
१९७.
"शिष्य वही जो गुरु सम्मुख, दर्पण सा निश्छल हो जाए,
अपनी सारी चतुराई को, जो चरणों में ही खो जाए।
विद्या तो एक अर्पण है, यह अहंकार का काम नहीं,
छल से जो अर्जित की जाए, वह विद्या का नाम नहीं।"
१९८.
भीष्म और कर्ण के मध्य खड़े, गुरु का तेज निराला था,
एक ओर त्याग का अमृत , दूजी ओर विष का प्याला था।
राम ने सिखाया कि पौरुष तो, केवल शस्त्र का नाम नहीं,
मर्यादा जो खो दे अपनी, वह जग में कोई राम नहीं।
१९९.
"अस्त्र का उपयोग धर्म है, पर उसका संचय संयम है,
अधर्म की उस प्रलय-नदी में, शील ही अंतिम संगम है।"
गुरु के शिक्षा-सूत्रों ने, भावी युग का पथ प्रशस्त किया,
शक्ति और तप के सामंजस्य ने, सबसंशय ध्वस्त किया।
२००.
महेन्द्र-गिरि की हवाओं में अब, मंत्र और टंकार घुली,
गुरु-शिष्य के पावन पथ की, अब अमर द्वार खुली।
अस्त्र-शस्त्र जब शास्त्रों के, पावन संग में ढलते हैं,
तभी धरा पर धर्म-वीर, मर्यादा संग में पलते हैं।
२०१.
राम की उन आँखों में अब, आने वाले रण की छाया थी,
वे जानते थे नियति की, यह कैसी अद्भुत माया थी।
शिष्यों को शस्त्र नहीं, बस जीने का एक बोध दिया,
अधर्म के उन महा-प्रलय को, सदा-सदा अवरोध दिया।
२०२.
"जाओ! पर याद रहे यह विद्या, केवल सत्य का साथ दे,
अन्यायी के हाथ चढ़े तो, यह स्वयं का ही घात दे।"
भीष्म ने शस्त्र उठाए, गुरु को अंतिम शीश नवाया,
कर्ण के भीतर भी अब तो, एक नया ही तेज समाया।
२०३.
यह संवाद नहीं था, यह तो—युगों-युगों का दर्शन था,
शक्ति के उन गलियारों में—अमर एक ये अर्पण था।
महेंद्र की यह शिक्षा अब—जग के मानस में जागी,
परशुराम के उस चिंतन से—कुमति यहाँ से अब भागी।
२०४.
शिक्षित होकर चले वे योद्धा—अवनि का भार उठाने को,
अधर्म की उस ऊँची दीवार—को फिर से अब ढहाने को।
पर राम थे अभी—अतीत और भविष्य के मध्य खडे,
महेन्द्र-गिरी के शिखरों पर—साधना में अब और बढ़े।
२०५.
संवाद की यह पावन सरिता—भाव से अब आगे बढ़ी,
मानस ने निज मानस से—सत्य की नई कथा गढ़ी।
न रहा कोई संशय ऐसा—जो गुरु-वाणी काट सके,
न रहा कोई अंधियारा—जो इस आलोक को बाँट सके।
२०६.
शिक्षा पूरी हुई तभी जब—गुरु का मन संतुष्ट हुआ,
शक्ति और मर्यादा का—यह बंधन अब तो पुष्ट हुआ।
परशुराम की यह शाला अब—योद्धाओं की जननी बनी,
सत्य और पौरुष की गाथा—मानवता की अपनी बनी।
२०७.
मर्यादा जो शस्त्रों को—पवित्रता का दान दे,
विद्या जो जन-जन को—अभय का वरदान दे।
गुरु शिष्य के संवादों में—यही संदेश समाया है,
भृगु-नंदन ने अस्त्रों को भी—अध्यात्म पाठ पढ़ाया है।
२०८.
समय साक्षी है कि जब-जब—शक्ति ने अपनी राह तजी,
तब-तब गुरु की शिक्षा ही—रण-भूमि में फिर से सजी।
भीष्म त्याग और कर्ण बल—इसी मिट्टी से जागे थे,
महेन्द्र-गिरी के उस तेज से—अंधियारे सब भागे थे।
२०९.
शिक्षाप्रद इस संवाद की—अमृता धारा पूर्ण हुई,
भ्रम की सारी काली घटा—गुरु-वाणी से चूर्ण हुई।
महेन्द्र-गिरि के तुंग शिखर पर, संवाद शांत हुआ,
शक्ति और मर्यादा के संगम का, अमर वेदांत हुआ
२१०.
गूँज रही गुरु-वाणी —उन वीरों के अंतर्मन में,
जैसे कोई दिव्य मंत्र—जागा हो सूने उपवन में।
अब आध्यात्मिक चिंतन का—पुण्य सवेरा आएगा,
परशुराम का ब्रह्म-तेज—अवतार-मिलन करवाएगा।
दशम सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते गुरु-शिष्य-परम्परायाम् 'शिक्षाप्रद-संवाद' नाम दशमः सोपानः समाप्तः ॥
॥ एकादश सर्ग: आध्यात्मिक चिंतन एवं अवतार दर्शन ॥
२११.
महेन्द्र-गिरि की कन्दराओं में, ब्रह्म-तेज अब जाग उठा,
भृगु-नंदन के अंतर्मन से, सारा मोह अब भाग उठा।
तप की उस प्रखर ज्वाला में, उन्होंने निज को तपा लिया,
ब्रह्माण्ड के हर गुप्त सत्य को, अपनी आत्मा में पा लिया।
२१२.
तभी अचानक दसों दिशाओं, में एक भारी गूँज हुई,
शिव के उस पिनाक-भंजन की, नभ में तीखी पूँज हुई।
परशुराम का आसन डोला, और नयन में क्रोध जगा,
"किसने तोड़ा ईश-चाप?"—यह प्रश्न अब बोध लगा।
२१३.
पहुँचे वे मिथिला की नगरी, जहाँ धनुष के खंड पड़े,
राजाओं के दम्भ और, अभिमान वहाँ थे खंड-खंड पड़े।
परशु उठा भृकुटी तनी, "दिखाओ वह अपराधी कौन?
जिसने शिव का अपमान किया, यहाँ खड़ा क्यों है मौन?"
२१४.
तभी सामने आए वे 'राम', जिनके नयन में करुणा थी,
शांति और मर्यादा की, जिनकी पावन अरुणा थी।
एक ओर वह कोप-अनल, दूजी ओर यह शांत-सलिल,
प्रगट हो रहा इस धरा पर, महा-मिलन का दृश्य अखिल।
२१५.
लक्ष्मण के वे प्रखर वचन, और राम की वह विनय-धार,
देख विप्र का मानस अब, करने लगा है स्वयं विचार।
"यह बालक साधारण नहीं, यह तो स्वयं ही तेज है,
जिसके सम्मुख मेरा परशु, अब पा रहा परहेज है।"
२१६.
राम ने संधान किया, उस वैष्णव-धनुष की डोरी पर,
मिट गया सारा संशय अब, परशुराम की छोरी पर।
पहचान लिया उन्होंने निज को, उस राघव के रूप में,
जैसे कोई छाँव मिल जाए, प्रलय की कड़ी धूप में।
२१७.
"धन्य हुए प्रभु! आप पधारे, अवनि का भार उठाने को,
अधर्म की उस काली छाया, को अब दूर भगाने को।
मेरा परशु अब शांत हुआ, कोदण्ड ही अब आधार है,
आपके इन कोमल हाथों में, अब सृष्टि का उद्धार है।"
२१८.
दो अवतारों का वह मिलन, जैसे गँगा-यमुना का संगम,
जहाँ क्रोध और करुणा का, हुआ पूर्णतः ही अति-अगम।
परशुराम ने निज तेज समर्पित, राघव चरणों में किया,
इस महा-मिलन ने भक्तों को, एक नया ही मंत्र दिया।
२१९.
"मैं चला अब तप की ओर, जहाँ शांति का ही वास है,
पर याद रहे हर पीड़ित को, बस आपसे ही आस है।"
भृगु-नंदन ने विदा ली और, राघव को आशीष दिया,
अवतारों के सामंजस्य ने, जग को दो जगदीश दिया।
२२०.
लौट चले वे फिर से अपने, महेन्द्र-गिरि के ऊँचे धाम,
जहाँ गूँजता था हर पल, बस नारायण का पावन नाम।
अब न क्रोध की ज्वाला थी, न प्रतिशोध की प्यास रही,
ब्रह्म-लीन उस मानस में अब, बस तप की ही आस रही।
२२१.
सीखा उन्होंने कि शक्ति का—जब रूप बदलता जाता है,
तब-तब नया अवतार धरा पर—शांति बीज उगाता है।
परशु का काम हुआ पूरा—अब धनुष का शासन आएगा,
परशुराम का यह त्याग ही—धरा पर राम-राज्य लाएगा।
२२२.
चले गए वे मौन होकर—सृष्टि के उन छोरों पर,
जहाँ सत्य का ही शासन है—अम्बर के उन ओरों पर।
दो राम का विमल मिलन—अध्यात्म का श्रृंगार बना,
परशुराम का आत्म-बोध—युग का नया आधार बना।
२२३.
नहीं रहा अब द्वंद्व कहीं—न कहीं अहंकार रहा,
दो रूपों के मध्य यहाँ—बस प्रेम का विस्तार रहा।
विप्र-शक्ति ने क्षत्रिय-तेज को—पावन अपनी राह दी,
अवनि के उज्ज्वल भविष्य को—एक नई अब चाह दी।
२२४.
तपोवन की उन कुटियों में—फिर से वेदों का गान हुआ,
परशुराम के उस जीवन का—अब तो पूर्ण उत्थान हुआ।
वे अमर हैं, वे अजर हैं—वे समय के भी पार खड़े,
महेन्द्र-गिरि के शिखरों पर—साधना में वे और बढ़े।
२२५.
इतिहास साक्षी है जब-जब—मर्यादा पर संकट आएगा,
भृगु-नंदन का वह तेज पुनः—अवनि को राह दिखाएगा।
अवतारों का यह दर्शन ही—इस काव्य का जो प्राण है,
परशुराम की यह महिमा—मानवता का कल्याण है।
२२६.
शांति की उस वेदी पर अब—तप का ही साम्राज्य रहा,
ब्रह्म और क्षत्र के संगम से—सिद्ध हुआ हर कार्य रहा।
शौर्य त्याग बलिदान के पदों में—अमृत की धार बही,
जहाँ कोप की बातें सब—केवल एक संस्मरण रही।
२२७.
राम ने जब परशुराम को—निज हृदय से लगा लिया,
सारे जग के संशयों को—क्षण भर में ही मिटा लिया।
यह मिलन ही तो संदेश है—कि शक्ति सदा ही झुकती है,
जहाँ विनय और करुणा की—पावन सरिता रुकती है।
२२८.
अवतार-दर्शन पूर्ण हुआ अब—नया सबेरा आने को,
अधर्म के उस घोर तिमिर को—जड़ से अब मिटाने को।
परशुराम अब चिरंजीवी—बनकर जग में वास करेंगे,
सत्य और मर्यादा का—वे हर युग में प्रकाश करेंगे।
२२९.
देवों की मिलन ज्योति—जन कल्याण की ओर चली,
अब ग्रंथ वाग के पुष्पों के —हर डाली पर कली खिली।
परशुराम का यह आध्यात्मिक—रूप अति ही भास्वर है,
जिसके सम्मुख फीका पड़ता—यह सारा जग नश्वर है।
२३०.
असंभव था जो वह संभव—दो अवतारों ने कर दिया,
भयभीत इस अवनि के हृदय—में साहस अब भर दिया।
जहाँ परशु और कोदण्ड का, वह दिव्य संगम हो गया,
सृष्टि के उस महा-द्वंद्व का, क्षण भर में ही लय हो गया।
२३१.
दो देह पर सत्ता एक ही, अब अवनि को यह ज्ञान है,
भृगु-नंदन का यह आत्म-बोध ही, मानवता का प्राण है
प्रस्थान मौन की ओर, जहाँ केवल तप का वास होगा,
आने वाली पंक्तियों में, अमरत्व का ही प्रकाश होगा।
एकादश सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते अवतार मिलन-प्रसंगे 'आध्यात्मिक-चिन्तन-अवतार-दर्शन' नाम एकादशः सोपानः समाप्तः ॥
॥ द्वादश सोपान: चिरंजीवी स्वरूप एवं फलश्रुति ॥
२३२.
महेन्द्र-गिरि के शिखरों पर, मौन का साम्राज्य है,
जहाँ समय झुककर पूछता, "प्रभु! क्या कोई कार्य है?"
परशुराम अचल खड़े हैं, जैसे तप का कोई महा-स्तंभ,
जिनके भीतर समाया हुआ है, सृष्टि का अंत और आरंभ।
२३३.
वे न मरे हैं, न मरेंगे, वे तो काल के भी पार हैं,
अधर्म के घोर तिमिर में, वे ही अब आधार हैं।
चिरंजीवी बनकर वे , इस अवनि पर वास करते हैं,
सत्य और मर्यादा का, हर युग में प्रकाश भरते हैं।
२३४.
द्वापर में, भीष्म-कर्ण को, उन्होंने शस्त्र का दान दिया,
न्याय और कर्तव्य के पथ पर, चलने का वरदान दिया।
पर स्वयं रहे वे सदा विलग, सत्ता के उन गलियारों से,
दूर रहे वे दुनिया की इन, झूठी सब जय जयकारों से।
२३५.
अब प्रतीक्षा उस युग की, जब कलि का अंत आएगा,
जब अत्याचार और अधर्म का, काला बादल छाएगा।
शम्बल ग्राम में जन्म लेकर, जब 'कल्कि' रूप अवतरेगा,
तब परशुराम ही गुरु बनकर, उस पावन पथ को संवरेगा।
२३६.
देंगे शस्त्र और देंगे शास्त्र, वे उस अंतिम अवतार को,
सत्य की वह धार सौंपेंगे, वे इस व्याकुल संसार को।
भृगु-नंदन का वह परशु पुनः, न्याय का ही निमित्त बनेगा,
सृष्टि के उस नव-निर्माण का, वह ही पावन चित्त बनेगा।
२३७.
राम से लेकर कल्कि तक, यह एक अटूट कहानी है,
परशुराम की यह विप्र-शक्ति, तो काल की भी वाणी है।
वेदों के संरक्षक देव , शस्त्रों के वे आचार्य महान,
जिन चरणों में शीश नवाता , सकल जगत जहान।
२३८.
जो पढ़ता इस गाथा को, जो सुनता श्रद्धा भाव से,
मुक्त हो जाता है वह नर, जग के कठिन अभाव से।
शक्ति और मर्यादा का यह, अद्भुत एक संगम है,
भृगु-नंदन की अमर कथा, पावन और अगम है।
२३९.
ब्राह्मण का वह तेज बढ़ा, क्षत्रिय का वह मान बढ़ा,
परशुराम के इस चरित्र से, अवनि का सम्मान बढ़ा।
नहीं रहा अब कोई संशय, न कहीं अंधकार रहा,
सत्य की पावन ज्योति का, चहुँ ओर विस्तार रहा।
२४०.
तपस्या जिनका जीवन, न्याय ही जिनका धर्म रहा,
पाप का मर्दन करना , जिनका पावन कर्म रहा।
वे अब पर्वत-शिखरों, पर ध्यान-मग्न ही रहते हैं,
अवनि के हर कण में, सत्य बनकर ही बहते हैं।
२४१.
यह काव्य अब पूर्ण हुआ, भृगु-कुल के उस गौरव से,
जो मुक्त है इस दुनिया के, हर मिथ्या और सौरव से।
परशुराम की छवि अब, हृदय-पटल पर अंकित हो,
मर्यादा की मर्यादा वेदी पर, जीवन सारा अर्पित हो।
२४२.
वेदों की ऋचाएँ गूँजें, और शस्त्रों का सम्मान रहे,
परशुराम का पावन पथ, सदा-सदा गतिमान रहे।
न शोषक हो, न शोषित हो, बस न्याय का ही राज चले,
विप्र-शक्ति के इस आलोक में, सारा ही समाज चले।
२४३.
अमरत्व की इस ऊँचाई पर, अब मानस विदा लेता है,
भृगु-नंदन के चरणों में, निज भक्ति अर्पण देता है।
चिरंजीवी महापुरुष का, युग-युग तक साथ रहेगा,
सत्य की हर इक लड़ाई में, वह परशु साथ बहेगा।
२४४.
समंतपंचक की वह माटी, अब चंदन बनकर महक रही,
भृगु-वंश की उस गरिमा की, पावन ज्योति दहक रही।
न रहा अब कोई मोह यहाँ, न रहा अब कोई राग यहाँ,
परशुराम के जीवन में, जागा अब तो महा-विराग यहाँ।
२४५.
आने वाले कल के योद्धा, इस पथ से ही प्रेरणा लेंगे,
सत्य के उस महा-यज्ञ में, अपनी आहुति वे देंगे।
शक्ति वहीं पर पूज्य बने, जहाँ शील का सानिध्य मिले,
परशुराम की छाया में, मानवता का दिव्य कमल खिले।
२४६.
दसों दिशाएँ धन्य हुईं, और अम्बर ने जयघोष किया,
इस पावन चरित्र-चित्रण ने, सबको ही संतोष किया।
भृगु-नंदन के उन चरणों में, सारा जग ही आज झुका,
समय का तीखा पहिया, वंदन करने को आज रुका।
२४७.
महेन्द्र-गिरि के शिखर कह रहे, "राम सदा ही जाग रहे",
अधर्म के वे सारे सपने, अब तो डरकर भाग रहे।
वे केवल एक व्यक्ति नहीं, वे तो एक विचार प्रबल,
निर्बल के वे हाथ बने, और कायर के वे महा-अनल।
२४८.
इस पावन ग्रंथ की परिणति, अब सत्य के उन चरणों में,
जहाँ शांति की वर्षा होती, जीवन के हर क्षणों में।
परशुराम की जय-ध्वनि से, गूँज उठा ब्रह्मांड सारा,
अवनि पर फिर बह निकली, मर्यादा की विमल धारा।
२४९.
समापन की इन घड़ियों में, बस एक ही प्रार्थना शेष रहे,
परशुराम का वह ब्रह्म-तेज, जग में बना विशेष रहे।
न आए कोई सहस्रबाहु, न कोई मद फिर से जागे,
मानवता के इस आँगन से, हर इक दुष्ट सदा भागे।
२५०.
यह महाकाव्य एक दर्पण है, पौरुष और संस्कार का,
अत्याचार के विरुद्ध खड़े, उस पावन अधिकार का।
भृगु-नंदन की यह अमर कथा, युगों-युगों तक गूँजेगी,
सत्य की हर इक पावन वेदी, इनका वंदन पूजेगी।
२५१.
श्रद्धा और विश्वास के साथ, यह अर्पण पूर्ण हुआ,
अधर्म के उस घोर दम्भ का, सारा ही पथ चूर्ण हुआ।
परशुराम अब चिरंजीवी, सबके हृदय में वास करें,
सत्य और मर्यादा का, वे फिर से नव-प्रकाश करें।
२५२.
ब्रह्म-तेज और क्षत्र-बल का, यह अद्भुत उपसंहार हुआ,
भृगु-नंदन के इस जीवन से, अवनि का उद्धार हुआ।
मानस पदों की पावन, काव्य-माला अब पूर्ण हुई,
मर्यादा की उस वेदी पर, जीवन-साधना सिद्ध हुई।
२५३.
वे न केवल ब्राह्मण , न केवल योद्धा की तलवार,
वे तो हैं स्वयं विधाता का, दुष्टों पर तीखा प्रहार।
एक हाथ में वेद-पुराण, दूजे में वह काल-दण्ड,
परशुराम स्वरूप, अति-भास्वर अति-प्रचण्ड।
२५४.
सतयुग से कलयुग तक, वे जीवित एक गवाही हैं,
अधर्म के उस घोर तिमिर में, वे ही अब राही हैं।
जब-जब डूबेगी सत नैया, मर्यादा के मंझधारों में,
गूँजेगा उनका परशु पुनः, अवनि की इन पुकारों में।
२५५.
शस्त्रों को दी गरिमा , शास्त्रों को नया ओज,
मानवता के भीतर , उन्होंने की है नई खोज।
सत्ता को ठुकराकर , त्याग का वह शिखर गढ़ा,
जिसके आगे इंद्रासन भी, है नत-मस्तक खड़ा।
२५६.
भीष्म की अटूट प्रतिज्ञा में, उन्हीं का तो वह तेज रहा,
कर्ण के दान-वीर स्वरूप में, उन्हीं का ही परहेज रहा।
द्रोण के अस्त्र-कौशल में, वही गुरु-वाणी बोलती,
परशुराम की यह शिक्षा ही, जग के बंद द्वार खोलती।
२५७.
महेन्द्र-गिरी गुफाओं में, आज भी ध्यान जारी है,
सृष्टि के कल्याण हेतु, उनकी अभी तैयारी है।
कल्कि का वे राह तकते, कब अधर्म का घड़ा भरे,
कब वे फिर से गुरु बनकर, जग का निस्तार करें।
२५८.
जो ध्यावे इस विप्र-तेज को, कभी नहीं भय पाएगा,
संकट के हर घोर समर में, विजय वही नर पाएगा।
शत्रु का मद चूर होगा, और सत्य की ही जय होगी,
जहाँ परशुराम की गाथा, वहाँ न कभी कोई क्षय होगी।
२५९.
यह केवल शब्द नहीं हैं, यह तो लहू के छींटे हैं,
अधर्म की उस ऊँची दीवार के, गिरते हुए ये ईंटें हैं।
भृगु-नंदन के चरणों में, यह मानस-पुष्प अर्पित है,
यह अलौकिक ग्रंथ अब , उन्हीं को पूर्ण समर्पित है।
२६०.
गूँजती रहे अमर कथा, जब तक गंगा की धार रहे,
जब तक इस वसुंधरा पर, धर्म का आधार रहे।
जय भृगु-नंदन! जय परशुराम! जय न्याय अनल,
तुम जग के कर्ता हो, तुम ही मुक्ति के पावन थल।
द्वादश सोपान:
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्ये शांडिल्य-मानस-विरचिते पूर्णत्व-सिद्धौ 'चिरंजीवी-स्वरूप-फलश्रुति' नाम द्वादशः सोपानः समाप्तः ॥
॥ इति शुभम् ॥
॥ श्री परशुराम चालीसा ॥
गुरू पित-पद-पंकज रज, चंद्रभूषण ध्यान।
परशुराम महिमा लिखूँ, दिजे ज्ञान-वरदान॥
शांडिल्य मानस उर में, भृगु-कुल कमल समान।
शक्ति-शिल-मर्यादा का, कीजे जन-कल्याण॥
१. जय परशुराम जय जग-स्वामी। विप्र-वंश विभु अन्तर्यामी॥
२. जमदग्नि ऋषि के गृह आए।रेणुका मातु अति हर्ष पाए॥
३. भृगु-कुल के तुम दीप अनूपा। साक्षात नारायण रूपा॥
४. कर में परशु तेज अति भारी। दुष्ट-दलन तुम अवनि-विहारी॥
५. महेन्द्र-गिरि पर कीन निवासा। शिव-शक्ति का हृदय प्रकासा॥
६. बाल्यकाल में विद्या पाई। सकल कला मन में उपजाई॥
७. शस्त्र और शास्त्र के तुम ज्ञाता। ऋषि-मुनि के तुम भाग्य विधाता॥
८. सहस्रबाहु जब मद में आया। कामधेनु पर हाथ बढ़ाया॥
९. पितु का आश्रम उसने उजाड़ा। धर्म-शील का पर्दा फाड़ा॥
१०. तब तुम उठा शस्त्र अति घोरा। अधर्म-वंश का मान मरोरा॥
११. सहस्त्रबाहु की बाहें काटी। शत्रु-रक्त से सींची माटी॥
१२. नृप-पुत्रों ने जब छली चाल। पिता हुए तब मृत्यु के गाल॥
१३. पितृ-वध का जब सुना संदेसा। क्रोधित हुए तज विप्र-भेसा॥
१४. कर में परशु प्रलय सम उठा। काँपा नभ और अम्बर रूठा॥
१५. २१-बार धरा निर्मल की। शक्ति नष्ट की सब खल-दल की॥
१६. क्षत्रिय-मद को धूल चटाया। न्याय-मार्ग को पुनः बसाया॥
१७. समंतपंचक रक्त से भरे। देव लोक सब विस्मय करे॥
१८. रुधिर-तर्पण पितु को कीन्हा। विप्र-वचन को गौरव दीन्हा॥
१९. कश्यप ऋषि को अवनि दान दी। सत्ता-त्याग महत पहचान दी॥
२०. द्वापर में तुम गुरु कहलाए। भीष्म-द्रोण तुम्हारे जाए॥
२१. गंगा-पुत्र को शस्त्र सिखाया। इच्छा-मृत्यु का मर्म बताया॥
२२. कर्ण तुम्हारी शरण में आया। विद्या का वरदान हि पाया॥
२३. द्रोणाचार्य को दीक्षा दीन्ही। धर्म-रक्षा की शिक्षा दीन्ही॥
२४. शिव-धनु जब मिथिला में टूटा। विप्र-कोप फिर से तब फूटा॥
२५. राम-लखन संग विनय-संवादा। परखी प्रभु की पूर्ण मर्यादा॥
२६. राघव में निज रूप निहारा। शांत हुआ तब क्रोध तुम्हारा॥
२७. अपना धनुष राम को दीन्हा। विप्र-रूप तप में मन कीन्हा॥
२८. चिरंजीवी तुम कलि के दाता। कल्कि के बनोगे तुम विधाता॥
२९. शम्बल ग्राम में जब प्रभु आएँ। तुम ही गुरु बन मार्ग दिखाएँ॥
३०. ब्रह्म-तेज और क्षत्र-वीर्य। तुम में समाया महा-धैर्य॥
३१. योग-साधना में तुम लीना। मोह-माया को पीछे कीना॥
३२. ऋषि-मुनि तुमको नित्य ध्यावें। गंधर्व-किन्नर मंगल गावें॥
३३. जो नर तुमको सुमिरन करते। उनके सब दुःख संकट टरते॥
३४. निर्बल पावे तुम सो बल। कायर बन जाए महा-अनल॥
३५. विद्यार्थी पावे शुभ विद्या। कट जाए भ्रम और अविद्या॥
३६. शत्रु हटे और बाधा भागे। राम-नाम हृदय में जागे॥
३७. अक्षय तृतीया पर्व तुम्हारा। पावन है यह जग उजियारा॥
३८. शांडिल्य मानस शरण तुम्हारी। राखो लाज प्रभु अब हमारी॥
३९. गुरु महेन्द्र-चंद्रभूषण छाया। तुम्हारी कृपा से यह सब पाया॥
४०. चालीस चौपाई जो नर गावे। परशुराम पद निश्चय पावे॥
॥ दोहा ॥
परशुराम जो हृदय धरि, करे नित्य ही जाप।
मानस रचित चालीसा , हरे कोटि जम-पाप॥
पाप कटे अज्ञान मिटे, जगे ज्ञान की जोत।
परशुराम की कृपा ही, सुख का पावन स्रोत॥
॥ श्री भृगु-नंदन अष्टकम् ॥
१. भृगुवंश-समुद्भूतं, जमदग्नि-कुलोद्भवम्।
परशु-हस्तं महावीर्यं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(भृगु वंश में उत्पन्न, जमदग्नि कुल के भूषण, हाथ में परशु धारण करने वाले महावीर भृगु-नंदन की मैं वंदना करता हूँ।)
२. रेणुका-हृदयानन्दं, मातृ-भक्ति-परायणम्।
पितृ-आज्ञा-पालकं च, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(माता रेणुका के हृदय को आनंद देने वाले, मातृ-भक्ति में लीन और पिता की आज्ञा के रक्षक भृगु-नंदन की मैं वंदना करता हूँ।)
३. ब्रह्म-तेज-मयं रूपं, क्षत्र-वीर्य-विनाशकम्।
अधर्म-मर्दनं देवं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(ब्रह्म-तेज से युक्त रूप वाले, आततायी क्षत्रियों के मद का नाश करने वाले और अधर्म को कुचलने वाले देव की मैं वंदना करता हूँ।)
४. महेन्द्र-गिरि-वासं च, योग-विद्या-विशारदम्।
भीष्म-द्रोण-गुरुं वरेण्यं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(महेन्द्र पर्वत पर निवास करने वाले, योग विद्या में निपुण, भीष्म और द्रोण जैसे वीरों के गुरु की मैं वंदना करता हूँ।)
५. २१-वारं धरा-शौचं, कृतवान् यो महामुनिः।
न्याय-मार्ग-प्रतिष्ठापं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(जिन्होंने २१ बार पृथ्वी को शुद्ध किया और न्याय मार्ग की पुनः स्थापना की, उन महामुनि की मैं वंदना करता हूँ।)
६. शिव-चाप-भंग-क्रुद्धं, राम-दर्शन-लालसम्।
वैष्णव-तेज-संपन्नं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(शिव धनुष टूटने पर क्रोधित, फिर राम दर्शन से शांत और वैष्णव तेज से संपन्न भृगु-नंदन की मैं वंदना करता हूँ।)
७. दान-वीरं महात्यागं, कश्यपाय धरा-प्रदम्।
निस्पृहं ब्रह्म-निष्ठं च, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(जीती हुई पृथ्वी कश्यप को दान देने वाले महात्यागी, निस्पृह और ब्रह्म-निष्ठ भृगु-नंदन की मैं वंदना करता हूँ।)
८. कल्कि-गुरुं भविष्यज्ञं, चिरंजीवि-स्वरूपिणम्।
पाप-ताप-हरं नित्यं, वन्देऽहं भृगु-नंदनम्॥
(कल्कि के भावी गुरु, चिरंजीवी स्वरूप और पापों का नाश करने वाले भृगु-नंदन की मैं नित्य वंदना करता हूँ।)
।।फलश्रुति (ग्रंथ-महिमा)।।
१.
जो नर श्रद्धा-प्रेम से, पढ़े यह पावन ग्रंथ,
खुल जाते हैं उसके लिए, प्रगति के सब पंथ।
शक्ति बढ़ेगी देह में, मन में बढ़ेगा ओज,
सत्य मार्ग पर ले चलेगी, उसे यह दिव्य खोज।
२.
भय-बाधा सब दूर हों, मिटे कलह और क्लेश,
जहाँ विराजे यह कथा, वहाँ न रहे द्वेष।
विप्र-शक्ति का आशीर्वाद, और पौरुष का वरदान,
पाएगा वह जगत में, अक्षय कीर्ति और मान।
३.
अक्षय तृतीया के दिन जो, करे इसका गान,
परशुराम की कृपा से, पाए पद-निर्वाण।
विद्यार्थी पाए विद्या, योद्धा पाए विजय-सार,
यह ग्रंथ ही सुगम नौका, करने को भव-पार।
।।महा-मंगल आरती (भगवान परशुराम जी)।।
जय परशुराम देवा, प्रभु जय परशुराम देवा ॥
ब्राह्मण-कुल-भूषण, सुर-मुनि-जन-सेवा ॥॥ जय परशुराम... ॥
.जमदग्नि के नंदन, रेणुका-मातु प्यारे,भृगु-वंश के सूरज, भक्तन के तारे।॥ जय परशुराम... ॥
.मंगल-भुजा के धारी, परशु हाथ सोहे,ब्रह्म-तेज की आभा, सबका मन मोहे।॥ जय परशुराम...
.इक्कीस बार अवनि को, निर्भय आपने किया,अधर्म का मद तोड़ा, धर्म को प्राण दिया।जय परशुराम...
.भीष्म-कर्ण के गुरुवर, आप ही जग-स्वामी,चिरंजीवी आप प्रभु, घट-घट अंतर्यामी।जय परशुराम...
.'शांडिल्य मानस' अर्पण, गुरु-चरणों की छाया,
परशुराम की महिमा,कोई समझ न पाया।जयपरशुराम...
जय परशुराम देवा, प्रभु जय परशुराम देवा ॥
।। क्षमा-प्रार्थना।।
"अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥"
हे भृगु-नंदन! हे गुरुदेव!
मैं अल्पज्ञ हूँ, मेरी बुद्धि सीमित है और आपकी महिमा अनंत। इस महाकाव्य के लेखन में यदि कहीं छंद की मात्रा गिरी हो, कहीं व्याकरण की मर्यादा टूटी हो, या कहीं भावों में चंचलता आई हो, तो उसे एक अबोध बालक की त्रुटि समझकर क्षमा करें। मैंने तो केवल वही लिखा है जो आपने और गुरु-परंपरा ने मेरे हृदय में स्फुरित किया। यह शब्द-माला आपकी है, यह ओज आपका है, मैं तो मात्र एक निमित्त मात्र हूँ।
॥ समापन पुष्पिका ॥
इति श्रीपरशुराम-महाकाव्यं संपूर्णम्। रचयिता—शांडिल्य "मानस"। समर्पितं—गुरु-प्रवर-श्री-महेन्द्र-तिवारी एवं श्री-चन्द्रभूषण-तिवारी चरण-कमलेषु। संवत् २०८३, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, अक्षय तृतीया। ॥शुभमस्तु।।
।। शांति-पाठ।।
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
"ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥"
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।।जय परशुराम।।