तृष्णा और स्रोत: जीवन का शाश्वत सत्य
gstshandilya.blogspot.com Ramcharimanas,Manas charcha,manascharcha,Hindi kavy shastra,alnkar,chhand,ras, synonyms etc. रामचरितमानस,मानस चर्चा,मानसचर्चा, हिन्दी काव्य शास्त्र,अलंकार,छंद,रस,पर्यायवाची,स्व रचना,कविता आदि,अन्य विषयों पर निज विचार।हनुमान कथा,कहानी,मानस की कहानियां,रस,छंद,अलंकार ,पर्यायवाची आदि प्रस्तुत ब्लोग की सभी रचनायें इस ब्लोग के लेखक के पक्ष मे सर्वाधिकार सुरक्षित है !
भूमिका: लोक-दर्पण
संसार एक अथाः सागर, जहाँ लहरें शोर मचाती हैं,
'मानस' इन लहरों में, इंसान की सूरत छिप जाती हैं।
खोजी आँखें, मन मंथन, तब जाकर ये मोती मिलते हैं,
अहंकार के बाज़ार में,जहाँ बस मुखौटे ही खिलते हैं।।1।।
ना यह कोई कोरी कल्पना, ना शब्दों का बस जाल है,
यह युग-युग का सत्य है जो, हर दौर में बदहाल है।
दर्पण देख खुद का चेहरा, कुछ सीख ले ऐ मुसाफिर,
'लोक-दर्पण' में छिपी है, तेरी और समाज की तकदीर।
न यहाँ किसी की स्तुति है, न व्यंग्य का कोई द्वेष है,
सत्य की इस काँच पर, बस मानव का ही परिवेश है।
पढ़ना इसे तुम ठहर कर, जब मन में कोई शोर न हो,
यह आईना सच बोलेगा, चाहे दिल में कोई भी होर न हो।
भजन और मनोरंजन
मुझे गुमान न था कि यह शहर इतना सुहावना होगा,
सड़क पर नृत्य होगा और कोठे पर भजन गूँजता होगा।
संवाद और दूरी
कभी पत्रों की स्याही में घरों के हाल-चाल मिलते थे,
आज स्क्रीन की रोशनी में, पास बैठे लोग ही नहीं मिलते।
सादगी और दिखावा
कभी सादगी के लिबास में इंसान की पहचान होती थी,
आज ब्रांड के नाम पर, फटे कपड़ों में ही शान होती है।
आस्था और बाज़ार
कभी मंदिरों की घंटी से सुबह का आगाज़ होता था,
आज लाउडस्पीकर के शोर में, ईश्वर का उपहास होता है।
रिश्ते और समय
कभी चारपाई पर बैठकर पूरा परिवार बतियाता था,
आज फ्लैट में, हर शख्स खुद को अकेला पाता है।।
डिजिटल मोह
अपनों से दूर होकर अब हम स्क्रीन पर जिए जाते हैं,
दो पल की झूठी ख़ुशी के लिए खुद को ही पिए जाते हैं।
दिखावे की संस्कृति
दिखावे की चमक-धमक ने चेहरे पर नकाब पहना दिया,
सच्चाई खो गई कहीं, झूठ को अपना खुदा बना लिया।
बौद्धिक पतन
किताबें अब धूल फांकती हैं, रील पर ज्ञान का शोर है,
समझ की कमी का देखिए कैसा ये अजीब सा दौर है।
आधुनिकता
मकान तो बन गए बड़े, पर दिलों में जगह कम हो गई,
रिश्तों की गर्माहट खोकर, हर रूह जहन्नुम हो गई। ।
वृद्धाश्रम की पीड़ा
मकान के हर कोने में अब अपनों का ही अकाल है,
बूढ़े माता-पिता का कमरा, एक खाली खयाल है।
अधूरी संवेदना
सबके पास वक्त है रील पर ठहाके लगाने का,
मगर फुर्सत नहीं है घर में माँ के आंसू मिटाने का।
बदलता नज़ारा
सड़क पर सज गया तमाशा, कोठे पर भजन का शोर है,
देखो, इंसानियत के नीलाम होने का कैसा ये दौर है।
दिखावे की भूख
भरे पेट की फोटो डालकर, हम अपनी भूख मिटाते हैं,
इंसान मर रहा है पास में, और स्टेटस पर मुस्कुराते हैं।
टूटा विश्वास
खतों की वो महक खो गई, अब टाइप किए हुए शब्द हैं,
रिश्तों की ऊष्मा मर गई, बस दिखावे के ये सब दर्द हैं।
खामोश घर
चार दीवारी के भीतर, अब अपनों का ही कोहराम है,
जीते जी हम मर चुके हैं, बस सांस लेने का ही काम है।
शिक्षा और संस्कार
पहले गुरु की दृष्टि से शिष्य का जीवन संवर जाता था,
आज डिग्रियाँ खरीदकर, संस्कार का गला घोंटा जाता है।
अतिथि सत्कार
पहले अतिथि के आने पर , द्वार भाव से खुलता था,
आज वाई-फाई का पासवर्ड पूछना ही, दम तोड़ता है।
आनंद का स्रोत
पहले आँगन की मिट्टी में बच्चों का बचपन खिलता था,
आज डिजिटल गेम के शोर में, उनका सुकून पिसता है।
लोक-मर्यादा
पहले बड़ों की खामोशी में बच्चों का अनुशासन होता था,
आज बच्चों की ज़िद के आगे, पूरे घर का पतन होता है।
पर्व और उत्सव
पहले त्यौहारों में अपनों का साथ ही सबसे बड़ी खुशी थी,
आज फोटो के फिल्टरों में, रूह अब पूरी तरह भूखी है।
सेवा और उपेक्षा
पहले बुढ़ापे की लाठी बेटा को माना जाता था,
आज बेटा वृद्धों, आश्रम का रास्ता दिखाता है।
शिक्षा और गुरु
गुरु के पास बैठकर कभी विद्या का मान होता था,
आज डिग्रियों की भीड़ में, चरित्र का अपमान होता है।
भोजन और प्रेम
हाथ की रोटियों में कभी माँ के प्यार का स्वाद था,
आज मशीनी थाली में, बस भूख का ही विवाद है।
खेले और मैदान
धूल भरे मैदानों में कभी बच्चों का मेला सजता था,
आज चारदीवारी के अंदर, बचपन अकेले ही लजता है।
त्यौहार और अपनापन
मिलकर होली-दीवाली में कभी घर का द्वार खिलता था,
आज अपनों की जगह , बस एक मैसेज मिलता है।
कहानियाँ और अनुभव
दादी की मीठी बातों में कभी पूरा संसार सिमटता था,
आज गूगल स्क्रीन पर, सच बस धुंधला सा दिखता है।
श्रम और सुख
पसीने की मेहनत में कभी नींद सुकून की आती थी,
आज एसी के कमरों में भी, बेचैनी ही चैन चुराती ।
रिश्तों की मर्यादा
बड़ों के सम्मान में कभी झुककर शीश नवाया जाता था,
आज तर्क अहंकार से, अपनों का मान गिराया जाता है।
आजीविका का ढंग
पसीने की कमाई में कभी बरकत का वास होता था,
आज कागजी माया के पीछे, चैन का उपहास होता है।
साझा चूल्हा
सबके मिल-बैठकर खाने में कभी प्यार का स्वाद था,
आज अलग-अलग थालियों में, अकेलेपन का विवाद है।
प्रकृति और जीवन
पेड़ों की शीतल छाया में कभी चैन से सोया जाता था,
आज कंक्रीट के जंगल में, सुकून कहीं खोया जाता है।
ज्ञान और विवेक
शब्दों की गहराई में कभी अर्थ का भंडार मिलता था,
आज सतही सूचनाओं में, ज्ञान का आधार हिलता है।
पड़ोस का नाता
दुख-सुख में पड़ोसी कभी अपना साया बनकर आता था,
आज दरवाजों के पीछे, इंसान खुद में सिमट जाता है।
आधुनिकता और अकेलापन
हजारों दोस्त जुड़े हैं, आज ऑनलाइन की इस भीड़ में,
अकेलापन छुपा है फिर भी, हर घर की तंग सी सीढ़ में।
सपनों की उड़ान
पंखों को हौसला देकर, कभी आसमान नापा करते थे,
आज कागजी कामयाबी में, खुद को ही मापा करते हैं।
समय की गति
घड़ी की टिक-टिक में , जिंदगी की धड़कन होती थी,
आज भागते वक्त की अंधी दौड़ में, रूह कहीं खोती है।
बदलता नजरिया
चेहरे के भावों में कभी, सच का आईना दिखता था,
आज फिल्टरों की माया में, झूठ भी सच सा बिकता है।
आजीविका का शोर
नाम कमाने की होड़ में, सुकून कहीं पीछे छूट गया,
दौड़ने के इस नए चलन में, अपनों का हाथ ही टूट गया।
शब्दों का मोल
कभी मौन में भी संवाद के गहरे अर्थ निकल आते थे,
आज कोलाहल भरे शब्दों में, जज्बात ही दम तोड़ जाते।
आधुनिकता और जड़ें
मिट्टी की सोंधी महक को आज कंक्रीट ने है दबाया,
'मानस' , भागते रहे और अपना ही घर पराया पाया।
डिजिटल दिखावा
झूठे फिल्टरों के पीछे, चेहरे अब ओझल होने लगे हैं,
'मानस' जो साथ थे, अब सोशल मीडिया पर रोने लगे हैं।
संवाद की मूकता
मौन में जो संवाद था, वो शब्दों में अब कहाँ मिलता है,
'मानस' मन ये सोचकर, आज हर अपना ही तड़पता है।
समय की मार
घड़ी की सुइयों के साथ, हमने अपनों को पीछे छोड़ा है,
'मानस' कलम पूछे, क्या हमने सुख का दाम ही तोड़ा है?
बदलती परम्परा
चौखट पर जो दीप जलते थे, अब मोबाइल की रौशनी में खोए हैं,
'मानस' दुखी है देख के, कि हम जागकर भी अब सोए हैं।
स्वार्थ और परोपकार
दूसरों की मदद में कभी निस्वार्थ भाव का रस होता था,
आज हर सेवा के पीछे, 'मानस' स्वार्थ का कस होता है।
जीवन की गति
रुककर कभी हम सांझ ढले, तारों को निहारा करते थे,
आज मशीनी दुनिया में, 'मानस' खुद को हारा करते है।
सांस्कृतिक विरासत
लोक-गीतों की थाप पर कभी पूरा गाँव झूम उठता था,
आज डीजे के शोर में, 'मानस' अपना ही संगीत उठता है।
आत्म-चिंतन
एकांत में बैठकर कभी खुद से बातें होती थीं,
आज भीड़ के कोलाहल में, 'मानस' यादें खोती हैं।
प्रकृति का प्रेम
आँगन के उस बरगद तले, हम शीतल छाँव पाते थे,
आज कृत्रिम रोशनी में, 'मानस' निज साया भूल जाते हैं।
त्याग की भावना
छोटा हिस्सा भी अपनों को देकर हम तृप्त हो जाते थे,
आज जहान पाकर 'मानस' और ज्वाला जल जाते हैं।
शिक्षा का बाज़ार
कभी ज्ञान की भूख में विद्यार्थी दर-दर फिरा करते थे,
आज डिग्रियों के नाम पर, 'मानस' बाज़ार सजे मिलते हैं।
परोपकार का रूप
कभी बिना कहे जो मदद को हाथ बढ़ाया करते थे,
आज कैमरे में, 'मानस' पुण्य भी बिकवाया करते हैं।
तर्क और विश्वास
कभी बड़ों की सलाह को अंतिम सत्य माना करते थे,
आज तर्क के तर्कों में, 'मानस' रिश्तों को नकारा करते हैं।
वृक्ष और मानव
कभी छाँव देने वाले पेड़ों को हम अपना पूज्य मानते थे,
आज कंक्रीट की ईंटों के लिए, हरियाली को हटाते हैं।
न्याय की भाषा
कभी पंचायत के फैसले में इंसान का विवेक बोलता था,
आज कागज़ी पेचीदगियों में, सत्य का गला घोंटता हैं।
आभार की अभिव्यक्ति
कभी मौन मुस्कान में ही हृदय का आभार व्यक्त होता था,
आज शब्दों के शोर में,'मानस' भाव ही उपेक्षित होता हैं।
स्वार्थ का बढ़ता दायरा
पराया दुःख अपना समझकर, कंधे पर ढोया जाता था,
'आज अपने ही स्वार्थ के पीछे, इंसान ही सोया जाता हैं।
आधुनिकता की अंधी दौड़
सुकून की तलाश में हम, नए रास्तों पर चलते रहे,
इस भाग-दौड़ में, हम अपनों से ही दूर चलते रहे।
कला का बदलता स्वरूप
गीत के सुरों में कभी, हृदय की पीड़ा छलकती थी,
' आज मशीन की धुन पर, रूह भी कहाँ पिघलती हैं।
नैतिकता की कसौटी
कभी वचन की कीमत पर, राज-पाट भी छोड़े जाते थे,
'आज मामूली फायदे के लिए, सारे नातें तोड़े जाते हैं।
प्रकृति का उपहास
मिट्टी की सोंधी खुशबू के लिए, खेतों की धूल फांकी थी,
आज एसी के कमरों में, हमने कैसी जिंदगी आँकी हैं।
नींद और मशीनी दौर
सिरहाने मोबाइल रखकर, रातों में हम जागते रहते हैं,
'सपनों की जगह अब नोटिफिकेशन में भागते रहते हैं।
बाज़ार का प्यार
बाज़ारों की चकाचौंध में, अब अहसास भी बिकने लगे हैं,
'मानस' की व्यथा, कि हम अपनों से ही दूर छिपने लगे हैं।
शहर की दौड़
मंजिल की धुन में हम, रास्तों का मज़ा भूल गए,
, इस भीड़-भाड़ में, हम खुद की ही तौल भूल गए।
शब्दों का संचय
चिट्ठियों के अल्फ़ाज़ों में, कभी रूह का वास होता था,
' संक्षिप्त शब्दों में, बस संवाद का उपहास होता है।
बदलते संस्कार
घर की दहलीज पर कभी, संस्कार का दीप जलता था,
आज फैशन की चकाचौंध, हर रस्म का दम निकलता है ।
इंटरनेट और इंसानियत
डिजिटल स्क्रीन के पीछे हम संवेदनाएँ भी भूल गए,
'मानस' की व्यथा, अब अपनों से ही हम दूर हो गए।
समय की रफ़्तार
घड़ी की सुइयों के साथ हमने सुकून को दांव लगाया है,
इस भाग-दौड़ में हमने अपना ही वजूद गँवाया है।
सांस्कृतिक खोखलापन
विदेशी चकाचौंध में हम अपनी जड़ें ही काट रहे हैं,
'मानस' , हम खुद ही अपना अस्तित्व बाँट रहे हैं।
बदलती मित्रता
मतलब के दौर में दोस्ती की परिभाषा बदल गई है,
'मानस' देखे, मित्रता बस जरूरत की सीढ़ी बन गई है।
पर्यावरण का तिरस्कार
ईंट-पत्थर के घरों के लिए हम कुदरत को उजाड़ते रहे,
'मानस' रोए, अपनी ही आने वाली नस्लों को मारते रहे।
दिखावे की राजनीति
झूठे वादों के मंच पर, आज सच का गला घोंटा जाता है,
'मानस' पूछे, क्या ईमान भी अब पैसों में तोला जाता है?
वृद्धावस्था और एकांत
कभी बुजुर्गों की कहानियों से पूरा घर महक जाता था,
'मानस' शांति के नाम पर हर बुज़ुर्ग अकेला रह जाता है।
स्मार्टफोन और नींद
आधी रात तक डिजिटल दुनिया में हम खोए रहते हैं,
'मानस' कहे, चैन की नींद अब किताबों में हम न पाते हैं।
व्यापार और ईमानदारी
कभी ज़ुबान की कीमत पर सौदे पूरे किए जाते थे,
मानस आज कानूनी कागज़ों में क्यों ईमान बिके जाते हैं?
यातायात और संयम
सड़क पर चलते हुए कभी एक-दूसरे को रास्ता देते थे,
'मानस'आज हर पल जल्दी में,हम आपस में ही लड़ते हैं।
पर्व और बाज़ार
कभी घर की बनी मिठाइयों में त्यौहार का असली नूर था,
'मानस' , आज डिब्बाबंद मिलावटों में सब कुछ बेनूर है।
फैशन और पहचान
कभी कपड़ों से सादगी और व्यक्तित्व झलकता था,
'मानस' , आज ब्रांड के पीछे, इंसान ही कहीं बदलता है।
सपनों का मोल
आधी रात को जागकर जो हमने खुद से किए थे वादे,
'मानस' देखे, आज हकीकत के बाज़ार में हैं वो आधे।
मौन की ताकत
भीड़ में शोर बहुत है, पर अंदर सन्नाटा गहरा है,
'मानस' कहे, इस चुप्पी में ही सत्य का असली पहरा है।
मिट्टी का ऋण
जिस खेत में खेलकर अपनी जवानी बिताया करते थे,
'मानस' रोए, आज उसी जमीन को टुकड़ों में बेचते हैं।
नदी और जल
कलकल करती नदियाँ जो कभी प्यास बुझाया करती थीं,
आज जहरीले कचरे से वो खुद को भी नहीं बचा पाती हैं।
बीतते दिन
सूरज की पहली किरण से कभी उम्मीदें जग जाती थीं,
आज ढलती शाम के साथ ही हिम्मतें हार जाती हैं।
ईमान का तराजू
कभी जुबान की साख पर बड़े-बड़े सौदे पके थे,
' आज कागजी दस्तखत के पीछे ही ईमान छिपे हैं।
इंटरनेट का ज्ञान
किताबों को धूल में छोड़, हम रील के ज्ञान पर अटके हैं,
'मानस' हँसे, देखो कैसे हम गूगल के चक्कर में भटके हैं।
दिखावटी दावत
फोटो खिंचवाने को ही अब, हम मेज़ पर सजाते हैं,
'मानस' , स्वाद से पहले हम लाइक्स को चख जाते हैं।
महंगाई और शौक
जेब में फूटी कौड़ी नहीं, पर हाथ में आईफ़ोन चमकता है,
'मानस' , दिखावे के कर्ज में, इंसान का दम घुटता है।
नींद और शार्ट्स
आधी रात को भी उंगलियाँ स्क्रीन पर ही फिसलती हैं,
'मानस'शॉर्ट्स की लत में, आँखों की रोशनी पिघलती है।
शादी और रील
दुल्हन के गहनों से ज्यादा, कैमरे पर ध्यान रहता है,
'मानस', रस्मों के बीच अब, बस रील का गुमान रहता है।
फिटनेस का शोर
जिम की सेल्फी ही अब सेहत की असली पहचान है,
'मानस' हँसे, पसीने से पहले, फिल्टर की ही आन है।
दिखावे की दौड़
मेज़ सजी है पकवानों से, पर पेट अभी भी खाली है,
'मानस' कहे, इस दिखावे के युग में, रूह भी बेहाली है।
डिजिटल मोहमाया
स्मार्टफोन की कैद में सिमटा, अब सारा संसार है,
'मानस' , अपनों की भीड़ में, खोया हर एक यार है।
समय का चक्र
कल जो अपनों की बातों में, घंटों बीता करते थे,
'मानस' हँसे, आज हम 'स्टेटस' डालने में ही डरते हैं।
परोपकार की नीलाम
एक हाथ से जो मदद की थी, उसे दुनिया ने अब देखा है,
'मानस'की टीस,दान भी बस शोहरत की एक रेखा है।
आधुनिकता का चश्मा
महंगे ब्रांड के चश्मे से, दुनिया अब हम नाप रहे,
'मानस'सादगी के पुराने सच से, क्यों अब हम भाग रहे?
नींद और शार्ट्स
आधी रात को भी आँखों में, नीली रोशनी की चमक है,
'मानस' देखे, रील के शोर में, सुकून की कहाँ दमक है?
आधुनिक फैशन
फटे हुए कपड़ों को पहनकर, हम स्टाइल का नाम देते हैं,
'मानस', सादगी के उस पुराने सच को हम भूलते जाते हैं।
दिखावटी मुस्कान
तस्वीरें खिंचवाने के लिए अब हम कृत्रिम होंठ हिलाते हैं,
'मानस' , भीतर के दर्द को हम फिल्टर में छुपाते हैं।
पड़ोसी का रिश्ता
कभी चारदीवारी के पार से भी,सुख-दुख साझा होता था,
'मानस' ,आज पड़ोसी के नाम से ही,हर इंसान डरता है
आस्था और पर्यटन
तीर्थों की पवित्रता अब, सेल्फी के शोर में खो गई है,
'मानस', श्रद्धा की वो पुरानी लौ, अब कहीं सो गई है।
अध्यापक और छात्र
कभी गुरु की डांट में ही, छात्र का भविष्य संवरता था,
'मानस' आज कानून के डर से, गुरु ही छात्र से डरता है।
बचपन की गलियाँ
कंचे और गिल्लियों की वो रौनक,अब यादों में सिमट गई,
'मानस' बच्चों की मासूमियत, स्मार्टफोन में लिपट गई।
दिखावटी सादगी
महंगे ब्रांड के कपड़ों पर, अब सादगी का टैग लगा है,
'मानस' दिखावे के बाज़ार में, असलियत बुरा फसा है।
नींद की कीमत
रात भर , सोशल मीडिया की दुनिया में खोए रहते हैं,
'मानस' , हकीकत में हम चैन की नींद कहाँ सोते रहते हैं।
दूरी का बहाना
घर के पास रहकर भी, हम एक-दूसरे से कोसों दूर हैं,
'मानस' , टेक्नोलॉजी के जाल में, हम खुद ही मजबूर हैं।
ईमानदारी का ढोंग
कैमरे के सामने हम, दान-पुण्य की बातें करते हैं,
'मानस' , पीठ पीछे हम, अपना ही स्वार्थ भरते हैं।
शिक्षा की दौड़
डिग्री तो ले ली हमने, पर समझ पर अकाल पड़ा है,
'मानस', रटने की इस होड़ में, विवेक कहीं पीछे खड़ा है।
त्यौहारों का शोर
घर की शांति को छोड़, अब हम भीड़ में सुख तलाशते हैं,
'मानस' मशीनी शोर में,हम अपनी ही खुशियाँ तराशते हैं।
स्वार्थ का चश्मा
बदलती आँखों में अब बस अपना ही नज़ारा दिखता है,
'मानस'आज इंसानियत का मोल भी बाज़ार बिकता है।
नींद और शून्यता
बिस्तरों पर सिमटी दुनिया में,अब सपनों का अकाल है,
'मानस', आज इंसान अंदर से ही कंगाल है।
अधूरा संवाद
ज़ुबाँ से निकले शब्द अब, हवा में ही दम तोड़ जाते हैं,
'मानस'आज के संवाद बस एक-दूसरे को छोड़ जाते हैं।
कृत्रिम हँसी
कैमरे की चमक के पीछे, गमों का एक गहरा डेरा है,
'मानस' आज के उजाले में, क्यों इतना घना अंधेरा है?
समय की बर्बादी
हाथ की लकीरों से ज्यादा, हम स्क्रीन की चमक देखते हैं,
'मानस' , हम अपने ही कल को आज, खुद ही फेंकते हैं।
रिश्तों का बोझ
चार दीवारी बड़ी हो गई, पर दिलों का फासला बढ़ गया,
'मानस' रोये , हर रिश्ता अब औपचारिकता में जड़ गया।
लालच का विस्तार
हाथ फैलाकर जो माँगा था, उसे अब भी हम कोस रहे,
'मानस' अपनों के साथ , आज हम खुद को भी खोस रहे।
समय की चाल
धूप ढले, छाँव सिमटी, पर हम भागते ही जाते हैं,
'मानस' वक्त तो वही है, हम ही दिशा भूल आते हैं।
दिखावे का मुखौटा
चेहरे के पीछे जो चेहरा है, वही अब राज करता है,
'मानस' मुखौटों के दौर में कौन सच का साहस करता है?
मानवता का मोल
खून के रिश्ते आज कागज़ों की दरार में बँट गए,
'मानस', हम इंसान होकर भी, पत्थर के लकीर बन गए।
आस्था का बाज़ार
सच्ची श्रद्धा अब भी वही है, जो मौन में बसती है,
'मानस' कहे, शोर-शराबे में तो, बस आस्था ही पिसती है।
अहंकार की ऊँचाई
सोने के महल बना लिए, पर मन की खिड़की बंद कर ली,
'मानस' , हमने दौड़ की खातिर, दुनिया ही चंद कर ली।
सपनों का बोझ
पलकों के पीछे बुनते थे, जो कभी खूबसूरत से ख़्वाब,
'मानस'हकीकत के बाज़ार में, सब बिक गए बे-हिसाब।
मौन की भाषा
शब्दों के कोलाहल में, जो खो गई थी एक खामोशी,
'मानस' आज उसी सन्नाटे में, छिपी है रूह की मदहोशी।
परिवर्तन का शोर
बदलाव के इस दौर में, हमने जड़ें ही काट डालीं,
'मानस'आज उजाड़ के बदले, हमने इमारतें ही पालीं।
स्वार्थ का चोला
परोपकार का चोगा पहनकर, अपना ही गुण गाते रहे,
'मानस' , हम सेवा के नाम पर, खुद को ही बढ़ाते रहे।
समय का अदृश्य हाथ
घड़ी की सुइयों ने तो बस, वक़्त का पैमाना बनाया है,
'मानस' भागते भागते,खुद को खोने का जाल बिछाया है।
अहंकार की ऊँचाई
सोने की ईंटों पर जो हमने, अपने घर का अभिमान बुना,
'मानस' ज़मीन का ऋण भूलकर हमने आसमान ही चुना।
स्मृतियों का अकाल
तस्वीरें तो बहुत हैं गैलरी में, पर दिल में यादें कम हैं,
'मानस' पूछे ये खुशियाँ भी अब महज एक भरम हैं?
शिक्षा और संस्कार
डिग्री की ऊँची डिग्री ने विवेक को ही बौना कर दिया,
'मानस' सादगी के पुराने सच को, हमने कोना कर दिया।
मौन का वजन
शोर भरे इस जग में देखो, मौन अब कोई नहीं सहता है,
'मानस' जो सब कुछ बोल दे, असल में क्या कहता है?
भविष्य की चिंता
कल की चिंता के चक्कर में, आज का निवाला बेस्वाद है,
'मानस' जीने के नाम पर, बस कटने की ही फ़रियाद है।
अहंकार की छाया
खुद को बड़ा समझने की दौड़ में, हम छोटे हो गए हैं,
'मानस' ऊँचाई की चाह में, हम अपनी जड़ें ही खो गए हैं।
वस्तु का मोह
चीज़ें बढ़ती गईं घर में, पर मन का खालीपन नहीं भरा,
'मानस' पाने के चक्कर में, खुद को ही खोने पर धरा।
प्रकृति का मौन प्रतिशोध
हमने पत्थरों की इमारतें तो खड़ी की, पर मिट्टी का अपमान किया,
'मानस' व्यंग्य करे, प्रकृति के आँगन में, हमने काँटों का ही काम किया।
अपनों में अनजानापन
पास बैठे हैं सब, पर मोबाइल की स्क्रीन के पीछे छुपे हैं,
हम सब अब, एक-दूसरे के लिए भी अनजाने रूप हैं।प
उम्मीद का भ्रम
सूरज उगने की खुशी है,पर ढलने का डर क्यों पालते हैं,
'मानस' हम अपनी ही परछाईं को ही खुद ही टालते हैं।
कृतज्ञता का अभाव
जो मिला है उसे भूलकर, जो नहीं है उसके लिए रोते हैं,
'मानस' हम चैन के बदले, बस शिकवे ही ढोते हैं।
बुढ़ापे की उपेक्षा
अनुभव की गठरी ढोते, जो साया कभी साथ चलता था,
'मानस', आज उसी काँपते हाथ को, हर कोई भूलता है।
सत्य का बाज़ार
सच को खरीदने की कोशिश में, हमने ज़मीर को गिरवी रख दिया,
'मानस' व्यंग्य करे, बिकने की इस होड़ में, हमने खुद को ही बिकवा दिया।
परिवर्तन का मायाजाल
नदी की धारा तो वही है, बस हमने रास्ते बदल दिए हैं,
'मानस' हमने सच में, या बस अपने वास्ते, बदल दिए हैं?
इच्छाओं का अंतहीन जाल
प्यास बढ़ती रही, पर हम सागर में भी प्यासे रहे,
' जो पास था उसे छोड़कर, हम दूर की आस में दास रहे।
ज्ञान और घमंड
किताबें तो बहुत पढ़ लीं, पर पढ़ने की कला हम भूल गए,
'फलदार वृक्ष की तरह झुकने के बजाय, हम पत्थर जैसे फूल गए।
धैर्य की कमी
धूप का इंतज़ार किए बिना ही, छाँव की बात करते हैं,
हम तो अब अपने ही कल की, आज ही बारात करते हैं।
अस्तित्व की दौड़
नाम कमाने की इस भीड़ में, हमने नाम ही खो दिया,
'मानस'जो चिराग रोशन था उसे हमने ख़ुद ही डुबो दिया।
भ्रम की बेल
सच की धूप से बचने के लिए, हमने झूठ की छाँव चुनी है,
'मानस' हमने अपनी ही खुशियों की, कटीली बेल बुनी है।
अपेक्षा का काँटा
दूसरों से उम्मीद की हमने, अपना घर सजाने की खातिर,
'खुद की नींव खोदी, किसी और को गिराने की खातिर।
वक्त की तड़प
हाथों से रेत फिसलती रही, हम मुट्ठी कसते ही गए,
'मानस हम वक्त की दौड़ में,अंतिम सांसों तक हँसते गए।
आडंबर का शिखर
मंदिर की ऊँचाई नापी हमने, पर मन के कपाट बंद रखे,
हमने प्रभु के नाम पर, अपने ही अहंकार से छंद रखे।
स्मृति का बोझ
बीते हुए कल की यादें, आज की चौखट पर भारी हैं,
'मानस' क्या ये यादें ही, हमारे वर्तमान की लाचारी हैं?
मौन का उपहास
भीड़ में सब चिल्ला रहे हैं, पर सुन कोई नहीं रहा,
'मानस' , इस दौर में, सच का अब कोई नहीं रहा।
कर्म की विडंबना
फल की चिंता में बीज बोना, हम वक्त से पहले सीख गए,
'मिट्टी का कर्ज चुकाने की जगह, बिकने की तकनीक सीख गए।
परोपकार का प्रदर्शन
दाएं हाथ ने मदद की तो, बाएं ने उसे रिकॉर्ड किया,
'मानस'हमने पुण्य को भी आज,पब्लिसिटी से बोर्ड किया
नींद की दरिद्रता
महंगे गद्दों पर लेटे हम, फिर भी करवटें ही बदलते हैं,
'मानस' , चैन की नींद को अब, हम गोलियों में ढलते हैं।
शब्दों का दिवालियापन
कोश में शब्द तो लाखों हैं, पर भावों का अकाल पड़ा है,
'आज हर एक रिश्ता, बस औपचारिकताओं पर खड़ा है।
अहंकार का आईना
तारीफ़ के आईने में , हम खुद को ख़ुदा समझ बैठे,
'अपनी ही परछाईं के पीछे, हम रास्ता भी भूल बैठे।
अतीत का बोझ
कल की गलतियों को, आज भी माला सा पहनते हैं,
'मानस' हम भविष्य के बाग में, शिकवे ही बोते रहते हैं।
शांति की खोज
शहर की भाग-दौड़ छोड़कर,पहाड़ की शांति ढूँढने चले,
'मानस' , हम अपने अंदर का शोर, साथ ही ले चले।
परिस्थितियों का गुलाम
हालात की बेड़ियाँ पहनकर, आज़ादी का ढोंग करते हैं,
'मानस' हँसे, हम खुद ही अपने ही, पैरों में लोहे भरते हैं।
अनकहा दर्द
भीड़ में हँसते चेहरे के पीछे, एक सन्नाटा पलता है,
इस दिखावे के युग में, हर शख्स अकेले ही जलता है।
अधिकारों का अंधापन
हक माँगने की बारी आई, तो हम दहाड़ कर चिल्लाते हैं,
'मानस'अपना फर्ज निभाने ,हम कोसों दूर भाग जाते हैं।
अनुभव की उपेक्षा
सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊपर गए,नीचे के पायदान भूल गए,
'मानस हम अपनी ही बनाई हुई, पुरानी रवायतें भूल गए।
समय का अदृश्य क़र्ज़
हर घड़ी जो हम काट रहे हैं, वो ज़िंदगी का ब्याज है,
क्या खुद से मिलना ही सबसे बड़ा काज है?
नसीब की चादर
मेहनत को छोड़कर हम, लकीरों को ढूँढते रहते हैं,
हम तो अपनी नाकामियों भी, क़िस्मत का नाम देते हैं।
उपलब्धि का भ्रम
ऊँचाइयों को छू लिया पर, ज़मीन से नाता तोड़ दिया,
'मानस'हमने अपनी जड़ों को ही, राह में कहीं छोड़ दिया।
सांत्वना का खेल
दूसरों को मशवरे दिए, खुद की उलझनें सुलझाने में,
'मानस', हम उस्ताद बने बैठे हैं, औरों को आजमाने में।
परिधान और पहचान
पहने हुए जो कपड़े हमने, वो हैसियत तय करते हैं,
'क्या इंसान की कद्र अब, बस बाज़ार ही तय करते हैं?
मौन की गवाही
सच्चाई अक्सर दबी रहती है, शोर की ऊँची दीवारों में,
'सत्य तो जीता है बस, अनकही सी उन पुकारों में।
स्वप्न का दिवाला
कल जो आग सीने में थी, वो आज बुझी सी राख है।
मानस इस भागती दौड़ में, बस एक अधूरा सा शाख है।
अस्तित्व की तलाश
हम भीड़ का हिस्सा बने रहे, खुद को खोने के डर से,
'मानस' पहचान मिलेगी खुद को, बस अपने ही अंदर से।
तकनीक और तन्हाई
पास बैठकर भी हम 'मैसेज' में बातें बुनते हैं,
'मानस' अब हम धड़कन नहीं, नोटिफिकेशन चुनते हैं।
स्वार्थ का भूगोल
जहाँ दिखे फायदा अपना, वहीं सर झुकाते हैं,
'मानस' हम मतलब के नक्शे खुद ही बनाते हैं।
समय का अदृश्य क़र्ज़
हर सेकंड जो बीता, वह उम्र का एक हिस्सा था,
'मानस', इस भाग-दौड़ में, कौन सा अपना किस्सा था?
पहचान का मुखौटा
आईने में खुद को नहीं, हम अपनी छवि सजाते हैं,
इस फिल्टर की दुनिया में, हम हकीकत भूल जाते हैं।
आस्था का बाज़ार
भीड़ बढ़ी तो लगा, जैसे ईश्वर भी बिकने लगा,
' दिखावे की चकाचौंध में, सादगी का मन सिसकने लगा।
अधूरा संतोष
दौड़ में सबसे आगे हैं, पर सुकून कहीं पीछे छूट गया,
'मानस', जिस लक्ष्य के लिए दौड़े, वही रिश्ता टूट गया।
सुख की अंधी दौड़
दौड़ रहे हैं सब यहाँ, बस एक मुकाम पाने की खातिर,
मानस हमने उम्र गुज़ार दीऔरों कोआजमाने की खातिर।
सुख की परिभाषा बदली, अब घर में दिखावा ही सजा है,
मानस चीख कर बोले, सुकून आज खुद से ही खफा है।
हाथों में हैं दुनिया की ख़बरें, पर मन है कोसों दूर बड़ा,
'मानस' इंसान खड़ा है भीड़ में, पर अंदर से है चूर बड़ा।
बनावटीपन की ओट
चेहरे पर मुस्कान सजी है, पर मन में एक सूनापन है,
'मानस' इस दुनिया में, अब हर रिश्ता ही एक उपवन है।
फूल तो खिलते हैं कागज़ के, खुशबू कहीं खो जाती है,
दिखावें की इस सतह पर, सच्चाई भी शर्मा जाती है।
घर के भीतर कलह पालकर, बाहर शिष्टाचार ओढ़ते हैं,
'मानस'ज़मीन को छोड़कर,हम सपनों के महल जोड़ते हैं।
तस्वीरों में हम चमक रहे, पर रूह कहीं मुरझाई है,
समय गवाही दे रहा, हमने खुशियों की परछाईं बनाई है।
सच बोलने का साहस अब, जैसे एक जुर्म सा लगता है,
'मानस' कहे, इस भीड़-तंत्र में, झूठ ही सबसे चमकता है।
आईना तो बस साफ़ है, पर देखने वाले के इरादे मैले हैं,
मानस इस पन्ने पर, हम सब ही अपने आप में अकेले हैं।
समर्पण
यह 'लोक-दर्पण' समर्पित है, उस हर एक सचेत मन को,
जो भीड़ की अंधी दौड़ में भी, ढूँढता है अपनेपन को।
समर्पित उस राहगीर कोजो खुद की तलाश में निकला है,
सत्य की तीखी धूप में जो, आईने सा निखरा-निखरा है।
समर्पित मौन विवेक को जो दिखावे का शोर नहीं करता,
जोअपनी गलतियों परहँसने का साहस हर बार करता है।
समर्पित है पुरानी यादों को, जो जड़ों का बोध कराती हैं,
उन आने वाले कल कोजो आईना फिर से दिखाती हैं।
और अंत में, समर्पित है स्वयं 'मानस' के उस विचार को,
जो अडिग है, सदा-सर्वदा, सत्य के इस लोक-दर्पण को।
समर्पण: आने वाली पीढ़ी के नाम
यह 'लोक-दर्पण' सौंपता हूँ, आने वाली नई नस्ल को,
जो ढूँढ रही है रोशनी, इस अंधी और धुंधली फसल को।
तुम बढ़ना इस राह पर, पर अपनी नींव को याद रखना,
शोर के बाज़ार में भी, अपने विवेक को आबाद रखना।
हम तो बस एक कड़ी हैं, जो इस जड़ से तुम्हें जोड़ेगी,
यह पुस्तक कल की पीढ़ी केहर भ्रम के पन्नों को मोड़ेगी।
मत गिरना दिखावे की इस कृत्रिम चमक और माया में,
सत्य खड़ा है अडिग आजभी,तुम्हारी अपनी ही काया में।
हमने जो बोया है, उसे अब फल में बदलना तुम,
इतिहास की उन सीढ़ियों पर, साहस से आगे बढ़ना तुम।
मुखौटों इस भीड़ में, अपना असली चेहरा बचाए रखना,
'लोक-दर्पण' के आईने में, खुद को सदा सजाए रखना।
तुम कल का सूरज हो, इस धरा का गौरव बढ़ाना तुम,
जहाँ हम थक कर रुक गए, वहाँ से मशाल जलाना तुम।
यह न सिर्फ शब्द हैंये मेरी पीढ़ी का एक छोटा सा सार है,
इसे सहेज कर रखन,क्योंकि यह सत्य का एक उपहार है।
न डरना भीड़ से तुम, न अकेलेपन से घबरा जाना,
भीतर के उस सत्य को तुम, लोक-दर्पण में खुद ही पाना।
सँभाल कर रखना इसे, आने वाले हर दौर के लिए,
यह विरासत है तुम्हारी, आने वाले हर शोर के लिए।
मिट्टी की सौंधी खुशबू को, अपनी साँसों में बस लेना,
बीते हुए उन पुरखों के, संस्कारों का कर्ज न भूलना।
भीड़ तुम्हें बहकाएगी, पर तुम ठहरे हुए दरिया से रहना,
सुनना दुनिया की सबको, पर अपने मन की ही कहना।
मुखौटों की इस भीड़ में,असली चेहरा बचाए रखना,
'लोक-दर्पण' के आईने में, खुद को सदा सजाए रखना।
गलती हो तो झुक जाना, पर सत्य पर तुम अड़ जाना,
जोअंधकार हम छोड़ गए अपनी ज्योति से उसे जलाना।
उपसंहार: आईने की विदाई
पन्ने ये अब सिमट रहे, पर बात अभी अनकही रही,
'लोक-दर्पण' के सफर में, बस एक छोटी सी नमी रही।
दर्पण हमने दिखाया तुम्हे,अब खुद से तुम खुद को देखो,
भीड़ की इस आपाधापी में, अपने मन का कोना लेखो।
हमने तो बस शब्द पिरोए, सत्य का अक्स सजाने को,
एक आईना रख दिया है, भीड़ से तुम्हें बचाने को।
दोष न देना आईने को, गर चेहरा तुम्हें बुरा दिखे,
सुधार लो अपनी फितरत, गर सच तुम्हें फिर जुदा दिखे।
यह तो केवल एक पड़ाव है, राह तुम्हारी शेष अभी,
भीतर के उस शोर को सुनना, आज की इस रैन कभी।
साफ रखना दिल का शीशा, धूल न इस पर जमने देना,
'लोक-दर्पण' की सीख को, अपने रग-रग में बसा लेना।
अब बंद करो ये पन्ने सारे, पर दृष्टि को तुम खुला रखना,
खुद के ही इस वजूद को तुम, सदा ही तुम तुला रखना।
नाराज़ न होना कभी हमसे, गर सच कड़वा लग जाए,
यह आईना है, न कभी थकता, न ही कभी यह झुक पाए।
संसार का नाटक चलता, बस अपनी भूमिका निभाना,
कभी पथ भूल जाते हो तो लोकदर्पण पर आ जाना।।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
'
मानस कवि की गीतांजलि
राम कृपा रिमोट से सब संभव
"जय सियाराम! भक्तों, आज हम एक ऐसे 'अदृश्य रिमोट' की बात करेंगे, जिसके एक क्लिक से हमारे जीवन की दिशा बदल जाती है।
मित्रों, क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम अपने जीवन की गाड़ी को इतनी रफ्तार से भगाते हैं, तो स्टियरिंग असल में किसके हाथ में होती है? हम सोचते हैं कि मैं कमा रहा हूँ, मैं जीत रहा हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ। पर आज की 'मानस चर्चा' में हम समझेंगे कि हमारे जीवन का असली रिमोट किसके हाथ में है!"
"लंका के दरबार का वह प्रसंग याद है? जहाँ रावण अपनी अपार शक्ति और सोने की लंका के अहंकार में चूर था। हनुमान जी वहाँ दूत बनकर पहुँचे। उन्होंने रावण से कोई युद्ध नहीं किया, बल्कि उसे आईना दिखाया। हनुमान जी ने गर्जना की:
'प्रणतपाल रघुनायक करुणासिंधु खरारि।
गए सरन प्रभु राखिहें तव अपराध बिसारि॥'
हनुमान जी ने रावण से कहा कि लंका का यह वैभव तुम्हारा अर्जित नहीं है, यह तो प्रभु की कृपा का परिणाम है जिसे तुम भूल गए हो। उन्होंने आगे कहा:
'रामचरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू।।
अगर अपनी लंका का राज 'अचल' रखना है, तो अपने अहंकार को हटाओ और प्रभु के चरणों को हृदय में बसाओ। इसे ऐसे समझिए—जैसे टीवी का रिमोट आपके हाथ में होता है, वैसे ही हमारे जीवन की हर साँस, हर सफलता, प्रभु की कृपा के रिमोट से चलती है। जिस दिन 'ऊपर' से कृपा का नेटवर्क बंद हो गया, उस दिन सब धरा का धरा रह जाएगा।"
"आज के दौर में हम सब 'रावण' की तरह भ्रम में जी रहे हैं। हम अपनी डिग्री, अपने पैसे और अपने रसूख को ही सब कुछ मान बैठे हैं। पर याद रखिए, हम केवल एक निमित्त हैं। हमारा रहन-सहन, हमारा परिवार, हमारा सुख-दुख—सब प्रभु की कृपा की रिमोट सेटिंग है।
जो इंसान यह मान लेता है कि 'सब कुछ राम कृपा से संभव है', वह कभी घमंड नहीं करता। और जो घमंड से बच गया, उसकी लंका कभी नहीं जलती। तो आज से अपनी मेहनत का रिमोट प्रभु के चरणों में अर्पित कर दीजिए और देखिए, जीवन कैसे अचल शांति से भर जाता है!"
"तो भक्तों, आज की इस चर्चा का सार यही है कि जीवन के रिमोट को प्रभु के चरणों में सौंप दें। जैसा कि स्पष्ट है:
राम कृपा बिनु सब विफल, लंका, वैभव, मान।
मानस प्रभु के पद भजहु, तजि सब गर्व गुमान।।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय!"
राम कृपा रिमोट से सब संभव'
वीडियो डिस्क्रिप्शन (Description):
क्या आप जानते हैं आपके जीवन का असली 'रिमोट' किसके हाथ में है?
लंका की स्वर्णपुरी, वैभव और अपार शक्ति... रावण के पास सब कुछ था, लेकिन फिर भी उसका सिंहासन डोल रहा था। आज की 'मानस चर्चा' में, लंकापति रावण और हनुमान जी के उस ऐतिहासिक संवाद के माध्यम से हम समझेंगे कि कैसे प्रभु श्रीराम की कृपा ही जीवन का असली आधार है।
अहंकार से भरी लंका हो या आज का हमारा आधुनिक जीवन—बिना राम कृपा के सब कुछ रेत के महल जैसा है। इस वीडियो में जानिए कि कैसे अपने जीवन के 'रिमोट' को प्रभु के चरणों में सौंपकर हम अचल शांति और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
इस वीडियो में आप सीखेंगे:
रावण के अहंकार और हनुमान जी के ज्ञान का रहस्य।
क्यों राम कृपा के बिना सब कुछ विफल है?
कैसे अपने जीवन से अहंकार रूपी रावण को निकालें?
'मानस चर्चा' के विशेष दोहे के साथ जीवन का निचोड़।
अगर आपको आज की यह चर्चा पसंद आई, तो वीडियो को लाइक करें, अपने प्रियजनों के साथ शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें!
जय सियाराम! 🙏
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'राम कृपा रिमोट से सब संभव'
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
गगरी का मान और अहंकार का शोर
"सज्जनों! जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान जब तक खाली रहता है, वह अहंकार में शोर करता है। पर जैसे ही वह गुणों और ज्ञान से भर जाता है, वह मौन हो जाता है। आज हम उस सूत्र को समझेंगे कि क्यों ‘अधजल गगरी छलकत जाए और भरी गगरिया चुपके जाए’।
"रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने बहुत सटीक कहा है कि —छुद्र नदी भरि चली तोराई।जस थोरेहु धन खल इतराई।।
अर्थात, जैसे थोड़ी सी वर्षा में छोटी नदी मर्यादा तोड़कर शोर मचाती है, वैसे ही थोड़ा सा धन या यश पाते ही दुष्ट व्यक्ति इतराने लगता है।
एक बार एक बहुत बड़ा सेठ, जिसके पास धन तो था लेकिन संस्कार नहीं, एक ज्ञानी संत के पास गया। अपनी शान दिखाते हुए बोला—'महाराज! मैं बहुत संपन्न हूँ, लोग मेरे सामने नतमस्तक हैं, बताइए मुझे और क्या करना चाहिए?'
संत मुस्कुराए। उन्होंने उसे एक खाली गगरी दी और कहा—'बेटा! पास की नदी से इस गगरी को भरकर लाओ।'
सेठ गया। उस दिन नदी में भारी बाढ़ आई थी। नदी का पानी कीचड़ से भरा था और जोर-जोर से शोर मचाते हुए किनारों को तोड़ रहा था। सेठ ने गगरी पानी में डाली। जैसे ही गगरी आधी भरी, वह जोर-जोर से छलकने लगी, पत्थर से टकराने लगी और बहुत आवाज करने लगी। सेठ को लगा यह गगरी ही शक्तिशाली है।
वह गगरी लेकर वापस आया और गर्व से बोला—'महाराज, यह देखिए! गगरी कितनी आवाज कर रही है, यह कितनी शक्तिशाली है!'
संत ने शांत भाव से कहा—'बेटा, इस गगरी को पूरा भर दो।'
सेठ ने गगरी को पानी के स्रोत में डुबोया। जैसे ही गगरी लबालब भर गई, उसका शोर बंद हो गया। अब वह गगरी शांत थी, गंभीर थी और अपना भार लेकर चुपचाप चल रही थी।
संत ने सेठ की आंखों में देखकर कहा—'देख लो! जब यह गगरी अधूरी थी, तो शोर मचा रही थी। जैसे ही यह पूरी भर गई, यह शांत हो गई। यही जीवन का सत्य है—अधजल गगरी छलक जाए, और भरी गगरिया चुपके जाए।'
सज्जनों, हम अपनी छोटी सी उपलब्धियों पर इतना इतराते हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि शोर वही करता है जो भीतर से खाली होता है। जो भरा हुआ होता है, वह मौन रहता है।
"तो सज्जनों ! याद रखिएगा, जिस दिन आप ज्ञान और भक्ति से पूरी तरह भर जाएंगे, उस दिन आप ‘छुद्र नदी’ की तरह मर्यादा नहीं तोड़ेंगे, बल्कि उस ‘भरी गगरिया’ की तरह शांत और गंभीर हो जाएंगे। याद रहे—खाली पात्र ही शोर करता है, भरा हुआ पात्र कभी नहीं ।"
manascharcha
।।जय श्री राम जय हनुमान।।
"वह बदल नहीं रहा, नाटक कर रहा है! - तुलसीदास जी की चेतावनी।"
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस व्यक्ति ने सालों की तपस्या से खुद को दिव्य बना लिया हो, उसे एक क्षण में कौन विचलित कर सकता है?
फेसबुक (FACEBOOK) का विश्लेषण:
F - Friends (मित्र)
A - Accounts (खाते)
C - Controlled (नियंत्रित)
E - Exploited (शोषित)
B - Bored (ऊब)
O - Overrated (अत्यधिक आंका गया)
O - Organized (संगठित)
K - Kaos (अराजकता)
"फ्रेंड्स अकाउंट्स कंट्रोल्ड हैं, शोषित है हर ओर।
ऊब भरी ओवररेटेड दुनिया, संगठित अराजकता की डोर॥"
(F-A-C-E-B-O-O-K)
अंत में एक छोटा सा सन्देश :
क्या हम वाकई 'फ्रेंड्स' से जुड़े हैं या बस एक कंट्रोल्ड सिस्टम का हिस्सा हैं?
"डिजिटल दुनिया में संतुलन ही आपकी असली आजादी है। सोचिएगा।
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।। जय श्री राम जय हनुमान।।
झूठे वादे जाल हैं, फैला जग में सार।
सुन्दरकाण्ड: पतंगें की कहानी
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥
बोलिए सियावर रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
उमापति महादेव की... जय!
परम आत्मीय, भगवत्प्रेमी सज्जनों, वात्सल्यमयी माताओं और हमारे यूट्यूब चैनल @मानसचर्चा के सभी रसिक श्रोता परिवार! आप सभी का इस पावन रामकथा सत्र में बहुत-बहुत स्वागत है।
श्रोताओं! आज हम सुन्दरकाण्ड के उस अत्यंत अद्भुत और रहस्यमयी दोहे पर चर्चा करने जा रहे हैं, जहाँ बल और बुद्धि का सारा संशय समाप्त हो जाता है। हनुमान जी एक ऐसी बात कहते हैं जो हर साधक और भक्त के लिए एक मार्गदर्शक है। हनुमान जी कहते हैं:
"निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥"
हनुमान जी कहते हैं— माँ! ये राक्षस पतंगों (पतिंगों) के समान हैं और प्रभु के बाण अग्नि के समान हैं। इसलिए तुम हृदय में धीरज रखो और इन निशाचरों को अभी से ही जला हुआ, भस्म हुआ समझो।
श्रोताओं, इस दोहे के भीतर एक बहुत ही सुंदर और शाश्वत कथा छिपी हुई है। वह कथा है—एक पतंगे की कहानी। आपने देखा होगा, जब बरसात के दिनों में या रात के अंधेरे में कोई दीपक जलता है, तो छोटे-छोटे पंख वाले पतंगे उसकी ओर खिंचे चले आते हैं।
दीपक की लौ से पतंगे का कोई पुराना बैर नहीं होता, और न ही दीपक पतंगे को बुलाने जाता है। लेकिन पतंगा उस प्रकाश के सम्मोहन में ऐसा अंधा हो जाता है कि वह समझ ही नहीं पाता कि जिस रोशनी को वह जीवन समझ रहा है, वही उसकी मृत्यु का कारण है। वह बार-बार जाकर उस लौ से टकराता है। दीपक उसे पीछे ढकेलता है, उसकी जलती हुई गरमी उसे चेतावनी देती है, पर वह सम्मोहित जीव अपनी ही मूर्खता से उसी आग में कूद जाता है और जलकर भस्म हो जाता है।
हनुमान जी कह रहे हैं— माँ! रावण और उसके राक्षसों की भी यही कहानी है। वे अपनी अज्ञानता और अहंकार के वशीभूत होकर खुद ही प्रभु राम के बाण रूपी अग्नि में कूदने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। दुष्टों का विनाश उनकी खुद की आसुरी वृत्तियों के कारण ही तय हो जाता है ।
श्रोताओं! इस पर एक बहुत ही मजेदार और आधुनिक हास्य कथा सुनिए जो आजकल के हमारे समाज की हकीकत को बयां करती है:
एक बार एक शहर में एक बहुत ही पहुंचे हुए और बुद्धिमान नेत्र रोग विशेषज्ञ (Eye Specialist) डॉक्टर साहब थे। उनके पास एक दिन एक बड़े ही विचित्र सज्जन आए—नाम था उनका 'मक्खन लाल'। मक्खन लाल जी ने अपनी आँखों पर काले रंग का बहुत ही मोटा और गहरा चश्मा लगा रखा था।
उन्होंने डॉक्टर साहब से कहा— "डॉक्टर साहब! मेरी आँखों का तुरंत इलाज कीजिए, मुझे चारों तरफ भयंकर अंधकार दिखाई दे रहा है। मुझे दिन में भी रात का भ्रम हो रहा है, कुछ सूझ नहीं रहा है।"
डॉक्टर साहब ने उन्हें अपनी बड़ी सी मशीन के पास बिठाया और जाँच शुरू की। उन्होंने पाया कि मक्खन लाल जी की आँखों में कोई बीमारी नहीं थी, वे बिल्कुल स्वस्थ थीं। डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई।
डॉक्टर साहब बोले— "मक्खन लाल जी! आपकी आँखों में कोई मोतियाबिंद या दोष नहीं है। जरा अपनी आँखों से यह काला चश्मा तो उतारिए!"
जैसे ही मक्खन लाल जी ने वह चश्मा उतारा, कमरे में बिखरा हुआ तेज प्रकाश उनकी आँखों को चौंधिया गया। वे बोले— "अरे! यहाँ तो बहुत उजाला है! डॉक्टर साहब, आपने तो गजब कर दिया, बिना किसी कड़वी ओषधि के ही मेरी आँखों की रोशनी लौटा दी!"
डॉक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए कहा— "भाई! रोशनी कहीं गई ही नहीं थी। तुमने अज्ञान और भ्रम का काला चश्मा पहन रखा था, इसीलिए तुम्हें प्रकाश भी अंधकार लग रहा था!" ।
प्यारे श्रोताओं! इस चौपाई का सार यह है कि हम भी जीवन में छोटी-छोटी समस्याओं, बीमारियों और दुखों को बहुत बड़ा 'अंधकार' या 'राक्षस' मान लेते हैं और भयभीत होकर रोने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे पास प्रभु राम के नाम की वह दिव्य शक्ति है जो हर संकट को भस्म कर सकती है।
हनुमान जी माता जानकी को यही समझा रहे हैं कि माँ! यह विरह की रात भले ही लंबी लग रही हो, पर आप धीरज रखिए। जब तक जीवन में 'आस' (आशा) है, तब तक 'सांस' चलती रहती है। आशा ही कठिन से कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को जीवित रखती है। जब प्रभु की कृपा का प्रकाश और उनके बाणों की अग्नि प्रकट होगी, तो रावण का यह सारा मायावी अंधकार पतंगों की तरह भस्म हो जाएगा।
यह कथा आपके सुंदर यूट्यूब चैनल@मानसचर्चा के माध्यम से सभी श्रोताओं को यही सिखाती है कि जीवन में जब भी संशय और डर का अंधकार छाने लगे, तो कबीरदास जी के इस सुंदर पद को गुनगुना लीजिएगा— "जाको राखे साइयाँ, मारि न सकिहै कोय। बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय॥"
आइए, इसी अटूट विश्वास और मस्ती के साथ अपने मन के सारे संशय को विसर्जित करें, और गाएं:
"श्री राम जय राम जय जय राम....."
बोलिए सियापति रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव!
हनुमानजी की रावण को ललकार
बंदी हनुमान की शेर की दहाड़!
जय श्री राम,प्रिय आत्मीय राम भक्तों "एक कैदी, जिसके हाथों में जंजीरें हैं। सामने रावण जैसा अहंकारी सम्राट है, जिसकी एक नज़र से लंका कांपती है। दरबारी सोच रहे हैं कि यह वानर डरा हुआ होगा, गिड़गिड़ाएगा। लेकिन, जैसे ही रावण ने उपहास किया, उस कैदी ने ऐसी दहाड़ लगाई कि लंका की नींवें हिल गईं! रावण के दरबार में हनुमान जी का यह 'खुला चैलेंज' आज के हर उस इंसान के लिए है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है एक सुंदर सीख है। क्या आप जानना चाहते हैं कि बंदी होकर भी 'विजेता' कैसे बना जाता है? चलिए, सीधे चलते हैं लंका की उस राजसभा में!"
लंका का स्वर्ण दरबार, चारों ओर खूंखार राक्षस। मेघनाथ ने हनुमान जी को रस्सियों से जकड़ कर पेश किया। रावण अपनी स्वर्ण गद्दी पर बैठा, अपनी मूछों पर ताव देते हुए हंसा और व्यंग्य किया, "अरे तुच्छ वानर! तूने मेरी अशोक वाटिका उजाड़ी, मेरे राक्षसों को मारा। अब तेरी मौत सामने है, क्या तू अब भी अपने राम को प्रभु कहता है?"
हनुमान जी ने जंजीरों की परवाह किए बिना, रावण की आँखों में आँखें डालकर अपनी बुलंद आवाज़ में ललकारा:
"जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥"
(रावण! तुमने जिसे मौत समझा, उसे तो मैं खेल-खेल में जीत आया। और यह जो तुम्हारा बेटा मुझे बाँधकर लाया है, तो समझ लो—यह रस्सियाँ मुझे नहीं, बल्कि तुम्हारी अज्ञानता को बाँध रही हैं!)
रावण का अहंकार तिलमिला उठा। उसने गरजकर कहा, "तू कैदी है और मुझे चैलेंज कर रहा है?"
हनुमान जी ने शेर की दहाड़ जैसी वाणी में उत्तर दिया:
"मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥"
(रावण, मुझे बँधने की कोई लज्जा नहीं है। मुझे शर्म तब आती, जब मैं अपने प्रभु का कार्य पूरा न कर पाता। मैं तो एक दूत हूँ, मेरा काम तुम्हारा अहंकार तोड़ना है। तुम मुझे नहीं, तुम काल को बाँधने का भ्रम पाल रहे हो!)
मित्रों आधुनिक समय में भी सारी बातें सत्य हैं क्योंकि आज के कॉर्पोरेट दरबार में भी रावण जैसे कई बॉस बैठे हैं, जो 'टर्मिनेशन' की धमकी देकर लोगों को बाँधना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि सत्य की आवाज़ को कभी जंजीरों में कैद नहीं किया जा सकता।
"पिंजरे में कैद करके, जो समझें स्वयं को विजेता,
वो भूल गए कि सत्य का है, अपना है एक नियंता।
जो बाँध सके हवाओं को, वो ही बाँध हमें पाएगा?
प्रभु का काज ही है साध्य, तू क्या हमें डिगा पाएगा?"
आज का इंसान अपनी 'ईमेज' और 'पद' की जंजीरों में ऐसा जकड़ा है कि वह खुद रावण बन बैठा है। बिल्कुल सही है कि,
"कुर्सी के मद में चूर, रावण बने बैठे हैं सब,
सच को सुनने की हिम्मत, खो चुके हैं अब।।
बँध गए खुद ही अपने, लालच की जंजीर में,
ढूँढ रहे हैं जीत सच्ची,अपनी झूठी 'तस्वीर' में।"
श्रोताओं! हनुमान जी का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि पद, प्रतिष्ठा और शारीरिक बंधन कभी भी उस आत्मा को नहीं बाँध सकते, जिसका लक्ष्य सत्य और परमार्थ है। रावण की सभा में हनुमान जी का बँधे होना उनकी हार नहीं, बल्कि उनके 'आत्म-सम्मान' की सबसे बड़ी जीत है।
आज अगर आप अपनी परिस्थितियों के 'बंदी' महसूस कर रहे हैं, तो याद रखिये—जिसका लक्ष्य प्रभु का काज (निस्वार्थ सेवा) है, उसे दुनिया की कोई शक्ति कैद नहीं कर सकती। आइए, अपनी बेड़ियों को तोड़ें और रावण की तरह अहंकार में नहीं, हनुमान जी की तरह साहस के साथ जीएं।
बोलिए सियावर रामचंद्र भगवान की... जय!
पवनसुत हनुमान की... जय!
डिस्क्लेमर (Disclaimer):
इस वीडियो की प्रस्तुति और संपादन प्रक्रिया में रचनात्मक सहायता के लिए AI (कृत्रिम मेधा) तकनीक का उपयोग किया गया है। वीडियो में प्रस्तुत मुख्य पात्र (वक्ता) और कथावाचन पूरी तरह से मौलिक, वास्तविक और व्यक्तिगत हैं। इस वीडियो का निर्माण और संपादन आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार और लोक-कल्याण की भावना के साथ किया गया है।
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वायरल पैकेज: 'बंदी हनुमान की शेर की दहाड़'
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लंका के दरबार में मेघनाथ ने हनुमान जी को बाँध तो लिया, लेकिन जब रावण ने अहंकार में प्रश्न किया, तो हनुमान जी ने जो उत्तर दिया, उससे पूरा दरबार थर्रा उठा। आखिर बंदी होने के बाद भी हनुमान जी इतने निर्भीक क्यों थे? क्या है 'कॉर्पोरेट किष्किंधा' और आधुनिक जीवन का संबंध?
पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए इस प्रसंग का गहरा अर्थ, जो आपको अंदर तक झकझोर देगा।
📌 इस कथा के मुख्य बिंदु:
रावण की सभा का सजीव वर्णन।
हनुमान जी की गर्जना: "मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा"।
आधुनिक समाज पर एक गहरी चोट।
'मानस' के भाव और प्रेरणादायक कविता।
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लंका के स्वर्ण दरबार में जब मेघनाथ ने हनुमान जी को बंदी बनाकर पेश किया, तो सबको लगा कि वानर डरा हुआ होगा। लेकिन रावण के अहंकार के सामने हनुमान जी ने जो गर्जना की, उसने लंका की नींव हिला दी।
बंदी होकर भी हनुमान जी की वह शेर जैसी दहाड़ आज के हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो खुद को परिस्थितियों का 'बंदी' मानता है। क्या है रावण के दरबार का वह रहस्य? पूज्य गिरिजा शंकर तिवारी 'शांडिल्य' जी के साथ जानिए आज की कथा का सार।
📌 इस शॉर्ट्स के मुख्य भाव:
हनुमान जी की निर्भीकता।
अहंकार बनाम आत्म-समर्पण का द्वंद्व।
आधुनिक जीवन में 'हनुमान' जैसा निस्वार्थ मित्र।
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manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
आज के भागदौड़ भरे युग में, 'सुग्रीव' सिर्फ रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आसपास का एक 'ट्रेंड' बन चुका है। आप कहेंगे, वह कैसे? अरे, वो दोस्त जिसे जरूरत के वक्त हम याद आते हैं, जिसके लिए हम अपनी जान लगा देते हैं, लेकिन काम निकलते ही वो हमें 'अनफॉलो' कर देता है या फोन उठाना बंद कर देता है।
रामायण के इस प्रसंग को देखिए—सुग्रीव राजा बने, राज-पाट मिला, लक्ष्मी बढ़ी, तो वो अपने परम मित्र श्रीराम का वादा भूलकर सुख-भोग में लीन हो गए। ठीक वैसे ही, जैसे आज लोग सफलता की सीढ़ी चढ़ते ही अपने पुराने साथियों को पहचानना बंद कर देते हैं।
मिला जो पद तो भूल गया एहसान,
वादे की मिट्टी में दबा दिया ईमान।
सुख सागर में डूबा बैठा है इन्सान,
अपनों के ही दिल के काट दिए अरमान।
तब श्रीराम ने लक्ष्मण को भेजा—आज का वो 'स्ट्रेट-फॉरवर्ड' और अनुशासन प्रिय दोस्त जो घुमा-फिरा कर बात नहीं करता। लक्ष्मण का क्रोध देख किष्किंधा के वानर कांप उठे, क्योंकि जो मित्र उपकार भूलकर अपना वचन तोड़ता है, वह संसार में सबसे नीच माना जाता है। यह गुस्सा आज के उस कड़क बॉस या मित्र जैसा है जो गलती होने पर सीधे आईना दिखा देता है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब हनुमान जी—एक चतुर 'मैनेजमेंट गुरु'—मैदान में उतरते हैं。 उन्होंने लक्ष्मण के क्रोध को समझा, स्थिति की गंभीरता को पहचाना और सुग्रीव को संभलने का मौका दिया। उन्होंने रिश्तों को टूटने से बचा लिया।
अहंकार की ओट में न छिपना मेरे यार,
वादे के पक्के बनो यही है जीवन का सार।
क्रोध की आग में जल सब कुछ खो न देना,
विवेक छाया के सहारे सच्चा प्यार पा लेना।
इस कहानी से शिक्षा एकदम स्पष्ट है—आज के 'सुग्रीव' मत बनिए जो स्वार्थ के लिए वादे तोड़ देते हैं। और अगर आप किसी से नाराज हैं, तो लक्ष्मण जैसा क्रोध तो रखें, लेकिन अंत में हनुमान जैसा विवेक अपनाएं ताकि रिश्ता सुधरे, न कि खत्म हो जाए।
क्या आपको लगता है कि आज के 'कॉर्पोरेट' और 'सोशल' कल्चर में हनुमान जैसे 'मध्यस्थ' (Mediator) की कमी हो गई है, जिसकी वजह से हमारे रिश्ते इतनी जल्दी टूट रहे हैं?
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"सीता-खोज और किष्किंधा का कॉर्पोरेट ड्रामा"
भगवान श्री राम ने पिता की आज्ञा मानकर 'वर्क-फ्रॉम-फॉरेस्ट' (वनवास) चुना। तेरह साल तो सब ठीक चला, फिर आया 'मारीच' नामक एक 'डिजिटल स्कैमर', जो सोने के हिरण का जाल बिछाकर बैठा था। माता सीता ने उस पर भरोसा कर लिया और रावण ने 'सीता-हरन' का कांड कर दिया।
राम और लक्ष्मण जब उन्हें ढूँढते हुए ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे, तो सुग्रीव डर गया। उसे लगा कि ये 'बाली' द्वारा भेजे गए कोई नए 'कॉर्पोरेट जासूस' (गुप्तचर) हैं। सुग्रीव ने हनुमान जी को 'रिक्रूटमेंट इंटरव्यू' के लिए भेजा। हनुमान जी ने ब्राह्मण वेश धारण किया और वे राम-लक्ष्मण की सादगी और तेज देख कर नतमस्तक हो गए। फिर क्या था, राम और सुग्रीव की दोस्ती हुई—अग्नि को साक्षी मानकर। बाली का 'डाउनफॉल' हुआ, और सुग्रीव फिर से 'किष्किंधा कॉर्पोरेशन' का सीईओ बन गया।
आज के समाज में भी लोग 'मारिच' जैसे दिखावे पर फिदा होकर अपनी सुख-शांति लूटवा बैठते हैं। और सुग्रीव जैसे भाई आज के दौर में भी 'धोखा' और 'डर' के बीच जीते हैं।इस प्रसंग की यह कविता सुने,
"माया के इस जाल में, हर कोई मृग में खोया है,
जो अपना है असल धन, वो दुनिया में सोया है।।
'मानस' कहता जग देखों, सब खेल है ये भारी,।
रावण सा छल कपट मारीच, लिए है दुनिया सारी।"
"सुख में सब हाथ मिलाते, ऑफिस में सब यार हैं,
विपदा में जो साथ निभाए, वही असली परिवार है।
'मानस' की सीख समझ लो, दोस्ती राम जैसी हो,
स्वार्थ भरी बाज़ार बीच , भक्ति हनुमान जैसी हो।"
इस कथा से शिक्षा,चेतावनी (स्कैम से सावधान): मारीच का सोने का हिरण आज के 'ऑनलाइन लुभावने विज्ञापनों' जैसा है। जो चमकता है, वह हमेशा सच नहीं होता। अपने निर्णयों में संयम बरतें।सही सलाहकार का महत्व: हनुमान जी की भूमिका एक ऐसे 'मेंटर' की है, जो न केवल सही रास्ता दिखाता है बल्कि संकट में चट्टान की तरह खड़ा रहता है। आज के कॉर्पोरेट और पारिवारिक जीवन में हमें ऐसे ही भरोसेमंद सलाहकारों की जरूरत है।कर्म का सिद्धांत: बाली की मृत्यु के बाद हनुमान जी ने तारा को जो समझाया—कि यह शरीर पानी के बुलबुले जैसा है और कर्मों का फल ही सुख-दुख का कारण है—वह आज की 'डिप्रेशन' वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा मंत्र है। भाग-दौड़ भरी जिंदगी में 'शांत भाव' ही असली सफलता है।
निष्कर्ष: राम और सुग्रीव की मैत्री हमें सिखाती है कि यदि नीयत साफ हो और साथ में हनुमान जैसा समर्पित व्यक्तित्व हो, तो रावण जैसी बड़ी मुसीबत भी छोटी लगने लगती है।
वो चेतावनी: किसी भी सरकारी दस्तावेज या पहचान पत्र (जैसे [Aadhaar Redacted]) के लिए सलाह है कि अपने दस्तावेजों को सुरक्षित रखें और किसी भी अपरिचित 'मारीच' को अपनी निजी जानकारी न दें।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
"कॉर्पोरेट किष्किंधा: और हनुमान जी "Corporate
किष्किंधा के 'राज्य लिमिटेड' में बाली बॉस था और सुग्रीव उसका छोटा भाई—बेचारा 'मैनेजर' स्तर का कर्मचारी। बाली को लगा कि सुग्रीव उसके प्रमोशन पर नज़र गड़ाए बैठा है।
एक दिन एक 'मायावी' नाम का कॉम्पिटिटर आया। बाली उसे मारने गुफा में गया और सुग्रीव को बाहर 'गार्ड' की तरह खड़ा कर दिया। सुग्रीव ने वहाँ से खून की धारा देखी तो सोचा, "अब तो भाई गया, अब तो ऑफिस—मेरा!" उसने गुफा के बाहर भारी रॉक (चट्टान) लगा दी और खुद 'सीईओ' बन बैठा। जब बाली वापस आया और उसने देखा कि उसकी गद्दी पर सुग्रीव बैठा है, तो उसका बीपी (BP) बढ़ गया। फिर क्या था, बाली ने सुग्रीव का 'पीछा' शुरू किया।
सुग्रीव बेचारा हिमालय से लेकर समुद्र तक 'दौड़ प्रतियोगिता' में हिस्सा लेता रहा। तभी हनुमान जी ने एंट्री मारी, जो तब 'ऋष्यमूक कंसल्टेंसी' के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे। उन्होंने सुग्रीव को बताया, "भाई, टेंशन न लो, उस वाले इलाके में बाली की एंट्री 'बैंड' है (मुनि का शाप)।" और बस, सुग्रीव ने हनुमान जी के दम पर 'वर्क फ्रॉम होम' (पहाड़ पर रहना) शुरू कर दिया।
आजकल के भाई-बंधुओं का यही हाल है। जिसे आप सच्चा भाई /'सच्चा मित्र' समझते हैं, वह अक्सर 'ऑफिस शिफ्ट' होते ही बदल जाता है। हनुमान जी जैसे सखा मिलना आज के 'फेक' दोस्तों के जमाने में किसी चमत्कार से कम नहीं है। आइए इस कविता को सुने,
"भाई-भाई में चल रहा, 'कॉपोरेट' का युद्ध है,
गद्दी पाने की होड़ में, खत्म हुआ सब शुद्ध है।
'मानस' कहता है सुनो, सच्चे मित्र ही आधार हैं,
जो विपत्ति में न छोड़ें, वही असली परिवार हैं।"
"सुख में तो सब आते हैं, 'सेल्फी' लेकर जाते हैं,
दुख की घड़ी में 'ब्लॉक' कर, सबको भुलाते हैं।
'मानस' की सीख सुनो, हनुमान सा यार चुनिए,
मतलब के बाजार में, भरोसे का संसार चुनिए।"
इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि,
सच्चे मित्र की पहचान: हनुमान जी ने तब साथ निभाया जब सुग्रीव के पास न राज्य था, न सत्ता। आज के समय में भी जो मित्र आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा है, वही आपका 'हनुमान' है।
गलाकाट प्रतिस्पर्धा: बाली और सुग्रीव का झगड़ा इस बात का प्रतीक है कि बिना सही संवाद (Communication) के, रिश्ते कैसे 'रक्त-पिपासु' बन जाते हैं। ऑफिस या परिवार में बैठकर बातें सुलझाना ही बेहतर है, बजाय पत्थर की दीवार खड़ी करने के।
विपत्ति में धैर्य: सुग्रीव का ऋष्यमूक पर्वत पर शांति से रहना सिखाता है कि जब चारों तरफ दुश्मन हों, तब भागने के बजाय किसी सुरक्षित जगह (पॉजिटिव माहौल) में रहकर अपनी ताकत इकट्ठा करनी चाहिए।
आज की कॉर्पोरेट राजनीति और पारिवारिक कलह का सार यही है—अहंकार छोड़ो और हनुमान जी जैसी निस्वार्थ सेवा का भाव रखो!
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
सेवा का सेतु: मानस की दृष्टि
प्राचीन काल की वह बेला थी, जब साक्षात ईश्वर ने लीला करने हेतु नर रूप धारण किया। अवध की गलियों में एक ओर जहाँ बाल-राम की मधुर मुस्कान गूँजती थी, वहीं दूसरी ओर स्वयं महादेव ने मदारी का वेश धरा और अपने साथ एक अत्यंत सुंदर बंदर लिए राजद्वार पर आए। यह प्रेम केवल उन दो रूपों का मिलन नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि ईश्वर और भक्त का रिश्ता कितना अटूट हो सकता है।
सेवा को अपना कर ,मिटा दो, तुम सब की दूरी,
प्रेम भाव की यह साधना, कर देगी सब पूरी।
भक्त हृदय में बसते प्रभु, जिनके गुण हैं सार,
परहित करने वाले मानस, पाते भव से पार।
जब प्रभु श्री राम ने मदारी के उस बंदर को देखा, तो वे उस पर मुग्ध हो गए और उसे पाने की जिद करने लगे। चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र की इच्छा पूर्ण हुई और मदारी ने वह बंदर प्रभु को समर्पित कर दिया। यह समर्पण ही वह आधार है, जिस पर समाज के सुधार की नींव रखी जा सकती है। आज के आधुनिक परिवेश में भी यदि हम अपनी अहंता का त्याग कर, सेवा के लिए स्वयं को अर्पित कर दें, तो समाज का कायाकल्प निश्चित है।
सबको अपना बना लो साथी, प्रेम की डोर बनाओ,
सकल जगत के दुखों को , हँसकर तुम मिटाओ।
इस पावन बंधन में बंधकर, मिट जाए सब भ्रम,
प्रभु की कृपा मिलेगी मानस, होगा दूर सब गम।
हनुमान जी ने प्रभु के साथ रहकर उनका सानिध्य प्राप्त किया, वे उनके साथ खेलते और उनकी आज्ञा का पालन अत्यंत प्रसन्नता से करते। किंतु समय का चक्र आगे बढ़ा, और महर्षि विश्वामित्र के आगमन पर प्रभु ने हनुमान को एक महान कार्य के लिए चुना। उन्होंने कहा कि लंकाधिपति रावण की अनीति से पृथ्वी विकल है और धर्म की स्थापना हेतु सुग्रीव से मैत्री करना अब परम आवश्यक है।
त्याग और सेवा का यह पथ, तुम सदा सँवारो,
मानवता की सेवा करके, खुशियाँ तुम पसारो।
धर्म जगत में सबसे बड़ा, है परहित का ध्यान,
सेवा ही मानस है प्रभु का, सबसे ऊँचा गान।
हनुमान जी प्रभु से पृथक नहीं होना चाहते थे, किंतु प्रभु की आज्ञा ही उनके लिए सर्वोपरि कर्तव्य था। वे अपने आराध्य को प्रणाम कर, उनके मधुर नामों का जप करते हुए ऋष्यमूक पर्वत के लिए प्रस्थान कर गए। यह कथा हमें सिखाती है कि सेवा का अर्थ सदैव साथ रहना नहीं, बल्कि प्रभु के कार्य को पूर्ण करने के लिए दूर रहकर भी उनके विचारों को जीवंत रखना है। यही वह सेतु है जो आज के व्यक्ति को समाज सुधारक बनाता है।
अंत समय में याद रहे , हमने क्या उपकार किया,
मानवता की सेवा का, हमने तो श्रृंगार किया।
कठिन डगर चलकर देखो, कर्म ही भाग्य जगाते हैं,
परहित जो कर जाते मानस, वे ही जन कहलाते हैं।
यह कथा एक ऐसी अखंड धारा है, जो यह सिखाती है कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग सेवा के सेतु से होकर गुजरता है। जब हम अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को एक 'लीला' समझकर परोपकार में लगाते हैं, तो हम स्वयं उस 'राम-हनुमान' के प्रेम के सहभागी बन जाते हैं।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
माँ, मोबाइल छोड़ो, हनुमान बनाओ!
भक्तों, आज हम एक ऐसी माला गूँथेंगे, जो न केवल मनोरंजन करेगी, बल्कि हृदय के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश भी देगी। आँखें मूँदिए और मन के आसन पर बिठा लीजिए उस अद्भुत बालक को, जिसके एक हाथ में भक्ति की गदा है और दूसरे में संस्कारों का शास्त्र है!
माता अंजना धन्य थीं! वे जानती थीं कि बच्चा कोई खिलौना नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है। वे बालक हनुमान को रोज पुराणों की कथाएँ सुनातीं। हनुमान जी का ध्यान ऐसा था जैसे 'वाई-फाई' का फुल सिग्नल हो। वे माँ को झकझोर कर पूछते— "माँ! आगे क्या हुआ? क्या रावण का अंत हुआ? मुझे जल्दी बता, नहीं तो मैं अभी लंका फूँक दूँगा!" आज की माताएँ बच्चा रोए तो हाथ में 'स्मार्टफोन' थमा देती हैं। बच्चा खाना न खाए तो 'कार्टून' दिखा देती हैं
माँ कहती है 'बेटा सो जा', बच्चा कहता 'अभी नहीं',
मैं हूँ 'पवन-पुत्र' मैया, मुझे सुलाने का दम नहीं!
गैजेट्स की इस दुनिया में, सब 'नेट-स्लो' हो गए,
माँ के उन संस्कारों से, हम कितने दूर हो गए!
माता अंजना जानती थीं कि बच्चे का मन एक 'कोरी स्लेट' है। रात के सन्नाटे में पुराणों की कथाएँ सुनाना, उस युग का 'हार्ड डिस्क अपडेट' था।
आज की स्थिति: आज का बच्चा पूछता है— "माँ, अगला लेवल (Level) क्या है?" जबकि हनुमान जी पूछते थे— "माँ, आगे क्या हुआ?"
स्क्रीन की चकाचौंध में, खो गया वो बचपन प्यारा,
माँ के हाथों से छूट गया, वो संस्कार का किनारा।
डिजीटल युग का नशा है, माँ ज़रा होश में आना,
बच्चों के कोमल मन में, रामायण तुम बसाना!
हनुमान जी रात को शैया से कूद पड़ते और अपनी नन्ही भुजाएँ फुलाकर कहते— "माँ, देख मेरी मसल्स! रावण आएगा तो मैं उसे पीस कर रख दूँगा!" आज के बच्चे जिम जाकर प्रोटीन शेक पीते हैं, जबकि हनुमान जी माँ की गोद में सोकर ब्रह्मांडीय शक्ति पाते थे। यह स्पष्ट करता है कि असली बल संस्कारों के आलिंगन में है।
हनुमान जी प्रभु श्री राम के ध्यान में इतने तल्लीन थे कि उन्हें भूख-प्यास की सुध ही नहीं रहती थी। माता अंजना को वन-वन उन्हें ढूँढना पड़ता था। आज की माँ अगर बच्चे को ढूँढने निकले, तो बच्चा 'सोशल मीडिया' की गुफा में फँसा मिलेगा।
वन-पर्वत में ढूँढती माता, अपने लाल का चेहरा,
आज की माँ ढूँढ रही है, फोन में बच्चा ठहरा।
माँ की ममता का आंचल, अब मोबाइल में खो रहा,
संस्कारों का बीज यहाँ, अज्ञानता में सो रहा।
मानस कहे, सुनो हे माताओं, चेतना को जगाओ,
मोबाइल की गुलामी छोड़, बच्चों को 'वीर' बनाओ!
हम इस कहानी से यह जान ले कि पहली बात माँ ही पहली गूगल (Google) है: बच्चा गूगल से पूछने के बजाय माँ से सीखे, उसे अपना पहला गुरु बनाए।
दूसरी बात एकाग्रता का मंत्र बच्चों को दे : हनुमान जी अगर आज की 'रील्स' देखते तो रावण कभी न मरता। फोकस कीजिए।
तीसरी बात हम बच्चों के अंदर संस्कार का निवेश करें: माता अंजना का निवेश ही आज पूरी दुनिया में 'जय श्री राम' के रूप में गूँज रहा है।
भवन तो खड़ा कर लोगे तुम, पर नींव न बना पाओगे,
जो छूट गए संस्कार यहाँ, तो खाली हाथ रह जाओगे।
चाहती हो कि बच्चा हो, भविष्य का 'संकटमोचन' वीर,
तो गैजेट्स के मायाजाल से, मुक्त करो उसकी तकदीर।
मोबाइल की इस लत से तुम, उसे दूर अभी ले जाओ,
रामायण की मंगल गाथा, प्रेम से उसे रोज सुनाओ।
'मानस' कहे हे माताओं, बस इतना सा संकल्प ठानो,
बचाओ मोबाइल-स्क्रीन से लाल , मानस कहा मानो!बोलिए पवन पुत्र हनुमान महाराज की जय! माता अंजना की जय!