हनुमानजी की रावण को ललकार
हनुमानजी की रावण को ललकार
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हनुमानजी की रावण को ललकार
बंदी हनुमान की शेर की दहाड़!
जय श्री राम,प्रिय आत्मीय राम भक्तों "एक कैदी, जिसके हाथों में जंजीरें हैं। सामने रावण जैसा अहंकारी सम्राट है, जिसकी एक नज़र से लंका कांपती है। दरबारी सोच रहे हैं कि यह वानर डरा हुआ होगा, गिड़गिड़ाएगा। लेकिन, जैसे ही रावण ने उपहास किया, उस कैदी ने ऐसी दहाड़ लगाई कि लंका की नींवें हिल गईं! रावण के दरबार में हनुमान जी का यह 'खुला चैलेंज' आज के हर उस इंसान के लिए है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है एक सुंदर सीख है। क्या आप जानना चाहते हैं कि बंदी होकर भी 'विजेता' कैसे बना जाता है? चलिए, सीधे चलते हैं लंका की उस राजसभा में!"
लंका का स्वर्ण दरबार, चारों ओर खूंखार राक्षस। मेघनाथ ने हनुमान जी को रस्सियों से जकड़ कर पेश किया। रावण अपनी स्वर्ण गद्दी पर बैठा, अपनी मूछों पर ताव देते हुए हंसा और व्यंग्य किया, "अरे तुच्छ वानर! तूने मेरी अशोक वाटिका उजाड़ी, मेरे राक्षसों को मारा। अब तेरी मौत सामने है, क्या तू अब भी अपने राम को प्रभु कहता है?"
हनुमान जी ने जंजीरों की परवाह किए बिना, रावण की आँखों में आँखें डालकर अपनी बुलंद आवाज़ में ललकारा:
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥"
(रावण! तुमने जिसे मौत समझा, उसे तो मैं खेल-खेल में जीत आया। और यह जो तुम्हारा बेटा मुझे बाँधकर लाया है, तो समझ लो—यह रस्सियाँ मुझे नहीं, बल्कि तुम्हारी अज्ञानता को बाँध रही हैं!)
रावण का अहंकार तिलमिला उठा। उसने गरजकर कहा, "तू कैदी है और मुझे चैलेंज कर रहा है?"
हनुमान जी ने शेर की दहाड़ जैसी वाणी में उत्तर दिया:
"मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥"
(रावण, मुझे बँधने की कोई लज्जा नहीं है। मुझे शर्म तब आती, जब मैं अपने प्रभु का कार्य पूरा न कर पाता। मैं तो एक दूत हूँ, मेरा काम तुम्हारा अहंकार तोड़ना है। तुम मुझे नहीं, तुम काल को बाँधने का भ्रम पाल रहे हो!)
मित्रों आधुनिक समय में भी सारी बातें सत्य हैं क्योंकि आज के कॉर्पोरेट दरबार में भी रावण जैसे कई बॉस बैठे हैं, जो 'टर्मिनेशन' की धमकी देकर लोगों को बाँधना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि सत्य की आवाज़ को कभी जंजीरों में कैद नहीं किया जा सकता।
"पिंजरे में कैद करके, जो समझें स्वयं को विजेता,
वो भूल गए कि सत्य का है, अपना है एक नियंता।
जो बाँध सके हवाओं को, वो ही बाँध हमें पाएगा?
प्रभु का काज ही है साध्य, तू क्या हमें डिगा पाएगा?"
आज का इंसान अपनी 'ईमेज' और 'पद' की जंजीरों में ऐसा जकड़ा है कि वह खुद रावण बन बैठा है। बिल्कुल सही है कि,
"कुर्सी के मद में चूर, रावण बने बैठे हैं सब,
सच को सुनने की हिम्मत, खो चुके हैं अब।।
बँध गए खुद ही अपने, लालच की जंजीर में,
ढूँढ रहे हैं जीत सच्ची,अपनी झूठी 'तस्वीर' में।"
श्रोताओं! हनुमान जी का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि पद, प्रतिष्ठा और शारीरिक बंधन कभी भी उस आत्मा को नहीं बाँध सकते, जिसका लक्ष्य सत्य और परमार्थ है। रावण की सभा में हनुमान जी का बँधे होना उनकी हार नहीं, बल्कि उनके 'आत्म-सम्मान' की सबसे बड़ी जीत है।
आज अगर आप अपनी परिस्थितियों के 'बंदी' महसूस कर रहे हैं, तो याद रखिये—जिसका लक्ष्य प्रभु का काज (निस्वार्थ सेवा) है, उसे दुनिया की कोई शक्ति कैद नहीं कर सकती। आइए, अपनी बेड़ियों को तोड़ें और रावण की तरह अहंकार में नहीं, हनुमान जी की तरह साहस के साथ जीएं।
बोलिए सियावर रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
डिस्क्लेमर (Disclaimer):
इस वीडियो की प्रस्तुति और संपादन प्रक्रिया में रचनात्मक सहायता के लिए AI (कृत्रिम मेधा) तकनीक का उपयोग किया गया है। वीडियो में प्रस्तुत मुख्य पात्र (वक्ता) और कथावाचन पूरी तरह से मौलिक, वास्तविक और व्यक्तिगत हैं। इस वीडियो का निर्माण और संपादन आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार और लोक-कल्याण की भावना के साथ किया गया है।
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वायरल पैकेज: 'बंदी हनुमान की शेर की दहाड़'
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लंका के दरबार में मेघनाथ ने हनुमान जी को बाँध तो लिया, लेकिन जब रावण ने अहंकार में प्रश्न किया, तो हनुमान जी ने जो उत्तर दिया, उससे पूरा दरबार थर्रा उठा। आखिर बंदी होने के बाद भी हनुमान जी इतने निर्भीक क्यों थे? क्या है 'कॉर्पोरेट किष्किंधा' और आधुनिक जीवन का संबंध?
पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए इस प्रसंग का गहरा अर्थ, जो आपको अंदर तक झकझोर देगा।
📌 इस कथा के मुख्य बिंदु:
रावण की सभा का सजीव वर्णन।
हनुमान जी की गर्जना: "मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा"।
आधुनिक समाज पर एक गहरी चोट।
'मानस' के भाव और प्रेरणादायक कविता।
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वायरल पैकेज: 'बंदी हनुमान की शेर की दहाड़'
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लंका के स्वर्ण दरबार में जब मेघनाथ ने हनुमान जी को बंदी बनाकर पेश किया, तो सबको लगा कि वानर डरा हुआ होगा। लेकिन रावण के अहंकार के सामने हनुमान जी ने जो गर्जना की, उसने लंका की नींव हिला दी।
बंदी होकर भी हनुमान जी की वह शेर जैसी दहाड़ आज के हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है। क्या है रावण के दरबार का वह रहस्य? पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए आज की कथा का सार।
📌 इस शॉर्ट्स के मुख्य भाव:
हनुमान जी की निर्भीकता।
अहंकार बनाम आत्म-समर्पण का द्वंद्व।
आधुनिक जीवन में 'हनुमान' जैसा निस्वार्थ मित्र।
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manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
आज के भागदौड़ भरे युग में, 'सुग्रीव' सिर्फ रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आसपास का एक 'ट्रेंड' बन चुका है। आप कहेंगे, वह कैसे? अरे, वो दोस्त जिसे जरूरत के वक्त हम याद आते हैं, जिसके लिए हम अपनी जान लगा देते हैं, लेकिन काम निकलते ही वो हमें 'अनफॉलो' कर देता है या फोन उठाना बंद कर देता है।
रामायण के इस प्रसंग को देखिए—सुग्रीव राजा बने, राज-पाट मिला, लक्ष्मी बढ़ी, तो वो अपने परम मित्र श्रीराम का वादा भूलकर सुख-भोग में लीन हो गए। ठीक वैसे ही, जैसे आज लोग सफलता की सीढ़ी चढ़ते ही अपने पुराने साथियों को पहचानना बंद कर देते हैं।
मिला जो पद तो भूल गया एहसान,
वादे की मिट्टी में दबा दिया ईमान।
सुख सागर में डूबा बैठा है इन्सान,
अपनों के ही दिल के काट दिए अरमान।
तब श्रीराम ने लक्ष्मण को भेजा—आज का वो 'स्ट्रेट-फॉरवर्ड' और अनुशासन प्रिय दोस्त जो घुमा-फिरा कर बात नहीं करता। लक्ष्मण का क्रोध देख किष्किंधा के वानर कांप उठे, क्योंकि जो मित्र उपकार भूलकर अपना वचन तोड़ता है, वह संसार में सबसे नीच माना जाता है। यह गुस्सा आज के उस कड़क बॉस या मित्र जैसा है जो गलती होने पर सीधे आईना दिखा देता है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब हनुमान जी—एक चतुर 'मैनेजमेंट गुरु'—मैदान में उतरते हैं。 उन्होंने लक्ष्मण के क्रोध को समझा, स्थिति की गंभीरता को पहचाना और सुग्रीव को संभलने का मौका दिया। उन्होंने रिश्तों को टूटने से बचा लिया।
अहंकार की ओट में न छिपना मेरे यार,
वादे के पक्के बनो यही है जीवन का सार।
क्रोध की आग में जल सब कुछ खो न देना,
विवेक छाया के सहारे सच्चा प्यार पा लेना।
इस कहानी से शिक्षा एकदम स्पष्ट है—आज के 'सुग्रीव' मत बनिए जो स्वार्थ के लिए वादे तोड़ देते हैं। और अगर आप किसी से नाराज हैं, तो लक्ष्मण जैसा क्रोध तो रखें, लेकिन अंत में हनुमान जैसा विवेक अपनाएं ताकि रिश्ता सुधरे, न कि खत्म हो जाए।
क्या आपको लगता है कि आज के 'कॉर्पोरेट' और 'सोशल' कल्चर में हनुमान जैसे 'मध्यस्थ' (Mediator) की कमी हो गई है, जिसकी वजह से हमारे रिश्ते इतनी जल्दी टूट रहे हैं?
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"सीता-खोज और किष्किंधा का कॉर्पोरेट ड्रामा"
भगवान श्री राम ने पिता की आज्ञा मानकर 'वर्क-फ्रॉम-फॉरेस्ट' (वनवास) चुना। तेरह साल तो सब ठीक चला, फिर आया 'मारीच' नामक एक 'डिजिटल स्कैमर', जो सोने के हिरण का जाल बिछाकर बैठा था। माता सीता ने उस पर भरोसा कर लिया और रावण ने 'सीता-हरन' का कांड कर दिया।
राम और लक्ष्मण जब उन्हें ढूँढते हुए ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे, तो सुग्रीव डर गया। उसे लगा कि ये 'बाली' द्वारा भेजे गए कोई नए 'कॉर्पोरेट जासूस' (गुप्तचर) हैं। सुग्रीव ने हनुमान जी को 'रिक्रूटमेंट इंटरव्यू' के लिए भेजा। हनुमान जी ने ब्राह्मण वेश धारण किया और वे राम-लक्ष्मण की सादगी और तेज देख कर नतमस्तक हो गए। फिर क्या था, राम और सुग्रीव की दोस्ती हुई—अग्नि को साक्षी मानकर। बाली का 'डाउनफॉल' हुआ, और सुग्रीव फिर से 'किष्किंधा कॉर्पोरेशन' का सीईओ बन गया।
आज के समाज में भी लोग 'मारिच' जैसे दिखावे पर फिदा होकर अपनी सुख-शांति लूटवा बैठते हैं। और सुग्रीव जैसे भाई आज के दौर में भी 'धोखा' और 'डर' के बीच जीते हैं।इस प्रसंग की यह कविता सुने,
"माया के इस जाल में, हर कोई मृग में खोया है,
जो अपना है असल धन, वो दुनिया में सोया है।।
'मानस' कहता जग देखों, सब खेल है ये भारी,।
रावण सा छल कपट मारीच, लिए है दुनिया सारी।"
"सुख में सब हाथ मिलाते, ऑफिस में सब यार हैं,
विपदा में जो साथ निभाए, वही असली परिवार है।
'मानस' की सीख समझ लो, दोस्ती राम जैसी हो,
स्वार्थ भरी बाज़ार बीच , भक्ति हनुमान जैसी हो।"
इस कथा से शिक्षा,चेतावनी (स्कैम से सावधान): मारीच का सोने का हिरण आज के 'ऑनलाइन लुभावने विज्ञापनों' जैसा है। जो चमकता है, वह हमेशा सच नहीं होता। अपने निर्णयों में संयम बरतें।सही सलाहकार का महत्व: हनुमान जी की भूमिका एक ऐसे 'मेंटर' की है, जो न केवल सही रास्ता दिखाता है बल्कि संकट में चट्टान की तरह खड़ा रहता है। आज के कॉर्पोरेट और पारिवारिक जीवन में हमें ऐसे ही भरोसेमंद सलाहकारों की जरूरत है।कर्म का सिद्धांत: बाली की मृत्यु के बाद हनुमान जी ने तारा को जो समझाया—कि यह शरीर पानी के बुलबुले जैसा है और कर्मों का फल ही सुख-दुख का कारण है—वह आज की 'डिप्रेशन' वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा मंत्र है। भाग-दौड़ भरी जिंदगी में 'शांत भाव' ही असली सफलता है।
निष्कर्ष: राम और सुग्रीव की मैत्री हमें सिखाती है कि यदि नीयत साफ हो और साथ में हनुमान जैसा समर्पित व्यक्तित्व हो, तो रावण जैसी बड़ी मुसीबत भी छोटी लगने लगती है।
वो चेतावनी: किसी भी सरकारी दस्तावेज या पहचान पत्र (जैसे [Aadhaar Redacted]) के लिए सलाह है कि अपने दस्तावेजों को सुरक्षित रखें और किसी भी अपरिचित 'मारीच' को अपनी निजी जानकारी न दें।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"कॉर्पोरेट किष्किंधा: और हनुमान जी "Corporate
किष्किंधा के 'राज्य लिमिटेड' में बाली बॉस था और सुग्रीव उसका छोटा भाई—बेचारा 'मैनेजर' स्तर का कर्मचारी। बाली को लगा कि सुग्रीव उसके प्रमोशन पर नज़र गड़ाए बैठा है।
एक दिन एक 'मायावी' नाम का कॉम्पिटिटर आया। बाली उसे मारने गुफा में गया और सुग्रीव को बाहर 'गार्ड' की तरह खड़ा कर दिया। सुग्रीव ने वहाँ से खून की धारा देखी तो सोचा, "अब तो भाई गया, अब तो ऑफिस—मेरा!" उसने गुफा के बाहर भारी रॉक (चट्टान) लगा दी और खुद 'सीईओ' बन बैठा। जब बाली वापस आया और उसने देखा कि उसकी गद्दी पर सुग्रीव बैठा है, तो उसका बीपी (BP) बढ़ गया। फिर क्या था, बाली ने सुग्रीव का 'पीछा' शुरू किया।
सुग्रीव बेचारा हिमालय से लेकर समुद्र तक 'दौड़ प्रतियोगिता' में हिस्सा लेता रहा। तभी हनुमान जी ने एंट्री मारी, जो तब 'ऋष्यमूक कंसल्टेंसी' के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे। उन्होंने सुग्रीव को बताया, "भाई, टेंशन न लो, उस वाले इलाके में बाली की एंट्री 'बैंड' है (मुनि का शाप)।" और बस, सुग्रीव ने हनुमान जी के दम पर 'वर्क फ्रॉम होम' (पहाड़ पर रहना) शुरू कर दिया।
आजकल के भाई-बंधुओं का यही हाल है। जिसे आप सच्चा भाई /'सच्चा मित्र' समझते हैं, वह अक्सर 'ऑफिस शिफ्ट' होते ही बदल जाता है। हनुमान जी जैसे सखा मिलना आज के 'फेक' दोस्तों के जमाने में किसी चमत्कार से कम नहीं है। आइए इस कविता को सुने,
"भाई-भाई में चल रहा, 'कॉपोरेट' का युद्ध है,
गद्दी पाने की होड़ में, खत्म हुआ सब शुद्ध है।
'मानस' कहता है सुनो, सच्चे मित्र ही आधार हैं,
जो विपत्ति में न छोड़ें, वही असली परिवार हैं।"
"सुख में तो सब आते हैं, 'सेल्फी' लेकर जाते हैं,
दुख की घड़ी में 'ब्लॉक' कर, सबको भुलाते हैं।
'मानस' की सीख सुनो, हनुमान सा यार चुनिए,
मतलब के बाजार में, भरोसे का संसार चुनिए।"
इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि,
सच्चे मित्र की पहचान: हनुमान जी ने तब साथ निभाया जब सुग्रीव के पास न राज्य था, न सत्ता। आज के समय में भी जो मित्र आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा है, वही आपका 'हनुमान' है।
गलाकाट प्रतिस्पर्धा: बाली और सुग्रीव का झगड़ा इस बात का प्रतीक है कि बिना सही संवाद (Communication) के, रिश्ते कैसे 'रक्त-पिपासु' बन जाते हैं। ऑफिस या परिवार में बैठकर बातें सुलझाना ही बेहतर है, बजाय पत्थर की दीवार खड़ी करने के।
विपत्ति में धैर्य: सुग्रीव का ऋष्यमूक पर्वत पर शांति से रहना सिखाता है कि जब चारों तरफ दुश्मन हों, तब भागने के बजाय किसी सुरक्षित जगह (पॉजिटिव माहौल) में रहकर अपनी ताकत इकट्ठा करनी चाहिए।
आज की कॉर्पोरेट राजनीति और पारिवारिक कलह का सार यही है—अहंकार छोड़ो और हनुमान जी जैसी निस्वार्थ सेवा का भाव रखो!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
सेवा का सेतु: मानस की दृष्टि
प्राचीन काल की वह बेला थी, जब साक्षात ईश्वर ने लीला करने हेतु नर रूप धारण किया। अवध की गलियों में एक ओर जहाँ बाल-राम की मधुर मुस्कान गूँजती थी, वहीं दूसरी ओर स्वयं महादेव ने मदारी का वेश धरा और अपने साथ एक अत्यंत सुंदर बंदर लिए राजद्वार पर आए। यह प्रेम केवल उन दो रूपों का मिलन नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि ईश्वर और भक्त का रिश्ता कितना अटूट हो सकता है।
सेवा को अपना कर ,मिटा दो, तुम सब की दूरी,
प्रेम भाव की यह साधना, कर देगी सब पूरी।
भक्त हृदय में बसते प्रभु, जिनके गुण हैं सार,
परहित करने वाले मानस, पाते भव से पार।
जब प्रभु श्री राम ने मदारी के उस बंदर को देखा, तो वे उस पर मुग्ध हो गए और उसे पाने की जिद करने लगे। चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र की इच्छा पूर्ण हुई और मदारी ने वह बंदर प्रभु को समर्पित कर दिया। यह समर्पण ही वह आधार है, जिस पर समाज के सुधार की नींव रखी जा सकती है। आज के आधुनिक परिवेश में भी यदि हम अपनी अहंता का त्याग कर, सेवा के लिए स्वयं को अर्पित कर दें, तो समाज का कायाकल्प निश्चित है।
सबको अपना बना लो साथी, प्रेम की डोर बनाओ,
सकल जगत के दुखों को , हँसकर तुम मिटाओ।
इस पावन बंधन में बंधकर, मिट जाए सब भ्रम,
प्रभु की कृपा मिलेगी मानस, होगा दूर सब गम।
हनुमान जी ने प्रभु के साथ रहकर उनका सानिध्य प्राप्त किया, वे उनके साथ खेलते और उनकी आज्ञा का पालन अत्यंत प्रसन्नता से करते। किंतु समय का चक्र आगे बढ़ा, और महर्षि विश्वामित्र के आगमन पर प्रभु ने हनुमान को एक महान कार्य के लिए चुना। उन्होंने कहा कि लंकाधिपति रावण की अनीति से पृथ्वी विकल है और धर्म की स्थापना हेतु सुग्रीव से मैत्री करना अब परम आवश्यक है।
त्याग और सेवा का यह पथ, तुम सदा सँवारो,
मानवता की सेवा करके, खुशियाँ तुम पसारो।
धर्म जगत में सबसे बड़ा, है परहित का ध्यान,
सेवा ही मानस है प्रभु का, सबसे ऊँचा गान।
हनुमान जी प्रभु से पृथक नहीं होना चाहते थे, किंतु प्रभु की आज्ञा ही उनके लिए सर्वोपरि कर्तव्य था। वे अपने आराध्य को प्रणाम कर, उनके मधुर नामों का जप करते हुए ऋष्यमूक पर्वत के लिए प्रस्थान कर गए। यह कथा हमें सिखाती है कि सेवा का अर्थ सदैव साथ रहना नहीं, बल्कि प्रभु के कार्य को पूर्ण करने के लिए दूर रहकर भी उनके विचारों को जीवंत रखना है। यही वह सेतु है जो आज के व्यक्ति को समाज सुधारक बनाता है।
अंत समय में याद रहे , हमने क्या उपकार किया,
मानवता की सेवा का, हमने तो श्रृंगार किया।
कठिन डगर चलकर देखो, कर्म ही भाग्य जगाते हैं,
परहित जो कर जाते मानस, वे ही जन कहलाते हैं।
यह कथा एक ऐसी अखंड धारा है, जो यह सिखाती है कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग सेवा के सेतु से होकर गुजरता है। जब हम अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को एक 'लीला' समझकर परोपकार में लगाते हैं, तो हम स्वयं उस 'राम-हनुमान' के प्रेम के सहभागी बन जाते हैं।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
माँ, मोबाइल छोड़ो, हनुमान बनाओ!
भक्तों, आज हम एक ऐसी माला गूँथेंगे, जो न केवल मनोरंजन करेगी, बल्कि हृदय के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश भी देगी। आँखें मूँदिए और मन के आसन पर बिठा लीजिए उस अद्भुत बालक को, जिसके एक हाथ में भक्ति की गदा है और दूसरे में संस्कारों का शास्त्र है!
माता अंजना धन्य थीं! वे जानती थीं कि बच्चा कोई खिलौना नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है। वे बालक हनुमान को रोज पुराणों की कथाएँ सुनातीं। हनुमान जी का ध्यान ऐसा था जैसे 'वाई-फाई' का फुल सिग्नल हो। वे माँ को झकझोर कर पूछते— "माँ! आगे क्या हुआ? क्या रावण का अंत हुआ? मुझे जल्दी बता, नहीं तो मैं अभी लंका फूँक दूँगा!" आज की माताएँ बच्चा रोए तो हाथ में 'स्मार्टफोन' थमा देती हैं। बच्चा खाना न खाए तो 'कार्टून' दिखा देती हैं
माँ कहती है 'बेटा सो जा', बच्चा कहता 'अभी नहीं',
मैं हूँ 'पवन-पुत्र' मैया, मुझे सुलाने का दम नहीं!
गैजेट्स की इस दुनिया में, सब 'नेट-स्लो' हो गए,
माँ के उन संस्कारों से, हम कितने दूर हो गए!
माता अंजना जानती थीं कि बच्चे का मन एक 'कोरी स्लेट' है। रात के सन्नाटे में पुराणों की कथाएँ सुनाना, उस युग का 'हार्ड डिस्क अपडेट' था।
आज की स्थिति: आज का बच्चा पूछता है— "माँ, अगला लेवल (Level) क्या है?" जबकि हनुमान जी पूछते थे— "माँ, आगे क्या हुआ?"
स्क्रीन की चकाचौंध में, खो गया वो बचपन प्यारा,
माँ के हाथों से छूट गया, वो संस्कार का किनारा।
डिजीटल युग का नशा है, माँ ज़रा होश में आना,
बच्चों के कोमल मन में, रामायण तुम बसाना!
हनुमान जी रात को शैया से कूद पड़ते और अपनी नन्ही भुजाएँ फुलाकर कहते— "माँ, देख मेरी मसल्स! रावण आएगा तो मैं उसे पीस कर रख दूँगा!" आज के बच्चे जिम जाकर प्रोटीन शेक पीते हैं, जबकि हनुमान जी माँ की गोद में सोकर ब्रह्मांडीय शक्ति पाते थे। यह स्पष्ट करता है कि असली बल संस्कारों के आलिंगन में है।
हनुमान जी प्रभु श्री राम के ध्यान में इतने तल्लीन थे कि उन्हें भूख-प्यास की सुध ही नहीं रहती थी। माता अंजना को वन-वन उन्हें ढूँढना पड़ता था। आज की माँ अगर बच्चे को ढूँढने निकले, तो बच्चा 'सोशल मीडिया' की गुफा में फँसा मिलेगा।
वन-पर्वत में ढूँढती माता, अपने लाल का चेहरा,
आज की माँ ढूँढ रही है, फोन में बच्चा ठहरा।
माँ की ममता का आंचल, अब मोबाइल में खो रहा,
संस्कारों का बीज यहाँ, अज्ञानता में सो रहा।
मानस कहे, सुनो हे माताओं, चेतना को जगाओ,
मोबाइल की गुलामी छोड़, बच्चों को 'वीर' बनाओ!
हम इस कहानी से यह जान ले कि पहली बात माँ ही पहली गूगल (Google) है: बच्चा गूगल से पूछने के बजाय माँ से सीखे, उसे अपना पहला गुरु बनाए।
दूसरी बात एकाग्रता का मंत्र बच्चों को दे : हनुमान जी अगर आज की 'रील्स' देखते तो रावण कभी न मरता। फोकस कीजिए।
तीसरी बात हम बच्चों के अंदर संस्कार का निवेश करें: माता अंजना का निवेश ही आज पूरी दुनिया में 'जय श्री राम' के रूप में गूँज रहा है।
भवन तो खड़ा कर लोगे तुम, पर नींव न बना पाओगे,
जो छूट गए संस्कार यहाँ, तो खाली हाथ रह जाओगे।
चाहती हो कि बच्चा हो, भविष्य का 'संकटमोचन' वीर,
तो गैजेट्स के मायाजाल से, मुक्त करो उसकी तकदीर।
मोबाइल की इस लत से तुम, उसे दूर अभी ले जाओ,
रामायण की मंगल गाथा, प्रेम से उसे रोज सुनाओ।
'मानस' कहे हे माताओं, बस इतना सा संकल्प ठानो,
बचाओ मोबाइल-स्क्रीन से लाल , मानस कहा मानो!बोलिए पवन पुत्र हनुमान महाराज की जय! माता अंजना की जय!
शिक्षा का सार अहंकार का त्याग
एक बार माता अंजना और वानरराज केसरी अपने पुत्र हनुमान की मेधावी स्थिति देखकर चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि यद्यपि हनुमान में अपार बल और दैवीय शक्तियाँ हैं, फिर भी एक महापुरुष को समाज की मर्यादा बनाए रखने के लिए गुरु के पास जाकर विद्या ग्रहण करनी चाहिए।
माता ने उन्हें सूर्यदेव को अपना गुरु बनाने का सुझाव दिया। हनुमानजी ब्रह्मचारी वेष धारण कर सूर्यदेव के पास पहुँचे। सूर्यदेव ने पहले तो अपनी व्यस्तता का बहाना बनाया—"अरे भाई! मेरा रथ तो रुकता ही नहीं, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा कैसे?" लेकिन हनुमानजी कहाँ रुकने वाले थे! उन्होंने विनम्रता से कहा, "प्रभु, आप रथ चलाइए, मैं आपके सामने चलते हुए पढ़ता रहूँगा।" सूर्यदेव उनके संकल्प और श्रद्धा से इतने प्रभावित हुए कि कुछ ही दिनों में उन्होंने हनुमानजी को समस्त विद्याओं में पारंगत कर दिया। अंत में, गुरुदक्षिणा में हनुमानजी ने सुग्रीव की रक्षा का वचन दिया और अपने माता-पिता के पास लौट आए।
इस कथा से हमें जीवन जीने की कला सीखने को मिलती है:
विनम्रता ही असली शक्ति है: आज के दौर में जब लोग थोड़े से ज्ञान के बाद 'अहं' में भर जाते हैं, हनुमानजी सिखाते हैं कि महापुरुष होने के बाद भी झुकने में ही बड़प्पन है।
सीखने की कोई उम्र या परिस्थिति नहीं होती: सूर्यदेव का रथ कभी नहीं रुकता था, फिर भी हनुमानजी ने रास्ता निकाल लिया। आज के बच्चों को बहाने छोड़कर लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए।
माता-पिता की भूमिका: जिस प्रकार माता-पिता ने हनुमानजी को संस्कार देकर सही दिशा दिखाई, वैसे ही माता-पिता को आज के बच्चों को डिग्रियों के साथ-साथ 'मर्यादा' और 'सेवा' का पाठ भी पढ़ाना चाहिए।
मानस की कलम से:
"डिग्री के इस दौर में, संस्कार खो रहे सब यार,
रटते हैं जो किताबी बातें, भूलें गुरु का प्यार।
'मानस' कहता है सुन लो, विद्या वही महान है,
अहंकार छोड़ जो झुके, वही असली हनुमान है।"
"अहंकार की छाया छोड़, तू गुरु चरण में आ रे,
विद्या का यह दीप जलाकर, जग में मान बढ़ा रे।
मानस कहता, शक्ति वही है, जो सेवा में झुकती है,
मर्यादा पथ पर ही, किस्मत सब की रुकती है।
विनम्रता की चादर ओढ़, तू अंबर को छू ले,
गुरु वचनों को अपनाकर, तू जीवन अर्थ खोल ले।"
क्या आपको लगता है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में हम 'हनुमान' जैसी विनम्रता को वापस ला सकते हैं?
।।हनुमानजी का संदेश रावण समझ नहीं पाया।।
"रावण, जिसके पास तीनों लोकों का मैनेजमेंट का 'विज़न' था, वह आखिर एक वानर के उन तीन शब्दों का रहस्य क्यों न समझ सका, जो उसके साम्राज्य के पतन का 'फाइल क्लोजर' बन गए?"
ॐ अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥
भक्तों जय श्री राम,लंका का दरबार लगा है। रावण अपने स्वर्ण सिंहासन पर 'सीईओ' की तरह अकड़ कर बैठा है। सामने हनुमान जी खड़े हैं, जिन्हें रावण के 'प्रोजेक्ट मैनेजर' (मेघनाद) ने पकड़ कर पेश किया है। रावण ने अपनी भारी आवाज में दहाड़ लगाई— "ओ वानर! तूने मेरी अशोक वाटिका का 'रिसोर्स' क्यों नष्ट किया? क्या तुझे पता नहीं कि यहाँ 'नो एंट्री' का बोर्ड लगा है?"
हनुमान जी ने एक ऐसी मुस्कान दी, मानो वे रावण को 'इंटरव्यू' दे रहे हों। उन्होंने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया:"खाएउँ प्रभु फल लागी भूखा।
कपि सुभाउ ते तोरें रूखा॥
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारगामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बांधेउ तनय तुम्हारे॥"
हनुमान जी ने व्यंग्य की ऐसी धार दिखाई कि रावण का 'ईगो' हिल गया। सुनते हैं:
सीईओ रावण! मैं तो बस लंच ब्रेक में लंच लेने आया ,
भूख लगी फल चखे, तुम्हारे गार्ड्स ने बवाल मचाया ।
मैंने नहीं छेड़ा किसी को, वे 'सेल्फ-डिफेंस'सिखाने आए
अपने प्राण बचाने को, मैंने उन्हें 'पैकेज' वापस थमाए ।।
तुम्हारे अनुचर 'कुमारगामी' हैं, अधर्म की राह पर चलते ,
बिना मीटिंग एजेंडा के, जो बिना बात के हाथ मलते हैं।।
तेरे पुत्र ने मुझे बंदी बनाया, पर मुझे कोई चिंता नहीं,
प्रभु का दूत हूँ, मुझे किसी 'सस्पेंशन' का भय नहीं।।
यहाँ हनुमान जी ने रावण के दरबार में तीन ऐसे 'पॉइंट्स' रखे, जो रावण की समझ के बाहर थे:
पहला 'कुमारगामी' का तंज: रावण को लगा हनुमान ने उसके राक्षसों को मारा है। पर हनुमान जी ने तो रावण के पूरे 'सिस्टम' पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने रावण को बताया कि— "जो तुम्हारे सैनिक 'कुमारगामी' (अधर्मी) होकर बिना कारण हमला कर रहे हैं, उनका पतन तो तुम्हारे लीडरशिप फेलियर का सबूत है!"
दूसरा दूत का 'कॉर्पोरेट' आत्मविश्वास: हनुमान जी ने स्पष्ट कर दिया कि "भले ही मेघनाद ने मुझे बाँध दिया हो, पर मैं बंदी नहीं हूँ। मैं तो यहाँ तुम्हारे दरबार में 'ऑडिट' करने आया हूँ कि तुम्हारा अहंकार किस स्तर तक पहुँच गया है।" रावण यह समझ ही नहीं पाया कि वह जिसे बंदी समझ रहा था, वह दरअसल उसके विनाश की 'रिपोर्ट' तैयार कर रहा था।
तीसरा मालिक का भेद: रावण खुद को 'स्वामी' कहता था, पर हनुमान जी का सारा ध्यान तो अपने असली 'मालिक' (श्री राम) के मिशन पर था। रावण यह देख ही नहीं पाया कि जिसके सामने वह खड़ा है, वह दुनिया की बेड़ियों से मुक्त है।
भक्तजनों! रावण का 'मैनेजमेंट' फेल हो गया क्योंकि वह अपने अनुचरों की 'कुमारगामी' हरकतों को अपना 'पराक्रम' समझ बैठा। जब कोई व्यक्ति अहंकार के चश्मे से दुनिया को देखता है, तो उसे हनुमान जी के सरल वचन भी 'अपमान' लगते हैं।
हनुमान जी ने यहाँ जो किया, वह केवल युद्ध नहीं था, वह रावण को यह चेतावनी थी कि— "अपनी टीम के अधर्म को देखो, अन्यथा विनाश निश्चित है।" जो अहंकारी होता है, उसे ये बातें समझ में नहीं आतीं, और जो विवेकी होता है, वह हनुमान जी के 'व्यंग्य' में भी सत्य की सुगंध ढूंढ लेता है।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. भाई का संबंध पावन
भाई का संबंध पावन, प्यार की सरिता बहा,
मुश्किलों में ढाल बन, जो खड़ा रहता यहाँ।
मान-मर्यादा निभाना, सीख हमने ली वहीं,
भाई जैसा और कोई, प्यारा इस जग में नहीं॥
2. बचपन की यादें और भाई का नाम
बचपन के खेल सारे, याद आते आज हैं,
भाई का ही नाम मेरे, गीत का ही साज़ है।
मानस ये चर्चा करे, प्रेम की इस धार की,
भ्रातृ-भक्ति से बड़ी है, भेंट कोई प्यार की॥
3. संकटों में साथ और अटूट नाता
संकटों के काल में भी, साथ अपना है प्रखर,
एक दूजे की खुशी में, देखते अपना घर।
स्वर्ण सा ये नाता अपना, भूलना न ये कभी,
भाई का वरदान पाकर, तृप्त है मानस सभी॥
4. स्मृतियों की माला
सावन की घटा सी, भाई की याद छाई है।
जैसे चकोर को, याद मयंक की परछाई है॥
अंगना की धूल में, वो साथ साथ खेलना है,
स्मृतियों की माला में, पिरोई वो बेल है।
5. भाई की शक्ति और आधार
हो खड़ा सामने, चाहे जो भी संकट हो।
भाई की भुजाओं में, शक्ति का वो संपुट हो॥
ढाल सा जो साथ दे, तलवार सा जो वार हो,
रिश्तों की रणभूमि में, भाई ही तो आधार हो।
6. उम्मीद की लौ
जब थकी-हारी राहें, साथ न दें कभी,
भाई की आँखों में, उम्मीद की लौ दिखे तभी।
मौन की ये भाषा, शब्दों से बड़ी होती,
दुख के अंधेरों में, दीप सी खड़ी होती।
7. प्रेम की निर्मल धार
जैसे चन्दन की सुगन्ध, और शीतल मंद बयार,
भाई का ये प्रेम, जैसे नदी की निर्मल धार।
पावन है ये संगम, न अंत इसका कोई छोर,
मानस के मन में गूँजे, बस भाई का ही शोर।
8. भैया की मुस्कान और साथ
भैया की मुस्कान सुहानी, जैसे भोर की लाली है।
दुख की घड़ी में साथ खड़ा, जो ढाल बड़ी मतवाली है॥
हँसी-ठिठोली के संग में, बीतें पल अनमोल यहाँ।
भाई का जो साथ मिला, तो सब कुछ है अनमोल जहाँ॥
9. धीरज और खुशियाँ
राह कठिन हो, बाधा भारी, तब भी धीरज देता है।
अपनी पीड़ा को भुलाकर, खुशियाँ मुझको लेता है॥
शब्द नहीं हैं, भाव बड़े हैं, मौन में सब कह जाता है।
भाई का विश्वास सदा, मन में हिम्मत भर जाता है॥
10. युगों-युगों का बंधन
रक्त का नाता, मन का नाता, युगों-युगों का बंधन है।
भाई का यह पावन साया, सबसे ऊँचा चंदन है॥
दुनिया की इस भीड़ में मुझको, एक सहारा मिलता है।
भाई का प्रेम पाकर ही, मन का पुष्प खिलता है॥
11. बचपन की परछाई
बचपन की वो खट्टी-मीठी, यादों की परछाई है।
आज भी दिल के कोने में, भाई की ही पुरवाई है॥
साथ चलेंगे, साथ रहेंगे, यही हमारा सपना है।
इस जग में तो भाई ही, सबसे अपना-अपना है॥
12. उम्मीदों का साया
अंधेरी रात हो गहरी, न कोई राह दिखता हो,
तभी भाई का इक साया, उम्मीदों सा लिखता हो।
भरोसा ढाल बनता है, अड़चन सब मिट जाती हैं,
हृदय की धड़कनें मिलके, सुरों में गीत गाती हैं।
13. बचपन की बातें
वो कच्ची उम्र की बातें, वो मिट्टी में मचल जाना,
कभी लड़ना, कभी झगड़ना, फिर हँसते ही मिल जाना।
वही बचपन अभी ज़िंदा, हमारे मन के आंगन में,
अभी भी गूँजता है स्वर, पुराने उस ही सावन में।
14. प्रीति पावन
न कोई शर्त होती है, न कोई माँग होती है,
भाई की प्रीति पावन सी, सदा ही ख़ुश-मिज़ाज होती है।
नज़र जो देख ले अपना, तो सब कुछ अर्पण होता,
रिश्तों की इसी वीणा में, समर्पण का ही स्पंदन होता।
15. पर्वत सा सहारा
पर्वत सा खड़ा भाई, चट्टान सा सहारा है,
संसार की इस भीड़ में, बस वही प्राण-प्यारा है।
अगर गिर जाऊँ राहों में, तो हाथ थाम लेता है,
मेरे हर एक आंसू को, वो मुस्कान में ढाल देता है।
16. माथे पर हाथ का रखना
वो कच्ची उम्र की बातें, वो मिट्टी में मचल जाना,
वो भाई का मेरी खातिर, हर ज़िद को सफल बनाना।
आज भी याद आता है, वो माथे पर हाथ का रखना,
वो कठिन घड़ी में चुपके से, सब पीड़ा को खुद चखना।
17. सूनी राहें और आँगन
अब न वो हाथ मिलता है, न वो ममता भरी छाया,
बस रह गई है आँखों में, भाई की ही ये काया।
पर्वत सा खड़ा भाई, चट्टान सा सहारा था,
संसार की इस भीड़ में, बस वही प्राण-प्यारा था।
मैं लड़खड़ाया जब राहों में, उसने हाथ थामे थे,
मेरे हर एक आँसू को, वो अपनी मुस्कान में बाँधते थे।
आज सूनी है वो राहें, आज सूना वो आँगन है,
भाई की याद में जलता, आज मेरा सारा तन-मन है।
18. मौन की भाषा
न कोई शर्त थी अपनी, न कोई माँग थी बाकी,
भाई की प्रीति पावन थी, जो करती थी सदा राखी।
वो मौन की भाषा जो थी, अब कोलाहल बन गई है,
भाई की कमी आँखों में, एक सागर सी बन गई है।
19. लौट आने की उम्मीद
तुम लौट आओगे शायद, यही मन को बहलाते हैं,
हम आज भी हर कोने में, बस तुम्हें ही ढूंढते जाते हैं।
स्वर्ण सा नाता जोड़ा था, डोर विश्वास की भारी,
क्यों छोड़ गए तुम मुझे, ये विधाता की है लाचारी?
20. पिघलते शब्द
मानस की लेखनी रुकी, अब सुर भी नहीं निकलते,
भाई की याद में देखो, आज शब्द भी हैं पिघलते।
आँखों की नमी कहती, तुम सा न कोई दूजा था,
भाई के चरणों में ही, मेरी हर एक पूजा था।
21. हृदय के द्वार पर
हृदय के द्वार पर खड़ा, वह भाई मुस्कुराता है।
मेरे हर एक श्वास में, वो अपनापन जगाता है॥
न कोई याद पुरानी है, न कोई कल का साया है,
बस इसी पल में सिमटा, उसका प्रेम अगाध पाया है।
22. चट्टान सा सहारा
जब भी लहरें आती हैं, वो चट्टान बन जाता है।
मेरे काँपते हाथों को, तुरंत थाम ले जाता है॥
डर का नाम नहीं यहाँ, बस उसका साथ है बाकी,
वो देता हिम्मत हरदम, वो मेरी ढाल है राखी॥
23. मौन की बातें
शब्दों की ज़रूरत नहीं, न कोई तर्क होता है।
बस आँखों के इशारे से, सब कुछ तय होता है॥
वह अभी देख रहा मुझको, मैं उसे देख लेता हूँ,
बिन बोले ही मन की बातें, सब भेद झेल लेता हूँ॥
24. रूह में गाता
न कहीं खोया है वो, न कहीं दूर वो जाता है।
वो यहीं मेरे पास है, वो मेरी रूह में गाता है॥
ये प्रेम का अटूट बंधन, सदा वर्तमान रहता है,
भाई की धड़कन ही तो, मेरा मान-सम्मान रहता है॥
25. जीवन का विस्तार
मेरी हर एक मुस्कान में, उसका ही तो विस्तार है।
वह जो मेरे लिए खड़ा, वही तो मेरा संसार है॥
जब थकता हूँ मैं राहों में, वो छाँव बनके आता है,
मेरे माथे की हर शिकन को, वो अपने हाथों से मिटाता है।
26. जीवन की परछाई
क्या लिखूँ मैं भाई के बारे, वो तो मेरी ही परछाई है,
उसके बिन तो इस जीवन में, बस एक वीरान तन्हाई है।
वो चुपके से जो देखता, मेरी हर एक जरूरत को,
वो पढ़ लेता है आँखों में, मेरी हर एक सूरत को।
27. पीड़ा का हरण
जब भी मैं उदास होता हूँ, वो पास मेरे बैठ जाता है,
बिना कहे ही मेरी पीड़ा, वो अपने हृदय से लगाता है।
वो आँसू जो गिरते नहीं, वो उसकी ममता में घुल जाते हैं,
भाई के इस प्रेम के आगे, सारे दुख-दर्द भी झुक जाते हैं।
28. निस्वार्थ प्रेम
वो जो मेरी धड़कन में है, वो जो मेरी हर साँस में है,
भाई का वो निस्वार्थ प्रेम, जो मेरे हर विश्वास में है।
दूरी का कोई बोध नहीं, वो पल-पल मेरे साथ खड़ा,
मुश्किल की इस कठिन घड़ी में, वो मेरा होकर ही पड़ा।
29. अस्तित्व का खिलना
उसके होने की गरिमा से, मेरा अस्तित्व आज खिलता है,
ऐसा पावन प्रेम मुझे, बस भाई की ही गोद में मिलता है।
यदि बह पड़ें ये आँखें मेरी, तो वो अपना आँचल बिछा देता है,
मेरे गिरे हुए हर सपने को, वो फिर से सच बना देता है।
30. साक्षात ईश्वर
न कोई स्वार्थ, न कोई माया, बस एक अटूट नाता है,
भाई के इस पावन प्रेम में, मुझे साक्षात ईश्वर पाता है।
वो आज भी वहीं खड़ा है, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये जो प्रेम है भाई, मेरे जीवन के हर नाम में है।
31. दीपक सा जलता
मेरा साया बनकर भाई, संग-संग जो चलता है।
मेरे मन के हर कोने में, वो दीपक सा जलता है॥
जब भी कोई कष्ट हो मुझ पर, वो खुद ही सह लेता है,
मेरे हिस्से के सारे आँसू, वो अपने में बह लेता है॥
32. अजीब सा बंधन
वो चुपके से जो देखता है, मेरी हर इक थाह को।
वो मिटा देता है पल भर में, मेरी हर इक राह को॥
अजीब सा ये बंधन भाई, न कोई तर्क न कोई बात है,
बस उसके साथ होने से ही, ये जीवन भर प्रभात है॥
33. आईने में परछाई
वो जो देखता हूँ मैं आईने में, वो मैं नहीं, वो भाई है।
वो मेरी हर इक धड़कन में, रची-बसी परछाई है॥
कभी जो मैं गिरता हूँ राहों में, तो वो हाथ बढ़ाता है,
मेरा हर इक दर्द वो भाई, अपनी मुस्कान में छुपाता है॥
34. प्रेम के आगे हर गम फीका
आँखें मेरी नम होती हैं, जब वो मुझे गले लगाता है,
भाई के इस प्रेम के आगे, हर गम फीका पड़ जाता है॥
न कोई अंत है इस प्रेम का, न कोई छोर यहाँ,
भाई के सिवा मुझे, दिखता नहीं कोई और यहाँ॥
35. निस्वार्थ प्रेम का काम
वो आज भी पास है मेरे, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये निस्वार्थ प्रेम ही, मेरे जीवन के काम में है॥
मेरा साया बनकर भाई, संग-संग जो चलता है।
मेरे मन के हर कोने में, वो दीपक सा जलता है॥
36. कष्टों का हरण
जब भी कोई कष्ट हो मुझ पर, वो खुद ही सह लेता है,
मेरे हिस्से के सारे आँसू, वो अपने में बह लेता है॥
वो चुपके से जो देखता है, मेरी हर इक थाह को।
वो मिटा देता है पल भर में, मेरी हर इक राह को॥
37. जीवन का प्रभात
अजीब सा ये बंधन भाई, न कोई तर्क न कोई बात है,
बस उसके साथ होने से ही, ये जीवन भर प्रभात है॥
वो जो देखता हूँ मैं आईने में, वो मैं नहीं, वो भाई है।
वो मेरी हर इक धड़कन में, रची-बसी परछाई है॥
38. दर्द छुपाता मुस्कान में
कभी जो मैं गिरता हूँ राहों में, तो वो हाथ बढ़ाता है,
मेरा हर इक दर्द वो भाई, अपनी मुस्कान में छुपाता है॥
आँखें मेरी नम होती हैं, जब वो मुझे गले लगाता है,
भाई के इस प्रेम के आगे, हर गम फीका पड़ जाता है॥
39. प्रेम का अंतहीन छोर
न कोई अंत है इस प्रेम का, न कोई छोर यहाँ,
भाई के सिवा मुझे, दिखता नहीं कोई और यहाँ॥
वो आज भी पास है मेरे, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये निस्वार्थ प्रेम ही, मेरे जीवन के काम में है॥
40. जीवन का टुकड़ा
मेरे भीतर का दर्पण, भाई का ही मुखड़ा है।
उसके ही विश्वासों पर, यह जीवन का टुकड़ा है॥
जब भी राहें धुंधली हों, वो दीपक बन जाता है,
मेरे उजड़े सपनों में, वो रंग नया भर जाता है॥
41. ममता की कहानी
वो चुपके से जो सुनता है, मेरे दिल की धड़कन को।
वो अपने आँचल में भरता, मेरे हर इक नंदन को॥
न कोई मोल चुकाना है, न कोई शर्त पुरानी है,
भाई की ये ममता ही तो, जीवन की कहानी है॥
42. अनमोल रत्न
सावन की पहली बूंदों सा, शीतल उसका साया है।
मैंने इस अनमोल रत्न को, भाई के रूप में पाया है॥
वो दर्द नहीं होने देता, वो राह नहीं रुकने देता,
मेरे माथे की चिंता को, वो अपने सर पर झुकने देता॥
43. निडर होकर बढ़ना
वो मूक भाषा में कहता, तू बस आगे बढ़ता जा।
मेरे प्रेम के इस बंधन में, तू निडर होकर चढ़ता जा॥
दुनिया की सब माया फीकी, उसके एक इशारे पर,
मैं जी लेता हूँ सदियाँ, बस उसके प्रेम के सहारे पर॥
44. झील सी गहरी आँखें
आँखें उसकी झील सी गहरी, जिसमें प्यार ही बहता है।
वो बिना कहे ही सचमुच, मन की हर बात कहता है॥
वो पास खड़ा है हर पल, ये अहसास ही काफी है,
उसका निस्वार्थ प्रेम ही, मेरी खुशियों की माफी है॥
45. कल्पवृक्ष का साया
जब दुनिया के शोर में मैं, खुद को खोने लगता हूँ।
भाई के स्पर्श से ही मैं, फिर से होने लगता हूँ॥
वो थामे हाथ खड़ा है, जैसे कल्पवृक्ष का साया,
उसने मेरी हर मुश्किल को, अपना ही रूप बनाया॥
46. अगाध समर्पण
शब्द नहीं हैं अर्थ नहीं, बस एक अगाध समर्पण है।
भाई के इन चरणों में ही, मेरा तन और मन अर्पण है॥
वो आँसू मेरी आँखों के, खुद ही पोंछ डालता है,
मेरे सारे अँधेरों को, वो अपनी ज्योति से पाल लेता है।
47. अंतिम सत्य
अंतिम सत्य यही है भाई, तू ही मेरा आधार अभी।
तेरे प्रेम की इस नगरी में, मैं हूँ एक संसार अभी॥
जो कल था वो आज भी है, और कल भी यही रहेगा,
भाई का ये पावन रिश्ता, युगों-युगों तक बहेगा॥
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
हनुमान वंदना
संकट-मोचन, महाबल-धाम,
राम चरण हैं ,जिनका विश्राम॥
जाने जहां, रामदूत महान,
मानस नायक, श्री हनुमान।।
लंका की राजसभा आज किसी रणक्षेत्र से कम नहीं थी। चारों ओर स्वर्ण के स्तंभों की चमक थी, लेकिन सभा का वातावरण भारी था। रावण अपने ऊँचे स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान था, जिसका अहंकार स्वयं काल को चुनौती देता आज दंग था। उसके सामने प्रभु श्री राम के दूत—श्रीहनुमानजी—खड़े थे ।
रावण ने अपनी आँखों में क्रूरता और ठसक भरते हुए कहा, "तुच्छ वानर! क्या तू जानता है कि मेरी प्रभुता के सामने देवता भी काँपते हैं? मेरी शक्ति के आगे तो प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिए हैं।"
हनुमान जी ने एक क्षण के लिए सभा में व्याप्त उस 'चापलूसी भरे सन्नाटे' को देखा, जहाँ रावण के मंत्री अपने राजा की झूठी प्रशंसा में मग्न थे। हनुमान जी ने रावण की आँखों में आँखें डालकर व्यंग्य का वह बाण छोड़ा, जिसने लंका की नींव हिला दी:
"जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥"
यह सुनते ही सभा में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। हनुमान जी ने रावण के उस 'अहंकार के आईने' को पूरी सभा के सामने रख दिया, जिसे वह वर्षों से अपनी 'दिग्विजय' की चादर के नीचे छिपाए बैठा था।
हनुमान जी ने शांत किंतु गूँजती हुई आवाज़ में कहा:
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई।।
"रावण! तुम अपनी भुजाओं का जो यह बखान कर रहे हो, तुझे वह नर्मदा का तट अच्छी तरह याद है न,जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई, वहां की तुम्हारी प्रभुताई मैं भी जानता हूं,जहाँ तुम शिव पूजा में लीन थे और सहस्रबाहु जलक्रीड़ा कर रहा था। उस दिन सहस्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से जल का वेग रोक दिया था और तुम्हारी पूजा सामग्री ही नहीं, तुम्हारा सारा दंभ भी बहा ले गया था। उस समय तुम्हारी वह 'प्रभुता' कहाँ थी, जब सहस्रबाहु ने तुम्हें गदा के एक ही प्रहार से घायल कर अपनी हजार भुजाओं में किसी असहाय कीट की तरह जकड़ लिया था? भरी सभा में बताओ, क्या वह तुम्हारी 'प्रभुता' थी या तुम्हारा तमाशा?"
दरबारी स्तब्ध थे। रावण के चेहरे का तेज पल भर में फीका पड़ गया। हनुमान जी रुके नहीं, उन्होंने रावण के उस अहंकार पर अंतिम वार किया:
"जो रावण सहस्रबाहु की भुजाओं में छटपटाया, वह आज मेरे सामने अपनी प्रभुता का ढोंग कर रहा है? रावण, सत्य यह है कि तुम अपनी पुरानी पराजयों को अपनी ढाल बनाकर जी रहे हो, जबकि काल का चक्र तुम्हें हर कदम पर आईना दिखा रहा है।"
पूरी सभा में फुसफुसाहट शुरू हो गई।पर सब शांत थे
रावण का वह अहंकार, जिसे वह अपनी ढाल मानता था, हनुमान जी के शब्दों के आगे पानी-पानी हो गया था। यह रावण के व्यक्तित्व को रावण के अहंकार को सबसे बड़ा आईना था।
यहाँ हमें शिक्षा मिलती है कि जब आपकी सत्ता का आधार 'अहंकार' होता है, तो सत्य का एक छोटा सा प्रहार आपकी पूरी गरिमा को मिट्टी में मिला देता है।
आज के समाज में हम अपनी सफलताओं का जो 'बुलबुला' बनाकर घूमते हैं, वास्तविकता कभी न कभी उसे फोड़ ही देती है। रावण की तरह अहंकार में जीना केवल अपनी फजीहत को निमंत्रण देना है।
असली शक्ति बल या पद में नहीं, बल्कि 'विनम्रता' में है। हनुमान जी ने रावण को आईना दिखाया कि जिसे तुम अपनी 'प्रभुता' कहते हो, वह काल के चक्र के सामने मात्र एक 'व्यंग्य' है।
रावण मत बनिए। रावण का विनाश उसके सिरों के कारण नहीं, बल्कि उस एक 'अहंकार' के कारण हुआ जिसने उसकी बुद्धि हर ली थी। अपनी सीमाओं को पहचानें, सत्य को स्वीकार करें, यही आज के दौर की सबसे बड़ी शक्ति है।
सभी बोले सियावर राम चंद्र की जय ,पवनसुत हनुमान की जय जय जय सीताराम।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
रावण के दरबार में राम-तेज की हुंकार
"अञ्जनागर्भसम्भूतं कपीन्द्रं सचिवोत्तमम्।
रामदूतं महाप्राज्ञं हनुमान्ं नमाम्यहम्॥"
प्रिय राम भक्तों जय श्री राम,लंका का राजदरबार है, रावण अपने सिंहासन पर बैठा है, जैसे कोई पहाड़ अभिमान के बोझ से दबा हो। उस अहंकारी रावण ने जब हनुमान जी को देखा, तो वह दहाड़कर पूछ बैठा:
"कह लंकेश--------------- तोहि न प्राण के बाधा?"
रावण के इस अहंकारपूर्ण प्रश्न को सुनकर हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे रावण की आँखों में आँखें डालकर एक सिंह के समान गरज उठे और बोले:"जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥"
हनुमान जी ने रावण को आईना दिखाते हुए कहा—"हे रावण! तुम अपनी जिस शक्ति पर इतना गर्व कर रहे हो, वह व्यर्थ है। जिस प्रभु श्री राम के बल के मात्र एक 'लवलेश' (अति सूक्ष्म कण) से तुमने इस चराचर जगत को जीता है, मैं उन्हीं 'अतुलित बलशाली' श्री राम का दूत हूँ। तुमने उन्हीं की प्रिय पत्नी माता सीता का हरण किया है, और इसी महापाप के कारण अब तुम्हारा अंत निश्चित है।"यहाँ हनुमानजी ने रावण के दो प्रश्नों का उत्तर दे दिया,प्रथम कह लंकेस कवन तै कीसा का "जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। दूसरा केहिके बल घालेहु बन खीसा का तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।अगली चर्चा में हम आगे बात करेंगे। इसी बीच दरबार के एक कोने में खड़े शुक और सारण आपस में फुसफुसाए। शुक बोला—"भाई, इसे कहते हैं 'शेर के मुँह में जाकर दहाड़ना'! लंकापति ने तो इसे पूछा था कि तू कौन है, और यह वानर तो उन्हें उनका 'बायोडेटा' बता रहा है कि तुम जिस बल के नशे में चूर हो, वो भी तो उन्हीं के बल का एक अंश है!" सारण ने व्यंग्य से कहा—"चुप रह भाई, यह साधारण वानर नहीं, रावण की लंका की अंतिम घड़ी है!"
इस प्रसंग का निष्कर्ष यह है कि अहंकार सत्य को देखने नहीं देता। रावण अपनी बाहुबल की शक्ति पर गर्वित था, जबकि हनुमान जी ने स्पष्ट किया कि जिसे वह अपना बल समझ रहा है, वह वास्तव में परमात्मा के बल का एक अत्यंत तुच्छ अंश मात्र है। अहंकार मनुष्य को अंधा कर देता है, जिससे वह अपने ही विनाश को 'विजय' समझने की भूल कर बैठता है।इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि
विनम्रता ही असली बल है: हम अक्सर अपनी उपलब्धियों के गर्व में चूर होकर खुद को सर्वोपरि मान लेते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हमारे पास जो भी है, वह उस परम शक्ति की कृपा का एक छोटा सा अंश है।सत्य के लिए निर्भीकता: हनुमान जी ने रावण के दरबार में रहकर भी अपनी बात को पूरी निर्भीकता से कहा। आम आदमी को भी अपने जीवन में सत्य के मार्ग पर चलते हुए असत्य और अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए।
आंतरिक स्वतंत्रता: हनुमान जी का मन सदैव राम में स्थित था, इसीलिए वे रावण के दरबार में भी निडर थे। यदि व्यक्ति के मन में सत्य का वास हो, तो वह बाहरी चुनौतियों या दुखों के बंधन में भी आंतरिक रूप से मुक्त रहता है।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
।।चार विकार और एक प्रभु।।
अंजना-गर्भ-सम्भूतं, मारुतात्मज-मुत्तमम्।
राम-दूतं महाप्राज्ञं, विश्व-रूपं नमाम्यहम्॥"
परम सम्माननीय राम भक्तों, विद्वतजनों और धर्मपरायण श्रोताओं! आज मैं आपको सुंदरकांड के उस सुंदर दृश्य में ले जाना चाहता हूँ, जहाँ लंका के राजदरबार में रावण के अहंकार का सामना, प्रभु श्री राम के परम भक्त हमारे इष्ट देव हनुमान जी कर रहे हैं।
जब रावण ने हनुमान जी से पूछा----
कह लंकेश कवन तै किसा --- प्रान कै बाधा।।
तब हनुमान जी ने बड़ी निर्भीकता से इन पंक्तियों का गान किया:
“खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥”
परंतु बंधुओं, क्या ये पंक्तियाँ मात्र एक वानर के द्वारा अपने स्वामी के बल का बखान है? नहीं! हम अपने धर्म ग्रंथों और आध्यात्मिक की दृष्टि से देखें, तो ये पंक्तियाँ हमारे जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा हैं। ये पंक्तियाँ 'चार विकारों' और उन पर विजय पाने वाले 'एक प्रभु' की कथा हैं।
“खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥”
हनुमान जी ने रावण के दरबार में इन चार नामों का ही चयन क्यों किया? क्योंकि ये चार नाम हमारे भीतर पलने वाले उन चार शत्रुओं के प्रतीक हैं, जिन्होंने आज मनुष्य की आत्मा को कैद कर रखा है:
खर (क्रोध): 'खर' का अर्थ है गधा। गधा हठ का प्रतीक है। जब मनुष्य को अपने क्रोध पर हठ हो जाए, तो वह विवेक खो देता है। राम ने 'खर' का वध किया, यानी मनुष्य को क्रोध के हठ से मुक्ति दी।
दूषण (पाप और दुर्व्यसन): जो हमारे आचरण को 'दूषित' करे, वही दूषण है। लत, व्यसन और कुविचार—ये हमारे भीतर के दूषण हैं। राम का बाण इन दूषित प्रवृत्तियों को समाप्त करता है।
त्रिसिरा (त्रि-दोष या भ्रम): त्रिसिरा के तीन सिर— तीन दोष वात, पित्त और कफ है और तीन गुणों सत्व, रज और तम के असंतुलन का प्रतीक हैं। जब तक मन इन तीन गुणों के मायाजाल में फँसा है, तब तक भ्रम दूर नहीं होगा। राम ने त्रिसिरा को मारकर जीव को 'त्रिगुणातीत' होने का मार्ग दिखाया।
बाली (अहंकार): सबसे अंत में आता है 'बाली'। बाली यानी 'अहंकार'। यह अहंकार का सबसे बलशाली रूप है, जो कहता है—"मैं ही बलवान हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ।" बाली का वध रामायण का शिखर है। जब तक 'अहंकार' नहीं मरता, तब तक हृदय में राम का राज्य स्थापित नहीं हो सकता।
हनुमान जी ने रावण को यह चेतावनी दी कि—"हे रावण! तू बाहर की लंका पर गर्व कर रहा है, लेकिन जिसके भीतर ये चार विकार जीवित हैं, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। जिसने खर, दूषण, त्रिसिरा और बाली जैसे विकारों को मार दिया है, वही 'अतुलित बलशाली' श्री राम मेरे हृदय में वास करते हैं।"
मेरे प्यारे बंधुओं! हम आज भी रावण की तरह सभा में बैठे हैं। हमारे भीतर भी खर है, दूषण है, त्रिसिरा है और बाली है। हम अपनी गलतियों का दोष समाज पर, समय पर या दूसरों पर मढ़ते हैं। लेकिन सत्य यह है कि जब तक हम अपने भीतर के 'बाली' यानी अहंकार को राम रूपी विवेक के बाण से नहीं मारेंगे, तब तक हमें शांति का 'राज्य' प्राप्त नहीं होगा।
तो आइए, आज हनुमान जी के उस तेजस्वी संवाद से प्रेरणा लें। आज हम संकल्प लें कि हम अपने भीतर के इन चार विकारों पर प्रभु की कृपा का अंकुश लगाएंगे।
याद रखिए, हनुमान जी ने रावण को यह पंक्तियाँ सुनाकर केवल डराया नहीं था, बल्कि उसे जीवन का परम सत्य बताया था कि: विजय बाहर की लंका जीतने में नहीं, बल्कि भीतर के इन चार विकारों को जीतने में है।
जिसने अपने अंतःकरण में इन चार को मार दिया, उसके लिए प्रभु सदा 'अतुलित बलशाली' बनकर खडे़ रहते हैं।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! हनुमान जी महाराज की जय!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"मानस का मर्म: हँसते-हँसते लोटपोट"
"देखिए, हमारी पत्नी ने कहा- 'मानस', घर में आटा खत्म हो गया है, कुछ ले आइए।
मैंने कहा- तुम भी अजीब हो, आटा खत्म हुआ है तो क्या हुआ?
सब्जी तो है ना?
बोली- सब्जी तो तब बनेगी जब गैस होगी।
मैंने कहा- तो तुम भी कमाल करती हो,
जब पेट में भूख है, तो गैस की क्या जरूरत है?"।।१..
बढ़े दाम इतने यहाँ, हो गई है अब लार,
नेता जी की जेब में, फूला है व्यवहार।
फूला है व्यवहार, आमजन रोता बैठा,
महँगाई के बोझ से, 'मानस' है अब ऐंठा।
नेता जी कहते सुनो, "विकास आया द्वार,
खाओ तुम भी मजे से, मूँगफली की धार।"।।२.....
एक आदमी गया बैंक में, बोला- "लोन चाहिए।"
बैंक वाले ने पूछा- "क्यों?"
उसने कहा- "सब्जी खरीदनी है।"
बैंक मैनेजर हँसा- "भाई, सब्जी के लिए लोन?
क्या सब्जी में सोना लगा है?"
वह बोला- "नहीं साहब, सब्जी में सोना नहीं,
पर सब्जी लेने के लिए 'गोल्ड लोन' ही बचा है!"
हम हँसते हैं, पर हँसने की उम्र नहीं है,
यह तो जेब कटने की, एक सुखद प्रक्रिया है।
लोग कहते हैं- "अच्छे दिन आए हैं,"
पर गौर से देखिए, ये 'अच्छे दिन' भी
ईएमआई (EMI) पर लाए हैं!।।३.....
[अंतिम पंक्तियाँ - लोटपोट होने के लिए]
जेब में छेद है पर, ठाठ निराले हैं,
सड़कों पर आज कल, भूखे भी मतवाले हैं।
'मानस' की कलम चले, नेता जी की चाल पे,
हँस-हँस के आप गिरें, अपनी ही बेहाल पे!।।४.....
मानस की दुविधा
मदद करने के चक्कर में, दुनिया हुई बेहाल,
'मानस' फँसा पड़ा है अब, लेकर अपना हाल।
सुबह उठा तो लगा कि, बदल गया है दौर,
दफ्तर की फ़ाइलें कह रहीं, "कर लो थोड़ा शोर।"
पत्नी ने आवाज़ दी, "सुनो जी ओ 'मानस',
बाजार से लाओ जरा, थोड़ा सा तो रशन।
तेल के भाव देखो, मानों सोना बिकता है,
मूँगफली के भाव में, यहाँ आदमी पिसता है।"
मैंने पूछा- "क्या हम, घास भी खा सकते हैं?"
बोली- "घास के भी अब, रेट बढ़ सकते हैं।
क्योंकि उसे भी काटने वाली, मशीन अब स्मार्ट है,
'मानस', यह समझ लो कि, जेब ही अपनी फट है।"
दफ्तर की मीटिंग में, बॉस ने फरमाया है,
"काम का प्रेशर ही, जीवन का साया है।"
मैंने कहा- "सर, काम तो होता रहेगा,
पर चाय और बिस्किट का, बिल कौन भरेगा?"
वह बोले- "तुम तो 'मानस', बड़े ही ज्ञानी हो,
पगार में ही तो छुपी, महँगाई की कहानी हो।
कम खर्च करो, ज्यादा काम की आस लगाओ,
हवा में ही तुम तो, अब पेट को सजाओ।"
आदमी अब आदमी को, देख मुस्कुराता है,
कि किसके पास कितने, खाली हाथ आता है।
'मानस' अब सोचता है, ये कैसी है आजादी,
पगार के नाम पर बस, मिलती है बर्बादी।
निकल पड़े हैं सब अब, अपनी ही चाल पे,
हँसते हैं लोग यहाँ, खुद के ही हाल पे।
'मानस' कलम उठाए, तो दुनिया खिलखिलाती है,
व्यंग्य की चोट देखो, कैसे असर दिखाती है!
आधुनिक तकनीक का 'मानस'
'मानस' ने लिया मोबाइल, जैसे कोई वरदान है,
सारे काम छोड़कर, अब इसका ही ध्यान है।
वाई-फाई (Wi-Fi) के पीछे, घूमता पूरा मोहल्ला,
जैसे पानी के लिए, प्यासा कोई छल्ला।
पत्नी ने कहा- "जरा, कूड़ा बाहर डाल आओ,"
बोले- "रुकिए, पहले रील (Reel) पर तो 'लाइक' आ जाने दो!"
डाइट और 'मानस'
'मानस' चला जिम में, फिटनेस का है शौक,
वहाँ जाकर देखा तो, मच गया है खौफ।
मशीन पर दौड़ा ऐसे, जैसे शेर पीछे पड़ा है,
मगर बाहर निकलकर, समोसे पे ही खड़ा है।
बोले- "डाइट तो कल से पक्की, नियम अपना तगड़ा है,
आज तो बस मन को, थोड़ा सा ये पकड़ा है!"
'मानस' और इंटरव्यू
नौकरी के चक्कर में, 'मानस' हुआ परेशान,
इंटरव्यू देने गया, बनके बड़ा विद्वान।
बॉस ने पूछा- "कितनी पगार लेंगे आप?"
'मानस' बोला- "उतनी, जितने में कटे न मेरे पाप।
काम न करने का एक्स्ट्रा, और करने का थोड़ा कम,
ऐसी कंपनी ढूंढ रहा, जहाँ न हो कोई गम!"
रिश्तों का गणित
शादी में 'मानस' पहुँचा, बनकर बड़ा सयाना,
रिश्तेदारों ने घेरा, जैसे हो कोई खजाना।
पूछा- "बेटा! पगार क्या है? शादी कब करोगे?"
'मानस' ने कहा- "सब कर लूँगा, पर पहले ये तो बताओ,
इस 'मुफ्त की सलाह' की, फीस कहाँ भरेंगे?"
रिश्तेदार चुप हुए ऐसे, जैसे इंटरनेट गया हो,
'मानस' हँसा मन में, जैसे कोई युद्ध जीत गया हो!
'मानस' का बजट
महँगाई के साए में, 'मानस' ने लगाया दिमाग,
बोले- "सब्जी के बिना भी, जल सकती है ये आग!"
दाल-रोटी छोड़कर अब, 'डिजिटल डाइट' अपनाई है,
यूट्यूब पे देख के खाना, सबसे बड़ी चतुराई है।
देख के रसमलाई, मन को बहला लेते हैं,
और बिल के वक्त, 'मानस' बस 'ऑनलाइन' हो जाते हैं!
मीटिंग और 'मानस'
ऑफिस की मीटिंग में, 'मानस' सोए थे शान से,
बॉस ने पूछा- "क्या हाल है? काम हुआ क्या काम से?"
'मानस' चौंक कर बोले- "सर, मैं तो ध्यान में था,
आपकी बातों के रहस्य, सुलझाने के विधान में था!"
बॉस भी घबरा गया, अपनी ही तारीफ सुनकर,
'मानस' बच निकले फिर, अपनी चतुराई चुनकर!
डॉक्टर और 'मानस'
'मानस' गया डॉक्टर के पास, बोला- "सब दुखता है भाई,
न चलने में चैन है, न सोने में है मलाई।"
डॉक्टर ने जाँच की, बोला- "सिस्टम सारा ढीला है,
थोड़ा कम सोचिए 'मानस', तनाव बहुत रंगीला है।"
'मानस' बोला- "डॉक्टर साहब, तनाव तो तब कम होगा,
जब इलाज का बिल देख, मेरा बीपी (BP) फिर से न कम होगा!"
पड़ोसी का चक्कर
'मानस' के पड़ोसी हैं, बड़े ही महान,
खिड़की से देखते हैं, घर का सारा सामान।
पूछा- "मानस, क्या मंगाया है आज ऑनलाइन डब्बे में?"
'मानस' बोला- "इसमें मेरी वो खुशियाँ हैं, जो न आती आपके कब्जे में!"
पड़ोसी का चेहरा ऐसा हुआ, जैसे बिजली गुल हो गई हो,
'मानस' की हाज़िरजवाबी पे, पूरी गली दंग हो गई हो।
'मानस' और दुनियादारी
दुनिया कहती है, "मानस, ज़रा संभल के चलिए,"
"ज़माने के हिसाब से, अपने कदम बदलिए।"
'मानस' बोला- "ज़माने के हिसाब से चलूँगा तो,
मैं तो गड्ढे में गिरूँगा, और ज़माना हँसेगा!"
अपनी मर्जी का राजा हूँ, खुद ही अपनी शान हूँ,
मैं तो 'मानस' हूँ साहब, मैं खुद में ही एक जहान हूँ!
दफ्तर का 'मानस'
"देखिए, मेरा बॉस मुझे कहता है कि 'मानस', तुम समय पर दफ्तर क्यों नहीं आते?
मैंने कहा- सर, मैं समय पर ही निकलता हूँ, पर रास्ते में इतने 'विचार' मिल जाते हैं कि भटक जाता हूँ।
बॉस ने कहा- 'काम करो, विचार मत करो!'
मैंने कहा- सर, भारत में काम करने वालों की कमी नहीं है, कमी तो उन लोगों की है जो बिना काम के भी 'काम का ढोंग' करना जानते हैं।
मैं तो 'मानस' हूँ,
दफ्तर जाकर अपनी कुर्सी से अपनी दोस्ती पक्की करता हूँ,
क्योंकि बाकी सब तो दफ्तर में बस अपनी नौकरी पक्की करते हैं!"
महँगाई का तमाशा
महँगाई ने कर दिया, 'मानस' का बुरा हाल,
रुपया तो बीमार है, गिरते इसके बाल।
गिरते इसके बाल, जेब में खनक नहीं है,
'मानस' की थाली में, अब कोई चमक नहीं है।
पेट काट के जोड़ता, नेता जी का दान,
और 'मानस' को थमाते हैं, बस झूठा सम्मान!
पेट भरा हो तो हँसे, खाली पेट न कोय,
महँगाई के राज में, बस चमत्कार ही होय।
सरकारी तंत्र
"मित्रों, हमारे यहाँ एक फाइल है। फाइल का नाम है 'प्रगति'। वह पिछले दस साल से एक मेज से दूसरी मेज पर 'प्रगति' कर रही है। जब भी मैं उसे छूता हूँ, तो मुझे फाइल की आवाज़ आती है- 'मानस, हमें मत छुओ, हम सरकारी दस्तावेज़ हैं, हमें धूल खाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।'
मैंने एक बार बाबूजी से पूछा- काम कब होगा?
वो बोले- 'मानस, काम तो हो जाएगा, पर उसके लिए आपको 'धैर्य' का आवेदन देना होगा।'
मैंने कहा- धैर्य तो मेरा उसी दिन मर गया था, जिस दिन मैंने दफ्तर में 'सुधार' के पोस्टर देखे थे!"
सोशल मीडिया और 'मानस'
"आजकल लोग 'मानस' से पूछते हैं- आप इतने उदास क्यों रहते हैं?
मैंने कहा- उदास नहीं हूँ, बस 'रील्स' नहीं बना रहा।
आजकल आदमी के पास चेहरा है, पर उसे दिखाने के लिए फिल्टर चाहिए।
लोग कहते हैं- 'मानस', फोटो डालो, दुनिया को पता चले तुम क्या खा रहे हो।
मैंने कहा- भाई, मैं जो खा रहा हूँ, वो मेरा पेट जानता है,
दुनिया को बताऊंगा तो उन्हें भी 'बदहजमी' हो जाएगी।
मैं तो 'मानस' हूँ,
बिना फोटो के भी, अपनी खुशियाँ जी लेता हूँ,
क्योंकि आज कल की दुनिया में, बिना 'डिस्प्ले' के भी,
मैं अपना 'स्वैग' जी लेता हूँ!"
दफ्तर का 'मानस' १
मक्खी बैठी मेज पे, 'मानस' हुआ निहाल,
बोले बॉस से हुजूर, ये क्या है हाल-चाल?
काम तो होता रहेगा, फाइल को सोने दो,
मेरी इस थकान को, तुम थोड़ा तो रोने दो।
नौकरी तो बहाना है, तनख्वाह है असली खेल,
पेंशन की उम्मीद में, घिस रहे हम रेल!
महँगाई का दौर
रुपया हुआ है मरियल, जैसे लंगड़ा बैल,
महँगाई के शोर में, 'मानस' हुआ फेल।
'मानस' हुआ फेल, दाल में पानी ज्यादा,
नेता जी का देख लो, झूठा-मूठा वादा।
महँगाई ने काट दी, कमर सभी की यार,
'मानस' अब तो माँगता, सब्जी की उधार!
सरकारी फाइलों का रहस्य
दफ्तर की अलमारी में, फाइलें सोती हैं,
'मानस' के अरमान भी, वहीं रोती हैं।
साहब की मेज पे, कलम चलती धीरे,
'मानस' के काम में, लगे हैं अब तीरे।
भ्रष्टाचार की गंगा में, सब गोते खाएं,
'मानस' अपनी फाइल को, कहाँ ढूंढने जाएं?
सोशल मीडिया का युग
दुनिया है मोबाइल पे, 'मानस' भी है साथ,
रील्स में उलझा हुआ, हर व्यक्ति के हाथ।
हर कोई है 'स्टार' यहाँ, फिल्टर का है जोर,
'मानस' की सादगी पे, हँसता चारों ओर।
सच को छुपाने का, ये कैसा है हुनर,
'मानस' की आँखों में भी, बढ़ गया है डर!
यह लोकतंत्र का तमाशा१
सुनिए साहब! घर की साड़ी, फटी हुई है जेब,
महँगाई की भट्टी में, जलता अपना देश।
जलती है ये रोटी भी, जैसे कोई सपना,
'मानस' खड़ा सोचता, क्या बचा है अपना?
यह लोकतंत्र का तमाशा२
पत्नी बोली- "सुनिए जी, सब्जी में नमक कम है,"
मैंने कहा- "नमक तो है, पर बजट में ही दम है।
वो बोले कि 'अच्छे दिन' आएंगे घर चलकर,
हम तो खड़े हैं आज भी, लोन की किस्तें लेकर!"
यह लोकतंत्र का तमाशा३
नेता जी का भाषण देखो, लगता बड़ा कमाल,
विकास की इस गाड़ी में, 'मानस' हुआ बदहाल।
'मानस' हुआ बदहाल, पगार तो बस एक छलावा,
झूठ बोलने का देखो, कैसा मीठा बुलावा।
यह लोकतंत्र का तमाशा४
व्यवस्था का ये ढाँचा है, सड़ता हुआ एक लाश,
'मानस' की फाइलों में, खत्म हुई हर आस।
कुर्सी पर बैठे बाबू, जैसे पत्थर के भगवान,
फाइल आगे बढ़ती नहीं, मांगते हैं ये दान।
ये लोकतंत्र नहीं, बस एक तमाशा है पुराना,
'मानस' यहाँ मजबूर है, सच का सच बताने को!
यह लोकतंत्र का तमाशा५
दुनिया कहती- "डिजिटल बनो, हर काम हो जाएगा,"
मैंने कहा- "ऑनलाइन तो बस, अपना बीपी बढ़ जाएगा।"
फिल्टर लगा के चेहरे पर, सब बनते हैं यहाँ 'रईस',
'मानस' असली चेहरा लेकर, ढूंढ रहा है अपनी फीस।
हँस लो जरा खुलकर, क्योंकि रोने का भी टैक्स है,
'मानस' की जिंदगी अब, एक उलझा हुआ 'फॅक्स' है!
'मानस' का वायरल सच
महँगाई के साए में, 'मानस' हुआ बेहाल,
जेब में अपने छेद है, और बाहर सब मालामाल।
पत्नी बोली- "सुनिए जी, राशन का क्या होगा?"
मैंने कहा- "चिंता मत कर, ये बजट ही सबको खाएगा!"
ये सरकारी फाइलें भी, बड़े नखरे दिखाती हैं,
'मानस' की मेहनत पे, खुद ही इठलाती हैं।
बाबू बोले- "साहब अभी, मीटिंग में व्यस्त हैं,"
अरे! मीटिंग में तो बस, चाय की चुस्की का ही हस्त है।
सोशल मीडिया पर सब, 'फिट' नजर आते हैं,
फिल्टर लगा के चेहरे, सबको भरमाते हैं।
'मानस' ने भी सोचा, चलो थोड़ा स्मार्ट बनूँ,
कैमरा ऑन किया, तो लगा मैं खुद ही सबसे बड़ा 'कार्टून' हूँ!
अब आप ही बताओ, हँसें या फिर रो लें हम?
इस महँगाई के दौर में, कहाँ-कहाँ से हो लें हम?
अगर 'मानस' की ये बात, आपको लगी हो सही,
तो लाइक-शेयर कर दीजिए, वरना नाराज़गी तो सही!
चेहरे पर मुस्कान
"लोग कहते हैं 'मानस', आजकल चेहरे पर बड़ी मुस्कान है,
मैंने कहा- भाई, ये महँगाई का असर है, अब रोने में भी बड़ा नुकसान है!"
दफ्तर गया तो बॉस बोले- "मानस, काम पेंडिंग क्यों है?"
मैंने कहा- "सर, काम तो होता रहेगा, पर ये सरकारी फाइलें,
जैसे मेरे पड़ोसी का दिमाग, बड़ी स्लो मोशन में है!"
पत्नी ने लिस्ट थमाई, तो लगा जैसे 'यमराज' का बुलावा,
महँगाई के साए में, अब तो प्याज भी हुआ दिखावा!
सोशल मीडिया पर सब, 'फिल्टर' लगा के 'स्टार' बने,
'मानस' बेचारा अपना, असली चेहरा लेकर ही खड़ा रहे।
अरे! हँस लो थोड़ा खुलकर, क्योंकि हँसी अभी भी मुफ्त है,
वरना कल को इस पर भी, सरकार का ही टैक्स है!
"बात सही लगी हो, तो 'मानस' को फॉलो जरूर करना,
'मानस' और रिश्तेदारी का मायाजाल
"रिश्तेदार घर आ जाएं, तो समझो 'आफत' का आना है,
'मानस' के घर में आज, बिना बुलाए बारात का जमाना है!"
फूफा जी आए, पूछे- "बेटा, अब क्या करते हो?"
मैंने कहा- "वही जो आप कर रहे हैं, बस मुस्कुराते हुए मरते हैं!"
तभी बुआ जी बोलीं- "फेसबुक पर फोटो कम डाला करो,
लोग नजर लगा देंगे, थोड़ा तो संभला करो!"
मैंने कहा- "बुआ जी, असली चेहरा तो हम, 'फिल्टर' के पीछे छोड़ आए,
ये जो आप देख रही हैं, ये तो बस 'नेटवर्क' के साए!"
दुनिया दिखावे की है, और हम सादगी का चश्मा पहने,
'मानस' फँसा पड़ा है, इनके तर्कों के गहने।
अरे! अब तो बस, फोन बंद करके सो जाना बेहतर है,
वरना इन रिश्तेदारों के, किस्सों में ही अपना पूरा शहर है!
"बात में दम लगा हो, तो 'मानस' को शेयर करना,
और ऐसे 'रिश्तेदारों' से, थोड़ा बचकर ही रहना!"
'मानस' का फिटनेस मिशन
"जीम जाने का जुनून ऐसा, कि 'मानस' का दम फूल गया,
फिट होने के चक्कर में, आदमी अपना सुकून ही भूल गया!"
सुबह उठते ही 'मानस' ने, सलाद की थाली सजाई,
दो निवाले खाए तो, याद आई वो हलवाई की मिठाई।
ट्रेनर बोला- "सर, प्रोटीन शेक पियो और वजन घटाओ,"
मैंने कहा- "भाई, प्रोटीन के भाव में, मैं अपना घर बेच आऊं?"
घर आकर देखा तो, पत्नी ने पिज़्ज़ा मँगा रखा था,
'मानस' की डाइट का सारा, प्लान ही हिला रखा था!
इंसान फिट नहीं, बस 'एप्लीकेशन' का गुलाम हो गया,
कितने कदम चले आज, इसका ही बस नाम हो गया।
अरे! फिट वो भी है, जो मेहनत की रोटी खाता है,
'मानस' तो बस ये देख के, मन ही मन हँस जाता है!
"अगर ये डाइट वाला सच, आपको भी सताता है,
तो 'मानस' के पेज को, अभी फॉलो कर जाता है!"
'मानस' का ऑनलाइन धोखा
"ऑनलाइन मंगाया था 'मानस' ने, एक बड़ा शानदार सूट,
डिब्बा खुला तो मिला, वहाँ बस प्लास्टिक का एक बूट!"
फोटो में तो चमक थी, जैसे कोई शाही दरबार हो,
पर हाथ में आया तो, लगा जैसे किसी कबाड़ का हार हो।
कस्टमर केयर को फोन किया, तो बोले- "थोड़ा धैर्य रखिए,"
मैंने कहा- "धैर्य तो खत्म है, अब मेरी रकम वापस कीजिए!"
रिटर्न करने बैठे तो, शिपिंग चार्ज ही बड़ा भारी है,
'मानस' की ऑनलाइन शॉपिंग, अब पूरी दुनिया पर भारी है!
तस्वीरें सब झूठ हैं, और 'ऑफर' भी एक जाल है,
'मानस' अब समझ गया, ये डिजिटल खरीदारी का हाल है।
अरे! बाजार जाकर खरीदो, ताकि हाथ से तसल्ली हो,
वरना घर बैठकर, आपकी जेब की खूब खली-बली हो!
"अगर आपके साथ भी, ऐसा ही कुछ हुआ है,
तो 'मानस' के पेज को शेयर करना न भूलना!"
'मानस' और सड़कों का रण
"गाड़ी स्टार्ट करते ही 'मानस' का, पारा चढ़ जाता है,
सड़क पर निकलते ही, हर इंसान 'युधिष्ठिर' से 'भीम' बन जाता है!"
लाल बत्ती पे खड़ा होकर, मैं संयम का पाठ पढ़ता हूँ,
बगल वाला हॉर्न बजाए, तो मैं भी अपना धैर्य खोता हूँ।
कोई 'रॉन्ग साइड' से आता है, जैसे उसे यमराज ने बुलाया हो,
मैंने पूछा भाई साहब, क्या आपने रास्ता घर से ही बनाया हो?
वो बोले- "मानस, जल्दी में हूँ, अपनी मर्जी की सरकार है,"
सड़क पर नियम नहीं, बस 'हॉर्न' का ही अधिकार है!
ट्रैफिक पुलिस की सीटी, जैसे संगीत का कोई शोर है,
'मानस' अपनी मंज़िल ढूंढे, पर हर तरफ बस 'टोर' है।
अरे! गाड़ी तो पहुँचती है, पर सुकून कहीं खो जाता है,
सफर का मज़ा तो छोड़ो, 'मानस' बस तनाव ही साथ लाता है!
"अगर ट्रैफिक में आपका भी, ऐसा ही हाल होता है,
तो 'मानस' के इस वीडियो को, शेयर करना ना भूलना!"
शीर्षक: 'मानस' का शादी-समारोह
"शादी का कार्ड मिला 'मानस' को, जैसे कोई भारी वारंट आया है,
लिफाफे के अंदर निमंत्रण नहीं, 'तुलना' का बड़ा सामान आया है!"
लिस्ट बनी है तोहफों की, कि किसे क्या देना है,
बजट मेरा है छोटा सा, पर सबको खुश करना है।
रिश्तेदार के लिफाफे में, हजार रुपए का 'शगुन' डाला,
बदले में मिला 'मानस' को, काजू का एक सूखा सा प्याला!
खाने की लाइन में लगे, तो पसीने में नहाए हैं,
पनीर की खोज में हम, तीन चक्कर लगा आए हैं।
दूल्हे के दोस्त चिल्लाए- "जल्दी खाओ, फोटो खिचवानी है,"
अरे! 'मानस' को तो बस, अपनी भूख मिटानी है!
तैयार होकर गए थे हम, बनकर बड़े मेहमान,
वापस आए तो लगा, छिन गई है अपनी शान।
शादी है मिलन का पर्व, या दिखावे का एक मेला?
'मानस' सोचता है, जेब खाली कर के क्यों, लौट रहा हूँ अकेला!
"अगर शादी के खाने में, आपका भी ऐसा ही हाल होता है,
तो 'मानस' को शेयर कर, इस हंसी को साझा करना न भूलना!"
बिजली-पानी का बिल और 'मानस'
"बिजली का बिल आया घर, तो 'मानस' कांप गया,
पंखे की हवा में भी, अब तो डर नाप गया!"
मीटर दौड़ता ऐसे, जैसे कोई रेसर हो भाई,
'मानस' ने तो बस, एक बल्ब की रोशनी जलाई।
साहब कहते हैं- "आपने एसी तो नहीं चलाया?"
मैंने कहा- "सर, मैंने तो बस, गर्मी में पसीना ही बहाया!"
बिल देख के लगता है, जैसे चाँद पर घर लिया है,
'मानस' ने अब तो, मोमबत्ती से ही नाता जोड़ लिया है!
"अगर बिल देख के आपको भी, झटका लगता है भाई,
तो 'मानस' को फॉलो कर, शेयर की बत्ती जलाओ भाई!"
घर की मरम्मत और कारीगर
"कारीगर बोला 'मानस' से- कल पक्का काम हो जाएगा,
वो 'कल' आया नहीं कभी, और नल भी बहता जाएगा!"
प्लम्बर को फोन किया, तो बोले- "बस रास्ते में हूँ,"
'मानस' खड़ा है नंगे पैर, जैसे मैं ही बस्ती में हूँ।
वो आता है तो औजार छोड़, चाय की फरमाइश करता है,
काम तो होता नहीं, बस पाइप को और सिकोड़ता है।
'मानस' की टूटती छत, अब आसमान को निहारती है,
ये कारीगरों की गैंग, बस 'समय' पे ही वार करती है!
"ऐसे कारीगरों से, अगर आप भी हैं परेशान,
तो 'मानस' के इस वीडियो पे, मारो एक लाइक का बाण!"
नींद और सुबह का अलार्म
"अलार्म की घंटी बजी, तो 'मानस' ने उसको ललकारा,
सोने की इस जंग में, अब तक है खुद का ही सहारा!"
पाँच मिनट का स्नूज़ (Snooze), जैसे जिंदगी का आखिरी मौका,
'मानस' सोता है ऐसे, जैसे मिला हो कोई स्वर्ग का चौका।
दफ्तर जाने की जल्दी, और सपने में हसीन चाय,
अलार्म कहता है- उठ जाओ, वरना बॉस बोलेगा- 'बाय-बाय!'
मजबूरी में उठा हूँ, पर मन अभी बिस्तर में सोता है,
'मानस' की ये सुबह, वाकई बहुत 'जुल्मी' होता है!
"अगर सुबह उठते ही, आपको भी मौत आती है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, दोस्तों को जरूर सुनाती है!"
बैंक की लंबी लाइनें (KYC का चक्कर)
"बैंक की लाइन में 'मानस' खड़ा है, जैसे खड़ा हो कोई अपराधी,
KYC के नाम पर यहाँ, खत्म हो जाती है सादगी और आजादी!"
अंदर जाते ही बाबू बोले- "फॉर्म का कॉलम छोटा है,"
'मानस' बोला- "सर, मेरा तो पूरा जीवन ही खोटा है!"
आधार कार्ड, पैन कार्ड, बिजली का बिल लाए,
बाबू बोले- "फिर आओ, जब धूप में पसीना सूख जाए।"
लाइन में खड़े-खड़े, अब बाल भी सफेद हो गए,
'मानस' की आधी उम्र, बैंक की चौखट पे ही सो गए।
"अगर बैंक की लाइन ने, आपको भी रुलाया है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, दोस्तों को जरूर दिखाया है!"
घर में घुसते ही 'वाइ-फाई' (Wi-Fi) का झगड़ा
"घर में घुसते ही 'मानस' ने, पहले पासवर्ड माँगा,
बीवी बोली- 'पहले काम तो कर', तो 'मानस' का दम भागा!"
इंटरनेट चला गया तो, जैसे घर में सन्नाटा छा गया,
'मानस' का पूरा डिजिटल संसार, जैसे कहीं खो गया।
बीवी देख रही रील, बच्चा गेम में लगा है बड़ा,
वाइ-फाई की स्पीड पे, पूरा परिवार ही अड़ा है।
मैंने कहा- 'थोड़ी देर तो, आपस में बात कर लो',
सब बोले- 'मानस', पहले राउटर को तो ठीक कर लो!'
"अगर घर में इंटरनेट, इंसान से ज्यादा प्यारा है,
तो 'मानस' के इस वीडियो पे, शेयर का बटन ही सहारा है!"
रिश्तेदारों का 'ज्ञान' और सोशल मीडिया
"फेसबुक पर 'मानस' ने डाली, एक नई फोटो मुस्कान के साथ,
बुजुर्ग रिश्तेदार बोले- 'बेटा! क्या यही रह गया है, तेरे हाथ?'"
फोटो में मैं स्मार्ट, और दुनिया में बड़ा 'कूल' हूँ,
रिश्तेदार के कमेंट से, लग रहा मैं 'मूर्ख' का फूल हूँ।
लिखते हैं- 'बेटा, पूजा-पाठ पे भी कभी ध्यान दिया कर,'
मैंने कहा- 'अंकल, फेसबुक की शांति के लिए, मुझे भी चैन दिया कर!'
सोशल मीडिया पे 'मानस', अब एक 'युद्ध' लड़ रहा है,
अपनी प्राइवेसी बचाने को, हर रिश्तेदार से लड़ रहा है!
"अगर रिश्तेदारों की कमेंट्स से, आपको भी खुजली होती है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, अपनी वॉल पे जरूर बोती है!"
'हेल्थ कॉन्शियस' पड़ोसी
"पड़ोसी मेरा सलाद खाकर, बड़े ज्ञान देता है,
'मानस' को देख के वो, 'हेल्थ' का दान देता है!"
वो बोले- "मानस, घी छोड़ो, थोड़ा कड़वा जूस पिया करो,"
मैंने कहा- "भाई, जिंदगी कड़वी है, कम से कम जीभ तो जिया करो!"
वो रोज सुबह दौड़ते हैं, जैसे कोई यमराज पीछे पड़ा हो,
और मैं बालकनी में खड़ा होकर, चाय की चुस्की पे ही अड़ा हूँ।
पड़ोसी की फिटनेस का, जलवा बड़ा भारी है,
पर उनके फ्रिज में भी, 'पिज़्ज़ा' की ही बारी है!
"अगर ऐसे ज्ञानी पड़ोसी, आपको भी मिले हैं भाई,
तो 'मानस' का ये वीडियो, दोस्तों को जरूर दिखाई!"
'फोन की गैलरी' का कचरा
"मानस की गैलरी में, कचरे का अंबार है,
सुबह-सुबह 'गुड मॉर्निंग' का, ही तो ये त्यौहार है!"
व्हाट्सएप की सेटिंग में, ऑटो-डाउनलोड ऑन है,
गैलरी में पड़ा, अब तो मोबाइल भी 'डाउन' है।
दस फोटो 'गुड मॉर्निंग' की, और बीस 'फॉरवर्ड' ज्ञान,
'मानस' ढूंढता है अपनी फोटो, पर मिल नहीं रही जान!
फोन भर गया है साहब, डिलीट करते-करते हाथ दुख गए,
ये 'फॉरवर्ड' करने वालों के, तार ही अब तो झुक गए!
"अगर आपका फोन भी, मैसेज से भर जाता है प्यारा,
तो 'मानस' का ये वीडियो, शेयर करके जगाओ अपना यारा!"
'सस्ते के चक्कर में' (Online Sale)(फ्लैश सेल का 'धोखा')
"'मानस' को सेल दिखी, तो मन में उठा तूफान है,
सस्ते के चक्कर में फँसा, और बन गया 'परेशान' है!"
'फ्लैश सेल' शुरू हुई, और मैंने बटन दबाया,
पर वो 'आउट ऑफ स्टॉक' का, पैगाम हाथ में आया!
पचास प्रतिशत की छूट थी, पर सामान तो था ही नहीं,
'मानस' का ये 'ऑनलाइन शॉपिंग' वाला, कोई ईमान ही नहीं।
घंटों बर्बाद किए, और मिला बस एक 'थैंक्स' का मैसेज,
अब तो 'मानस' करता है, शॉपिंग पर ही एतराज का रिसेस!
"अगर 'फ्लैश सेल' ने, आपको भी चूना लगाया है,
तो 'मानस' के पेज को फॉलो कर, अपना दुख जताया है!
'महंगे रेस्टोरेंट का ड्रामा'(हर मध्यमवर्गीय इंसान की हकीकत)
"बड़े रेस्टोरेंट में 'मानस' ने, एक पिज्जा ऑर्डर किया,
बिल देखकर तो लगा, जैसे पूरा बैंक ही खाली किया!"
वहाँ का पानी है 'मिनरल', और वेटर है 'वीआईपी',
'मानस' वहाँ बैठ के, बस अपनी ही किस्मत को पी!
वो सूप में मिलाते हैं, बस दो बूंद कोई 'अजीब घास',
नाम है 'ऑर्गेनिक' उसका, पर स्वाद है बिल्कुल बकवास।
बिल में जो 'सर्विस चार्ज' है, वो दिल में चुभता है,
'मानस' घर आकर, फिर 'मैगी' में ही खुश होता है!
"अगर रेस्टोरेंट के खाने में, आपको भी स्वाद नहीं आता,
तो 'मानस' का ये सच, सबको शेयर कर के सुनाता!"
'सरकारी फॉर्म की भूलभुलैया'(जहाँ 'मानस' का दिमाग चकरा जाता है)
"सरकारी फॉर्म भरना 'मानस' के लिए, महाभारत का युद्ध है,
कॉलम ए-बी-सी में, दिमाग ही तो पूरा शुद्ध है!"
'आधार' का लिंक माँगा, तो 'पैन' का नंबर खो गया,
'मानस' फॉर्म भरते-भरते, खुद ही उलझ के सो गया।
वो पूछते हैं- 'आपका पिता का नाम, और दादा का बचपन का ठिकाना',
अरे! फॉर्म भरवा रहे हो, या मेरी पूरी खानदान की दास्तान सुनाना?
सबमिट बटन दबाया तो, आया 'एरर' (Error) का संदेश,
'मानस' का तो अब, फॉर्म भरते-भरते ही निकल गया भेष!
"अगर सरकारी फॉर्म ने, आपको भी परेशान किया है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, लाइक करके अपना दर्द साझा किया है!"
'बढ़ती उम्र और चश्मे का खेल'
(यह वह स्थिति है जब 'मानस' को समझ नहीं आता कि चश्मा कहाँ गया)
"आँखों पे लगा 'मानस' ने, एक बड़ा सा चश्मा पाया,
पर चश्मा ढूंढने में ही, आधा दिन निकल आया!"
हाथ में मोबाइल है, और आँखों पे चश्मा रखा है,
'मानस' ढूंढ रहा चश्मा, जैसे कोई खजाना बिखरा है!
पढ़ने बैठूँ तो दिखता नहीं, बिना उसके अक्षर सारे,
पहना तो लगा, जैसे धुंधले हो गए सितारे।
कभी माथे पे चढ़ता, तो कभी गले में लटक जाता है,
'मानस' की उम्र का ये चश्मा, अब अपनी ही धाक जमाता है!
"अगर चश्मा ढूंढते-ढूंढते, आपको भी आती है हंसी,
तो 'मानस' का ये वीडियो, शेयर करना अभी के अभी!"
'त्यौहारों की सफाई का खौफ'
(वह समय जब घर के कोने-कोने में 'मानस' को सफाई करनी पड़ती है)
"त्यौहार आया तो घर में, सफाई का भूकंप आया है,
'मानस' की पीठ का तो, अब बुरा हाल हो आया है!"
पत्नी कहती है- 'मानस', अलमारी के पीछे झाड़ू लगाओ,
मैं बोला- 'देवी जी, इससे अच्छा तो मुझे जेल ही भिजवाओ!'
मकड़ी के जाले साफ़ करते, मैं खुद एक जाले जैसा हो गया,
घर का कोना-कोना साफ़ करते, मेरा तो वजूद ही खो गया।
त्यौहार तो खुशियों के हैं, पर सफाई का ये डर कैसा,
'मानस' तो अब सफाई देख के, सो जाता है हो के बेबस-सा!
"अगर सफाई के नाम पर, आपको भी बुखार आता है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, दोस्तों को जरूर दिखाया है!"
'रिटायरमेंट' का सपना बनाम हकीकत
(वह समय जब 'मानस' सोचता है कि अब तो मौज होगी)
"रिटायरमेंट के बाद 'मानस' ने, सपने बड़े सजाए थे,
पर घर पहुँचते ही, कामों के ढेर सारे पहाड़ आए थे!"
सोचा था सुबह देर तक सोऊँगा, और अखबार पढ़ूँगा चैन से,
पर पत्नी बोली- 'अब समय मिला है, राशन ले आओ पैर से!'
'मानस' की आजादी का, बस एक दिन ही जश्न चला,
अगले ही दिन से, घर का 'कामकाजी' चक्र चला।
पेंशन का पैसा भी, अब घर की मरम्मत में जाता है,
'मानस' का रिटायरमेंट, बस 'अरेस्ट' (Arrest) जैसा नजर आता है!
"अगर रिटायरमेंट के बाद, आपको भी काम ही काम मिलता है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, शेयर करके अपना दर्द मिलता है!"
'बच्चों के साथ स्मार्ट बनने की कोशिश'
(वह जंग जहाँ 'मानस' हार जाता है)
"बच्चों को लगा 'मानस' बड़ा, 'पुराने खयालात' वाला है,
मैंने कहा- बेटा, इस 'स्मार्टफोन' से बड़ा तो, मेरा दिमाग ही निराला है!"
मैं सिखाने चला उन्हें, 'दुनियादारी' और 'संस्कार',
वो सिखाने लगे मुझे, 'इंस्टाग्राम' के नए 'रफ्तार'!
मैंने कहा- 'यह बटन क्या है?', बोले- 'बाबा ये फिल्टर है',
मैंने देखा तो लगा, चेहरा ही हो गया 'सिल्वर' है!
उनकी भाषा है 'कोड' (Code), और मेरी भाषा 'ज्ञान' है,
'मानस' फँसा है बीच में, जहाँ जनरेशन का 'तूफान' है!
"अगर बच्चों के आगे, आपकी भी 'स्मार्टनेस' फेल हो जाती है,
तो 'मानस' की ये बात, सबको खूब भाती है!"
'ब्रांडेड कपड़ों का चक्कर'
(वह दिखावा, जिसमें जेब कट जाती है)
"ब्रांड के नाम पर 'मानस' ने, एक टी-शर्ट बड़ी महँगी ली,
धोते ही वो सिकुड़ गई, जैसे निकली उसकी जान की कली!"
दुकानदार बोला- 'सर, ये तो प्रीमियम क्वालिटी का ब्रांड है',
'मानस' ने भी जेब खोली, जैसे कोई बहुत बड़ी 'कमांड' है।
एक बार पहना तो लगा, मैं खुद में कोई 'स्टार' हूँ,
धोया तो लगा, अब तो बस 'कपड़े के टुकड़े' का ही भार हूँ।
ब्रांड की चमक तो, पानी में ही बह गई,
'मानस' की वो हजारों की नोट, बस यादों में रह गई!
"अगर ब्रांड के चक्कर में, आपको भी चूना लगा है भाई,
तो 'मानस' के इस वीडियो को, शेयर कर के सब को बताओ भाई!"
'बारिश और ऑफिस का सफर'
(जब बारिश 'मानस' के सारे प्लान चौपट कर देती है)
"बारिश आई तो 'मानस' का, ऑफिस जाने का जोश मर गया,
जूते भी भीगे, और पूरा दिन ही तनाव से भर गया!"
छाता लेकर निकला तो, हवा ने उसे ही मोड़ दिया,
जैसे ऊपर वाले ने, मेरी किस्मत से ही नाता तोड़ दिया।
बस पकड़ने की रेस में, मैं तो कीचड़ में ही नहा गया,
ऑफिस पहुँचा तो लगा, मैं 'नदी' से ही हो कर आ गया!
बॉस बोले- 'लेट क्यों हो?', मैंने कहा- 'सर कुदरत का करिश्मा है',
'मानस' की ये बारिश वाली ज़िंदगी, बस एक 'भीगा हुआ' किस्सा है!
"अगर बारिश में ऑफिस जाना, आपको भी सजा लगती है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, दोस्तों को खूब जचती है!"
'तारीफ' का भूखा इंसान
(सोशल मीडिया पर लाइक्स की भूख)
"फोटो डाली तो 'मानस' ने, लाइक्स का इंतज़ार किया,
पर 5 लाइक देख के ही, दिल ने खुद पे वार किया!"
स्टेटस डाला- 'आज मैं खुश हूँ', पर अंदर से उदास है,
लोगों की वाह-वाही में ही, 'मानस' की सारी प्यास है।
कमेंट नहीं आए तो लगा, दुनिया मुझसे ही रूठ गई,
'मानस' की ये आभासी दुनिया, बस एक धागे पे टूट गई।
अरे! हकीकत की दुनिया में भी, कभी जी कर तो देखिए,
'मानस' की मुस्कान के लिए, असली दोस्तों को तो देखिए!
"अगर लाइक्स के पीछे, आप भी पागल हो रहे हैं भाई,
तो 'मानस' का ये वीडियो, लाइक करके सच्चाई अपनाई!"
'मच्छरों का आतंक' (रात की जंग)
(यह वह युद्ध है जिसे 'मानस' कभी नहीं जीत पाता)
"मच्छर ने किया 'मानस' पे, रात भर में ही हमला भारी,
नींद गई और गई चैन, बस बची है खरोचें सारी!"
मच्छर का वो गाना, जैसे कान में कोई रेडियो बजता है,
'मानस' हाथ चलाता है, पर मच्छर बस हँसता है।
'ऑल-आउट' (All-out) भी बेअसर, और कॉइल का भी दम निकल गया,
पूरी रात बीत गई, पर 'मानस' का चैन ही फिसल गया।
सुबह उठा तो लगा, जैसे किसी युद्ध का मैं सेनापति हूँ,
मच्छरों के काटने के बाद, अब तो बस एक 'छलनी' हूँ!
"अगर मच्छरों ने आपकी भी, रातों की नींद उड़ाई है,
तो 'मानस' का ये वीडियो, शेयर करके अपनी भड़ास दिखाई है!"
😅 सच बताऊं तो 'मानस' के साथ भी यही होता है। क्या आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है?
इस व्यंग्य को पूरा देखें और बताएं कि आपका अनुभव कैसा रहा! अगर हंसी आई हो, तो 'मानस' के पेज को फॉलो करना न भूलें, ऐसी और चटपटी बातें आती रहेंगी! 👇
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कभी हँसते-हँसते, तो कभी सोचते-सोचते! आज की यह कविता हमारी रोज़मर्रा की एक कड़वी सच्चाई को बयां करती है। अगर आपको लगा कि यह कहानी आपकी अपनी है, तो दिल खोलकर हँसिए और शेयर कीजिए!
आपकी राय कमेंट्स में जरूर बताएं, ऐसी और मज़ेदार बातें आती रहेंगी। 'मानस' के पेज को फॉलो करना न भूलें! 👇
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।