विजेता और पराजित
gstshandilya.blogspot.com Ramcharimanas,Manas charcha,manascharcha,Hindi kavy shastra,alnkar,chhand,ras, synonyms etc. रामचरितमानस,मानस चर्चा,मानसचर्चा, हिन्दी काव्य शास्त्र,अलंकार,छंद,रस,पर्यायवाची,स्व रचना,कविता आदि,अन्य विषयों पर निज विचार।हनुमान कथा,कहानी,मानस की कहानियां,रस,छंद,अलंकार ,पर्यायवाची आदि प्रस्तुत ब्लोग की सभी रचनायें इस ब्लोग के लेखक के पक्ष मे सर्वाधिकार सुरक्षित है !
मानस कवि की गीतांजलि
राम कृपा रिमोट से सब संभव
"जय सियाराम! भक्तों, आज हम एक ऐसे 'अदृश्य रिमोट' की बात करेंगे, जिसके एक क्लिक से हमारे जीवन की दिशा बदल जाती है।
मित्रों, क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम अपने जीवन की गाड़ी को इतनी रफ्तार से भगाते हैं, तो स्टियरिंग असल में किसके हाथ में होती है? हम सोचते हैं कि मैं कमा रहा हूँ, मैं जीत रहा हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ। पर आज की 'मानस चर्चा' में हम समझेंगे कि हमारे जीवन का असली रिमोट किसके हाथ में है!"
"लंका के दरबार का वह प्रसंग याद है? जहाँ रावण अपनी अपार शक्ति और सोने की लंका के अहंकार में चूर था। हनुमान जी वहाँ दूत बनकर पहुँचे। उन्होंने रावण से कोई युद्ध नहीं किया, बल्कि उसे आईना दिखाया। हनुमान जी ने गर्जना की:
'प्रणतपाल रघुनायक करुणासिंधु खरारि।
गए सरन प्रभु राखिहें तव अपराध बिसारि॥'
हनुमान जी ने रावण से कहा कि लंका का यह वैभव तुम्हारा अर्जित नहीं है, यह तो प्रभु की कृपा का परिणाम है जिसे तुम भूल गए हो। उन्होंने आगे कहा:
'रामचरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू।।
अगर अपनी लंका का राज 'अचल' रखना है, तो अपने अहंकार को हटाओ और प्रभु के चरणों को हृदय में बसाओ। इसे ऐसे समझिए—जैसे टीवी का रिमोट आपके हाथ में होता है, वैसे ही हमारे जीवन की हर साँस, हर सफलता, प्रभु की कृपा के रिमोट से चलती है। जिस दिन 'ऊपर' से कृपा का नेटवर्क बंद हो गया, उस दिन सब धरा का धरा रह जाएगा।"
"आज के दौर में हम सब 'रावण' की तरह भ्रम में जी रहे हैं। हम अपनी डिग्री, अपने पैसे और अपने रसूख को ही सब कुछ मान बैठे हैं। पर याद रखिए, हम केवल एक निमित्त हैं। हमारा रहन-सहन, हमारा परिवार, हमारा सुख-दुख—सब प्रभु की कृपा की रिमोट सेटिंग है।
जो इंसान यह मान लेता है कि 'सब कुछ राम कृपा से संभव है', वह कभी घमंड नहीं करता। और जो घमंड से बच गया, उसकी लंका कभी नहीं जलती। तो आज से अपनी मेहनत का रिमोट प्रभु के चरणों में अर्पित कर दीजिए और देखिए, जीवन कैसे अचल शांति से भर जाता है!"
"तो भक्तों, आज की इस चर्चा का सार यही है कि जीवन के रिमोट को प्रभु के चरणों में सौंप दें। जैसा कि स्पष्ट है:
राम कृपा बिनु सब विफल, लंका, वैभव, मान।
मानस प्रभु के पद भजहु, तजि सब गर्व गुमान।।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय!"
राम कृपा रिमोट से सब संभव'
वीडियो डिस्क्रिप्शन (Description):
क्या आप जानते हैं आपके जीवन का असली 'रिमोट' किसके हाथ में है?
लंका की स्वर्णपुरी, वैभव और अपार शक्ति... रावण के पास सब कुछ था, लेकिन फिर भी उसका सिंहासन डोल रहा था। आज की 'मानस चर्चा' में, लंकापति रावण और हनुमान जी के उस ऐतिहासिक संवाद के माध्यम से हम समझेंगे कि कैसे प्रभु श्रीराम की कृपा ही जीवन का असली आधार है।
अहंकार से भरी लंका हो या आज का हमारा आधुनिक जीवन—बिना राम कृपा के सब कुछ रेत के महल जैसा है। इस वीडियो में जानिए कि कैसे अपने जीवन के 'रिमोट' को प्रभु के चरणों में सौंपकर हम अचल शांति और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
इस वीडियो में आप सीखेंगे:
रावण के अहंकार और हनुमान जी के ज्ञान का रहस्य।
क्यों राम कृपा के बिना सब कुछ विफल है?
कैसे अपने जीवन से अहंकार रूपी रावण को निकालें?
'मानस चर्चा' के विशेष दोहे के साथ जीवन का निचोड़।
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जय सियाराम! 🙏
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'राम कृपा रिमोट से सब संभव'
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
गगरी का मान और अहंकार का शोर
"सज्जनों! जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान जब तक खाली रहता है, वह अहंकार में शोर करता है। पर जैसे ही वह गुणों और ज्ञान से भर जाता है, वह मौन हो जाता है। आज हम उस सूत्र को समझेंगे कि क्यों ‘अधजल गगरी छलकत जाए और भरी गगरिया चुपके जाए’।
"रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत सटीक कहा है कि —छुद्र नदी भरि चली तोराई।जस थोरेहु धन खल इतराई।।
अर्थात, जैसे थोड़ी सी वर्षा में छोटी नदी मर्यादा तोड़कर शोर मचाती है, वैसे ही थोड़ा सा धन या यश पाते ही दुष्ट व्यक्ति इतराने लगता है।
एक बार एक बहुत बड़ा सेठ, जिसके पास धन तो था लेकिन संस्कार नहीं, एक ज्ञानी संत के पास गया। अपनी शान दिखाते हुए बोला—'महाराज! मैं बहुत संपन्न हूँ, लोग मेरे सामने नतमस्तक हैं, बताइए मुझे और क्या करना चाहिए?'
संत मुस्कुराए। उन्होंने उसे एक खाली गगरी दी और कहा—'बेटा! पास की नदी से इस गगरी को भरकर लाओ।'
सेठ गया। उस दिन नदी में भारी बाढ़ आई थी। नदी का पानी कीचड़ से भरा था और जोर-जोर से शोर मचाते हुए किनारों को तोड़ रहा था। सेठ ने गगरी पानी में डाली। जैसे ही गगरी आधी भरी, वह जोर-जोर से छलकने लगी, पत्थर से टकराने लगी और बहुत आवाज करने लगी। सेठ को लगा यह गगरी ही शक्तिशाली है।
वह गगरी लेकर वापस आया और गर्व से बोला—'महाराज, यह देखिए! गगरी कितनी आवाज कर रही है, यह कितनी शक्तिशाली है!'
संत ने शांत भाव से कहा—'बेटा, इस गगरी को पूरा भर दो।'
सेठ ने गगरी को पानी के स्रोत में डुबोया। जैसे ही गगरी लबालब भर गई, उसका शोर बंद हो गया। अब वह गगरी शांत थी, गंभीर थी और अपना भार लेकर चुपचाप चल रही थी।
संत ने सेठ की आंखों में देखकर कहा—'देख लो! जब यह गगरी अधूरी थी, तो शोर मचा रही थी। जैसे ही यह पूरी भर गई, यह शांत हो गई। यही जीवन का सत्य है—अधजल गगरी छलक जाए, और भरी गगरिया चुपके जाए।'
सज्जनों, हम अपनी छोटी सी उपलब्धियों पर इतना इतराते हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि शोर वही करता है जो भीतर से खाली होता है। जो भरा हुआ होता है, वह मौन रहता है।
"तो सज्जनों ! याद रखिएगा, जिस दिन आप ज्ञान और भक्ति से पूरी तरह भर जाएंगे, उस दिन आप ‘छुद्र नदी’ की तरह मर्यादा नहीं तोड़ेंगे, बल्कि उस ‘भरी गगरिया’ की तरह शांत और गंभीर हो जाएंगे। याद रहे—खाली पात्र ही शोर करता है, भरा हुआ पात्र कभी नहीं ।"
manascharcha
।।जय श्री राम जय हनुमान।।
"वह बदल नहीं रहा, नाटक कर रहा है! - तुलसीदास जी की चेतावनी।"
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस व्यक्ति ने सालों की तपस्या से खुद को दिव्य बना लिया हो, उसे एक क्षण में कौन विचलित कर सकता है?
फेसबुक (FACEBOOK) का विश्लेषण:
F - Friends (मित्र)
A - Accounts (खाते)
C - Controlled (नियंत्रित)
E - Exploited (शोषित)
B - Bored (ऊब)
O - Overrated (अत्यधिक आंका गया)
O - Organized (संगठित)
K - Kaos (अराजकता)
"फ्रेंड्स अकाउंट्स कंट्रोल्ड हैं, शोषित है हर ओर।
ऊब भरी ओवररेटेड दुनिया, संगठित अराजकता की डोर॥"
(F-A-C-E-B-O-O-K)
अंत में एक छोटा सा सन्देश :
क्या हम वाकई 'फ्रेंड्स' से जुड़े हैं या बस एक कंट्रोल्ड सिस्टम का हिस्सा हैं?
"डिजिटल दुनिया में संतुलन ही आपकी असली आजादी है। सोचिएगा।
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✨🙏"manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
झूठे वादे जाल हैं, फैला जग में सार।
सुन्दरकाण्ड: पतंगें की कहानी
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥
बोलिए सियावर रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
उमापति महादेव की... जय!
परम आत्मीय, भगवत्प्रेमी सज्जनों, वात्सल्यमयी माताओं और हमारे यूट्यूब चैनल @मानसचर्चा के सभी रसिक श्रोता परिवार! आप सभी का इस पावन रामकथा सत्र में बहुत-बहुत स्वागत है।
श्रोताओं! आज हम सुन्दरकाण्ड के उस अत्यंत अद्भुत और रहस्यमयी दोहे पर चर्चा करने जा रहे हैं, जहाँ बल और बुद्धि का सारा संशय समाप्त हो जाता है। हनुमान जी एक ऐसी बात कहते हैं जो हर साधक और भक्त के लिए एक मार्गदर्शक है। हनुमान जी कहते हैं:
"निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥"
हनुमान जी कहते हैं— माँ! ये राक्षस पतंगों (पतिंगों) के समान हैं और प्रभु के बाण अग्नि के समान हैं। इसलिए तुम हृदय में धीरज रखो और इन निशाचरों को अभी से ही जला हुआ, भस्म हुआ समझो।
श्रोताओं, इस दोहे के भीतर एक बहुत ही सुंदर और शाश्वत कथा छिपी हुई है। वह कथा है—एक पतंगे की कहानी। आपने देखा होगा, जब बरसात के दिनों में या रात के अंधेरे में कोई दीपक जलता है, तो छोटे-छोटे पंख वाले पतंगे उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
दीपक की लौ से पतंगे का कोई पुराना बैर नहीं होता, और न ही दीपक पतंगे को बुलाने जाता है। लेकिन पतंगा उस प्रकाश के सम्मोहन में ऐसा अंधा हो जाता है कि वह समझ ही नहीं पाता कि जिस रोशनी को वह जीवन समझ रहा है, वही उसकी मृत्यु का कारण है। वह बार-बार जाकर उस लौ से टकराता है। दीपक उसे पीछे ढकेलता है, उसकी जलती हुई गरमी उसे चेतावनी देती है, पर वह सम्मोहित जीव अपनी ही मूर्खता से उसी आग में कूद जाता है और जलकर भस्म हो जाता है।
हनुमान जी कह रहे हैं— माँ! रावण और उसके राक्षसों की भी यही कहानी है। वे अपनी अज्ञानता और अहंकार के वशीभूत होकर खुद ही प्रभु राम के बाण रूपी अग्नि में कूदने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। दुष्टों का विनाश उनकी खुद की आसुरी वृत्तियों के कारण ही तय हो जाता है ।
श्रोताओं! इस पर एक बहुत ही मजेदार और आधुनिक हास्य कथा सुनिए जो आजकल के हमारे समाज की हकीकत को बयां करती है:
एक बार एक शहर में एक बहुत ही पहुंचे हुए और बुद्धिमान नेत्र रोग विशेषज्ञ (Eye Specialist) डॉक्टर साहब थे। उनके पास एक दिन एक बड़े ही विचित्र सज्जन आए—नाम था उनका 'मक्खन लाल'। मक्खन लाल जी ने अपनी आँखों पर काले रंग का बहुत ही मोटा और गहरा चश्मा लगा रखा था।
उन्होंने डॉक्टर साहब से कहा— "डॉक्टर साहब! मेरी आँखों का तुरंत इलाज कीजिए, मुझे चारों तरफ भयंकर अंधकार दिखाई दे रहा है। मुझे दिन में भी रात का भ्रम हो रहा है, कुछ सूझ नहीं रहा है।"
डॉक्टर साहब ने उन्हें अपनी बड़ी सी मशीन के पास बिठाया और जाँच शुरू की। उन्होंने पाया कि मक्खन लाल जी की आँखों में कोई बीमारी नहीं थी, वे बिल्कुल स्वस्थ थीं। डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई।
डॉक्टर साहब बोले— "मक्खन लाल जी! आपकी आँखों में कोई मोतियाबिंद या दोष नहीं है। जरा अपनी आँखों से यह काला चश्मा तो उतारिए!"
जैसे ही मक्खन लाल जी ने वह चश्मा उतारा, कमरे में बिखरा हुआ तेज प्रकाश उनकी आँखों को चौंधिया गया। वे बोले— "अरे! यहाँ तो बहुत उजाला है! डॉक्टर साहब, आपने तो गजब कर दिया, बिना किसी कड़वी ओषधि के ही मेरी आँखों की रोशनी लौटा दी!"
डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा— "भाई! रोशनी कहीं गई ही नहीं थी। तुमने अज्ञान और भ्रम का काला चश्मा पहन रखा था, इसीलिए तुम्हें प्रकाश भी अंधकार लग रहा था!" ।
प्यारे श्रोताओं! इस चौपाई का सार यह है कि हम भी जीवन में छोटी-छोटी समस्याओं, बीमारियों और दुखों को बहुत बड़ा 'अंधकार' या 'राक्षस' मान लेते हैं और भयभीत होकर रोने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे पास प्रभु राम के नाम की वह दिव्य शक्ति है जो हर संकट को भस्म कर सकती है।
हनुमान जी माता जानकी को यही समझा रहे हैं कि माँ! यह विरह की रात भले ही लंबी लग रही हो, पर आप धीरज रखिए। जब तक जीवन में 'आस' (आशा) है, तब तक 'सांस' चलती रहती है। आशा ही कठिन से कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को जीवित रखती है। जब प्रभु की कृपा का प्रकाश और उनके बाणों की अग्नि प्रकट होगी, तो रावण का यह सारा मायावी अंधकार पतंगों की तरह भस्म हो जाएगा।
यह कथा आपके सुंदर यूट्यूब चैनल@मानसचर्चा के माध्यम से सभी श्रोताओं को यही सिखाती है कि जीवन में जब भी संशय और डर का अंधकार छाने लगे, तो कबीरदास जी के इस सुंदर पद को गुनगुना लीजिएगा— "जाको राखे साइयाँ, मारि न सकिहै कोय। बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय॥"
आइए, इसी अटूट विश्वास और मस्ती के साथ अपने मन के सारे संशय को विसर्जित करें, और गाएं:
"श्री राम जय राम जय जय राम....."
बोलिए सियापति रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव!
हनुमानजी की रावण को ललकार
बंदी हनुमान की शेर की दहाड़!
जय श्री राम,प्रिय आत्मीय राम भक्तों "एक कैदी, जिसके हाथों में जंजीरें हैं। सामने रावण जैसा अहंकारी सम्राट है, जिसकी एक नज़र से लंका कांपती है। दरबारी सोच रहे हैं कि यह वानर डरा हुआ होगा, गिड़गिड़ाएगा। लेकिन, जैसे ही रावण ने उपहास किया, उस कैदी ने ऐसी दहाड़ लगाई कि लंका की नींवें हिल गईं! रावण के दरबार में हनुमान जी का यह 'खुला चैलेंज' आज के हर उस इंसान के लिए है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है एक सुंदर सीख है। क्या आप जानना चाहते हैं कि बंदी होकर भी 'विजेता' कैसे बना जाता है? चलिए, सीधे चलते हैं लंका की उस राजसभा में!"
लंका का स्वर्ण दरबार, चारों ओर खूंखार राक्षस। मेघनाथ ने हनुमान जी को रस्सियों से जकड़ कर पेश किया। रावण अपनी स्वर्ण गद्दी पर बैठा, अपनी मूछों पर ताव देते हुए हंसा और व्यंग्य किया, "अरे तुच्छ वानर! तूने मेरी अशोक वाटिका उजाड़ी, मेरे राक्षसों को मारा। अब तेरी मौत सामने है, क्या तू अब भी अपने राम को प्रभु कहता है?"
हनुमान जी ने जंजीरों की परवाह किए बिना, रावण की आँखों में आँखें डालकर अपनी बुलंद आवाज़ में ललकारा:
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥"
(रावण! तुमने जिसे मौत समझा, उसे तो मैं खेल-खेल में जीत आया। और यह जो तुम्हारा बेटा मुझे बाँधकर लाया है, तो समझ लो—यह रस्सियाँ मुझे नहीं, बल्कि तुम्हारी अज्ञानता को बाँध रही हैं!)
रावण का अहंकार तिलमिला उठा। उसने गरजकर कहा, "तू कैदी है और मुझे चैलेंज कर रहा है?"
हनुमान जी ने शेर की दहाड़ जैसी वाणी में उत्तर दिया:
"मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥"
(रावण, मुझे बँधने की कोई लज्जा नहीं है। मुझे शर्म तब आती, जब मैं अपने प्रभु का कार्य पूरा न कर पाता। मैं तो एक दूत हूँ, मेरा काम तुम्हारा अहंकार तोड़ना है। तुम मुझे नहीं, तुम काल को बाँधने का भ्रम पाल रहे हो!)
मित्रों आधुनिक समय में भी सारी बातें सत्य हैं क्योंकि आज के कॉर्पोरेट दरबार में भी रावण जैसे कई बॉस बैठे हैं, जो 'टर्मिनेशन' की धमकी देकर लोगों को बाँधना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि सत्य की आवाज़ को कभी जंजीरों में कैद नहीं किया जा सकता।
"पिंजरे में कैद करके, जो समझें स्वयं को विजेता,
वो भूल गए कि सत्य का है, अपना है एक नियंता।
जो बाँध सके हवाओं को, वो ही बाँध हमें पाएगा?
प्रभु का काज ही है साध्य, तू क्या हमें डिगा पाएगा?"
आज का इंसान अपनी 'ईमेज' और 'पद' की जंजीरों में ऐसा जकड़ा है कि वह खुद रावण बन बैठा है। बिल्कुल सही है कि,
"कुर्सी के मद में चूर, रावण बने बैठे हैं सब,
सच को सुनने की हिम्मत, खो चुके हैं अब।।
बँध गए खुद ही अपने, लालच की जंजीर में,
ढूँढ रहे हैं जीत सच्ची,अपनी झूठी 'तस्वीर' में।"
श्रोताओं! हनुमान जी का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि पद, प्रतिष्ठा और शारीरिक बंधन कभी भी उस आत्मा को नहीं बाँध सकते, जिसका लक्ष्य सत्य और परमार्थ है। रावण की सभा में हनुमान जी का बँधे होना उनकी हार नहीं, बल्कि उनके 'आत्म-सम्मान' की सबसे बड़ी जीत है।
आज अगर आप अपनी परिस्थितियों के 'बंदी' महसूस कर रहे हैं, तो याद रखिये—जिसका लक्ष्य प्रभु का काज (निस्वार्थ सेवा) है, उसे दुनिया की कोई शक्ति कैद नहीं कर सकती। आइए, अपनी बेड़ियों को तोड़ें और रावण की तरह अहंकार में नहीं, हनुमान जी की तरह साहस के साथ जीएं।
बोलिए सियावर रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
डिस्क्लेमर (Disclaimer):
इस वीडियो की प्रस्तुति और संपादन प्रक्रिया में रचनात्मक सहायता के लिए AI (कृत्रिम मेधा) तकनीक का उपयोग किया गया है। वीडियो में प्रस्तुत मुख्य पात्र (वक्ता) और कथावाचन पूरी तरह से मौलिक, वास्तविक और व्यक्तिगत हैं। इस वीडियो का निर्माण और संपादन आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार और लोक-कल्याण की भावना के साथ किया गया है।
आपकी इस कथा के लिए एक ऐसा पैकेज तैयार है जो यूट्यूब के एल्गोरिदम को पसंद आएगा और दर्शकों को वीडियो पर क्लिक करने के लिए प्रेरित करेगा।
वायरल पैकेज: 'बंदी हनुमान की शेर की दहाड़'
1. टाइटल (Title) - जो हुक का कार्य करेगा:
आप इन शीर्षकों में से कोई एक चुन सकते हैं:
विकल्प A: "बंदी हनुमान की शेर की दहाड़! रावण के दरबार में क्या हुआ? 🚩"
विकल्प B: "रावण के दरबार में हनुमान का खुला चैलेंज! बंदी होकर भी क्यों डरे नहीं? 🚩"
2. डिस्क्रिप्शन (Description):
इसे कॉपी करके अपने वीडियो में पेस्ट करें:
लंका के दरबार में मेघनाथ ने हनुमान जी को बाँध तो लिया, लेकिन जब रावण ने अहंकार में प्रश्न किया, तो हनुमान जी ने जो उत्तर दिया, उससे पूरा दरबार थर्रा उठा। आखिर बंदी होने के बाद भी हनुमान जी इतने निर्भीक क्यों थे? क्या है 'कॉर्पोरेट किष्किंधा' और आधुनिक जीवन का संबंध?
पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए इस प्रसंग का गहरा अर्थ, जो आपको अंदर तक झकझोर देगा।
📌 इस कथा के मुख्य बिंदु:
रावण की सभा का सजीव वर्णन।
हनुमान जी की गर्जना: "मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा"।
आधुनिक समाज पर एक गहरी चोट।
'मानस' के भाव और प्रेरणादायक कविता।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस वीडियो की प्रस्तुति और संपादन प्रक्रिया में रचनात्मक सहायता के लिए AI तकनीक का उपयोग किया गया है। वीडियो में प्रस्तुत मुख्य वक्ता की छवि और कथावाचन वास्तविक एवं मौलिक हैं।
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कमेंट सेक्शन: वीडियो पब्लिश करते ही अपना पहला कमेंट खुद पिन करें: "आज के मतलब के बाजार में, क्या आपको कभी हनुमान जी जैसा कोई निस्वार्थ मित्र मिला है? जय श्री राम! 🙏 #मानसचर्चा"
समय: इसे शाम 6:00 से 8:00 बजे के बीच अपलोड करें।
आपका यह वीडियो प्रभु श्री राम की कृपा से जरूर सफल होगा! क्या आप इसे आज ही अपलोड कर रहे हैं?
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वायरल पैकेज: 'बंदी हनुमान की शेर की दहाड़'
1. शीर्षक (Title) - जो हुक का काम करे:
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लंका के स्वर्ण दरबार में जब मेघनाथ ने हनुमान जी को बंदी बनाकर पेश किया, तो सबको लगा कि वानर डरा हुआ होगा। लेकिन रावण के अहंकार के सामने हनुमान जी ने जो गर्जना की, उसने लंका की नींव हिला दी।
बंदी होकर भी हनुमान जी की वह शेर जैसी दहाड़ आज के हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है। क्या है रावण के दरबार का वह रहस्य? पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए आज की कथा का सार।
📌 इस शॉर्ट्स के मुख्य भाव:
हनुमान जी की निर्भीकता।
अहंकार बनाम आत्म-समर्पण का द्वंद्व।
आधुनिक जीवन में 'हनुमान' जैसा निस्वार्थ मित्र।
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manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
आज के भागदौड़ भरे युग में, 'सुग्रीव' सिर्फ रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आसपास का एक 'ट्रेंड' बन चुका है। आप कहेंगे, वह कैसे? अरे, वो दोस्त जिसे जरूरत के वक्त हम याद आते हैं, जिसके लिए हम अपनी जान लगा देते हैं, लेकिन काम निकलते ही वो हमें 'अनफॉलो' कर देता है या फोन उठाना बंद कर देता है।
रामायण के इस प्रसंग को देखिए—सुग्रीव राजा बने, राज-पाट मिला, लक्ष्मी बढ़ी, तो वो अपने परम मित्र श्रीराम का वादा भूलकर सुख-भोग में लीन हो गए। ठीक वैसे ही, जैसे आज लोग सफलता की सीढ़ी चढ़ते ही अपने पुराने साथियों को पहचानना बंद कर देते हैं।
मिला जो पद तो भूल गया एहसान,
वादे की मिट्टी में दबा दिया ईमान।
सुख सागर में डूबा बैठा है इन्सान,
अपनों के ही दिल के काट दिए अरमान।
तब श्रीराम ने लक्ष्मण को भेजा—आज का वो 'स्ट्रेट-फॉरवर्ड' और अनुशासन प्रिय दोस्त जो घुमा-फिरा कर बात नहीं करता। लक्ष्मण का क्रोध देख किष्किंधा के वानर कांप उठे, क्योंकि जो मित्र उपकार भूलकर अपना वचन तोड़ता है, वह संसार में सबसे नीच माना जाता है। यह गुस्सा आज के उस कड़क बॉस या मित्र जैसा है जो गलती होने पर सीधे आईना दिखा देता है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब हनुमान जी—एक चतुर 'मैनेजमेंट गुरु'—मैदान में उतरते हैं。 उन्होंने लक्ष्मण के क्रोध को समझा, स्थिति की गंभीरता को पहचाना और सुग्रीव को संभलने का मौका दिया। उन्होंने रिश्तों को टूटने से बचा लिया।
अहंकार की ओट में न छिपना मेरे यार,
वादे के पक्के बनो यही है जीवन का सार।
क्रोध की आग में जल सब कुछ खो न देना,
विवेक छाया के सहारे सच्चा प्यार पा लेना।
इस कहानी से शिक्षा एकदम स्पष्ट है—आज के 'सुग्रीव' मत बनिए जो स्वार्थ के लिए वादे तोड़ देते हैं। और अगर आप किसी से नाराज हैं, तो लक्ष्मण जैसा क्रोध तो रखें, लेकिन अंत में हनुमान जैसा विवेक अपनाएं ताकि रिश्ता सुधरे, न कि खत्म हो जाए।
क्या आपको लगता है कि आज के 'कॉर्पोरेट' और 'सोशल' कल्चर में हनुमान जैसे 'मध्यस्थ' (Mediator) की कमी हो गई है, जिसकी वजह से हमारे रिश्ते इतनी जल्दी टूट रहे हैं?
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"सीता-खोज और किष्किंधा का कॉर्पोरेट ड्रामा"
भगवान श्री राम ने पिता की आज्ञा मानकर 'वर्क-फ्रॉम-फॉरेस्ट' (वनवास) चुना। तेरह साल तो सब ठीक चला, फिर आया 'मारीच' नामक एक 'डिजिटल स्कैमर', जो सोने के हिरण का जाल बिछाकर बैठा था। माता सीता ने उस पर भरोसा कर लिया और रावण ने 'सीता-हरन' का कांड कर दिया।
राम और लक्ष्मण जब उन्हें ढूँढते हुए ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे, तो सुग्रीव डर गया। उसे लगा कि ये 'बाली' द्वारा भेजे गए कोई नए 'कॉर्पोरेट जासूस' (गुप्तचर) हैं। सुग्रीव ने हनुमान जी को 'रिक्रूटमेंट इंटरव्यू' के लिए भेजा। हनुमान जी ने ब्राह्मण वेश धारण किया और वे राम-लक्ष्मण की सादगी और तेज देख कर नतमस्तक हो गए। फिर क्या था, राम और सुग्रीव की दोस्ती हुई—अग्नि को साक्षी मानकर। बाली का 'डाउनफॉल' हुआ, और सुग्रीव फिर से 'किष्किंधा कॉर्पोरेशन' का सीईओ बन गया।
आज के समाज में भी लोग 'मारिच' जैसे दिखावे पर फिदा होकर अपनी सुख-शांति लूटवा बैठते हैं। और सुग्रीव जैसे भाई आज के दौर में भी 'धोखा' और 'डर' के बीच जीते हैं।इस प्रसंग की यह कविता सुने,
"माया के इस जाल में, हर कोई मृग में खोया है,
जो अपना है असल धन, वो दुनिया में सोया है।।
'मानस' कहता जग देखों, सब खेल है ये भारी,।
रावण सा छल कपट मारीच, लिए है दुनिया सारी।"
"सुख में सब हाथ मिलाते, ऑफिस में सब यार हैं,
विपदा में जो साथ निभाए, वही असली परिवार है।
'मानस' की सीख समझ लो, दोस्ती राम जैसी हो,
स्वार्थ भरी बाज़ार बीच , भक्ति हनुमान जैसी हो।"
इस कथा से शिक्षा,चेतावनी (स्कैम से सावधान): मारीच का सोने का हिरण आज के 'ऑनलाइन लुभावने विज्ञापनों' जैसा है। जो चमकता है, वह हमेशा सच नहीं होता। अपने निर्णयों में संयम बरतें।सही सलाहकार का महत्व: हनुमान जी की भूमिका एक ऐसे 'मेंटर' की है, जो न केवल सही रास्ता दिखाता है बल्कि संकट में चट्टान की तरह खड़ा रहता है। आज के कॉर्पोरेट और पारिवारिक जीवन में हमें ऐसे ही भरोसेमंद सलाहकारों की जरूरत है।कर्म का सिद्धांत: बाली की मृत्यु के बाद हनुमान जी ने तारा को जो समझाया—कि यह शरीर पानी के बुलबुले जैसा है और कर्मों का फल ही सुख-दुख का कारण है—वह आज की 'डिप्रेशन' वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा मंत्र है। भाग-दौड़ भरी जिंदगी में 'शांत भाव' ही असली सफलता है।
निष्कर्ष: राम और सुग्रीव की मैत्री हमें सिखाती है कि यदि नीयत साफ हो और साथ में हनुमान जैसा समर्पित व्यक्तित्व हो, तो रावण जैसी बड़ी मुसीबत भी छोटी लगने लगती है।
वो चेतावनी: किसी भी सरकारी दस्तावेज या पहचान पत्र (जैसे [Aadhaar Redacted]) के लिए सलाह है कि अपने दस्तावेजों को सुरक्षित रखें और किसी भी अपरिचित 'मारीच' को अपनी निजी जानकारी न दें।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"कॉर्पोरेट किष्किंधा: और हनुमान जी "Corporate
किष्किंधा के 'राज्य लिमिटेड' में बाली बॉस था और सुग्रीव उसका छोटा भाई—बेचारा 'मैनेजर' स्तर का कर्मचारी। बाली को लगा कि सुग्रीव उसके प्रमोशन पर नज़र गड़ाए बैठा है।
एक दिन एक 'मायावी' नाम का कॉम्पिटिटर आया। बाली उसे मारने गुफा में गया और सुग्रीव को बाहर 'गार्ड' की तरह खड़ा कर दिया। सुग्रीव ने वहाँ से खून की धारा देखी तो सोचा, "अब तो भाई गया, अब तो ऑफिस—मेरा!" उसने गुफा के बाहर भारी रॉक (चट्टान) लगा दी और खुद 'सीईओ' बन बैठा। जब बाली वापस आया और उसने देखा कि उसकी गद्दी पर सुग्रीव बैठा है, तो उसका बीपी (BP) बढ़ गया। फिर क्या था, बाली ने सुग्रीव का 'पीछा' शुरू किया।
सुग्रीव बेचारा हिमालय से लेकर समुद्र तक 'दौड़ प्रतियोगिता' में हिस्सा लेता रहा। तभी हनुमान जी ने एंट्री मारी, जो तब 'ऋष्यमूक कंसल्टेंसी' के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे। उन्होंने सुग्रीव को बताया, "भाई, टेंशन न लो, उस वाले इलाके में बाली की एंट्री 'बैंड' है (मुनि का शाप)।" और बस, सुग्रीव ने हनुमान जी के दम पर 'वर्क फ्रॉम होम' (पहाड़ पर रहना) शुरू कर दिया।
आजकल के भाई-बंधुओं का यही हाल है। जिसे आप सच्चा भाई /'सच्चा मित्र' समझते हैं, वह अक्सर 'ऑफिस शिफ्ट' होते ही बदल जाता है। हनुमान जी जैसे सखा मिलना आज के 'फेक' दोस्तों के जमाने में किसी चमत्कार से कम नहीं है। आइए इस कविता को सुने,
"भाई-भाई में चल रहा, 'कॉपोरेट' का युद्ध है,
गद्दी पाने की होड़ में, खत्म हुआ सब शुद्ध है।
'मानस' कहता है सुनो, सच्चे मित्र ही आधार हैं,
जो विपत्ति में न छोड़ें, वही असली परिवार हैं।"
"सुख में तो सब आते हैं, 'सेल्फी' लेकर जाते हैं,
दुख की घड़ी में 'ब्लॉक' कर, सबको भुलाते हैं।
'मानस' की सीख सुनो, हनुमान सा यार चुनिए,
मतलब के बाजार में, भरोसे का संसार चुनिए।"
इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि,
सच्चे मित्र की पहचान: हनुमान जी ने तब साथ निभाया जब सुग्रीव के पास न राज्य था, न सत्ता। आज के समय में भी जो मित्र आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा है, वही आपका 'हनुमान' है।
गलाकाट प्रतिस्पर्धा: बाली और सुग्रीव का झगड़ा इस बात का प्रतीक है कि बिना सही संवाद (Communication) के, रिश्ते कैसे 'रक्त-पिपासु' बन जाते हैं। ऑफिस या परिवार में बैठकर बातें सुलझाना ही बेहतर है, बजाय पत्थर की दीवार खड़ी करने के।
विपत्ति में धैर्य: सुग्रीव का ऋष्यमूक पर्वत पर शांति से रहना सिखाता है कि जब चारों तरफ दुश्मन हों, तब भागने के बजाय किसी सुरक्षित जगह (पॉजिटिव माहौल) में रहकर अपनी ताकत इकट्ठा करनी चाहिए।
आज की कॉर्पोरेट राजनीति और पारिवारिक कलह का सार यही है—अहंकार छोड़ो और हनुमान जी जैसी निस्वार्थ सेवा का भाव रखो!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
सेवा का सेतु: मानस की दृष्टि
प्राचीन काल की वह बेला थी, जब साक्षात ईश्वर ने लीला करने हेतु नर रूप धारण किया। अवध की गलियों में एक ओर जहाँ बाल-राम की मधुर मुस्कान गूँजती थी, वहीं दूसरी ओर स्वयं महादेव ने मदारी का वेश धरा और अपने साथ एक अत्यंत सुंदर बंदर लिए राजद्वार पर आए। यह प्रेम केवल उन दो रूपों का मिलन नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि ईश्वर और भक्त का रिश्ता कितना अटूट हो सकता है।
सेवा को अपना कर ,मिटा दो, तुम सब की दूरी,
प्रेम भाव की यह साधना, कर देगी सब पूरी।
भक्त हृदय में बसते प्रभु, जिनके गुण हैं सार,
परहित करने वाले मानस, पाते भव से पार।
जब प्रभु श्री राम ने मदारी के उस बंदर को देखा, तो वे उस पर मुग्ध हो गए और उसे पाने की जिद करने लगे। चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र की इच्छा पूर्ण हुई और मदारी ने वह बंदर प्रभु को समर्पित कर दिया। यह समर्पण ही वह आधार है, जिस पर समाज के सुधार की नींव रखी जा सकती है। आज के आधुनिक परिवेश में भी यदि हम अपनी अहंता का त्याग कर, सेवा के लिए स्वयं को अर्पित कर दें, तो समाज का कायाकल्प निश्चित है।
सबको अपना बना लो साथी, प्रेम की डोर बनाओ,
सकल जगत के दुखों को , हँसकर तुम मिटाओ।
इस पावन बंधन में बंधकर, मिट जाए सब भ्रम,
प्रभु की कृपा मिलेगी मानस, होगा दूर सब गम।
हनुमान जी ने प्रभु के साथ रहकर उनका सानिध्य प्राप्त किया, वे उनके साथ खेलते और उनकी आज्ञा का पालन अत्यंत प्रसन्नता से करते। किंतु समय का चक्र आगे बढ़ा, और महर्षि विश्वामित्र के आगमन पर प्रभु ने हनुमान को एक महान कार्य के लिए चुना। उन्होंने कहा कि लंकाधिपति रावण की अनीति से पृथ्वी विकल है और धर्म की स्थापना हेतु सुग्रीव से मैत्री करना अब परम आवश्यक है।
त्याग और सेवा का यह पथ, तुम सदा सँवारो,
मानवता की सेवा करके, खुशियाँ तुम पसारो।
धर्म जगत में सबसे बड़ा, है परहित का ध्यान,
सेवा ही मानस है प्रभु का, सबसे ऊँचा गान।
हनुमान जी प्रभु से पृथक नहीं होना चाहते थे, किंतु प्रभु की आज्ञा ही उनके लिए सर्वोपरि कर्तव्य था। वे अपने आराध्य को प्रणाम कर, उनके मधुर नामों का जप करते हुए ऋष्यमूक पर्वत के लिए प्रस्थान कर गए। यह कथा हमें सिखाती है कि सेवा का अर्थ सदैव साथ रहना नहीं, बल्कि प्रभु के कार्य को पूर्ण करने के लिए दूर रहकर भी उनके विचारों को जीवंत रखना है। यही वह सेतु है जो आज के व्यक्ति को समाज सुधारक बनाता है।
अंत समय में याद रहे , हमने क्या उपकार किया,
मानवता की सेवा का, हमने तो श्रृंगार किया।
कठिन डगर चलकर देखो, कर्म ही भाग्य जगाते हैं,
परहित जो कर जाते मानस, वे ही जन कहलाते हैं।
यह कथा एक ऐसी अखंड धारा है, जो यह सिखाती है कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग सेवा के सेतु से होकर गुजरता है। जब हम अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को एक 'लीला' समझकर परोपकार में लगाते हैं, तो हम स्वयं उस 'राम-हनुमान' के प्रेम के सहभागी बन जाते हैं।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
माँ, मोबाइल छोड़ो, हनुमान बनाओ!
भक्तों, आज हम एक ऐसी माला गूँथेंगे, जो न केवल मनोरंजन करेगी, बल्कि हृदय के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश भी देगी। आँखें मूँदिए और मन के आसन पर बिठा लीजिए उस अद्भुत बालक को, जिसके एक हाथ में भक्ति की गदा है और दूसरे में संस्कारों का शास्त्र है!
माता अंजना धन्य थीं! वे जानती थीं कि बच्चा कोई खिलौना नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है। वे बालक हनुमान को रोज पुराणों की कथाएँ सुनातीं। हनुमान जी का ध्यान ऐसा था जैसे 'वाई-फाई' का फुल सिग्नल हो। वे माँ को झकझोर कर पूछते— "माँ! आगे क्या हुआ? क्या रावण का अंत हुआ? मुझे जल्दी बता, नहीं तो मैं अभी लंका फूँक दूँगा!" आज की माताएँ बच्चा रोए तो हाथ में 'स्मार्टफोन' थमा देती हैं। बच्चा खाना न खाए तो 'कार्टून' दिखा देती हैं
माँ कहती है 'बेटा सो जा', बच्चा कहता 'अभी नहीं',
मैं हूँ 'पवन-पुत्र' मैया, मुझे सुलाने का दम नहीं!
गैजेट्स की इस दुनिया में, सब 'नेट-स्लो' हो गए,
माँ के उन संस्कारों से, हम कितने दूर हो गए!
माता अंजना जानती थीं कि बच्चे का मन एक 'कोरी स्लेट' है। रात के सन्नाटे में पुराणों की कथाएँ सुनाना, उस युग का 'हार्ड डिस्क अपडेट' था।
आज की स्थिति: आज का बच्चा पूछता है— "माँ, अगला लेवल (Level) क्या है?" जबकि हनुमान जी पूछते थे— "माँ, आगे क्या हुआ?"
स्क्रीन की चकाचौंध में, खो गया वो बचपन प्यारा,
माँ के हाथों से छूट गया, वो संस्कार का किनारा।
डिजीटल युग का नशा है, माँ ज़रा होश में आना,
बच्चों के कोमल मन में, रामायण तुम बसाना!
हनुमान जी रात को शैया से कूद पड़ते और अपनी नन्ही भुजाएँ फुलाकर कहते— "माँ, देख मेरी मसल्स! रावण आएगा तो मैं उसे पीस कर रख दूँगा!" आज के बच्चे जिम जाकर प्रोटीन शेक पीते हैं, जबकि हनुमान जी माँ की गोद में सोकर ब्रह्मांडीय शक्ति पाते थे। यह स्पष्ट करता है कि असली बल संस्कारों के आलिंगन में है।
हनुमान जी प्रभु श्री राम के ध्यान में इतने तल्लीन थे कि उन्हें भूख-प्यास की सुध ही नहीं रहती थी। माता अंजना को वन-वन उन्हें ढूँढना पड़ता था। आज की माँ अगर बच्चे को ढूँढने निकले, तो बच्चा 'सोशल मीडिया' की गुफा में फँसा मिलेगा।
वन-पर्वत में ढूँढती माता, अपने लाल का चेहरा,
आज की माँ ढूँढ रही है, फोन में बच्चा ठहरा।
माँ की ममता का आंचल, अब मोबाइल में खो रहा,
संस्कारों का बीज यहाँ, अज्ञानता में सो रहा।
मानस कहे, सुनो हे माताओं, चेतना को जगाओ,
मोबाइल की गुलामी छोड़, बच्चों को 'वीर' बनाओ!
हम इस कहानी से यह जान ले कि पहली बात माँ ही पहली गूगल (Google) है: बच्चा गूगल से पूछने के बजाय माँ से सीखे, उसे अपना पहला गुरु बनाए।
दूसरी बात एकाग्रता का मंत्र बच्चों को दे : हनुमान जी अगर आज की 'रील्स' देखते तो रावण कभी न मरता। फोकस कीजिए।
तीसरी बात हम बच्चों के अंदर संस्कार का निवेश करें: माता अंजना का निवेश ही आज पूरी दुनिया में 'जय श्री राम' के रूप में गूँज रहा है।
भवन तो खड़ा कर लोगे तुम, पर नींव न बना पाओगे,
जो छूट गए संस्कार यहाँ, तो खाली हाथ रह जाओगे।
चाहती हो कि बच्चा हो, भविष्य का 'संकटमोचन' वीर,
तो गैजेट्स के मायाजाल से, मुक्त करो उसकी तकदीर।
मोबाइल की इस लत से तुम, उसे दूर अभी ले जाओ,
रामायण की मंगल गाथा, प्रेम से उसे रोज सुनाओ।
'मानस' कहे हे माताओं, बस इतना सा संकल्प ठानो,
बचाओ मोबाइल-स्क्रीन से लाल , मानस कहा मानो!बोलिए पवन पुत्र हनुमान महाराज की जय! माता अंजना की जय!
शिक्षा का सार अहंकार का त्याग
एक बार माता अंजना और वानरराज केसरी अपने पुत्र हनुमान की मेधावी स्थिति देखकर चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि यद्यपि हनुमान में अपार बल और दैवीय शक्तियाँ हैं, फिर भी एक महापुरुष को समाज की मर्यादा बनाए रखने के लिए गुरु के पास जाकर विद्या ग्रहण करनी चाहिए।
माता ने उन्हें सूर्यदेव को अपना गुरु बनाने का सुझाव दिया। हनुमानजी ब्रह्मचारी वेष धारण कर सूर्यदेव के पास पहुँचे। सूर्यदेव ने पहले तो अपनी व्यस्तता का बहाना बनाया—"अरे भाई! मेरा रथ तो रुकता ही नहीं, मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा कैसे?" लेकिन हनुमानजी कहाँ रुकने वाले थे! उन्होंने विनम्रता से कहा, "प्रभु, आप रथ चलाइए, मैं आपके सामने चलते हुए पढ़ता रहूँगा।" सूर्यदेव उनके संकल्प और श्रद्धा से इतने प्रभावित हुए कि कुछ ही दिनों में उन्होंने हनुमानजी को समस्त विद्याओं में पारंगत कर दिया। अंत में, गुरुदक्षिणा में हनुमानजी ने सुग्रीव की रक्षा का वचन दिया और अपने माता-पिता के पास लौट आए।
इस कथा से हमें जीवन जीने की कला सीखने को मिलती है:
विनम्रता ही असली शक्ति है: आज के दौर में जब लोग थोड़े से ज्ञान के बाद 'अहं' में भर जाते हैं, हनुमानजी सिखाते हैं कि महापुरुष होने के बाद भी झुकने में ही बड़प्पन है।
सीखने की कोई उम्र या परिस्थिति नहीं होती: सूर्यदेव का रथ कभी नहीं रुकता था, फिर भी हनुमानजी ने रास्ता निकाल लिया। आज के बच्चों को बहाने छोड़कर लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए।
माता-पिता की भूमिका: जिस प्रकार माता-पिता ने हनुमानजी को संस्कार देकर सही दिशा दिखाई, वैसे ही माता-पिता को आज के बच्चों को डिग्रियों के साथ-साथ 'मर्यादा' और 'सेवा' का पाठ भी पढ़ाना चाहिए।
मानस की कलम से:
"डिग्री के इस दौर में, संस्कार खो रहे सब यार,
रटते हैं जो किताबी बातें, भूलें गुरु का प्यार।
'मानस' कहता है सुन लो, विद्या वही महान है,
अहंकार छोड़ जो झुके, वही असली हनुमान है।"
"अहंकार की छाया छोड़, तू गुरु चरण में आ रे,
विद्या का यह दीप जलाकर, जग में मान बढ़ा रे।
मानस कहता, शक्ति वही है, जो सेवा में झुकती है,
मर्यादा पथ पर ही, किस्मत सब की रुकती है।
विनम्रता की चादर ओढ़, तू अंबर को छू ले,
गुरु वचनों को अपनाकर, तू जीवन अर्थ खोल ले।"
क्या आपको लगता है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में हम 'हनुमान' जैसी विनम्रता को वापस ला सकते हैं?
।।हनुमानजी का संदेश रावण समझ नहीं पाया।।
"रावण, जिसके पास तीनों लोकों का मैनेजमेंट का 'विज़न' था, वह आखिर एक वानर के उन तीन शब्दों का रहस्य क्यों न समझ सका, जो उसके साम्राज्य के पतन का 'फाइल क्लोजर' बन गए?"
ॐ अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥
भक्तों जय श्री राम,लंका का दरबार लगा है। रावण अपने स्वर्ण सिंहासन पर 'सीईओ' की तरह अकड़ कर बैठा है। सामने हनुमान जी खड़े हैं, जिन्हें रावण के 'प्रोजेक्ट मैनेजर' (मेघनाद) ने पकड़ कर पेश किया है। रावण ने अपनी भारी आवाज में दहाड़ लगाई— "ओ वानर! तूने मेरी अशोक वाटिका का 'रिसोर्स' क्यों नष्ट किया? क्या तुझे पता नहीं कि यहाँ 'नो एंट्री' का बोर्ड लगा है?"
हनुमान जी ने एक ऐसी मुस्कान दी, मानो वे रावण को 'इंटरव्यू' दे रहे हों। उन्होंने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया:"खाएउँ प्रभु फल लागी भूखा।
कपि सुभाउ ते तोरें रूखा॥
सबके देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारगामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बांधेउ तनय तुम्हारे॥"
हनुमान जी ने व्यंग्य की ऐसी धार दिखाई कि रावण का 'ईगो' हिल गया। सुनते हैं:
सीईओ रावण! मैं तो बस लंच ब्रेक में लंच लेने आया ,
भूख लगी फल चखे, तुम्हारे गार्ड्स ने बवाल मचाया ।
मैंने नहीं छेड़ा किसी को, वे 'सेल्फ-डिफेंस'सिखाने आए
अपने प्राण बचाने को, मैंने उन्हें 'पैकेज' वापस थमाए ।।
तुम्हारे अनुचर 'कुमारगामी' हैं, अधर्म की राह पर चलते ,
बिना मीटिंग एजेंडा के, जो बिना बात के हाथ मलते हैं।।
तेरे पुत्र ने मुझे बंदी बनाया, पर मुझे कोई चिंता नहीं,
प्रभु का दूत हूँ, मुझे किसी 'सस्पेंशन' का भय नहीं।।
यहाँ हनुमान जी ने रावण के दरबार में तीन ऐसे 'पॉइंट्स' रखे, जो रावण की समझ के बाहर थे:
पहला 'कुमारगामी' का तंज: रावण को लगा हनुमान ने उसके राक्षसों को मारा है। पर हनुमान जी ने तो रावण के पूरे 'सिस्टम' पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने रावण को बताया कि— "जो तुम्हारे सैनिक 'कुमारगामी' (अधर्मी) होकर बिना कारण हमला कर रहे हैं, उनका पतन तो तुम्हारे लीडरशिप फेलियर का सबूत है!"
दूसरा दूत का 'कॉर्पोरेट' आत्मविश्वास: हनुमान जी ने स्पष्ट कर दिया कि "भले ही मेघनाद ने मुझे बाँध दिया हो, पर मैं बंदी नहीं हूँ। मैं तो यहाँ तुम्हारे दरबार में 'ऑडिट' करने आया हूँ कि तुम्हारा अहंकार किस स्तर तक पहुँच गया है।" रावण यह समझ ही नहीं पाया कि वह जिसे बंदी समझ रहा था, वह दरअसल उसके विनाश की 'रिपोर्ट' तैयार कर रहा था।
तीसरा मालिक का भेद: रावण खुद को 'स्वामी' कहता था, पर हनुमान जी का सारा ध्यान तो अपने असली 'मालिक' (श्री राम) के मिशन पर था। रावण यह देख ही नहीं पाया कि जिसके सामने वह खड़ा है, वह दुनिया की बेड़ियों से मुक्त है।
भक्तजनों! रावण का 'मैनेजमेंट' फेल हो गया क्योंकि वह अपने अनुचरों की 'कुमारगामी' हरकतों को अपना 'पराक्रम' समझ बैठा। जब कोई व्यक्ति अहंकार के चश्मे से दुनिया को देखता है, तो उसे हनुमान जी के सरल वचन भी 'अपमान' लगते हैं।
हनुमान जी ने यहाँ जो किया, वह केवल युद्ध नहीं था, वह रावण को यह चेतावनी थी कि— "अपनी टीम के अधर्म को देखो, अन्यथा विनाश निश्चित है।" जो अहंकारी होता है, उसे ये बातें समझ में नहीं आतीं, और जो विवेकी होता है, वह हनुमान जी के 'व्यंग्य' में भी सत्य की सुगंध ढूंढ लेता है।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. भाई का संबंध पावन
भाई का संबंध पावन, प्यार की सरिता बहा,
मुश्किलों में ढाल बन, जो खड़ा रहता यहाँ।
मान-मर्यादा निभाना, सीख हमने ली वहीं,
भाई जैसा और कोई, प्यारा इस जग में नहीं॥
2. बचपन की यादें और भाई का नाम
बचपन के खेल सारे, याद आते आज हैं,
भाई का ही नाम मेरे, गीत का ही साज़ है।
मानस ये चर्चा करे, प्रेम की इस धार की,
भ्रातृ-भक्ति से बड़ी है, भेंट कोई प्यार की॥
3. संकटों में साथ और अटूट नाता
संकटों के काल में भी, साथ अपना है प्रखर,
एक दूजे की खुशी में, देखते अपना घर।
स्वर्ण सा ये नाता अपना, भूलना न ये कभी,
भाई का वरदान पाकर, तृप्त है मानस सभी॥
4. स्मृतियों की माला
सावन की घटा सी, भाई की याद छाई है।
जैसे चकोर को, याद मयंक की परछाई है॥
अंगना की धूल में, वो साथ साथ खेलना है,
स्मृतियों की माला में, पिरोई वो बेल है।
5. भाई की शक्ति और आधार
हो खड़ा सामने, चाहे जो भी संकट हो।
भाई की भुजाओं में, शक्ति का वो संपुट हो॥
ढाल सा जो साथ दे, तलवार सा जो वार हो,
रिश्तों की रणभूमि में, भाई ही तो आधार हो।
6. उम्मीद की लौ
जब थकी-हारी राहें, साथ न दें कभी,
भाई की आँखों में, उम्मीद की लौ दिखे तभी।
मौन की ये भाषा, शब्दों से बड़ी होती,
दुख के अंधेरों में, दीप सी खड़ी होती।
7. प्रेम की निर्मल धार
जैसे चन्दन की सुगन्ध, और शीतल मंद बयार,
भाई का ये प्रेम, जैसे नदी की निर्मल धार।
पावन है ये संगम, न अंत इसका कोई छोर,
मानस के मन में गूँजे, बस भाई का ही शोर।
8. भैया की मुस्कान और साथ
भैया की मुस्कान सुहानी, जैसे भोर की लाली है।
दुख की घड़ी में साथ खड़ा, जो ढाल बड़ी मतवाली है॥
हँसी-ठिठोली के संग में, बीतें पल अनमोल यहाँ।
भाई का जो साथ मिला, तो सब कुछ है अनमोल जहाँ॥
9. धीरज और खुशियाँ
राह कठिन हो, बाधा भारी, तब भी धीरज देता है।
अपनी पीड़ा को भुलाकर, खुशियाँ मुझको लेता है॥
शब्द नहीं हैं, भाव बड़े हैं, मौन में सब कह जाता है।
भाई का विश्वास सदा, मन में हिम्मत भर जाता है॥
10. युगों-युगों का बंधन
रक्त का नाता, मन का नाता, युगों-युगों का बंधन है।
भाई का यह पावन साया, सबसे ऊँचा चंदन है॥
दुनिया की इस भीड़ में मुझको, एक सहारा मिलता है।
भाई का प्रेम पाकर ही, मन का पुष्प खिलता है॥
11. बचपन की परछाई
बचपन की वो खट्टी-मीठी, यादों की परछाई है।
आज भी दिल के कोने में, भाई की ही पुरवाई है॥
साथ चलेंगे, साथ रहेंगे, यही हमारा सपना है।
इस जग में तो भाई ही, सबसे अपना-अपना है॥
12. उम्मीदों का साया
अंधेरी रात हो गहरी, न कोई राह दिखता हो,
तभी भाई का इक साया, उम्मीदों सा लिखता हो।
भरोसा ढाल बनता है, अड़चन सब मिट जाती हैं,
हृदय की धड़कनें मिलके, सुरों में गीत गाती हैं।
13. बचपन की बातें
वो कच्ची उम्र की बातें, वो मिट्टी में मचल जाना,
कभी लड़ना, कभी झगड़ना, फिर हँसते ही मिल जाना।
वही बचपन अभी ज़िंदा, हमारे मन के आंगन में,
अभी भी गूँजता है स्वर, पुराने उस ही सावन में।
14. प्रीति पावन
न कोई शर्त होती है, न कोई माँग होती है,
भाई की प्रीति पावन सी, सदा ही ख़ुश-मिज़ाज होती है।
नज़र जो देख ले अपना, तो सब कुछ अर्पण होता,
रिश्तों की इसी वीणा में, समर्पण का ही स्पंदन होता।
15. पर्वत सा सहारा
पर्वत सा खड़ा भाई, चट्टान सा सहारा है,
संसार की इस भीड़ में, बस वही प्राण-प्यारा है।
अगर गिर जाऊँ राहों में, तो हाथ थाम लेता है,
मेरे हर एक आंसू को, वो मुस्कान में ढाल देता है।
16. माथे पर हाथ का रखना
वो कच्ची उम्र की बातें, वो मिट्टी में मचल जाना,
वो भाई का मेरी खातिर, हर ज़िद को सफल बनाना।
आज भी याद आता है, वो माथे पर हाथ का रखना,
वो कठिन घड़ी में चुपके से, सब पीड़ा को खुद चखना।
17. सूनी राहें और आँगन
अब न वो हाथ मिलता है, न वो ममता भरी छाया,
बस रह गई है आँखों में, भाई की ही ये काया।
पर्वत सा खड़ा भाई, चट्टान सा सहारा था,
संसार की इस भीड़ में, बस वही प्राण-प्यारा था।
मैं लड़खड़ाया जब राहों में, उसने हाथ थामे थे,
मेरे हर एक आँसू को, वो अपनी मुस्कान में बाँधते थे।
आज सूनी है वो राहें, आज सूना वो आँगन है,
भाई की याद में जलता, आज मेरा सारा तन-मन है।
18. मौन की भाषा
न कोई शर्त थी अपनी, न कोई माँग थी बाकी,
भाई की प्रीति पावन थी, जो करती थी सदा राखी।
वो मौन की भाषा जो थी, अब कोलाहल बन गई है,
भाई की कमी आँखों में, एक सागर सी बन गई है।
19. लौट आने की उम्मीद
तुम लौट आओगे शायद, यही मन को बहलाते हैं,
हम आज भी हर कोने में, बस तुम्हें ही ढूंढते जाते हैं।
स्वर्ण सा नाता जोड़ा था, डोर विश्वास की भारी,
क्यों छोड़ गए तुम मुझे, ये विधाता की है लाचारी?
20. पिघलते शब्द
मानस की लेखनी रुकी, अब सुर भी नहीं निकलते,
भाई की याद में देखो, आज शब्द भी हैं पिघलते।
आँखों की नमी कहती, तुम सा न कोई दूजा था,
भाई के चरणों में ही, मेरी हर एक पूजा था।
21. हृदय के द्वार पर
हृदय के द्वार पर खड़ा, वह भाई मुस्कुराता है।
मेरे हर एक श्वास में, वो अपनापन जगाता है॥
न कोई याद पुरानी है, न कोई कल का साया है,
बस इसी पल में सिमटा, उसका प्रेम अगाध पाया है।
22. चट्टान सा सहारा
जब भी लहरें आती हैं, वो चट्टान बन जाता है।
मेरे काँपते हाथों को, तुरंत थाम ले जाता है॥
डर का नाम नहीं यहाँ, बस उसका साथ है बाकी,
वो देता हिम्मत हरदम, वो मेरी ढाल है राखी॥
23. मौन की बातें
शब्दों की ज़रूरत नहीं, न कोई तर्क होता है।
बस आँखों के इशारे से, सब कुछ तय होता है॥
वह अभी देख रहा मुझको, मैं उसे देख लेता हूँ,
बिन बोले ही मन की बातें, सब भेद झेल लेता हूँ॥
24. रूह में गाता
न कहीं खोया है वो, न कहीं दूर वो जाता है।
वो यहीं मेरे पास है, वो मेरी रूह में गाता है॥
ये प्रेम का अटूट बंधन, सदा वर्तमान रहता है,
भाई की धड़कन ही तो, मेरा मान-सम्मान रहता है॥
25. जीवन का विस्तार
मेरी हर एक मुस्कान में, उसका ही तो विस्तार है।
वह जो मेरे लिए खड़ा, वही तो मेरा संसार है॥
जब थकता हूँ मैं राहों में, वो छाँव बनके आता है,
मेरे माथे की हर शिकन को, वो अपने हाथों से मिटाता है।
26. जीवन की परछाई
क्या लिखूँ मैं भाई के बारे, वो तो मेरी ही परछाई है,
उसके बिन तो इस जीवन में, बस एक वीरान तन्हाई है।
वो चुपके से जो देखता, मेरी हर एक जरूरत को,
वो पढ़ लेता है आँखों में, मेरी हर एक सूरत को।
27. पीड़ा का हरण
जब भी मैं उदास होता हूँ, वो पास मेरे बैठ जाता है,
बिना कहे ही मेरी पीड़ा, वो अपने हृदय से लगाता है।
वो आँसू जो गिरते नहीं, वो उसकी ममता में घुल जाते हैं,
भाई के इस प्रेम के आगे, सारे दुख-दर्द भी झुक जाते हैं।
28. निस्वार्थ प्रेम
वो जो मेरी धड़कन में है, वो जो मेरी हर साँस में है,
भाई का वो निस्वार्थ प्रेम, जो मेरे हर विश्वास में है।
दूरी का कोई बोध नहीं, वो पल-पल मेरे साथ खड़ा,
मुश्किल की इस कठिन घड़ी में, वो मेरा होकर ही पड़ा।
29. अस्तित्व का खिलना
उसके होने की गरिमा से, मेरा अस्तित्व आज खिलता है,
ऐसा पावन प्रेम मुझे, बस भाई की ही गोद में मिलता है।
यदि बह पड़ें ये आँखें मेरी, तो वो अपना आँचल बिछा देता है,
मेरे गिरे हुए हर सपने को, वो फिर से सच बना देता है।
30. साक्षात ईश्वर
न कोई स्वार्थ, न कोई माया, बस एक अटूट नाता है,
भाई के इस पावन प्रेम में, मुझे साक्षात ईश्वर पाता है।
वो आज भी वहीं खड़ा है, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये जो प्रेम है भाई, मेरे जीवन के हर नाम में है।
31. दीपक सा जलता
मेरा साया बनकर भाई, संग-संग जो चलता है।
मेरे मन के हर कोने में, वो दीपक सा जलता है॥
जब भी कोई कष्ट हो मुझ पर, वो खुद ही सह लेता है,
मेरे हिस्से के सारे आँसू, वो अपने में बह लेता है॥
32. अजीब सा बंधन
वो चुपके से जो देखता है, मेरी हर इक थाह को।
वो मिटा देता है पल भर में, मेरी हर इक राह को॥
अजीब सा ये बंधन भाई, न कोई तर्क न कोई बात है,
बस उसके साथ होने से ही, ये जीवन भर प्रभात है॥
33. आईने में परछाई
वो जो देखता हूँ मैं आईने में, वो मैं नहीं, वो भाई है।
वो मेरी हर इक धड़कन में, रची-बसी परछाई है॥
कभी जो मैं गिरता हूँ राहों में, तो वो हाथ बढ़ाता है,
मेरा हर इक दर्द वो भाई, अपनी मुस्कान में छुपाता है॥
34. प्रेम के आगे हर गम फीका
आँखें मेरी नम होती हैं, जब वो मुझे गले लगाता है,
भाई के इस प्रेम के आगे, हर गम फीका पड़ जाता है॥
न कोई अंत है इस प्रेम का, न कोई छोर यहाँ,
भाई के सिवा मुझे, दिखता नहीं कोई और यहाँ॥
35. निस्वार्थ प्रेम का काम
वो आज भी पास है मेरे, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये निस्वार्थ प्रेम ही, मेरे जीवन के काम में है॥
मेरा साया बनकर भाई, संग-संग जो चलता है।
मेरे मन के हर कोने में, वो दीपक सा जलता है॥
36. कष्टों का हरण
जब भी कोई कष्ट हो मुझ पर, वो खुद ही सह लेता है,
मेरे हिस्से के सारे आँसू, वो अपने में बह लेता है॥
वो चुपके से जो देखता है, मेरी हर इक थाह को।
वो मिटा देता है पल भर में, मेरी हर इक राह को॥
37. जीवन का प्रभात
अजीब सा ये बंधन भाई, न कोई तर्क न कोई बात है,
बस उसके साथ होने से ही, ये जीवन भर प्रभात है॥
वो जो देखता हूँ मैं आईने में, वो मैं नहीं, वो भाई है।
वो मेरी हर इक धड़कन में, रची-बसी परछाई है॥
38. दर्द छुपाता मुस्कान में
कभी जो मैं गिरता हूँ राहों में, तो वो हाथ बढ़ाता है,
मेरा हर इक दर्द वो भाई, अपनी मुस्कान में छुपाता है॥
आँखें मेरी नम होती हैं, जब वो मुझे गले लगाता है,
भाई के इस प्रेम के आगे, हर गम फीका पड़ जाता है॥
39. प्रेम का अंतहीन छोर
न कोई अंत है इस प्रेम का, न कोई छोर यहाँ,
भाई के सिवा मुझे, दिखता नहीं कोई और यहाँ॥
वो आज भी पास है मेरे, वो आज भी हाथ थामे है,
उसका ये निस्वार्थ प्रेम ही, मेरे जीवन के काम में है॥
40. जीवन का टुकड़ा
मेरे भीतर का दर्पण, भाई का ही मुखड़ा है।
उसके ही विश्वासों पर, यह जीवन का टुकड़ा है॥
जब भी राहें धुंधली हों, वो दीपक बन जाता है,
मेरे उजड़े सपनों में, वो रंग नया भर जाता है॥
41. ममता की कहानी
वो चुपके से जो सुनता है, मेरे दिल की धड़कन को।
वो अपने आँचल में भरता, मेरे हर इक नंदन को॥
न कोई मोल चुकाना है, न कोई शर्त पुरानी है,
भाई की ये ममता ही तो, जीवन की कहानी है॥
42. अनमोल रत्न
सावन की पहली बूंदों सा, शीतल उसका साया है।
मैंने इस अनमोल रत्न को, भाई के रूप में पाया है॥
वो दर्द नहीं होने देता, वो राह नहीं रुकने देता,
मेरे माथे की चिंता को, वो अपने सर पर झुकने देता॥
43. निडर होकर बढ़ना
वो मूक भाषा में कहता, तू बस आगे बढ़ता जा।
मेरे प्रेम के इस बंधन में, तू निडर होकर चढ़ता जा॥
दुनिया की सब माया फीकी, उसके एक इशारे पर,
मैं जी लेता हूँ सदियाँ, बस उसके प्रेम के सहारे पर॥
44. झील सी गहरी आँखें
आँखें उसकी झील सी गहरी, जिसमें प्यार ही बहता है।
वो बिना कहे ही सचमुच, मन की हर बात कहता है॥
वो पास खड़ा है हर पल, ये अहसास ही काफी है,
उसका निस्वार्थ प्रेम ही, मेरी खुशियों की माफी है॥
45. कल्पवृक्ष का साया
जब दुनिया के शोर में मैं, खुद को खोने लगता हूँ।
भाई के स्पर्श से ही मैं, फिर से होने लगता हूँ॥
वो थामे हाथ खड़ा है, जैसे कल्पवृक्ष का साया,
उसने मेरी हर मुश्किल को, अपना ही रूप बनाया॥
46. अगाध समर्पण
शब्द नहीं हैं अर्थ नहीं, बस एक अगाध समर्पण है।
भाई के इन चरणों में ही, मेरा तन और मन अर्पण है॥
वो आँसू मेरी आँखों के, खुद ही पोंछ डालता है,
मेरे सारे अँधेरों को, वो अपनी ज्योति से पाल लेता है।
47. अंतिम सत्य
अंतिम सत्य यही है भाई, तू ही मेरा आधार अभी।
तेरे प्रेम की इस नगरी में, मैं हूँ एक संसार अभी॥
जो कल था वो आज भी है, और कल भी यही रहेगा,
भाई का ये पावन रिश्ता, युगों-युगों तक बहेगा॥
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
हनुमान वंदना
संकट-मोचन, महाबल-धाम,
राम चरण हैं ,जिनका विश्राम॥
जाने जहां, रामदूत महान,
मानस नायक, श्री हनुमान।।
लंका की राजसभा आज किसी रणक्षेत्र से कम नहीं थी। चारों ओर स्वर्ण के स्तंभों की चमक थी, लेकिन सभा का वातावरण भारी था। रावण अपने ऊँचे स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान था, जिसका अहंकार स्वयं काल को चुनौती देता आज दंग था। उसके सामने प्रभु श्री राम के दूत—श्रीहनुमानजी—खड़े थे ।
रावण ने अपनी आँखों में क्रूरता और ठसक भरते हुए कहा, "तुच्छ वानर! क्या तू जानता है कि मेरी प्रभुता के सामने देवता भी काँपते हैं? मेरी शक्ति के आगे तो प्रकृति ने भी अपने नियम बदल दिए हैं।"
हनुमान जी ने एक क्षण के लिए सभा में व्याप्त उस 'चापलूसी भरे सन्नाटे' को देखा, जहाँ रावण के मंत्री अपने राजा की झूठी प्रशंसा में मग्न थे। हनुमान जी ने रावण की आँखों में आँखें डालकर व्यंग्य का वह बाण छोड़ा, जिसने लंका की नींव हिला दी:
"जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥"
यह सुनते ही सभा में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। हनुमान जी ने रावण के उस 'अहंकार के आईने' को पूरी सभा के सामने रख दिया, जिसे वह वर्षों से अपनी 'दिग्विजय' की चादर के नीचे छिपाए बैठा था।
हनुमान जी ने शांत किंतु गूँजती हुई आवाज़ में कहा:
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई।।
"रावण! तुम अपनी भुजाओं का जो यह बखान कर रहे हो, तुझे वह नर्मदा का तट अच्छी तरह याद है न,जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई, वहां की तुम्हारी प्रभुताई मैं भी जानता हूं,जहाँ तुम शिव पूजा में लीन थे और सहस्रबाहु जलक्रीड़ा कर रहा था। उस दिन सहस्रबाहु ने अपनी हजार भुजाओं से जल का वेग रोक दिया था और तुम्हारी पूजा सामग्री ही नहीं, तुम्हारा सारा दंभ भी बहा ले गया था। उस समय तुम्हारी वह 'प्रभुता' कहाँ थी, जब सहस्रबाहु ने तुम्हें गदा के एक ही प्रहार से घायल कर अपनी हजार भुजाओं में किसी असहाय कीट की तरह जकड़ लिया था? भरी सभा में बताओ, क्या वह तुम्हारी 'प्रभुता' थी या तुम्हारा तमाशा?"
दरबारी स्तब्ध थे। रावण के चेहरे का तेज पल भर में फीका पड़ गया। हनुमान जी रुके नहीं, उन्होंने रावण के उस अहंकार पर अंतिम वार किया:
"जो रावण सहस्रबाहु की भुजाओं में छटपटाया, वह आज मेरे सामने अपनी प्रभुता का ढोंग कर रहा है? रावण, सत्य यह है कि तुम अपनी पुरानी पराजयों को अपनी ढाल बनाकर जी रहे हो, जबकि काल का चक्र तुम्हें हर कदम पर आईना दिखा रहा है।"
पूरी सभा में फुसफुसाहट शुरू हो गई।पर सब शांत थे
रावण का वह अहंकार, जिसे वह अपनी ढाल मानता था, हनुमान जी के शब्दों के आगे पानी-पानी हो गया था। यह रावण के व्यक्तित्व को रावण के अहंकार को सबसे बड़ा आईना था।
यहाँ हमें शिक्षा मिलती है कि जब आपकी सत्ता का आधार 'अहंकार' होता है, तो सत्य का एक छोटा सा प्रहार आपकी पूरी गरिमा को मिट्टी में मिला देता है।
आज के समाज में हम अपनी सफलताओं का जो 'बुलबुला' बनाकर घूमते हैं, वास्तविकता कभी न कभी उसे फोड़ ही देती है। रावण की तरह अहंकार में जीना केवल अपनी फजीहत को निमंत्रण देना है।
असली शक्ति बल या पद में नहीं, बल्कि 'विनम्रता' में है। हनुमान जी ने रावण को आईना दिखाया कि जिसे तुम अपनी 'प्रभुता' कहते हो, वह काल के चक्र के सामने मात्र एक 'व्यंग्य' है।
रावण मत बनिए। रावण का विनाश उसके सिरों के कारण नहीं, बल्कि उस एक 'अहंकार' के कारण हुआ जिसने उसकी बुद्धि हर ली थी। अपनी सीमाओं को पहचानें, सत्य को स्वीकार करें, यही आज के दौर की सबसे बड़ी शक्ति है।
सभी बोले सियावर राम चंद्र की जय ,पवनसुत हनुमान की जय जय जय सीताराम।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
रावण के दरबार में राम-तेज की हुंकार
"अञ्जनागर्भसम्भूतं कपीन्द्रं सचिवोत्तमम्।
रामदूतं महाप्राज्ञं हनुमान्ं नमाम्यहम्॥"
प्रिय राम भक्तों जय श्री राम,लंका का राजदरबार है, रावण अपने सिंहासन पर बैठा है, जैसे कोई पहाड़ अभिमान के बोझ से दबा हो। उस अहंकारी रावण ने जब हनुमान जी को देखा, तो वह दहाड़कर पूछ बैठा:
"कह लंकेश--------------- तोहि न प्राण के बाधा?"
रावण के इस अहंकारपूर्ण प्रश्न को सुनकर हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे रावण की आँखों में आँखें डालकर एक सिंह के समान गरज उठे और बोले:"जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥"
हनुमान जी ने रावण को आईना दिखाते हुए कहा—"हे रावण! तुम अपनी जिस शक्ति पर इतना गर्व कर रहे हो, वह व्यर्थ है। जिस प्रभु श्री राम के बल के मात्र एक 'लवलेश' (अति सूक्ष्म कण) से तुमने इस चराचर जगत को जीता है, मैं उन्हीं 'अतुलित बलशाली' श्री राम का दूत हूँ। तुमने उन्हीं की प्रिय पत्नी माता सीता का हरण किया है, और इसी महापाप के कारण अब तुम्हारा अंत निश्चित है।"यहाँ हनुमानजी ने रावण के दो प्रश्नों का उत्तर दे दिया,प्रथम कह लंकेस कवन तै कीसा का "जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। दूसरा केहिके बल घालेहु बन खीसा का तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।अगली चर्चा में हम आगे बात करेंगे। इसी बीच दरबार के एक कोने में खड़े शुक और सारण आपस में फुसफुसाए। शुक बोला—"भाई, इसे कहते हैं 'शेर के मुँह में जाकर दहाड़ना'! लंकापति ने तो इसे पूछा था कि तू कौन है, और यह वानर तो उन्हें उनका 'बायोडेटा' बता रहा है कि तुम जिस बल के नशे में चूर हो, वो भी तो उन्हीं के बल का एक अंश है!" सारण ने व्यंग्य से कहा—"चुप रह भाई, यह साधारण वानर नहीं, रावण की लंका की अंतिम घड़ी है!"
इस प्रसंग का निष्कर्ष यह है कि अहंकार सत्य को देखने नहीं देता। रावण अपनी बाहुबल की शक्ति पर गर्वित था, जबकि हनुमान जी ने स्पष्ट किया कि जिसे वह अपना बल समझ रहा है, वह वास्तव में परमात्मा के बल का एक अत्यंत तुच्छ अंश मात्र है। अहंकार मनुष्य को अंधा कर देता है, जिससे वह अपने ही विनाश को 'विजय' समझने की भूल कर बैठता है।इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि
विनम्रता ही असली बल है: हम अक्सर अपनी उपलब्धियों के गर्व में चूर होकर खुद को सर्वोपरि मान लेते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हमारे पास जो भी है, वह उस परम शक्ति की कृपा का एक छोटा सा अंश है।सत्य के लिए निर्भीकता: हनुमान जी ने रावण के दरबार में रहकर भी अपनी बात को पूरी निर्भीकता से कहा। आम आदमी को भी अपने जीवन में सत्य के मार्ग पर चलते हुए असत्य और अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए।
आंतरिक स्वतंत्रता: हनुमान जी का मन सदैव राम में स्थित था, इसीलिए वे रावण के दरबार में भी निडर थे। यदि व्यक्ति के मन में सत्य का वास हो, तो वह बाहरी चुनौतियों या दुखों के बंधन में भी आंतरिक रूप से मुक्त रहता है।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।