।।ॐ श्री हनुमंते नमः।।
।।ॐ श्री हनुमंते नमः।।
gstshandilya.blogspot.com Ramcharimanas,Manas charcha,manascharcha,Hindi kavy shastra,alnkar,chhand,ras, synonyms etc. रामचरितमानस,मानस चर्चा,मानसचर्चा, हिन्दी काव्य शास्त्र,अलंकार,छंद,रस,पर्यायवाची,स्व रचना,कविता आदि,अन्य विषयों पर निज विचार।हनुमान कथा,कहानी,मानस की कहानियां,रस,छंद,अलंकार ,पर्यायवाची आदि प्रस्तुत ब्लोग की सभी रचनायें इस ब्लोग के लेखक के पक्ष मे सर्वाधिकार सुरक्षित है !
।।ॐ श्री हनुमंते नमः।।
🔱 श्री शंकर-वंदना 🔱
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर, आदि-अनादि दिगंबर जय।
जय त्रिपुरारी, मन्मथ-हारी, हे भवभय-हारी शंकर जय॥
मस्तक सोहे बाल-शशांक, जटा-जूट में गंग बहे,
'मानस' का हर त्रास मिटाकर, शिव का पावन नाम रहे।
डमरू बाजे, डम-डम-डम-डम, तांडव नृत्य दिखाते शिव,
गले बिराजे महाकाल के, मुंडमाल मुस्काते शिव।
कालजयी हे महाकाल तुम, रूप तुम्हारा परम अनूप,
'मानस' के अज्ञान-तमस को, हरता शिव का दिव्य-सरूप।
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर...
नीलकंठ हे औढरदानी, संकट में जो सदा हँसे,
कालकूट-विष पीकर जिसने, जन-जन के सब कष्ट डसे।
त्रिशूल-धारी, डमरू-धारी, नंदी-वाहन त्रिपुरारी,
'मानस' का सर्वस्व तुम्हीं हो, हे शिव शंभू! अविकारी।
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर...
कण-कण भीतर शिव का वास, शिव ही आदि और अंत हैं,
शिव की महिमा अपरम्पार, गाते सब ऋषि और संत हैं।
करो कृपा हे आशुतोष, अब शरण तुम्हारी आया दास,
'मानस' में बस शिव ही गूँजे, शिव ही अंतिम एक प्यास।
जय जय शंभू! जय जय शंभू! हर हर महादेव शिव शंभू!
'मानस' रंजन, भव-भय भंजन, जय-जय-जय कैलास-प्रभु॥
।। सोरठा ।।
पवन-वेग सुकुमार, करुणा-सिंधु कपीश प्रभु।
हरहु सकल संसार, बाधा विपति विलोकि जन॥
।। वंदना ।।
जयति जयति अंजनी के जाए, अद्भुत रूप अतुल बल पाए।
मुख पर सात्विक तेज बिराजे, देखि छटा कलिमल सब भागे॥
राम काज हित तुम अवतारे, सुग्रीव के काज सँवारे।
लाँघि सिंधु गए सिय-सुधि लाने, लंका जारि असुर भय माने॥
लछिमन प्रान उबारे जाई, संजीवन ला ये हरषाई।
जहाँ-जहाँ रघुनाथ बखाना, तहाँ-तहाँ तुम हाजिर नाना॥
भक्ति-भाव का वर दो देवा, जनम-जनम पाऊँ तव सेवा।
'मानस' विनय करे कर जोरी, संकट हरो विपत्ति अब मोरी॥
।। मंत्र ।।
ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
।। दोहा ।।
कनक बदन कुण्डल ललित, कर माला सिर छत्र।
नमो नमो मार्तण्ड प्रभु, हरहु तिमिर सर्वत्र॥
।। वंदना ।।
उदय देव हे दिनकर स्वामी, नमन तुम्हें कोटि प्रणाम।
अंधकार के नाशक प्रभु तुम, आदिदेव तुम साक्षात॥
ॐ जय कश्यप-नंदन, जय जग-वंदन,
तेज तुम्हारा अमित अपार।
ऋद्धि-सिद्धि के दाता तुम हो, तुमसे रोशन यह संसार॥
हाथ जोड़कर शीश नवाएँ, अर्घ्य समर्पण करते हम।
किरणों से अपनी हे भगवन, हर लो हमारे सारे ग़म॥
बुद्धि, बल और आरोग्य दो देवा, शुद्ध करो हमारा मन।
'मानस' शीश नवाए प्रभु चरनन, सफल करो यह मानव जीवन॥
।। मंत्र ।।
ॐ सूर्याय नमः
ॐ आदित्याय नमः
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. ऑनलाइन फ्रॉड और लॉटरी घोटाला (OTP स्कैम)
दोहा:
लिंक दबावत ही गयो, बैंक अकाउंट साफ़।
मानस ओटीपी दियो, अब काहे का विलाप॥
2. नौकरियों का घोटाला (पेपर लीक कांड)
दोहा:
रट-रट के छात्र मरे, पेपर लीक कराय।
मानस डिगरी रो रही, चोर महल चमकाय॥
3. नकली दवाओं का घोटाला
दोहा:
जहर बेचते चाव से, ओढ़ि वैद का भेस।
मानस नोट बटोरते, जीवन देइ कलेस॥
4. राशन घोटाला (गरीबों के हक की लूट)
दोहा:
कागज़ पर राशन बँट्यो, भूखा मरे किसान।
मानस साहेब की यहाँ, तोंद भई बलवान॥
5. ऑनलाइन रील्स और फेक लाइक घोटाला (बिकते व्यूज)
दोहा:
पैसा देइ के खरीदता, लाइक और कमेंत।
मानस नकली व्यूज का, कलयुग माहीं ट्रेंड॥
6. चिटफंड घोटाला (पैसा डबल करने का लालच)
दोहा:
इक्कीस दिन में डबल का, मन में पाल्यो लोभ।
मानस कंपनी भाग गई, अब करतहु सब क्षोभ॥
7. दिखावटी संस्थाएँ और चंदा घोटाला (NGO स्कैम)
दोहा:
अनाथालय के नाम पै, माँग रहे सब भीख।
मानस खुद एसी में रहें, जनता पाए सीख॥
8. सरकारी फंड का घोटाला (सड़क और पुल का टूटना)दोहा:
मौरंग-माटी से बन्यो, पहली बारिश ढाय।
मानस पुलिया बह गई, ठेकेदार मुसकाय॥
📱 डिजिटल मोह-माया
खींच रहे सब सेल्फी, चाहे दुःख का काल।
अश्रु बहाना बाद में, पहले पोस्ट संभाल।।
🥙 सेहत और दिखावा
छोड़ चले माँ का हाथ, पीछे भागे डाइट।
देसी घी में ज़हर है, पिज़्ज़ा लगता राइट।।
🤐 सत्य की स्थिति
झूठ यहाँ पर हंस रहा, पहन रेशमी चीर।
सच बैठा है कोने में, आँखों में ले नीर।।
💸 संपन्नता का स्वांग
जेब कटी है फटी है, कर्ज चढ़ा है सीस।
आईफोन हाथ में, खींचे लंबी खीस।।
🤫 ज्ञान का प्रदर्शन
डिग्री लेकर हाथ में, अक्ल ढूंढे बाजार।
गूगल बाबा हो गए, सबके खेवनहार।।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. दिखावे की भक्ति पर व्यंग्य
चौपाई:
तिलक विशाल भाल चमकावा, माला फेरत जगहि दिखावा।
भीतर कपट पाप की खानि, बाहर साधु बने अज्ञानी॥
दोहा:
मानस ईस्वर दूर है, मन के मेल न धोय।
फोटो खींचत भक्ति की, रील वायरल होय॥
2. स्वार्थ और रिश्तों पर व्यंग्य
चौपाई:
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति, कलयुग की यह पावन रीति।
माता-पिता वृद्ध घर परहीं, बेटा सेल्फी बीच बिहरहीं॥
दोहा:
प्रेम घटा अब ऐप में, रिश्ता हुआ बाजार।
मानस सगा न कोउ यहाँ, मतलब का संसार॥
3. 'ज्ञानी' और 'ट्रोलर्स' पर व्यंग्य
चौपाई:
बिनु विद्या पंडित भइ भारी, गूगल ज्ञान बघारत चारी।
दूजे के अवगुण सब गावैं, निज मुख कालिख देखि न पावैं॥
दोहा:
पर निंदा में मग्न है, तजि के सांचो काम।
मानस कीबोर्ड हाथ लै, बन बैठे भगवान॥
4. धन और प्रदर्शन पर व्यंग्य
चौपाई:
झूठ बोलि जे धन को जोड़ें, धर्म-नीति की मर्यादा तोड़ें।
दान करहिं दश टका जो भाई, सौ पन्ना पेपर छपवाई॥
दोहा:
भूख न पूंछे जात को, दान न मांगै शोर।
मानस पर उपकार अब, है बस पब्लिसिटी जोर॥
5. सोशल मीडिया और दिखावे पर प्रहार
चौपाई:
खान-पान सब फोटो माहीं, बिना रील कछु पचतहु नाहीं।
संकट पड़े न मित्र गोहरावैं, मोबाइल लै वीडियो बनावैं॥
दोहा:
मानस भीतर रिक्तता, बाहर ठाठ-बटाठ।
लाइक देखत रात भर, हृदय लगावत गांठ॥
6. आधुनिक गुरुओं और ज्ञानियों पर व्यंग्य
चौपाई:
निज घर शांति न एकहु रत्ती, जगत बाँटते फिरत विभूति।
मंच विराजी प्रवचन झाड़ें, पीछे बैठि के नोट निहाड़ें॥
दोहा:
त्याग सिखावैं और को, खुद कंचन के दास।
मानस ऐसे ज्ञान का, मत करियो विश्वास॥
7. स्वास्थ्य और बनावटीपन पर व्यंग्य
चौपाई:
शुद्ध अन्न कहुं मिलई न भाई, पैकेट बंद की महिमा छाई।
पसीना बहावन जिम को जाहीं, घर की चक्की छुवतहु नाहीं॥
दोहा:
तन सुंदर मन मैल भरा, कपट भरा है बोल।
मानस असली रूप तब, जब खुल जाय पोल॥
8. राजनीति और स्वार्थ पर व्यंग्य
चौपाई:
जात-पात की आग लगाई, अपनी रोटी सेकत भाई।
जनता रोवत भूख पियासा, नेता देखत विजय तमाशा॥
दोहा:
कुर्सी ऊपर टिकी है, सबकी आजु नजर।
मानस जनता पिस रही, नेता बेखबर॥
प्रस्तुति के लिए सुझाव (यूट्यूब हेतु):
9. मोबाइल की गुलामी पर व्यंग्य
चौपाई:
मात-पिता सँग बैठ न पावैं, अनचिनहन सँग चैट बढ़ावैं।
भोजन हाथ रहे नहिं यादू, अंगूठा चलत निरंतर दादू॥
सुत-तिय-तात पास सब बैठे, मनहूँ सात समंदर पैठे।
नेटवर्क रहत तो मुख पर लाली, जो कट जाय तो जीवन खाली॥
दोहा:
मानस जिय को यंत्र यह, कीन्हों बस में डार।
पास खड़े को देख नहिं, जपत 'ऑनलाइन' सार॥
10. शिक्षा और डिग्रियों पर प्रहार
चौपाई:
पोथी पढ़ि-पढ़ि डिगरी धारी, अकल बिना सब फिरत भिखारी।
आदर-मान बिसारि कै ताता, अंग्रेजी में गारी गाता॥
संस्कार सब धूलि मिलावैं, पाश्चात्य की रीत सिखावैं।
वृद्धाश्रम में जनक पठाई, सुखी होन की करत कमाई॥
दोहा:
शिक्षित कहिए ताहि को, जो सेवा मन लाय।
मानस कोरी डिगरी, रद्दी भाव बकाय॥
11. आधुनिक विवाह और रस्मों पर व्यंग्य
चौपाई:
ब्याह न रहा अब पावन काजा, बन गय शक्ति प्रदर्शन बाजा।
कर्ज उठाई के महल सजावैं, सात पुश्त तक ब्याज चुकावैं॥
प्री-वेडिंग की महिमा भारी, मर्यादा सब गयी बिसारी।
रस्म-रिवाज भये अब फीके, फोटो खींचे बस मन टीके॥
दोहा:
सात वचन बिसराय के, साढ़े सात फेर।
मानस टूटे प्रेम तब, जब होवत धन ढेर॥
12. दिखावटी परोपकार (चैरिटी) पर व्यंग्य
चौपाई:
दीन दुखी को अन्न खिलावैं, कैमरा लैके शोर मचावैं।
एक केला जो हाथ थमावैं, दस मिलि के फोटो खिचवावैं॥
गुपत दान की महिमा खोई, जग जाहिर बिनु करे न कोई।
पुण्य के बदले व्यूज कमावैं, नरकहु में अपनी रील बनावैं॥
दोहा:
दान वही जो दाहिना, बाएँ को नहिं ज्ञात।
मानस आजु प्रचार बिनु, होवत नहिं प्रभात॥
13. 'स्टेटस' और 'दिखावे' की होड़ पर
चौपाई:
घर में राशन होय न भाई, आईफोन की किश्त चुकाई।
फटे पैंट को फैशन मानहिं, लाज-शरम सब तजि के जानहिं॥
तेल चुपड़ि के बाल संवारें, शीशे देखि के उमर गुजारें।
सुखी होन का करत ढोंग है, भीतर बैठा भारी रोग है॥
दोहा:
मानस चमक बाहर घनी, भीतर घोर अँधेर।
उजले कपड़े पहन कर, घूम रहे सब ढेर॥
14. आधुनिक 'स्वास्थ्य' और 'डाइट' पर व्यंग्य
चौपाई:
पिज्जा-बर्गर चाट जो खावैं, पेट फुलाय के जिम को जावैं।
हरी सब्जियाँ देखि के रोवैं, कोल्ड-ड्रिंक में जीवन खोवैं॥
योग करत बस फोटो काजा, तन सूखी पर मन है राजा।
नींद न आवै बिना दवाई, ऐसी जुगत कलयुग में आई॥
दोहा:
पैदल चलना छोड़ि के, चढ़े कार पर धाय।
मानस व्याधि बढ़त है, काया रही कुम्हलाय॥
15. 'गूगल' और 'वॉट्सऐप' के अल्पज्ञानी पंडितों पर
चौपाई:
बिना पढ़े जो प्रवचन झाड़ें, वॉट्सऐप का ज्ञान बघारें।
सच-झूठ का बोध न भाई, फॉरवर्ड करहीं आफत आई॥
तर्क करत सब ब्रह्मज्ञानी, जैसे गंगा किनारे प्राणी।
निज घर का नहिं होय ठिकाना, जग को देते ज्ञान पुराना॥
दोहा:
अकल चरी जब घास को, गूगल बन्यो गुरुदेव।
मानस सच को भूलि के, करहिं झूठ की सेव॥
16. 'वीआईपी' कल्चर और चापलूसी पर
चौपाई:
बड़े लोग की करहिं गुलामी, छोटे देखि के दिखावैं खामी।
आगे-पीछे हाथ जो जोड़े, पद के लालच नियम मरोड़े॥
तिलक लगाय के साहेब बनहीं, जनता की पीड़ा नहिं सुनहीं।
कुर्सी पावत बुद्धि हिरानी, भूल गये अपनी सब कहानी॥
दोहा:
पद की गरिमा धूलि सम, चमचागिरी अपार।
मानस ऐसी रीत देखि, रोवत है संसार॥
17. 'स्टेटस' और 'दिखावे' की होड़ पर
चौपाई:
घर में राशन होय न भाई, आईफोन की किश्त चुकाई।
फटे पैंट को फैशन मानहिं, लाज-शरम सब तजि के जानहिं॥
तेल चुपड़ि के बाल संवारें, शीशे देखि के उमर गुजारें।
सुखी होन का करत ढोंग है, भीतर बैठा भारी रोग है॥
दोहा:
मानस चमक बाहर घनी, भीतर घोर अँधेर।
उजले कपड़े पहन कर, घूम रहे सब ढेर॥
18. आधुनिक 'स्वास्थ्य' और 'डाइट' पर व्यंग्य
चौपाई:
पिज्जा-बर्गर चाट जो खावैं, पेट फुलाय के जिम को जावैं।
हरी सब्जियाँ देखि के रोवैं, कोल्ड-ड्रिंक में जीवन खोवैं॥
योग करत बस फोटो काजा, तन सूखी पर मन है राजा।
नींद न आवै बिना दवाई, ऐसी जुगत कलयुग में आई॥
दोहा:
पैदल चलना छोड़ि के, चढ़े कार पर धाय।
मानस व्याधि बढ़त है, काया रही कुम्हलाय॥
19. 'गूगल' और 'वॉट्सऐप' के अल्पज्ञानी पंडितों पर
चौपाई:
बिना पढ़े जो प्रवचन झाड़ें, वॉट्सऐप का ज्ञान बघारें।
सच-झूठ का बोध न भाई, फॉरवर्ड करहीं आफत आई॥
तर्क करत सब ब्रह्मज्ञानी, जैसे गंगा किनारे प्राणी।
निज घर का नहिं होय ठिकाना, जग को देते ज्ञान पुराना॥
दोहा:
अकल चरी जब घास को, गूगल बन्यो गुरुदेव।
मानस सच को भूलि के, करहिं झूठ की सेव॥
20. 'वीआईपी' कल्चर और चापलूसी पर
चौपाई:
बड़े लोग की करहिं गुलामी, छोटे देखि के दिखावैं खामी।
आगे-पीछे हाथ जो जोड़े, पद के लालच नियम मरोड़े॥
तिलक लगाय के साहेब बनहीं, जनता की पीड़ा नहिं सुनहीं।
कुर्सी पावत बुद्धि हिरानी, भूल गये अपनी सब कहानी॥
दोहा:
पद की गरिमा धूलि सम, चमचागिरी अपार।
मानस ऐसी रीत देखि, रोवत है संसार॥
21. वृद्ध माता-पिता की दुर्दशा पर करारा प्रहार
चौपाई:
तीरथ जाइ के पुण्य कमावैं, घर के देव को भूख रुलावैं।
कुत्ता पालि के लाड़ लड़ावैं, जननी-जनक को बोझ बतावैं॥
मंदिर माहीं भोग चढ़ावैं, घर की थाली जहर बनावैं।
फोटो खींचि के फेसबुक डारें, "मिस यू माँ" कहि फर्ज उतारें॥
दोहा:
मानस पत्थर पूजते, घर का हीरा खोय।
वृद्ध आश्रम में पिता, बेटा मगन सोय॥
22. 'मुफ्तखोर' राजनीति और बिकती जनता पर
चौपाई:
दारू-मुर्गा रात खवावैं, सुबह वोट को बटन दबावैं।
पाँच साल फिर रोवत राहीं, नेता देखि के मुसकुराहीं॥
मुफ्त की रेवड़ी मुँह में डारें, देश को गर्त में रोज उतारें।
धर्म के नाम पै आग लगावैं, अपनी रोटी खूब सिकावैं॥
दोहा:
बिका हुआ जो वोट है, बिका हुआ है राज।
मानस नग्न खड़ा हुआ, लोकतंत्र का आज॥
23. न्याय और व्यवस्था की सड़न पर व्यंग्य
चौपाई:
निर्बल को सब डंडा मारें, सबल को झुकि के शीश उतारें।
कानून की देवी अँखियाँ मीचें, न्याय बिकत है मेजों नीचे॥
चोर उचक्के मंच विराजी, साधु फिरत हैं बन के पाजी।
सच बोले तो जेल पठावैं, झूठ कहें तो माला पावैं॥
दोहा:
मानस कलम बिकी जहाँ, न्याय की कौन आस।
सरेआम नीलामी हुई, जनता भई हताश॥
24. दिखावटी संतों और 'आश्रम' के पापों पर
चौपाई:
भगवा ओढ़ि के काम कमावैं, भोली जनता को भरमावैं।
महल खड़ा कियो धर्म के नामे, पाप छिपाये सुंदर जामे॥
योग सिखावत भोगी भारी, पर-धन पर-तिय पर अधिकारी।
चेला मुँड़ि के अपना भरहीं, भक्ति की आड़ में धंधा करहीं॥
दोहा:
तुलसी मानस रो रहे, देखि संत को भेस।
मानस रावण राज अब, छाया है हर देस॥
25. सोशल मीडिया की 'प्रदर्शनी' और खोखलेपन पर
चौपाई:
दुखिया देखि के रील्स बनावैं, आँसू गिरत न लाइक पावैं।
श्मशान माहीं सेल्फी खींचे, लाज-शरम सब पाँवन नीचे॥
संस्कार की बातें करहीं, खुद मर्यादा तनिक न धरहीं।
नंगे तन को फैशन कहहीं, गंदी भाषा मन में रहहीं॥
दोहा:
मर्यादा की चिता पर, नाच रहा संसार।
मानस डिजिटल हो गया, नफरत का व्यापार॥
26. बदलते समाज और लुप्त होती मर्यादा पर
चौपाई:
कुल की रीत बिसारी सबहीं, लाज-शरम मन भावत नाहीं।
मधुर बचन अब कोउ न बोलै, कटु बानी में विष को घोलै॥
मर्यादा के बंधन टूटे, साँचो प्रेम गलिन में लूटे।
कलयुग के सुर ऐसे बाजे, कपट यहाँ सिंहासन साजे॥
दोहा:
मानस उजला वेश है, मन मलीन कुरुप।
छाया में बैठे सभी, बेचत अपनी धूप॥
27. घर की शांति और मोबाइल की माया पर
चौपाई:
घर-घर माहीं मौन पसारा, यंत्र बन्यो अब प्रान हमारा।
सुत-पितु मातु न बात बढ़ावैं, उँगली चलत स्क्रीन डरावैं॥
अंसुअन बहे तो कोउ न पुंछे, स्टेटस देखि के धीरज मुँछें।
झूठी दुनिया, झूठे नाते, रोवत-रोवत हँसते जाते॥
दोहा:
पास बैठि के दूर हैं, मन के टूटे तार।
मानस कैसी रीत यह, अजब भयो संसार॥
28. झूठी प्रतिष्ठा और कर्ज के दलदल पर
चौपाई:
देखि-देखी सब करत दिखावा, भीतर भले न एकहु पावा।
कर्ज उठाई के महल सजावैं, जग को अपनी आन दिखावैं॥
सुंदर चोगा, भीतर खाली, जैसे सावन सूखी डाली।
सादगी को सब मूर्ख बतावैं, चमक-दमक के पीछे धावैं॥
दोहा:
मानस महँगी गाड़ियाँ, सस्ते भये विचार।
किस्तों पर चलने लगा, आज यहाँ व्यवहार॥
29. निंदा रस और कलयुगी ज्ञानियों पर
चौपाई:
अपनी आँख की शुद्धि न करहीं, पर-अवगुण पर चश्मा धरहीं।
कीबोर्ड हाथ लै बनत विधाता, धर्म-नीति का ज्ञान बघाता॥
साधु सरल को मंद बतावैं, चतुर कपटी को शीश नवावैं।
सत्य विकल हो कोने रोवे, झूठ यहाँ मखमल में सोवे॥
दोहा:
गंगा-जल निंदक भये, मदिरा भई सुजान।
मानस उलटी धार में, बहते चतुर सुजान॥
30. दिखावे के रिश्तों और खोखले प्रेम पर
चौपाई:
मुख पर मीठी बानी बोलें, हृदय माहीं बस विष ही घोलें।
गरज परे तो पाँवन आवैं, काम भये फिर आँख दिखावैं॥
नेह-नाते सब स्वारथ तोले, कौड़ी बदले ईमान डोले।
कलयुग के सुर ऐसे बाजे, भीतर कपट, बाहर साज साजे॥
दोहा:
मानस धागा प्रेम का, उलझा बीच बाज़ार।
गाँठें इतनी पड़ गयीं, खुलत न अबकी बार॥
31. युवाओं की दशा और दिशाहीनता पर
चौपाई:
ग्रँथ-किताबें कोने रोवैं, रील देखि सब रैनि खोवैं।
बुद्धि-विवेक को ताले दीन्हे, फैशन के वश जीवन कीन्हे॥
संस्कारी जो बात सुनावै, मूर्ख कहि के जग ठुकरावै।
नकल करत पाश्चात्य पुराना, भूल गये निज गौरव गाना॥
दोहा:
मानस चंदन छोड़ि के, माटी मलते शीश।
रील्स माहीं खो गये, भूलि गये जगदीश॥
32. धन की अंधी दौड़ और घटती इंसानियत पर
चौपाई:
कंचन पीछे दुनिया धाई, भाई से लड़ि बैठो भाई।
तिजोरी भरन की मची है रारा, सूखी गयो संवेदना धारा॥
महँगी कोठरी, महँगी गाड़ी, मन की हवेली टूटी-फाड़ी।
इंसानियत अब सिसक रही है, तृष्णा की आग धधक रही है॥
दोहा:
मानस नोट बटोरते, बीती पूरी उमर।
कफ़न में जेब न होत है, जाई कहाँ लै कुबेर॥
33. कलयुगी न्याय और 'पैसे' के प्रभाव पर
चौपाई:
सत्य बिचारा कोने रोवै, झूठ यहाँ मखमल में सोवै।
पैसा देइ जो कोर्टे जाई, गवाह-वकील सब लेत सिकाई॥
दीन-दुखी की सुनै न कोई, लाठी जिसकी भैंस है होई।
धरम-करम सब कागज़ माहीं, धरनी विकल पर त्राण कहुँ नाहीं॥
दोहा:
मानस अंधा न्याय है, बिका हुआ है धर्म।
कुर्सी ऊपर बैठि के, भूलि गये सब कर्म॥
34. दिखावे के परोपकार और 'डिजिटल दान' पर व्यंग्य
चौपाई:
भूखे को इक टुकड़ा दीन्हा, सौ-सौ फोटो झटपट कीन्हा।
दान की महिमा ऐसे गाई, जैसे कोई जंग जीत आई॥
पुन्य कमावन का यह ढोंगा, ओढ़ि लिया सब साधु का चोगा।
गुप्त दान की रीत बिसारी, व्यूज के भूखे सब संसारी॥
दोहा:
मानस कीरति के लिए, करत धरम का काज।
देय अठन्नी हाथ में, माँगत जग का राज॥
35. घर के बुजुर्गों की उपेक्षा और 'तीर्थ' के ढोंग पर
चौपाई:
मात-पिता को कटु मुख बोलैं, चारो धाम में तीरथ डोलैं।
घर की गंगा प्यासी रोवै, बाहर जाइ के पातक धोवै॥
जीते जी नहिं पूँछे बाता, मरे बाद पिंडा सँग नाता।
श्राद्ध मनावन दुनिया आवै, वृद्ध जनक परछाईं तरसावै॥
दोहा:
मानस घर के देव को, कहुँ न मिलत सम्मान।
मूरत पूजत बैठि के, बन बैठे अज्ञान॥
36. जीभ के स्वाद (फास्ट फूड) और ढलती काया पर
चौपाई:
होटल माहीं महँगो खाहीं, घर की थाली मन को न भाई।
मैदा-रसायन भीतर डारें, वैद-हकीम को रोज निहारें॥
काया सुँदर चाहत सबहीं, श्रम की डगरिया चलतहु नाहीं।
जोग-सन्यासी टीवी देखें, चप्स-समोसा डाइन लेखें॥
दोहा:
रसना के वश भये सब, भूलि गये निज स्वास्थ्य।
मानस रोगी तन भयो, मनहूँ भयो असाध्य॥
37. शांति की झूठी खोज और अशांत मन पर
चौपाई:
शांति खोजन पहाड़ पर जाहीं, भीतर का मन शांत कहुँ नाहीं।
रील बनावन होड़ मची है, कुदरत की बस लाश बची है॥
मौन-साधना का ढोंग रचाते, वाई-फाई बिना छटपटाते।
एकांत ढूंढत भीड़ के माहीं, भ्रम में जियत लाज कछु नाहीं॥
दोहा:
मानस भीतर खोजिए, जहाँ राम का वास।
बाहर-बाहर ढूँढते, बीत गयौ इतिहास॥
38. 'स्टेटस' की गुलामी और खोखली अमीरी पर
चौपाई:
बँगला-गाड़ी सुंदर कीन्हा, मन का सुकूँ बेच कहुँ दीन्हा।
महँगी घड़ी हाथ चमकावैं, अपनों हेतु समय नहिं पावैं॥
सोफ़ा मख़मल घर में साजे, रिश्तों में पर काँटा बाजे।
बाहर सबरंग रूप अनूपा, भीतर दुख का घोर कुँआ पा॥
दोहा:
मानस महँगे वस्त्र पहन, घूम रहा संसार।
भीतर नंगा आदमी, विचारों से लाचार॥
39. बच्चों के बिगड़ते संस्कार और माता-पिता के 'लाड़' पर
चौपाई:
सुत को महँगो फ़ोन थमावैं, कहें कि हम आधुनिक कहावैं।
तोतली बानी गारी गावै, पिता देखि के मोद बढ़ावै॥
विनय-शर्म सब गए बिसारी, आदर की अब छूटी बारी।
जब बूढ़े भये जनक-जननी, बेटा सीखे अपनी करनी॥
दोहा:
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय।
मानस रोवत अंत में, बचपन देइ बिगोय॥
40. दिखावे की 'किताबी' पढ़ाई और घटती अक्ल पर
चौपाई:
अँगरेजी में गिटपिट बोलैं, ज्ञान का झूठा परदा खोलैं।
तुलसी-मीरा नाम न जानहिं, पाश्चात्य को ईश्वर मानहिं॥
रट-रट के सब डिगरी पावैं, नौकरी हेतु दर-दर धावैं।
बुद्धि बिकानी इंटरनेट माहीं, सोचन की शक्ति कहुँ नाहीं॥
दोहा:
मानस पढ़ि-पढ़ि के भये, चतुर सुजान अजान।
यंत्र चलावन सीख गये, भूलि गये इंसान॥
41. कलयुगी 'चमचागीरी' और स्वाभिमान के अंत पर
चौपाई:
साहेब की जो जूती चाटैं, जग में सुख की रोटी काटैं।
सच बोले सो लात ही खावे, चापलूस यहाँ माला पावे॥
स्वाभिमान को बेच कहुँ दीन्हा, टुकड़ों पर जीवन कर लीन्हा।
सच की ताकत क्षीण भई है, झूठ की महिमा प्रबल बही है॥
दोहा:
मानस झुकते वो नहीं, जिनके पास है प्राण।
मुर्दे झुक कर चल रहे, बन बैठे धनवान॥
42. पड़ोसियों की ईर्ष्या और झूठी हमदर्दी पर
चौपाई:
सुख देखि के पड़ोसी रोवै, अपनी विपदा भूलि के सोवै।
मुख पर पूछें कुशल-क्षेम भाई, पीठ पीछे करत सब बुराई॥
तरक्की देखि जिय जरत अनूपा, चाहें गिरो तुम गहरे कूपा।
संकट पड़ते ही हँसत हँसाते, झूठे आँसू आँख दिखाते॥
दोहा:
मानस जग का नियम यह, अजब भयो व्यव्हार।
जीत तुम्हारी खल रही, रोवत देखि सँसार॥
43 ब्याह के बाद बदलते रंग और माँ-बाप का अकेलापन
चौपाई:
ब्याह भयो तब बदले रँगा, भूलि गये जननी के सँगा।
जिन जनम दियो सो भये पराये, तिय के वश में शीश नवाये॥
कोठरी में बैठे मातु-पिता रोवैं, बेटा-बहू निज महलन सोवैं।
जिस आँगन में बचपन खेल्यो, उसी वृद्ध को बाहर ठेल्यो॥
दोहा:
मानस महलों में रहे, सुत-तिय सहित सानन्द।
कुटिया में सिसकें खड़े, बूढ़े मातु-पसन्द॥
44. पैसों के आगे झुकती नैतिकता और 'भ्रष्ट' आचरण
चौपाई:
लक्ष्मी देखि के धरम डोला, पाप कमावन झोला खोला।
ईमानदारी को मूर्ख बतावैं, घूस की रोटी चाव से खावैं॥
ईमान बेचकर कोठी बनाई, नरक के द्वारे कीन्हि कमाई।
कफ़न में जेब की आस लगाये, माया के पीछे प्रान गँवाये॥
दोहा:
मानस कौड़ी के लिए, बेचे बैठे प्रान।
माटी की इस देह का, करते सब अभिमान॥
45.दिखावे के 'मौन' और अशांत मन की दशा
चौपाई:
साधु बने पर क्रोध न छूटा, लोभ-मोह का भँवर न टूटा।
कंठी-माला कंठ सजाई, मन की कुटिलता दूर न जाई॥
दुनिया को उपदेश सुनावैं, निज जीवन में तनिक न लावैं।
दीपक तले अँधेरा भारी, ऐसी कलयुग की संसारी॥
दोहा:
मानस अंतर साफ़ बिनु, तीरथ-व्रत सब धूलि।
घट में राम को छोड़ि के, भटके दुनिया भूलि॥
46. 'वक्त' बदलने पर बदलते चेहरों का कटु सत्य
चौपाई:
जब लगि जेब में कंचन झलकै, मित्र-सगे सब द्वार पै ललकइ।
आदर-मान मिलै तब भारी, जग पूछे कि कैसि तैयारी॥
लक्ष्मी रूठी तो सब मुख मोड़ें, साया भी तब साथ को छोड़ें।
संकट में कोउ पास न आवै, परछाईं भी राह छुपावै॥
दोहा:
मानस उगते सूर्य को, पूजत है संसार।
ढलते ही मुख फेर लें, ये कलयुगी व्यव्हार॥
47. 'दिखावे की सुंदरता' और 'सस्ती शालीनता' पर चोट
चौपाई:
रूप सँवारन पालर (Parlor) जाहीं, मन की काई धोवत नाहीं।
महँगी क्रीम से मुख चमकावैं, गंदे बोल से विष बरसावैं॥
तन सुंदर पर जीभ कसाई, ऐसी नारी-नर कलयुग माहीं।
कपड़े छोटे, सोच भी छोटी, संस्कृति की कर दीन्ही लँगोटी॥
दोहा:
मानस उजली देह पर, मत करियो विश्वास।
भीतर कोयला भरा, बाहर गोरा मास॥
48. 'झूठी वाहवाही' और वायरल होने की सनक पर
चौपाई:
मान-बड़ाई की लगी बीमारी, व्यूज-लाइक के सब अधिकारी।
लाज-शरम सब खूँटी टाँगे, सड़कों पर सब ठुमका माँगे॥
माँ-बहन की इज्जत भुलाई, कैमरे आगे लाज गँवाई।
ट्रेंडिंग (Trending) में जो नाम आ जाई, समझें कि गंगा नहा आई॥
दोha:
मानस मर्यादा मरी, ज़िंदा रहा न कोई।
रील की अंधी दौड़ में, दुनिया अकल खोई॥
49. अंत समय का सत्य और मनुष्य का अहंकार
चौपाई:
मेरो-मेरो करत उमर सिहानी, अंत काल कछु काम न आनी।
कोठी-बँगला यहीं रहि जाई, चार कहार मिलि आग जलाई॥
कंचन-कामिनी सब कहुँ छूटे, जमराजा जब प्रान को लूटे।
तब काहे को गरब बढ़ावै, माटी में माटी मिलि जावै॥
दोहा:
मुट्ठी बाँधे आया था, हाथ पसारे जाय।
मानस इस संसार में, काहे रहा इतराय॥
50. कलयुग के 'न्याय' की अंतिम पराकाष्ठा
चौपाई:
साधु भूखा द्वारे डोले, पापी सोने के महलन डोले।
गौ माता जो कचरा खावै, कुत्ता गद्दे पर सुत जावै॥
धरम-नीति की बात जो भाषै, जग उसको पागल करि राखै।
कलियुग का यह चरित अनूपा, उजला राजा, अंधा कूपा॥
दोहा:
मानस उलटी रीत देखि, हँसत-रोवत मन माहिं।
जहाँ सत्य का आदर नहिं, तहाँ राम कहुँ नाहिं॥
51. 'रील' के दीवानों और 'सड़क दुर्घटना' की संवेदनहीनता पर
चौपाई:
मरत देखि कोउ हाथ न लावै, कैमरा खोलि के रील बनावै।
बहय रक्त कोउ सुधि नहिं लेई, लाइक हेतु सब साक्षय देई॥
तड़पत प्रान न कछु डरि आवा, डिजिटल दुनिया मनहिं लुभावा।
मानवता अब दफ़न भई है, स्वार्थ की आँधी प्रबल बही है॥
दोहा:
मानस जिय पत्थर भये, हृदय न उपजइ पीर।
व्यूज बढ़ावन के लिए, बेचत अपनी धीर॥
52. 'धर्म' के नाम पर व्यापार और दिखावे पर
चौपाई:
धर्म-कर्म अब बना तमाशा, भीतर भरी पाप की आसा।
लाउडस्पीकर शोर मचावैं, पड़ोसी की निद्रा उड़वावैं॥
वीआईपी दर्शन को धाई, लम्बी लाइन देखि कतराई।
पैसा देइ जो ईश्वर पावै, असल भक्त वह नहिं कहलावे॥
दोहा:
कंचन चढ़ि के देव गृह, मगन भये सब लोग।
मानस प्रभु को भूलि के, करहिं स्वयं को भोग॥
53. 'दोगली राजनीति' और 'जनता की बेबसी' पर
चौपाई:
चुनाव आवत हाथ जो जोड़े, जीतत ही फिर मुख को मोड़े।
मुफ़्त माल का जाल बिछावैं, देश को कर्ज की गर्त डुबावैं॥
जात-पात की रार बढ़ावैं, भाई-भाई को लड़वावैं।
महल खड़ा कियो अपना भारी, जनता की बस रहि गयी बारी॥
दोहा:
भाषण में अमृत झरे, कर्म जहर की खान।
मानस जनता पिस रही, नेता बने सुजान॥
54. 'आधुनिक प्रेम' और 'धोखे' पर प्रहार
चौपाई:
प्रेम नहीं अब खेल भयो है, पासवर्ड में साँच गयो है।
आजु यहाँ कल और कहीं पर, भंवरा डोलत नयी कली पर॥
वादा करहिं सात जनम का, टुटत सबद बस एक छिनक का।
हृदय तोड़ि के हँसत हँसाते, नये शिकार की राह तकाते॥
दोहा:
तन की चाहत प्रेम कहि, करत सबै व्यभिचार।
मानस पावन रीत को, कीन्हों मटियामेट बाज़ार॥
55. 'गौ-माता' बनाम 'कुत्ता' (आधुनिक पशु-प्रेम पर भीषण प्रहार)
चौपाई:
प्लास्टिक खाय के गैया मरती, सड़कों पर जो ठोकर चरती।
ताके दूध की चाय गटकते, चाय पिलाय के धरम पटकते॥
कुत्ता को जो कार बिठावैं, शैम्पू साबुन ताहि नहवावैं।
अपनी माई जो खॉसइ घर माहीं, ताहि दवा को पैसा नाहीं॥
दोहा:मानस कलयुग रीति देखि, बुद्धि गई बौराय।
कुत्ता सोवे गद्दे पर, कचरा खाए गाय॥
56. अर्थी पर रील और बिकती संवेदना (डिजिटल गिद्ध)
चौपाई:घर में कोऊ मरई जो भाई, रोवन छोड़ि के रील बनाई।
'माई चली गई' लिखि के डारें, लाइक देखि के आँसू संवारें॥
मरघट बना अब पिकनिक स्पॉटा, लाज-शरम का पड़ गया टोटा।
चिता की आग अभी नहिं ठंडी, व्यूज की सज गई पूरी मंडी॥
दोहा:मानस संवेदना मरी, उपजा घोर पिसाच।
अपनों की ही लाश पर, करत कलयुगी नाच॥
57. 'नारी स्वतंत्रता' की आड़ में अश्लीलता का व्यापार
चौपाई:तन के कपड़े छोटे कीन्हे, लाज-हया सब गिरवी दीन्हे।
ठुमका मारि के व्यूज कमावैं, ताही को आज़ादी बतलावैं॥
कुल की कीरति धूलि मिलाई, कैमरे आगे देह दिखाई।
जो टोके सो दुश्मन भाई, कलयुग की यह अजब पढ़ाई॥
दोहा:मानस गहना शील का, बेचो बीच बाज़ार।
नंगेपन को नाम दियो, 'आधुनिक विचार'॥
58. मुफ़्तखोर जनता और देश बेचने वाले नेता
चौपाई:मुफ़्त की बिजली, मुफ़्त का रासन, बिक गई जनता, सो गय सासन।
पाँच सौ रूपये हाथ में पावैं, देश का पूरा भाग्य लुटावैं॥
जात के नाम पै कटते-मरते, काम के नाम पै पानी भरते।
नेता लूटि के महल बनावा, जनता बैठि के भीख मँगावा॥
दोहा:मानस मुफ़्त के लोभ में, कौड़ी भयो ईमान।
भीख माँगती प्रजा है, नेता भये सुजान॥
59. 'कमाई' के भूखे कलयुगी गुरु और चेले
चौपाई:कथा बाँचि के नोट बटोरें, पाँच सितारा में आसन जोड़ें।
वीआईपी टिकट जो पावै, ताहि को प्रभु के निकट पहुँचावै॥
ग़रीब बिचारा धक्के खावे, खिड़की से ही शीश नवावे।
भक्ति का ऐसा धंधा चोखा, भगवान के नाम पै भारी धोखा॥
दोहा:मानस कथा बाज़ार भई, संत भये व्यापारी।
पैसा फेंको, पुन्य लो, देखि कलयुग की गारी॥
"कलयुग की सबसे नग्न सच्चाई! सुनने की हिम्मत है तो ही क्लिक करें।"
60. 'दिखावटी नारी सम्मान' और 'दहेज की वेदी' पर प्रहार
चौपाई:बेटी ब्याहन को धन जोड़ें, नीति-धरम की मर्यादा तोड़ें।
तिलक-दहेज की लगी बीमारी, बिकत है दूल्हा बन के संसारी॥
लक्ष्मी कहि के बहू घर लावैं, दासी सम ताहि रोज खटावैं।
कम पड़ि जाय जो नोट की बोरी, मारि के बेटी कहें 'कमजोरी'॥
दोहा:मानस पूजत देवियाँ, नवरातर नौ रात।
घर की लक्ष्मी रो रही, देखि कलयुगी लात॥
61. 'फेक फेमिनिज्म' (झूठे नारीवाद) और पुरुषों के शोषण पर व्यंग्य
चौपाई:कानून की आड़ में खेल रचावैं, झूठे केस में फँसाय डरावैं।
निज अवगुण सब परदे पाछें, मर्यादा को पाँवन नाचें॥
सीधे नर को सूली टाँगें, आजादी के नाम पै ताँगे।
सत्य बिचारा थाने रोवै, स्वार्थ यहाँ मखमल में सोवै॥
दोहा:मानस न्याय की आड़ लै, करत जे व्यभिचार।
ऐसी 'आज़ादी' यहाँ, कर रही वंश उजाड़॥
62. 'दिखावे की फिटनेस' और 'प्रोटीन के डब्बों' पर करारी चोट
चौपाई:डब्बा भरि-भरि कैमिकल खाहीं, साँस फूलि जाय श्रम कहुँ नाहीं।
नस चमकावन इंजेक्शन डारें, यमराजा को रोज निहारें॥
छाती फुलाय के डोलत बीरा, भीतर बैठी भारी पीरा।
घर की रोटी जहर बतावैं, पाउडर खाकर देह बनावैं॥
दोहा:मानस नकली काया पर, काहे को अभिमान।
भीतर खोखला बाँस है, बाहर बने सुजान॥
63. 'मोबाइल की स्क्रीन' और 'बचपन की हत्या' पर प्रहार
चौपाई:मात-पिता फुर्सत जो पावैं, सुत के हाथ में फोन थमावैं।
लोरी-कथा सब बिसरई माहीं, यूट्यूब पर बचपन जाहीं॥
खेल-कूद सब गायब कीन्हा, आँखों पर चश्मा जड़ दीन्हा।
संस्कार की नींव न डाली, कलयुग की पीढ़ी भई खाली॥
दोहा:मानस जो बचपन यहाँ, स्क्रीन माहीं खोय।
तरुण भये जब डंडा मारे, तब काहे को रोय॥
64. 'शराब की दुकान' और 'बिकते स्वाभिमान' पर भीषण प्रहार
चौपाई:राशन हेतु जो लाइन लावैं, पौआ खातिर नोट बहावैं।
घर में बच्चा भूख से रोवै, बाप ठेके पर होश को खोवै॥
नाली माहीं साहेब सोवैं, इज्जत-आबरू सब कहुँ खोवैं।
ऐसी मदिरा कलयुग आई, मति-बुद्धि सब हरत सिकाई॥
दोहा:मानस कौड़ी की भई, पुरुष की औकात।
बोतल पीछे बिक गया, मर्यादा का पात॥
65. 'दिखावे की अंग्रेजी' और 'संस्कारों के पतन' पर घोर प्रहार
चौपाई:"मम्मी-डैडी" कहि जनम गँवाया, मातु-पिता का भाव न पाया।
अँगरेजी की पट्टी आँखों, भारत की संस्कृति को लाँघौ॥
"हैलो-हाय" में रीत पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी।
सासु-ससुर जो घर में आवैं, "प्राइवेसी" का रोना रोवैं॥
दोहा:मानस भाषा सीखिए, पर न बेचो संस्कार।
जड़ें कटीं जिस वृक्ष की, वह तो होत उजार॥
66. 'किस्तों' (EMI) पर टिकी झूठी रईसी पर करारा व्यंग्य
चौपाई:सैलरी आवत ही कटि जाई, बैंक वाले सब लेत सिकाई।
किश्त चुकावन में दम टूटे, बाहर ठाठ-बटाठ न छूटे॥
महँगी कार पै घूमैं बीरा, जेब कटी पर मन में हीरा।
सिबिल स्कोर (CIBIL Score) की पूजा करहीं, भीतर कर्ज़ के डर से मरहीं॥
दोहा:मानस उधार की चमक पै, फूलि रहे सब लोग।
सुख-चैन सब बिक गया, बचा सिर्फ़ अब रोग॥
67. 'दिखावे के पर्यावरण-प्रेम' और 'एसी' (AC) की विलासिता
चौपाई:फेसबुक पै जो पेड़ लगावैं, घर में दिन-भर एसी चलावैं।
कुदरत की जो बातें झाड़ें, काँक्रीट का महल खड़ाड़ें॥
बिसलरी पानी पी कर जींहीं, नदियों में सब कचरा दींहीं।
पर्यावरण का दिवस मनावैं, रील बनाय के फर्ज उतारैं॥
दोहा:
मानस धरती रो रही, देखि इंसानी ढोंग।
छाया सबको चाहिए, पर पेड़ न रोपे कौंग (कोई)॥
68. 'अस्पतालों' के व्यापार और 'मरीजों' की बेबसी पर भीषण चोट
चौपाई:वैद-हकीम अब भये कसाई, बिना नोट के छुवत न भाई।
टेस्ट पै टेस्ट लिखत हैं भारी, जैसे कोई लूट की बारी॥
लाश को भी जो वेंटिलेटर धरहीं, बिल बढ़ावन का धंधा करहीं।
मरी गयो जो निर्धन भाई, गहना-जेवर बेच चुकाई॥
दोहा:मानस सेवा उठि गई, बचा सिर्फ़ व्यापार।
तीरथ सम जो अस्पताल, बन गये अब बाज़ार॥
69. 'यूट्यूब और इंस्टाग्राम' की अंधी दुनिया (कंटेंट का अकाल)
चौपाई:प्रैंक (Prank) के नाम पै मूर्ख बनावैं, राह चलत को पकड़ि डरावैं।
व्यूज बढ़ावन को कछु करहीं, नाली माहीं कूदि के मरहीं॥
गाली-गलौज को टैलेंट बतावैं, लाखो-करोड़ो सब्सक्राइबर पावैं।
ज्ञान की बातें जो कोई बोले, ताकी वीडियो कोउ न खोले॥
दोहा:मानस कचरा बिक रहा, मखमल के इस दौर।
बुद्धि बिकानी नेट पै, बचा न कोई ठौर॥
70:दिखावे की अंग्रेजी और संस्कारों का पतन
चौपाई."मम्मी-डैडी" कहि जनम गँवाया, मातु-पिता का भाव न पाया।
अँगरेजी की पट्टी आँखों, भारत की संस्कृति को लाँघौ॥
"हैलो-हाय" में रीत पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी।
सासु-ससुर जो घर में आवैं, "प्राइवेसी" का रोना रोवैं॥
दोहा:मानस भाषा सीखिए, पर न बेचो संस्कार।
जड़ें कटीं जिस वृक्ष की, वह तो होत उजार॥
71.चौपाई:अपनी भाषा बोलत लाजा, अँगरेजी बन बैठो राजा।
'थैंक्यू-सॉरी' मुख से झाड़ें, रिश्तों की मर्यादा फाड़ें॥
पच्छिम की सब रीत चुराई, संस्कारी सब भई पराई।
पब और क्लब में रात बितावैं, घर की संध्या भूलि ही जावैं॥
दोहा:मानस कोरी जीभ पै, चढ़ी विदेशी धार।
मन मलीन भीतर भरा, बाहर शिष्टाचार॥
72.चौपाई:चरण छुवन को बैकवर्ड (Backward) मानहिं, घुटने टेक मटुक मुसकानहिं।
दादी-बाबा जो कछु बोलें, 'ओल्ड थिंकिंग' (Old Thinking) कहि विष घोलें॥
कान्वेंट में सुत को पढ़ावैं, 'ट्विंकल-ट्विंकल' रटवावैं।
राम-कृष्ण की कथा न जानहिं, कार्टून को ईश्वर मानहिं॥
दोहा:मानस तोतली बोलि में, बिसरयो सारा ज्ञान।
सूट-बूट की आड़ में, घूमत पशु अज्ञान॥
73.चौपाई:होटल माहीं काँटा-चम्मच, सीख गये पर छूटी समझ।
हाथ से भोजन छुवन न पावैं, जूठी रीत पै मोद बढ़ावैं॥
'थैंक गॉड' (Thank God) कहि शीश झुकावैं, अन्नपूर्णा को बिसरावैं।
डिग्री बड़ी और बुद्धि छोटी, पाश्चात्य की पकड़ी धोती॥
दोहा:मानस अन्धा अनुकरण, करत कलयुगी लोग।
गौरव अपनी संस्कृति का, समझ रहे सब रोग॥
74.चौपाई:वृद्धाश्रम की राह दिखावैं, खुद को 'मॉडर्न' (Modern) कहि इतरावैं।
कुत्ते को जो 'बेटा' बोलैं, जनक देखि के नैना डोलैं॥
जहाँ 'मदर-फादर डे' आई, साल में एक दिन प्रीत दिखाई।
बाकी दिन माँ तरसती बैठी, बेटा की अँगरेजी ऐंठी॥
दोहा:मानस ऐसी सभ्यता, लावे घोर विनास।
जननी-जनक रुलाय के, ढूँढ रहे सुख-रास॥
75.चौपाई:राम राम कहि मुख सुकुचाहीं, "गुड मॉर्निंग" कहि मोद बढ़ाहीं॥
तुलसीकृत रामायण खोई, शेक्सपियर पढ़ि रोवत कोई॥
निज गौरव को पिछड़ा मानहिं, दूजे की जूठन पहिचानहिं॥
संसकति की कबरिया खोदी, बन बैठे पाश्चात्य के लोदी॥
दोहा:मानस अपनी मात को, कहत गँवार नदान।
दूजी भाषा सीखि के, भूलि गये इंसान॥
76.चौपाई:खान-पान सब बदल्यो भाई, "डिनर-लंच" की महिमा छाई॥
चौका-चूल्हा भयो पराया, डाइनिंग टेबल पै मन आया॥
"प्लीज-थैंक्यू" का जाल बिछावैं, भीतर डाह की आग जलावैं॥
मीठी अंग्रेज़ी जो बोलै, पीठ पाछे सोई विष घोलै॥
दोहा:मानस ऊपर उजला, भीतर कपट अपार।
सूट-बूट पहिने घूमै, कलयुगी सँसार॥
77.चौपाई:"हाय-ब्रो" कहि मीत बुलावैं, भ्राता-भगिनी भाव न पावैं॥
रिश्तों के सब नाम मिटाए, "अंकल-आंटी" सबहिं बनाए॥
काका-ताऊ बिसरे ताता, "कज़िन" माहीं सिमट्यो सब नाता॥
घर को "हाउस" नाम दियो है, मन का "होम" उजाड़ दियो है॥
दोहा:मानस पावन नेह को, कीन्हों "बिजनेस" रूप।अँगरेजी के जाल में, डूबे चतुर सरूप॥
78.चौपाई:तीरथ-व्रत को अंधविश्वास बतावैं, "संडे-पार्टी" में हुल्लड़ मचावैं॥
गीता के उपदेश भुलाए, "मोटिवेशन" खोजन को धाए॥
संत-महातम देखि के हँसहीं, "पब-क्लब" की गलियन में फँसहीं॥
मर्यादा की कटि गई डोरी, कलयुग की यह सुंदर चोरी॥
दोहा:मानस पूरब छोड़ि के, पच्छिम भये दीवान।
अपनी ही माटी तजी, ढूँढत दूजो आसमान॥
79.चौपाई:जनमदिवस पर दीप बुझावैं, फूंक मारि कै कलयुग गावैं॥
केक काटि के कीचड़ मलहीं, अंधकार की राह पै चलहीं॥
वैदिक रीती सब बिसराई, "बर्थडे पार्टी" की आफत आई॥
तिलक-आरती भई पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी॥
दोहा:मानस उजियारा तजि, करत अँधेरो काम।
ऐसी आधुनिक रीति को, दूरहु से प्रनाम॥
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
।।हास्य व्यंग।।
खुलते ही आँखें यहाँ, ढूँढे सब मोबाइल।
प्रभु के दर्शन छोड़कर, देखें अपनी प्रोफाइल॥1
बिना नमक की दाल भी, सबको लगती खास।
फोटो खींच फेसबुक पे, मिले जो 'लाइक' पचास॥2
काम-धाम सब छोड़कर, नाच रहे नर-नार।
रील बनाकर हो रहे, रातों-रात स्टार॥3
बुद्धि गई है घास चरने, शर्म गई है तेल।
लाइक के चक्कर में अब, बना दिया है खेल॥4
जिम में जाकर फोटो खींची, पिया न एक भी घूँट।
बाहर आकर खा रहे, छोले-भटूरे ऊँट॥5
योगा पट्टी बाँधकर, सोए हैं श्रीमान।
डाइट का संकल्प है, पर बर्गर में है जान॥6
एक छत के नीचे खड़े, पर आपस में मौन।
बगल में बैठी माँ को भी, मैसेज करे है कौन?॥7
रिश्तों की कड़वाहट को, इमोजी से ढँक लें।
असली चेहरा भूलकर, फिल्टर में सब जिएं॥8
पिज़्ज़ा बर्गर ठूँसकर, पेट हुआ है ड्रम।
ऊपर से पीते 'डाइट कोक', करने को कैलोरी कम॥9
शादी में ऐसे टूटे, जैसे मच गया अकाल।
प्लेट में पर्वत बना लिया, भूल के अपना हाल॥10
जेब में फूटी कौड़ी नहीं, ठाठ नवाबी यार।
किस्तों पर मोबाइल लिया, किस्तों पर है कार॥11
सब्जी मंडी जा रहे, पहन के महँगा सूट।
धनिया मुफ्त में माँगते, जैसे मची हो लूट॥12
चैनल पर चिल्ला रहे, एंकर जैसे शेर।
मुद्दे गायब हो गए, शोर मचा है ढेर॥13
पहुँचे जब श्मशान में, किया वहां भी चेक-इन।
दुख मनाना भूलकर, फोटो खींचें बेहतरीन॥14
ज्ञान बाँटते फेसबुक पर, बनकर भारी संत।
घर में अपनी बीवी से, डरते हैं श्रीमंत॥15
बिना नहाए दिन कटे, कटे न बिना नेट।
साँसें भले ही रुक जाएँ, रुके न डेटा-रेट॥16
चार्जर ढूंढें ऐसे जैसे, खोई अपनी जान।
बैटरी जब 'लो' हो गई, उड़े हुए हैं प्राण॥17
दूल्हा बैठा सोचता, ये कैसा है हाल।
दुल्हन सेल्फी ले रही, छोड़ के अपना लाल॥18
पनीर की सब्जी गायब है, प्लेट में है सलाद।
फोटो लेकर लोग बोले, क्या खाना था स्वाद॥19
सच्ची बातें कड़वी लगें, झूठी पे विश्वास।
जो जितनी बकवास करे, वो जनता का खास॥20
वीडियो ऐसा बनाइए, जिसमें हो हुड़दंग।
तमीज ताक पर रख दीजिए, चढ़ेगा सबको रंग॥21
पढ़े-लिखे भी बह गए, सुनकर कोरी बात।
व्हाट्सएप के ज्ञान से, पलट रहे जज्बात॥22
बिना जाँच और परख के, बटन दिया है दबा।
अफवाहों के पंख लगें, उड़ें जैसे हवा॥23
इज्जत बेची बीच बाजार, रील बनाने आए।
ठुमके मारें सड़क पर, अक्ल घास चरने जाए॥24
बाप कमाकर थक गया, बेटा बना नवाब।
आईफोन के शौक में, डूबे सब ख्वाब॥25
भीतर भरा है कीचड़, बाहर ओढ़े रेशम।
प्रोफाइल पे शरीफ हैं, असलियत में बेदम॥26
गरीब को खाना न दिया, सेल्फी ली है चार।
दान का ढिंढोरा पीटना, आज का है व्यापार॥27
गर्दन टेढ़ी हो गई, आँखों में है जाल।
मोबाइल के गुलाम हम, गजब हुआ है हाल॥28
रिश्ते सारे जम गए, 'ब्लॉक' और 'अनफ्रेंड' में।
इंसानियत अब मर रही, केवल नए ट्रेंड में॥29
बैल मिले न हल मिले, मिले न खेती-बारी।
शादी करके बन गए, खुद ही बोझा-धारी॥30
मौन व्रत पत्नी रखे, घर में शांति आए।
पिज्जा-बर्गर मंगवाकर, मौन सफल हो जाए॥31
शॉपिंग की जब लिस्ट बने, उड़े पति के होश।
क्रेडिट कार्ड रो पड़ा, करके भारी अफसोस॥32
खद्दर पहन के चमक रहे, जैसे उजला दूध।
जनता बेचारी रो रही, पाकर इनको मूढ़॥33
वादों की पोटली बंधी, चुनाव के हैं द्वार।
पाँव पकड़ते नेताजी, फिर दिखें न दोबारा यार॥34
दल बदलें ऐसे यहाँ, जैसे बदले चोला।
कुर्सी के चक्कर में सब, बन गए बम-गोला॥35
फीस भरी जब डॉक्टर की, निकल गई है जान।
बीमारी तो कम हुई, खाली हुआ मकान॥36
रिपोर्टें लंबी आ गईं, देख के चकराए माथ।
दवा कम और दुआ ज्यादा, अब तो प्रभु के हाथ॥37
संडे को भी कॉल करें, बॉस बड़े बलवान।
टारगेट के चक्कर में, सूख रहे इंसान॥38
काम करे कोई और यहाँ, नाम किसी का होय।
मेहनत वाला कोने में, बैठ अकेला रोय॥39
सब्जी अब तो गहना है, दाल हुई है खास।
आम आदमी जी रहा, ले-लेकर लंबी सांस॥40
बजट बना के थक गए, खर्चे हैं विकराल।
महीने के आखिर में अब, बुरा हुआ है हाल॥41
बिना डिग्री के यहाँ, घूम रहे सब वैद्य।
गूगल पढ़कर ज्ञान दें, जैसे हों महान तदविद्।।42 (एक्सपर्ट)॥
दुनिया सुधरे न सुधरे, हम सुधरेँगे भाई।
दूसरे के फटे में यहाँ, सबकी टाँग समाई॥43
लिख-लिख के थक गए यहाँ, मिले न एक भी व्यू।
कॉपी-पेस्ट का दौर है, ओरिजिनल है क्यू।।44 (Queue)॥
कीवर्ड ठूँसे लेख में, भुला दिया सब ज्ञान।
गूगल बाबा खुश रहें, चाहे दुखी रहे इंसान॥45।।
ज्ञान बाँटते नेट पर, खुद का खाली डब्बा।
दूसरों की पोस्ट चुराकर, बन रहे बड़े अब्बा।।46
दुनिया भर की फिक्र है, खुद का पता न कोय।
'मानस' देखे रील जो, चैन-वैन सब खोय॥47
फोटो खींची हाथ में, लेकर खाली थाल।
'मानस' जग को लग रहा, दानी है विकराल॥48
बेलन लेकर खड़ी है, घर की लक्ष्मी आज।
'मानस' दुबके कोने में, तज कर अपना राज॥49
शादी का लड्डू यहाँ, जो खाए पछताए।
'मानस' बिना खाए भी, चैन कभी न पाए॥50
आमदनी अठन्नी हुई, खर्चा रुपैया साठ।
'मानस' बजट को देखकर, लग गई दिल में गांठ॥51
पनीर अब तो ख्वाब है, दाल हुई है दूर।
'मानस' चटनी चाटकर, रहने को मजबूर॥52
कुर्सी के सब यार हैं, जनता के न कोय।
'मानस' नेता जीत के, फिर चादर तान के सोय॥53
वादों की नदियाँ बही, सूखा पड़ा है खेत।
'मानस' देख तमाशा तू, बैठी जनता रेत॥54
काम बढ़ाते जा रहे, बॉस बड़े होशियार।
'मानस' सन्डे को भी अब, बैठा करे गुहार॥55
टारगेट की फाँस में, फँसे हुए सब लोग।
'मानस' जीवन बन गया, ऑफिस का एक रोग॥56
जिम में फोटो खींचकर, डाला है स्टेटस।
'मानस' खाए समोसे, भूल के सब फिटनेस॥57
योग करें बस पार्क में, हाथ में लेकर फोन।
'मानस' सांसें कम गिने, देखे लाइक कौन॥58
मंदिर में चप्पल चुरा, बाहर माँगे दान।
'मानस' देखो कलयुगी, भक्ति का सामान॥59
अंधा बांटे रेवड़ी, अपनों को भर-भर।
'मानस' खैरात की यहाँ, मची हुई है डगर॥60
भीतर नफरत की अगन, मुख पर राम का नाम।
'मानस' ऐसे संतों से, बचकर रहो सुबह-शाम॥61
सड़क किनारे मर रहा, कोई बेबस लाचार।
'मानस' जनता वीडियो, बना रही है यार॥62
इज्जत की अब फिक्र नहीं, व्यूज की है भूख।
'मानस' नंगे नाच पर, रही हया अब सूख॥63
रिश्ते सारे बिक गए, बस बचा है स्क्रीन।
'मानस' डिजिटल प्यार में, सब हुए हैं लीन॥64
देश जले या राख हो, कुर्सी रहनी पास।
'मानस' नेताओं की बस, यही एक है प्यास॥65
मुफ्त की रेवड़ी बाँटकर, जनता की खींची खाल।
'मानस' अगले चुनाव तक, बुनते रहेंगे जाल॥66
धर्म-जात के नाम पर, भिड़ा रहे हैं लोग।
'मानस' कुर्सी पा गए, देकर सबको रोग॥67
बाप पड़ा है वृद्धाश्रम, बेटा बना है सेठ।
'मानस' मदर्स डे पर देखो, भावुक हुए हैं जेठ॥68
एक ही सोफे पर खड़े, चार अलग संसार।
'मानस' मोबाइल ने किया, रिश्तों का संहार॥69
पेट काट कर टैक्स भर, फिर भी गड्ढे राह।
'मानस' इस विकास की, कौन भरेगा आह?॥70
सोना-चाँदी छोड़िए, अब महँगी हुई प्याज़।
'मानस' मध्यम वर्ग का, बिगड़ गया है साज़॥71
कर्ज लेकर जी रहे, दुनिया को दिखा ठाठ।
'मानस' खाली जेब पर, पड़ी शान की गांठ॥72
अंग्रेजी में बोलकर, खुद को समझें तोप।
'मानस' अपनी जड़ों का, कर रहे खुद ही लोप॥73
हादसे को देखकर, काँपे नहीं अब हाथ।
'मानस' कैमरा खोलकर, खड़े हैं सबके साथ॥74
मदद की कोई बात हो, तो डेटा खत्म है भाई।
गाली देनी हो अगर, तो फिर 'स्पीड' सवाई॥75
बगल में छुरी दबी, मुँह पे 'भाई-भाई'।
'मानस' इस कलयुग में, वफा कहीं न पाई॥76
दुश्मन से तो बच गए, अपनों ने दी मात।
'मानस' पीठ पे जो मिले, वो खंजर था ज्ञात॥77
डिग्री लेकर हाथ में, अक्ल से हैं पैदल।
'मानस' सोशल मीडिया, बना मूर्खों का दल॥78
किताबें कभी छुई नहीं, गूगल के हैं भक्त।
'मानस' ज्ञान ऐसा बघारें, जैसे हों सबसे सख्त॥79
झूठ को सच कह रहे, पालतू जो दरबार।
'मानस' चमचों ने यहाँ, डुबो दी है सरकार॥80
रोटी माँगो तो यहाँ, मिलती है तलवार।
'मानस' भूख के नाम पर, बस हो रहा प्रचार॥81
ईमान बेचकर जी रहे, जो बने थे रईस।
'मानस' ईमानदार तो, बस दे रहा है 'फीस'॥82
दिखावे की इस दौड़ में, बिक गए हैं मकान।
'मानस' किस्तों पर यहाँ, टिका हुआ इंसान॥83
कपड़े छोटे हो गए, छोटी हुई है सोच।
'मानस' तरक्की के नाम पर, रहे सभ्यता नोच॥84
इंग्लिश में गाली दें तो, लगते हैं कूल डूड।
'मानस' अपनी भाषा पर, दिखाते बड़ा रूड॥85
काले धन की गंगा में, सब धो रहे हैं हाथ।
'मानस' कानून खड़ा है, बस फाइल के साथ॥86
नीचे से ऊपर तलक, रिश्वत का है खेल।
'मानस' सच जो बोलेगा, होगी उसको जेल॥87
डिग्री की रद्दी भरी, अक्ल का डब्बा गोल।
'मानस' शिक्षा बिक रही, आज टके के मोल॥88
रट्टा मार के पास हुए, बने बड़े विद्वान।
'मानस' इंटरव्यू में खड़े, जैसे खड़े नादान॥89
कॉलेज खुले हैं गली-गली, जैसे खुलें दुकान।
'मानस' ज्ञान न मिल रहा, बस मिलता प्रमाण॥90
एम.ए. करके ढो रहे, कचरे वाली लाट।
'मानस' चपरासी की लाइन में, खड़ी डिग्रियाँ ठाठ।।91
फॉर्म भरने में यहाँ, बीत रही है उम्र।
'मानस' नौकरी का पता नहीं, बस बढ़ रहा है 'ट्यूमर'॥92
पकोड़े तलना ही अगर, है रोजगार की रीत।
'मानस' तो फिर पढ़-लिखकर, क्यों गाएं हम गीत?॥93
नीचे बाबू बैठा है, ऊपर बैठा बाज़।
'मानस' बिना चढ़ावे के, सरके न कोई काज़॥94
फाइल पर फाइल दबी, धूल फांकते काम।
'मानस' लक्ष्मी जहाँ झड़ी, वहीं मिले आराम॥95
ईमान बिकता यहाँ, कौड़ियों के भाव।
'मानस' विकास की नाव में, भ्रष्टाचार का घाव॥96
तारीख पर तारीख मिले, न्याय हुआ है मौन।
'मानस' गरीब की यहाँ, सुनता आख़िर कौन?॥97
अंधा कानून कह रहा, लाओ तुम सबूत।
'मानस' अपराधी घूम रहे, बनकर बड़े सपूत॥98
सुबह से शाम तक पिसे, जैसे कोल्हू बैल।
'मानस' तनख्वाह मिली जब, लगा है जैसे मैल॥99
इंक्रीमेंट का सपना दिखाकर, काम लिया है ठूँस।
'मानस' खून चूस लिया, जैसे हो कोई जूँस।।100 (Juice)॥
अन्नदाता भूखा सो रहा, कर्ज का चढ़ा पहाड़।
'मानस' भाषण बाजी में, नेता मारें दहाड़॥101
गाँव की रौनक बिक गई, शहर की चकाचौंध।
'मानस' रिश्तों की जड़ों को, रहा मोबाइल रौंद॥102
सच को दफना दिया, झूठ का ऊँचा कद।
'मानस' टीआरपी के लिए, लांघ रहे सब हद॥103
मुद्दे गायब हो गए, बहस रही है शोर।
'मानस' मीडिया की बंधी, सत्ता के संग डोर॥104
फिल्टर मार के शक्ल को, बना दिया अंगूर।
'मानस' असली रूप में, दिखें लंगूर के पूर॥105
कैमरा ऊँचा कर खड़े, मुँह को दें मरोड़।
'मानस' पाउट (Pout) देख के, भैंस रही है दौड़॥106
ट्रैक सूट पहन के चले, टहलने को दो मील।
'मानस' रस्ते में रुके, खाने को 'दो मील' (समोसे और चाय)॥107
साँस रोक के खींचते, पेट की फोटो यार।
'मानस' साँस जो छोड़ दी, फट गई बटन उघार॥108
शादी की एल्बम देख के, रोए हैं श्रीमान।
'मानस' मुजरिम देख रहा, जैसे अपना वारंट-दान॥109
बेलन से स्वागत हुआ, आए जब वे लेट।
'मानस' बिना डिनर किए, सो गए भर के पेट (आँसुओं से)॥110
पैसे माँगे यार से, बना लिया मुँह गोल।
'मानस' नंबर 'ब्लॉक' है, बज रहा डब्बा ढोल॥111
पार्टी में जो सबसे आगे, बिल में सबसे पीछे।
'मानस' ऐसे मित्र तो, जूते के हों नीचे॥112
गुड मॉर्निंग के मैसेज से, भर दी सबकी गैलरी।
'मानस' फोन है हैंग हुआ, जैसे कम हो सैलरी॥113
ग्रुप में ज्ञान जो बाँटते, घर में झाड़ू मारें।
'मानस' अपनी बीवी से, हर बाजी वे हारें॥114
ऊपर शर्ट है प्रेस की, नीचे है पाजामा।
'मानस' वीडियो कॉल पे, खुल गया सारा ड्रामा॥115
म्यूट समझ के गालियाँ, दे दीं जो एक बार।
'मानस' बॉस ने कह दिया कल से मत आना यार'॥116
उठने का मन था सुबह, साढ़े चार के वक़्त।
'मानस' आँख जो खुल गई,तो बज गए थे दस सख़्त।117
ब्रश मुँह में फँसा हुआ, हाथ में है मोबाइल।
'मानस' बिस्तर छोड़ना, लगता बड़ा ट्रायल॥118
कुंवारे बैठे सोच रहे, कब बजेगी शहनाई।
'मानस' जो फंस गए वे पूछें'किसने आफत बनाई?'॥119
शादी से पहले थे जो, शेर जैसे खूंखार।
'मानस' अब वे धो रहे, धनिया और अचार॥120
एक दिन जिम में गए, उठा लिया सौ वेट।
'मानस' अगले सात दिन, बेड पर लेटे सेठ॥121
प्रोटीन के डिब्बे भरे, डोले हुए न गोल।
'मानस' टी-शर्ट के भीतर, अब भी डब्बा ढोल॥122
खुद का घर कचरा भरा, गंदा है सब हाल।
'मानस' पड़ोसी के यहाँ, झांक रहे फिलहाल॥123
कौन आया? कब गया? रखतीं सबका हिसाब।
'मानस' पड़ोस की चाची ही, गूगल की किताब॥124
मेकअप ऐसा थोप लिया, जैसे पुती दीवार।
'मानस' पानी गिर गया, तो हो गए सब फरार॥125
सड़क पे ठुमके मारते, देख रहे न राह।
'मानस' कुत्ता पीछे पड़ा, तो निकली लंबी आह॥126
पनीर की सब्जी दिखे, तो खो देते हैं होश।
'मानस' प्लेट में भर लिया, जैसे हो कोई जोश॥127
आइसक्रीम की लाइन में, धक्का-मुक्की घोर।
'मानस' सूट पहन के भी, लग रहे सब चोर॥128
इधर से भेजा 'I Love You', उधर से आया 'Hmm'।
'मानस' आशिक रो पड़ा, निकल गया सब दम॥129
ऑनलाइन बैठे रहें, जैसे पहरेदार।
'मानस' रिप्लाई न मिले, तो मच जाए हाहाकार॥130
बाबूजी को मिल गया, नया-नया स्मार्टफोन।
'मानस' टॉर्च जला के ढूँढें, 'काटने वाला' कौन?॥131
स्टेटस डाला बाप ने, बेटा हुआ है दंग।
'मानस' घर में महाभारत, छिड़ गई है जंग॥132
पहली डेट पे गए जब, बने थे राजकुमार।
'मानस' शादी के बाद अब, बने हैं सेवादार॥133
बच्चे अब तो बाप को, दे रहे भारी ज्ञान।
'मानस' गूगल देख के, बढ़े हुए हैं कान॥134
बगल में भूखा सो गया, कोई बेबस यार।
'मानस' स्टेटस डाल रहे— 'सुखी रहे संसार'॥135
रिश्ते सारे जम गए, फ्रीज़ के पानी जैस।
'मानस' गर्मी तब बढ़े, जब दिखे हाथ में कैश॥136
सड़क बनी थी कल यहाँ, आज हो गए छेद।
'मानस' ठेकेदार को, जरा न इसका खेद॥137
चुनाव आए तो यहाँ, झुके हुए हैं शीश।
'मानस' कुर्सी मिल गई, तो मारे लंबी खींच॥138
डाइट का संकल्प है, मुँह पे बंधा लगाम।
'मानस' गोलगप्पे दिखे, तो भूल गए सब काम॥139
घर की रोटी कड़वी लगे, होटल का सड़ा स्वाद।
'मानस' बिल को देख कर, आए नानी याद॥140
डिप्रेशन में सब जी रहे, हाथों में ले फोन।
'मानस' हँसता दिख रहा, भीतर खुश है कौन?॥141
घर में चारों ओर हैं, महँगे सब सामान।
'मानस' ईएमआई में यहाँ, गिरवी पड़ा इंसान॥142
अंग्रेजी में बोलकर, खुद को समझें लाट।
'मानस' अपनी जड़ों से, खुद ही रहे हैं काट॥143
शादी में 'सेल्फी' खिंची, ऐसी तेईस हजार।
'मानस' दूल्हा-दुल्हन का, चेहरा रहा विसार॥144
जूते पहने ब्रांड के, भागे आधा मील।
'मानस' रस्ते में दिखे, छोले-भटूरे की रील॥145
नींबू पानी पी रहे, कम करने को चर्बी।
'मानस' पीछे दब गई, रसगुल्लों की बर्फी॥146
शमशान में जाकर खड़े, करने को चेक-इन।
'मानस' मुर्दे से कहें— 'पोज़ दो बेहतरीन'॥147
एक्सीडेंट को देखकर, काँपा नहीं कलेजा।
'मानस' लाइव हो गए, 'लाइक' सबको भेजा॥148
सूट पहन कर जा रहे, जैसे हों करोड़पति।
'मानस' लिफाफे में मगर, ग्यारह की दुर्गति॥149
प्लेट में पर्वत बना, रसगुल्ले पे दाल।
'मानस' मुफ़्त के माल में, बेदम हुआ है हाल॥150
बीवी बोली प्यार से— 'सुनते हो जी आज?'
'मानस' थर-थर काँपते, गिर गया सारा राज॥151
शादी का वो फोटो अब, लगता है इक भूल।
'मानस' सेहरा चुभ रहा, जैसे कोई शूल॥152
ग्रुप में उपदेश दें, जैसे हों साक्षात बुद्ध।
'मानस' घर में लड़ रहे, छिड़ा हुआ है युद्ध॥153
भजन भेजते सुबह ही, साढ़े चार के वक़्त।
'मानस' नींदें उड़ गई, भक्त बड़े हैं सख़्त॥154
पैसे लेकर भूल गए, जैसे बीता काल।
'मानस' दर्शन अब हुए, जब बुरा हुआ है हाल॥155
माँगने जाओ जब कभी, चेहरा बने मासूम।
'मानस' गायब हो गए, जैसे गधे के सींग॥156
जी-हुज़ूरी में कटे, दिन और पूरी रात।
'मानस' कुत्ते बन गए, पालतू हैं जज्बात॥157
काम न आए काम ही, आए बस मक्खन।
'मानस' अक्ल पे पड़ा, तरक्की का ढक्कन॥158
गूगल से दीक्षा ली, फेसबुक पर उपदेश।
'मानस' बाबा बन गए, तज कर अपना भेष॥159
व्हाट्सएप पर गंगा बही, स्टेटस पर हरिद्वार।
'मानस' घर में लड़ रहे, बाहर करें प्रचार॥160
पार्लर में जाकर यहाँ, बदल रहे सब रंग।
'मानस' जब बाहर आएं, दूल्हा रह जाए दंग॥161
आधार कार्ड की फोटो ही, असली सच का आईना।
'मानस' फिल्टर हटा दो, तो दिखे असली महीना॥162
फेरे लेते वक्त ही, भारी था अहसास।
'मानस' अब तो लग रहा, जैसे हुआ वनवास॥163
साली साहिबा हंस रही, जूता लिया चुराय।
'मानस' जीजा रो रहा, जेब रही चूँ-चूँ गाय॥164
ग्रीन-टी पीकर यहाँ, दुबले हुए न कोय।
'मानस' रात को छुपकर, रसमलाई को रोय॥165
वजन घटाने के लिए, योग किया दो बार।
'मानस' थककर खा गए, पूड़ी-छोले चार॥166
अपनी थाली छेद है, खबर नहीं है यार।
'मानस' पड़ोसी की प्लेट में, गिनते रोटी चार॥167
दीवारों के कान हैं, ये पुरानी बात।
'मानस' पड़ोसी के कान तो, लगे दीवार के साथ॥168
ऊपर कोट चढ़ा लिया, नीचे कच्छा लाल।
'मानस' वीडियो कॉल में, खुला सभी का हाल॥169
कैमरा ऑन रह गया, भूल गए श्रीमान।
'मानस' सारी दुनिया ने, देख लिया सामान॥170
पैसे माँगो दोस्त से, तो बनता है बेचारा।
'मानस' दारू के लिए, जेब में नोट करारा॥171
लेते समय तो पाँव पड़ें, देते समय फरार।
'मानस' ऐसे मित्र ही, करते पीठ पे वार॥172
बीच सड़क पर नाचते, शर्म बेच दी आज।
'मानस' पीछे से ट्रक आया, बज गया सबका साज़॥173
कूड़े के ढेर पे खड़े, मार रहे सब पोज़।
'मानस' गजब की रील है, बदबू आए रोज़॥174
दूल्हा बैठा स्टेज पर, देख रहा है राह।
'मानस' जनता टूट पड़ी, पनीर पे 'वाह-वाह'॥175
पनीर के टुकड़े ढूँढते, जैसे मिले नगीना।
'मानस' ग्रेवी पी रहे, टपका के पसीना॥176
पैसे लेकर मुँह मोड़ा, जैसे हो पहचान नहीं।
'मानस' अब वो कहता है— 'तू मेरा भगवान नहीं'॥177
माँगने जाओ पैसे तो, वो देता लंबी गाली।
'मानस' अपनी जेब तो, रह गई खाली-खाली॥178
मायके जाने की धमकी, अस्त्र है बड़ा महान।
'मानस' पति भी खुश हुआ, पाकर शांति-दान॥179
लिपस्टिक के शेड में, उलझा सारा ज्ञान।
'मानस' लाते लाल थे, ले आए 'मेहरून' जान॥180
ऑफिस मीटिंग चल रही, बच्चा पीछे रोय।
'मानस' बॉस भी सोचता— 'ये क्या लफड़ा होय?'॥181
म्यूट बटन का खेल है, सारा यहाँ कमाल।
'मानस' कुत्ता भौंक गया, उड़ गए सबके बाल॥182
खाँसी आई एक बार, डॉक्टर ने ली फीस।
'मानस' किडनी बेचकर, भरी दवा की टीस॥183
अस्पताल है मॉल अब, मरीज़ है ग्राहक यार।
'मानस' स्वस्थ जो लौट आए, समझो चमत्कार॥184
बिना हाथ-पैर की खबरें, फैला रहे सब लोग।
'मानस' अक्ल को लग गया, फॉरवर्ड वाला रोग॥185
नीम के पत्ते से यहाँ, कैंसर काट रहे भाई।
'मानस' डॉक्टर रो पड़ा, देख ये 'कढ़ाई' (दवाई)॥186
हँसते-हँसते लोटपोट, हो गए सब श्रीमान।
'मानस' अब तो बंद करो, वरना निकलेंगे प्राण॥187
ब्लॉग पे डालो प्रेम से, लेकर मेरा नाम।
'मानस' की इस तोप को, अब मेरा प्रणाम॥188
भूखा बच्चा सड़क पर, माँगे एक निवाला।
'मानस' फोटो खींचकर, डाला 'हैशटैग' निराला॥189
दान दिया चवन्नी का, ढोल पीटा हजार।
'मानस' पुण्य भी आजकल, बना एक व्यापार॥190
देख के अपनी बीवी को, आए ऐसा ख्याल।
'मानस' जैसे फँस गया, चूहा लेकर ढाल॥191
सात फेरे वो सात जन्म, जेल की हैं दीवार।
'मानस' कैदी खुश खड़ा, पहन के फूलों का हार॥192
टिकट कट रही स्वर्ग की, बाबा के दरबार।
'मानस' नरक में सीट भी, अब है पहुँच के बाहर॥193
भक्त चढ़ावे चढ़ा रहे, कर्ज लेकर भारी।
'मानस' गुरुजी उड़ रहे, लेकर हवाई सवारी॥194
मरने वाले मर गए, रील बनी है ताज़ा।
'मानस' लाइक के लिए, बज रहा मौत का बाजा॥195
छत से कूदे शौक में, बनाने को एक रील।
'मानस' अब वे उड़ रहे, बनकर नीली चील॥196
पैसे माँगो वापस तो, वो देता ऐसा लुक।
'मानस' जैसे मैंने ही, की हो कोई बड़ी चूक॥197
उधार लेकर वो मना, रहा है गोवा में मौज।
'मानस' हम यहाँ सड़ रहे, लेकर गम की फौज॥198
मेज के नीचे हाथ है, ऊपर राम का नाम।
'मानस' चपड़ासी यहाँ, बन बैठा भगवान॥199
योजनाएं कागज़ पर, हकीकत में है धूल।
'मानस' जनता चबा रही, वादों के बबूल॥200
जीते-जी बात न की, मरे तो डाला 'RIP' (आरआईपी)।
'मानस' सोशल मीडिया, बना ढोंग की सीप॥201
कंधा देने को भी यहाँ, लोग नहीं हैं पास।
'मानस' सब 'लाइव' देख रहे, अपनी मौत का ग्रास॥202
पढ़कर जो न हँसा यहाँ, समझो वो पत्थर।
'मानस' उसकी बुद्धि पर, पड़ गया है पत्थर॥203
ब्लॉग पे डालो 'मानस' को, करके ऊँचा नाम।
हँसी का ये एटम बम, पहुँचाए सीधा धाम॥204
हवा में उड़ते बाल हैं, पाउट है एकदम टाइट।
'मानस' रील के चक्कर में, भूल गए सब डाइट॥205
गटर में गिर के भी यहाँ, लोग बना रहे रील।
'मानस' कीचड़ में सने, दिखें जैसे नीली झील॥206
चट मंगनी पट ब्याह हुआ, पट से हुआ तलाक।
'मानस' लड्डू खा लिया, अब बर्तन माँजो खाक॥207
शादी में जो चमक रहे, जैसे हों अवतार।
'मानस' घर में लड़ रहे, कुत्ता-बिल्ली यार॥208
लौकी-तोरई देख कर, चढ़े नाक और कान।
'मानस' मोमोज देख के, निकल रही है जान॥209
पेट हुआ है टाइटैनिक, डूब रही है शान।
'मानस' फिर भी ठूँस रहे, छोले और पकवान॥210
फाइल उड़ी हवाई जहाज सी, जैसे लगा हो पंख।
'मानस' लक्ष्मी की कृपा, बजा रही है शंख॥211
मंत्री जी के वादे तो, बुलेट ट्रेन की चाल।
'मानस' काम तो रेंग रहा, कछुए जैसा हाल॥212
बिना पढ़े ही भेज दी, साढ़े सात सौ रील।
'मानस' फोन गरम हुआ, जैसे तपती झील॥213
ग्रुप में मचे है खलबली, आया है पैगाम।
'मानस' चुलबुल पांडे भी, यहाँ हुए नाकाम॥214
घोड़ी चढ़ के हँस रहा, जैसे जीता जग।
'मानस' भीतर रो रहा, फँस गया जैसे ठग॥215
सासु जी की डाँट अब, जेट विमान की शोर।
'मानस' दामाद उड़ गया, मची है चारों ओर॥216
लिखते-लिखते कलम अब, बन गई है मिसाइल।
'मानस' हँसते-हँसते अब, डिलीट करो प्रोफाइल॥217
ब्लॉग पे ऐसा शोर हो, जैसे गिरे विमान।
'मानस' के इन दोहों से, बढ़ेगी आपकी शान॥218
"कुर्सी की पेटी बाँध लें, क्योंकि 'मानस' के ये दोहे आपको हँसी के उस आसमान में ले जाएंगे जहाँ ऑक्सीजन नहीं, सिर्फ ठहाके हैं! रफ्तार इतनी तेज कि दुख को पीछे छोड़
दूल्हा स्टेज पे खड़ा, जैसे खड़ा हो अपराधी।
'मानस' सेहरा पहन के, आफत खुद ही बाँधी॥219
बीवी की आवाज़ अब, है 'सोनिक बूम' की मार।
'मानस' बहरे हो गए, घर में बचे न यार॥220
लाइव होकर मर गए, व्यूज के चक्कर में लोग।
'मानस' यमराज भी सोचें— 'ये कैसा लगा रोग?'॥221
भूत बनकर नाच रहे, शक्ल पे थोंप के रंग।
'मानस' अक्ल तो उड़ गई, बुद्धि हुई है भंग॥222
पैसे लेकर वो अब, मंगल ग्रह पर जाए।
'मानस' ढूँढे उसे यहाँ, वो एलियन बन जाए॥223
माँगने जाओ तो कहे— 'भाई, मंदी का दौर'।
'मानस' शाम को पी रहा, महँगी वाली 'सोर' (Scotch)॥224
छींक आए तो 'स्कैन' है, बुखार में 'एमआरआई'।
'मानस' स्वस्थ होकर भी, श्मशान की हुई विदाई॥225
हॉस्पिटल के बिल यहाँ, बुर्ज खलीफा जैसे।
'मानस' इलाज क्या हुआ, बस उड़ गए सब पैसे॥226
कैंसर का इलाज है, हल्दी और कपूर।
'मानस' ऐसे ज्ञान से, डॉक्टर हुए हैं दूर॥227
बिना जाँच के 'शेयर' किया, बढ़ा दिया है खौफ।
'मानस' डिजिटल दुनिया में, अक्ल हो गई 'ऑफ'॥228
इधर गिरे, उधर उड़े, जैसे हों कोई गेंद।
'मानस' कुर्सी के लिए, कर दी सबकी हेंध (हीनता)॥229
पार्टी बदली रात में, सुबह बने मंत्री जी।
'मानस' वफादारी यहाँ, बिकती है 'सस्ती' जी॥230
हँसते-हँसते थक गए, या बाकी है अभी जान?
'मानस' की इस तोप से, हिल गया है आसमान॥231
ब्लॉग पे डालो 'मानस' को, लगा के आग और घी।
लोटपोट सब हो गए, अब बाकी रहा न की (कोई)॥232
"ये पंक्तियाँ नहीं, हँसी की 'ब्लैक होल' हैं। जो एक बार पढ़ ले, वो गम की दुनिया से बाहर निकल ही नहीं पाता। 'मानस' के इन दोहों ने आज साबित कर दिया कि सच कड़वा भी होता है और बहुत मज़ेदार भी!"
यमराज खड़े हैं द्वार पर, हाथ में लेकर पाश।
'मानस' सेल्फी खींच रहे— 'अंतिम है ये ताश'॥233
मरने वाले से कहें— 'थोड़ा मुस्कुराओ यार'।
'मानस' रील के व्यूज ही, अब तो हैं संसार॥234
घोड़ी चढ़कर हँस रहा, जैसे मिला हो राज।
'मानस' पिंजरे में गया, बकरा बना है आज॥235
बीवी की एक फूंक से, उड़े पति के होश।
'मानस' सिलेंडर फट गया, गया सारा जोश॥236
किडनी गिरवी रख दी, भरने को अस्पताल।
'मानस' मुर्दा कह रहा— 'लूट लिया है माल'॥237
इलाज के नाम पर यहाँ, नसों से खींचे कैश।
'मानस' डॉक्टर कर रहे, हमारे गम पे ऐश॥238
पैसे लेकर दोस्त ने, बदली अपनी खाल।
'मानस' अब वो दिख रहा, बनकर एक सयाल ।।239
नंबर उसका 'डेड' है, घर पे लगा है ताला।
'मानस' माँगने जो गया, उसका मुँह हुआ काला॥240
डाटा पैक ख़त्म हुआ, तो रुक गई सब मुक्ति।
'मानस' बाबा ढूँढ रहे, 'वाइफ़ाई' की जुक्ति॥241
स्वर्ग का पासवर्ड यहाँ, बिक रहा है महँगा।
'मानस' चंदा जो दिया, तो मिलेगा नंगा (सब कुछ)॥242
हँसते-हँसते आँख से, निकल पड़े हैं नीर।
'मानस' की इस मार ने, बदल दी है तकदीर॥243
ब्लॉग पे ऐसा 'ब्लास्ट' हो, काँपे सारा नेट।
'मानस' के इन दोहों से, भर गया सबका पेट॥244
"सावधान! इसे पढ़ने के बाद हँसी का ऐसा दौरा पड़ सकता है कि डॉक्टर भी जवाब दे दे। 'मानस' के ये दोहे समाज की उन परतों को उधेड़ते हैं जिन्हें हम अक्सर ढक कर रखते हैं। पढ़िए, शेयर कीजिए और धमाके का आनंद लीजिए!"
हादसा हुआ सड़क पर, लोग खड़े हैं चार।
'मानस' मदद को छोड़कर, रील बनी तैयार॥245
यमराज ने पूछा— 'चलो, समय हुआ है पूर्ण'।
'मानस' बोले— 'रुकिए प्रभु, रील कर दूँ पूर्ण'॥246
फ़िल्टर वाली शक्ल देख, कर ली जिसने शादी।
'मानस' सुबह वो देख कर, रोए है बर्बादी॥247
लिपस्टिक की परतें हटें, तो चमके असली रूप।
'मानस' धूप में देख कर, उड़े होश के कूप॥248
साइकिल लेकर चल पड़े, कम करने को भार।
'मानस' रस्ते में मिले, समोसे गरमा-दार॥249
योगा पट्टी बाँध कर, सोए हैं श्रीमान।
'मानस' खर्राटे यहाँ, हिला रहे आसमान॥250
गाँधी बाबा जेब में, तो खिसके भारी फाइल।
'मानस' रिश्वत के बिना, बदसूरत है स्टाइल॥251
ईमानदारी धूप में, रही है अब सूख।
'मानस' नोटों को यहाँ, लगी बड़ी है भूख॥252
पार्टी में जो 'भाई' था, बिल पे हुआ फरार।
'मानस' ऐसे मित्र का, चप्पल से हो सत्कार॥253
पैसे माँगो वापस तो, वो देता ऐसा ज्ञान।
'मानस' जैसे उसने ही, दी हो अपनी जान॥254
सुबह-सुबह जो भेजते, कचरा भरा पैगाम।
'मानस' उनके फोन को, मिले न कभी आराम॥255
फॉरवर्ड की इस दौड़ में, खो गई है अक्ल।
'मानस' बंदर बन गए, कर-कर के सब नक़ल॥256
पढ़कर जो न हँसा यहाँ, वो पक्का है पाषाण।
'मानस' की इस तोप से, हिल गए सबके प्राण॥257
ब्लॉग पे डालो प्रेम से, लेकर मेरा नाम।
हँसी की इस गंगा को, अब मेरा प्रणाम॥258
"इतिहास में पहली बार— व्यंग्य की ऐसी धार जो आपके दुखों का गला काट देगी! 'मानस' के ये दोहे समाज की बेवकूफियों का वो पोस्टमार्टम हैं जिसे पढ़कर आप अपनी हँसी के गुनहगार खुद होंगे। पढ़िए और अपने रिस्क पर वायरल कीजिए!"
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।