।हनुमान जी ने रावण को याद दिलाया उसकी औकात।
gstshandilya.blogspot.com Ramcharimanas,Manas charcha,manascharcha,Hindi kavy shastra,alnkar,chhand,ras, synonyms etc. रामचरितमानस,मानस चर्चा,मानसचर्चा, हिन्दी काव्य शास्त्र,अलंकार,छंद,रस,पर्यायवाची,स्व रचना,कविता आदि,अन्य विषयों पर निज विचार।हनुमान कथा,कहानी,मानस की कहानियां,रस,छंद,अलंकार ,पर्यायवाची आदि प्रस्तुत ब्लोग की सभी रचनायें इस ब्लोग के लेखक के पक्ष मे सर्वाधिकार सुरक्षित है !
तात देवलोक बैठे, आशीष तो देवें सदा,
'मानस' का जीवन ही, धन्य सदा बनावे रे।
जगत नारायण हैं, ज्ञान का प्रकाश रूप,
पुत्र को मारग बीच, राह सब दिखावे रे।।
उंगली को थाम मेरी, चलना सिखाया पिता,
'मानस' के कंठ बीच, शत शब्द सजावे रे।
सत्य की डगर पै ही, अडिग रहना सदा,
तिवारी का वंश धर्म, धरा पर बढ़ावे रे।।
३. पूजनीया माताश्री स्वर्गीय मेवाती देवी जी को सादर समर्पण
मेवाती की कोख धन्य, ममता की खान मातु,
'मानस' को गोद बीच, लोरी सदा सुनावे रे।
दूध का जो कर्ज भारी, जीवन ये अर्पण है,
स्वर्ग बीच बैठी मातु, मन मोद मनावे रे।।
माता और पिता दोनों, देव रूप पूजनीय,
'मानस' का शीश झुके, जिन चरण जाय रे।
व्यंग्य के ये बाण सारे, ग्रंथ रूप सजे आज,
पुत्र की ये काव्य कृति, अर्पण उन्हें खास रे।।
।। वन्दना।।
मोदक का भोग भावे, मूषक की पीठ सोहे,
'मानस' जो ध्यान धरे, संकट को टाले रे।
विघ्न को विनास करे, बुद्धि का जो दान देवे,
एकदंत दयावंत, भक्त को सँभाले रे।।1।।
प्रथम जो पूजें तुम, काज सब सिद्ध होवे,
देवता जो शीश धरे, महिमा अपार रे।
रिद्धि-सिद्धि साथ लेके, अंगना में आओ आज,
काव्य के इस ग्रंथ बीच, करियो उद्धार रे।।2।।
माँ सरस्वती वंदना
श्वेत वस्त्र धार करे, वीणा हाथ बीच सोहे,
'मानस' जो शीश धरे, विद्या दान पावे रे।
मूर्खता को दूर करे, ज्ञान का प्रकाश देवे,
हंस पै जो बैठ मातु, कंठ में समावे रे।।3।।
पिंगल का बोध देहु, शब्द का विन्यास शुद्ध,
मात्रा और वर्ण बीच, गलती नहीं होवे रे।
लेखनी पै बैठ आज, व्यंग्य का जो बाण छोड़,
काव्य रस धार बहे, मानस मैल धोवे रे।।4।।
श्री हनुमान वंदना
लाल देह लाली सोहे, अंजनी का लाल प्यारा,
'मानस' जो नाम लेवे, पिशाच दूर भागे रे।
हाथ में जो गदा धरे, राम का ही काज करे,
संकट को काट देवे, सोया भाग्य जगावे रे।।5।।
सीता की जो खोज करी, लंका को जलाय दियो,
पर्वत उठावे हाथ, लक्ष्मण को जिलावे रे।
बल और बुद्धि देहु, दास को सँभाल आज,
राम के चरण बीच, भक्ति रस पिलावे रे।।6।।
इष्ट देव तुम मेरे, संकट को काटो प्रभु,
'मानस' के प्राण बीच, आपका सदा वास रे।
लाल रंग चोला सोहे, सिंदूर का अंग लेप,
भक्तों के जो काज करो, पूरन हर आस रे।।
छंद-लक्षण परिचय (शिल्प का गणित)
"छंद-साधना वज्र का अनुशासन है।": इस ग्रंथ के समस्त पद विशुद्ध रूपघनाक्षरी छंद में निबद्ध हैं। पाठक इसके सही प्रवाह और आनंद को प्राप्त कर सकें, इसलिए छंद के शास्त्रीय नियम को यहाँ स्वयं रूपघनाक्षरी छंद में ही स्पष्ट किया गया है:
आठ आठ आठ आठ, वर्ण पै यति विलास,
'मानस' जो गावे छंद, रूप को अनूप है रे।
आधा वर्ण छोड़ गिन, अंत गुरु धार सदा,
कड़क प्रवाह बहे, जैसे कोई भूसुर रे।।।
भूमिका / प्राक्कथन (कवि के दो शब्द)
प्रिय सुधी पाठकों एवं साहित्य अनुरागी मर्मज्ञों,"मानस के व्यंग्य-बाण: रूपघनाक्षरी शतक" केवल मनोरंजन या हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारे बदलते हुए आधुनिक समाज की विसंगतियों, खोखले दिखावों और समसामयिक पाखंडों पर पिंगल शास्त्र के कड़े अनुशासन में रहकर किया गया एक तीखा प्रहार है।आज का समाज जहाँ एक ओर आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों, मर्यादाओं और सहजता को भूलता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जीवन के हर मोड़ पर—चाहे वह सामाजिक उत्सव हों, इंटरनेट की आभासी दुनिया हो, या रोज़मर्रा का व्यवहार—सब पर दिखावे का चश्मा हावी हो चुका है। एक व्यंग्यकार का धर्म है कि वह समाज को उसका आईना दिखाए। मैंने इस ग्रंथ में उसी आईने को छंदोबद्ध मर्यादा के साथ प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास किया है।
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता इसका शिल्प है। पूरी शृंखला को विशुद्ध रूपघनाक्षरी छंद के कड़े शास्त्रीय गणित पर परखा गया है। पिंगल शास्त्र के इन कड़े नियमों का पालन करते हुए हास्य और व्यंग्य के रसों का ऐसा समन्वय दुर्लभ है।
मंगलाचरण की पावन छत्रछाया और इस संक्षिप्त प्रवेश के बाद, अब मैं समाज की इन विसंगतियों पर छोड़े गए व्यंग्य-बाणों को आपके सम्मुख ससम्मान प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह ग्रंथ केवल हास्य-व्यंग्य का संग्रह नहीं, बल्कि शब्द-व्याकरण और छंद-शास्त्र की शुद्धता का जीवंत दस्तावेज़ है।आशा है, यह पिंगल-साधना और वैचारिक चोट आपके अंतर्मन को छुएगी।
विनीत:- गिरिजा शंकर तिवारी शांडिल्य 'मानस'
भेदभाव छोड़ो अब, एक साथ जोड़ो अब,
जाति-पाति तोड़ो अब, राष्ट्र को जगाओ रे।
श्रम का सम्मान होवे, योग्यता महान होवे,
एक ही विधान होवे, समता लाओ रे।
वंचित न रोए कोई, शोषित न सोए कोई,
भेदबीज बोए कोई, शूल तुम ढाओ रे।
कर्म ही प्रधान यहाँ, मानव महान यहाँ,
एक ही महान देश, प्रेम को बढ़ाओ रे।
'मानस' पुकार रहा, देश है निहार रहा,
वक्त यह पुकार रहा, शक्ति को दिखाओ रे।
एकता की गूँज होवे, विसंगति रूठ जावे,
क्षमता बराबर जहाँ, न्याय तुम पाओ रे।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
मेधा की ललकार — 'मानस'
श्रम का आदर जहाँ न होता, वह सत्ता तो बिलकुल धूल,
मेधा को पीछे जो ठेले, वह तंत्र ही बनता शूल।
रात-रात भर जो जन जागा, आज खड़ा वह थका-उदास,
कुर्सी के चतुर खिलाड़ी वे, रचते हैं नित नया हास।
जो सचमुच निर्धन पिछड़ा है, उसका हक तो गया ही छीन,
मलाईदार परत के लोग ही, मजे उड़ाते हैं नित दीन।
योग्य खड़ा है आज कतार में, डगर-डगर पर खाता मार,
कैसा यह समता का ढांचा, कैसी यह अंधी सरकार।
'मानस' कहता अब मत बैठो, तोड़ो सब बंधन का जाल,
एक साथ सब वर्ग खड़े हो, चमकेगा तब राष्ट्र-भाल।
भेदभाव का यह तम टूटे, राष्ट्र में नया सवेरा होय,
हो जहाँ क्षमता एक बराबर, सम्मान वहाँ ही आला होय। gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
मेधा का महायज्ञ
मौन मेधा का प्रतिशोध
एक ही माँ के सभी हम, एक ही संतान हैं,
जाति में मत बाँट भाई, हम सभी धनवान हैं।
किन्तु इस अंधी प्रथा ने, आज तो यह दिन दिया,
योग्य का अधिकार उसने, राह में ही हर लिया।
जो खड़ा निर्धन यहाँ है, मिल सका उसको न फल,
बाँटते खैरात वे जो, चाहते अपना महल।
योग्य जन पीछे खड़ा है, नीति पर अधिकार है,
खेल यह कैसा अनोखा, आज यह अंधार है।
'मानस' उठो हर वर्ग को, न्याय का अधिकार दो,
जाति तज कर आज केवल, कर्म को ही प्यार दो।
भेद का यह शूल टूटे, राष्ट्र का उत्थान हो,
हो जहाँ क्षमता बराबर, वहाँ सम सम्मान हो।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
स्वागतम! स्वागतम! स्वागतम, आपका।
भाग्य जागे हमारे, जो आए यहाँ,
धन्य पावन हुआ यह सदन आपका।
स्वागतम! स्वागतम! स्वागतम, आपका!।।1।।
आप आए तो मन में दिए जल उठे,
प्रेम के सुर हृदय में मधुर बज उठे।
आज पूरी हुई मन की हर एक आस,
देखकर यह सरल सा चलन आपका।
स्वागतम! स्वागतम! स्वागतम, आपका!
भाग्य जागे हमारे, जो आए यहाँ,
धन्य पावन हुआ यह सदन आपका।।2।।
आप आए तो उपवन में आई बहार,
फूल श्रद्धा के लाए हैं हम उपहार।
आपके आने से यह धरा धन्य है,
दिल से करते हैं हम सब नमन आपका।
स्वागतम! स्वागतम! स्वागतम, आपका!
भाग्य जागे हमारे, जो आए यहाँ,
धन्य पावन हुआ यह सदन आपका।।3।।
सादगी आपकी मन को भाने लगी,
एक प्यारी सी खुशियाँ यहाँ छाने लगी।
'मानस' अपने हृदय से बड़े प्यार से,
कर रहा है खड़े हो वंदन आपका।
'मानस' गाता रहे गीत सत्कार के,
सदा महकता रहे यह भुवन आपका।
स्वागतम! स्वागतम! स्वागतम, आपका!
धन्य पावन हुआ यह सदन आपका!
हाँ, धन्य पावन हुआ यह सदन आपका!
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
।।ॐ श्री हनुमंते नमः।।
🔱 श्री शंकर-वंदना 🔱
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर, आदि-अनादि दिगंबर जय।
जय त्रिपुरारी, मन्मथ-हारी, हे भवभय-हारी शंकर जय॥
मस्तक सोहे बाल-शशांक, जटा-जूट में गंग बहे,
'मानस' का हर त्रास मिटाकर, शिव का पावन नाम रहे।
डमरू बाजे, डम-डम-डम-डम, तांडव नृत्य दिखाते शिव,
गले बिराजे महाकाल के, मुंडमाल मुस्काते शिव।
कालजयी हे महाकाल तुम, रूप तुम्हारा परम अनूप,
'मानस' के अज्ञान-तमस को, हरता शिव का दिव्य-सरूप।
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर...
नीलकंठ हे औढरदानी, संकट में जो सदा हँसे,
कालकूट-विष पीकर जिसने, जन-जन के सब कष्ट डसे।
त्रिशूल-धारी, डमरू-धारी, नंदी-वाहन त्रिपुरारी,
'मानस' का सर्वस्व तुम्हीं हो, हे शिव शंभू! अविकारी।
जय शिव शंकर, जय प्रलयंकर...
कण-कण भीतर शिव का वास, शिव ही आदि और अंत हैं,
शिव की महिमा अपरम्पार, गाते सब ऋषि और संत हैं।
करो कृपा हे आशुतोष, अब शरण तुम्हारी आया दास,
'मानस' में बस शिव ही गूँजे, शिव ही अंतिम एक प्यास।
जय जय शंभू! जय जय शंभू! हर हर महादेव शिव शंभू!
'मानस' रंजन, भव-भय भंजन, जय-जय-जय कैलास-प्रभु॥
।। सोरठा ।।
पवन-वेग सुकुमार, करुणा-सिंधु कपीश प्रभु।
हरहु सकल संसार, बाधा विपति विलोकि जन॥
।। वंदना ।।
जयति जयति अंजनी के जाए, अद्भुत रूप अतुल बल पाए।
मुख पर सात्विक तेज बिराजे, देखि छटा कलिमल सब भागे॥
राम काज हित तुम अवतारे, सुग्रीव के काज सँवारे।
लाँघि सिंधु गए सिय-सुधि लाने, लंका जारि असुर भय माने॥
लछिमन प्रान उबारे जाई, संजीवन ला ये हरषाई।
जहाँ-जहाँ रघुनाथ बखाना, तहाँ-तहाँ तुम हाजिर नाना॥
भक्ति-भाव का वर दो देवा, जनम-जनम पाऊँ तव सेवा।
'मानस' विनय करे कर जोरी, संकट हरो विपत्ति अब मोरी॥
।। मंत्र ।।
ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
।। दोहा ।।
कनक बदन कुण्डल ललित, कर माला सिर छत्र।
नमो नमो मार्तण्ड प्रभु, हरहु तिमिर सर्वत्र॥
।। वंदना ।।
उदय देव हे दिनकर स्वामी, नमन तुम्हें कोटि प्रणाम।
अंधकार के नाशक प्रभु तुम, आदिदेव तुम साक्षात॥
ॐ जय कश्यप-नंदन, जय जग-वंदन,
तेज तुम्हारा अमित अपार।
ऋद्धि-सिद्धि के दाता तुम हो, तुमसे रोशन यह संसार॥
हाथ जोड़कर शीश नवाएँ, अर्घ्य समर्पण करते हम।
किरणों से अपनी हे भगवन, हर लो हमारे सारे ग़म॥
बुद्धि, बल और आरोग्य दो देवा, शुद्ध करो हमारा मन।
'मानस' शीश नवाए प्रभु चरनन, सफल करो यह मानव जीवन॥
।। मंत्र ।।
ॐ सूर्याय नमः
ॐ आदित्याय नमः
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. ऑनलाइन फ्रॉड और लॉटरी घोटाला (OTP स्कैम)
दोहा:
लिंक दबावत ही गयो, बैंक अकाउंट साफ़।
मानस ओटीपी दियो, अब काहे का विलाप॥
2. नौकरियों का घोटाला (पेपर लीक कांड)
दोहा:
रट-रट के छात्र मरे, पेपर लीक कराय।
मानस डिगरी रो रही, चोर महल चमकाय॥
3. नकली दवाओं का घोटाला
दोहा:
जहर बेचते चाव से, ओढ़ि वैद का भेस।
मानस नोट बटोरते, जीवन देइ कलेस॥
4. राशन घोटाला (गरीबों के हक की लूट)
दोहा:
कागज़ पर राशन बँट्यो, भूखा मरे किसान।
मानस साहेब की यहाँ, तोंद भई बलवान॥
5. ऑनलाइन रील्स और फेक लाइक घोटाला (बिकते व्यूज)
दोहा:
पैसा देइ के खरीदता, लाइक और कमेंत।
मानस नकली व्यूज का, कलयुग माहीं ट्रेंड॥
6. चिटफंड घोटाला (पैसा डबल करने का लालच)
दोहा:
इक्कीस दिन में डबल का, मन में पाल्यो लोभ।
मानस कंपनी भाग गई, अब करतहु सब क्षोभ॥
7. दिखावटी संस्थाएँ और चंदा घोटाला (NGO स्कैम)
दोहा:
अनाथालय के नाम पै, माँग रहे सब भीख।
मानस खुद एसी में रहें, जनता पाए सीख॥
8. सरकारी फंड का घोटाला (सड़क और पुल का टूटना)दोहा:
मौरंग-माटी से बन्यो, पहली बारिश ढाय।
मानस पुलिया बह गई, ठेकेदार मुसकाय॥
📱 डिजिटल मोह-माया
खींच रहे सब सेल्फी, चाहे दुःख का काल।
अश्रु बहाना बाद में, पहले पोस्ट संभाल।।
🥙 सेहत और दिखावा
छोड़ चले माँ का हाथ, पीछे भागे डाइट।
देसी घी में ज़हर है, पिज़्ज़ा लगता राइट।।
🤐 सत्य की स्थिति
झूठ यहाँ पर हंस रहा, पहन रेशमी चीर।
सच बैठा है कोने में, आँखों में ले नीर।।
💸 संपन्नता का स्वांग
जेब कटी है फटी है, कर्ज चढ़ा है सीस।
आईफोन हाथ में, खींचे लंबी खीस।।
🤫 ज्ञान का प्रदर्शन
डिग्री लेकर हाथ में, अक्ल ढूंढे बाजार।
गूगल बाबा हो गए, सबके खेवनहार।।
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
1. दिखावे की भक्ति पर व्यंग्य
चौपाई:
तिलक विशाल भाल चमकावा, माला फेरत जगहि दिखावा।
भीतर कपट पाप की खानि, बाहर साधु बने अज्ञानी॥
दोहा:
मानस ईस्वर दूर है, मन के मेल न धोय।
फोटो खींचत भक्ति की, रील वायरल होय॥
2. स्वार्थ और रिश्तों पर व्यंग्य
चौपाई:
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति, कलयुग की यह पावन रीति।
माता-पिता वृद्ध घर परहीं, बेटा सेल्फी बीच बिहरहीं॥
दोहा:
प्रेम घटा अब ऐप में, रिश्ता हुआ बाजार।
मानस सगा न कोउ यहाँ, मतलब का संसार॥
3. 'ज्ञानी' और 'ट्रोलर्स' पर व्यंग्य
चौपाई:
बिनु विद्या पंडित भइ भारी, गूगल ज्ञान बघारत चारी।
दूजे के अवगुण सब गावैं, निज मुख कालिख देखि न पावैं॥
दोहा:
पर निंदा में मग्न है, तजि के सांचो काम।
मानस कीबोर्ड हाथ लै, बन बैठे भगवान॥
4. धन और प्रदर्शन पर व्यंग्य
चौपाई:
झूठ बोलि जे धन को जोड़ें, धर्म-नीति की मर्यादा तोड़ें।
दान करहिं दश टका जो भाई, सौ पन्ना पेपर छपवाई॥
दोहा:
भूख न पूंछे जात को, दान न मांगै शोर।
मानस पर उपकार अब, है बस पब्लिसिटी जोर॥
5. सोशल मीडिया और दिखावे पर प्रहार
चौपाई:
खान-पान सब फोटो माहीं, बिना रील कछु पचतहु नाहीं।
संकट पड़े न मित्र गोहरावैं, मोबाइल लै वीडियो बनावैं॥
दोहा:
मानस भीतर रिक्तता, बाहर ठाठ-बटाठ।
लाइक देखत रात भर, हृदय लगावत गांठ॥
6. आधुनिक गुरुओं और ज्ञानियों पर व्यंग्य
चौपाई:
निज घर शांति न एकहु रत्ती, जगत बाँटते फिरत विभूति।
मंच विराजी प्रवचन झाड़ें, पीछे बैठि के नोट निहाड़ें॥
दोहा:
त्याग सिखावैं और को, खुद कंचन के दास।
मानस ऐसे ज्ञान का, मत करियो विश्वास॥
7. स्वास्थ्य और बनावटीपन पर व्यंग्य
चौपाई:
शुद्ध अन्न कहुं मिलई न भाई, पैकेट बंद की महिमा छाई।
पसीना बहावन जिम को जाहीं, घर की चक्की छुवतहु नाहीं॥
दोहा:
तन सुंदर मन मैल भरा, कपट भरा है बोल।
मानस असली रूप तब, जब खुल जाय पोल॥
8. राजनीति और स्वार्थ पर व्यंग्य
चौपाई:
जात-पात की आग लगाई, अपनी रोटी सेकत भाई।
जनता रोवत भूख पियासा, नेता देखत विजय तमाशा॥
दोहा:
कुर्सी ऊपर टिकी है, सबकी आजु नजर।
मानस जनता पिस रही, नेता बेखबर॥
प्रस्तुति के लिए सुझाव (यूट्यूब हेतु):
9. मोबाइल की गुलामी पर व्यंग्य
चौपाई:
मात-पिता सँग बैठ न पावैं, अनचिनहन सँग चैट बढ़ावैं।
भोजन हाथ रहे नहिं यादू, अंगूठा चलत निरंतर दादू॥
सुत-तिय-तात पास सब बैठे, मनहूँ सात समंदर पैठे।
नेटवर्क रहत तो मुख पर लाली, जो कट जाय तो जीवन खाली॥
दोहा:
मानस जिय को यंत्र यह, कीन्हों बस में डार।
पास खड़े को देख नहिं, जपत 'ऑनलाइन' सार॥
10. शिक्षा और डिग्रियों पर प्रहार
चौपाई:
पोथी पढ़ि-पढ़ि डिगरी धारी, अकल बिना सब फिरत भिखारी।
आदर-मान बिसारि कै ताता, अंग्रेजी में गारी गाता॥
संस्कार सब धूलि मिलावैं, पाश्चात्य की रीत सिखावैं।
वृद्धाश्रम में जनक पठाई, सुखी होन की करत कमाई॥
दोहा:
शिक्षित कहिए ताहि को, जो सेवा मन लाय।
मानस कोरी डिगरी, रद्दी भाव बकाय॥
11. आधुनिक विवाह और रस्मों पर व्यंग्य
चौपाई:
ब्याह न रहा अब पावन काजा, बन गय शक्ति प्रदर्शन बाजा।
कर्ज उठाई के महल सजावैं, सात पुश्त तक ब्याज चुकावैं॥
प्री-वेडिंग की महिमा भारी, मर्यादा सब गयी बिसारी।
रस्म-रिवाज भये अब फीके, फोटो खींचे बस मन टीके॥
दोहा:
सात वचन बिसराय के, साढ़े सात फेर।
मानस टूटे प्रेम तब, जब होवत धन ढेर॥
12. दिखावटी परोपकार (चैरिटी) पर व्यंग्य
चौपाई:
दीन दुखी को अन्न खिलावैं, कैमरा लैके शोर मचावैं।
एक केला जो हाथ थमावैं, दस मिलि के फोटो खिचवावैं॥
गुपत दान की महिमा खोई, जग जाहिर बिनु करे न कोई।
पुण्य के बदले व्यूज कमावैं, नरकहु में अपनी रील बनावैं॥
दोहा:
दान वही जो दाहिना, बाएँ को नहिं ज्ञात।
मानस आजु प्रचार बिनु, होवत नहिं प्रभात॥
13. 'स्टेटस' और 'दिखावे' की होड़ पर
चौपाई:
घर में राशन होय न भाई, आईफोन की किश्त चुकाई।
फटे पैंट को फैशन मानहिं, लाज-शरम सब तजि के जानहिं॥
तेल चुपड़ि के बाल संवारें, शीशे देखि के उमर गुजारें।
सुखी होन का करत ढोंग है, भीतर बैठा भारी रोग है॥
दोहा:
मानस चमक बाहर घनी, भीतर घोर अँधेर।
उजले कपड़े पहन कर, घूम रहे सब ढेर॥
14. आधुनिक 'स्वास्थ्य' और 'डाइट' पर व्यंग्य
चौपाई:
पिज्जा-बर्गर चाट जो खावैं, पेट फुलाय के जिम को जावैं।
हरी सब्जियाँ देखि के रोवैं, कोल्ड-ड्रिंक में जीवन खोवैं॥
योग करत बस फोटो काजा, तन सूखी पर मन है राजा।
नींद न आवै बिना दवाई, ऐसी जुगत कलयुग में आई॥
दोहा:
पैदल चलना छोड़ि के, चढ़े कार पर धाय।
मानस व्याधि बढ़त है, काया रही कुम्हलाय॥
15. 'गूगल' और 'वॉट्सऐप' के अल्पज्ञानी पंडितों पर
चौपाई:
बिना पढ़े जो प्रवचन झाड़ें, वॉट्सऐप का ज्ञान बघारें।
सच-झूठ का बोध न भाई, फॉरवर्ड करहीं आफत आई॥
तर्क करत सब ब्रह्मज्ञानी, जैसे गंगा किनारे प्राणी।
निज घर का नहिं होय ठिकाना, जग को देते ज्ञान पुराना॥
दोहा:
अकल चरी जब घास को, गूगल बन्यो गुरुदेव।
मानस सच को भूलि के, करहिं झूठ की सेव॥
16. 'वीआईपी' कल्चर और चापलूसी पर
चौपाई:
बड़े लोग की करहिं गुलामी, छोटे देखि के दिखावैं खामी।
आगे-पीछे हाथ जो जोड़े, पद के लालच नियम मरोड़े॥
तिलक लगाय के साहेब बनहीं, जनता की पीड़ा नहिं सुनहीं।
कुर्सी पावत बुद्धि हिरानी, भूल गये अपनी सब कहानी॥
दोहा:
पद की गरिमा धूलि सम, चमचागिरी अपार।
मानस ऐसी रीत देखि, रोवत है संसार॥
17. 'स्टेटस' और 'दिखावे' की होड़ पर
चौपाई:
घर में राशन होय न भाई, आईफोन की किश्त चुकाई।
फटे पैंट को फैशन मानहिं, लाज-शरम सब तजि के जानहिं॥
तेल चुपड़ि के बाल संवारें, शीशे देखि के उमर गुजारें।
सुखी होन का करत ढोंग है, भीतर बैठा भारी रोग है॥
दोहा:
मानस चमक बाहर घनी, भीतर घोर अँधेर।
उजले कपड़े पहन कर, घूम रहे सब ढेर॥
18. आधुनिक 'स्वास्थ्य' और 'डाइट' पर व्यंग्य
चौपाई:
पिज्जा-बर्गर चाट जो खावैं, पेट फुलाय के जिम को जावैं।
हरी सब्जियाँ देखि के रोवैं, कोल्ड-ड्रिंक में जीवन खोवैं॥
योग करत बस फोटो काजा, तन सूखी पर मन है राजा।
नींद न आवै बिना दवाई, ऐसी जुगत कलयुग में आई॥
दोहा:
पैदल चलना छोड़ि के, चढ़े कार पर धाय।
मानस व्याधि बढ़त है, काया रही कुम्हलाय॥
19. 'गूगल' और 'वॉट्सऐप' के अल्पज्ञानी पंडितों पर
चौपाई:
बिना पढ़े जो प्रवचन झाड़ें, वॉट्सऐप का ज्ञान बघारें।
सच-झूठ का बोध न भाई, फॉरवर्ड करहीं आफत आई॥
तर्क करत सब ब्रह्मज्ञानी, जैसे गंगा किनारे प्राणी।
निज घर का नहिं होय ठिकाना, जग को देते ज्ञान पुराना॥
दोहा:
अकल चरी जब घास को, गूगल बन्यो गुरुदेव।
मानस सच को भूलि के, करहिं झूठ की सेव॥
20. 'वीआईपी' कल्चर और चापलूसी पर
चौपाई:
बड़े लोग की करहिं गुलामी, छोटे देखि के दिखावैं खामी।
आगे-पीछे हाथ जो जोड़े, पद के लालच नियम मरोड़े॥
तिलक लगाय के साहेब बनहीं, जनता की पीड़ा नहिं सुनहीं।
कुर्सी पावत बुद्धि हिरानी, भूल गये अपनी सब कहानी॥
दोहा:
पद की गरिमा धूलि सम, चमचागिरी अपार।
मानस ऐसी रीत देखि, रोवत है संसार॥
21. वृद्ध माता-पिता की दुर्दशा पर करारा प्रहार
चौपाई:
तीरथ जाइ के पुण्य कमावैं, घर के देव को भूख रुलावैं।
कुत्ता पालि के लाड़ लड़ावैं, जननी-जनक को बोझ बतावैं॥
मंदिर माहीं भोग चढ़ावैं, घर की थाली जहर बनावैं।
फोटो खींचि के फेसबुक डारें, "मिस यू माँ" कहि फर्ज उतारें॥
दोहा:
मानस पत्थर पूजते, घर का हीरा खोय।
वृद्ध आश्रम में पिता, बेटा मगन सोय॥
22. 'मुफ्तखोर' राजनीति और बिकती जनता पर
चौपाई:
दारू-मुर्गा रात खवावैं, सुबह वोट को बटन दबावैं।
पाँच साल फिर रोवत राहीं, नेता देखि के मुसकुराहीं॥
मुफ्त की रेवड़ी मुँह में डारें, देश को गर्त में रोज उतारें।
धर्म के नाम पै आग लगावैं, अपनी रोटी खूब सिकावैं॥
दोहा:
बिका हुआ जो वोट है, बिका हुआ है राज।
मानस नग्न खड़ा हुआ, लोकतंत्र का आज॥
23. न्याय और व्यवस्था की सड़न पर व्यंग्य
चौपाई:
निर्बल को सब डंडा मारें, सबल को झुकि के शीश उतारें।
कानून की देवी अँखियाँ मीचें, न्याय बिकत है मेजों नीचे॥
चोर उचक्के मंच विराजी, साधु फिरत हैं बन के पाजी।
सच बोले तो जेल पठावैं, झूठ कहें तो माला पावैं॥
दोहा:
मानस कलम बिकी जहाँ, न्याय की कौन आस।
सरेआम नीलामी हुई, जनता भई हताश॥
24. दिखावटी संतों और 'आश्रम' के पापों पर
चौपाई:
भगवा ओढ़ि के काम कमावैं, भोली जनता को भरमावैं।
महल खड़ा कियो धर्म के नामे, पाप छिपाये सुंदर जामे॥
योग सिखावत भोगी भारी, पर-धन पर-तिय पर अधिकारी।
चेला मुँड़ि के अपना भरहीं, भक्ति की आड़ में धंधा करहीं॥
दोहा:
तुलसी मानस रो रहे, देखि संत को भेस।
मानस रावण राज अब, छाया है हर देस॥
25. सोशल मीडिया की 'प्रदर्शनी' और खोखलेपन पर
चौपाई:
दुखिया देखि के रील्स बनावैं, आँसू गिरत न लाइक पावैं।
श्मशान माहीं सेल्फी खींचे, लाज-शरम सब पाँवन नीचे॥
संस्कार की बातें करहीं, खुद मर्यादा तनिक न धरहीं।
नंगे तन को फैशन कहहीं, गंदी भाषा मन में रहहीं॥
दोहा:
मर्यादा की चिता पर, नाच रहा संसार।
मानस डिजिटल हो गया, नफरत का व्यापार॥
26. बदलते समाज और लुप्त होती मर्यादा पर
चौपाई:
कुल की रीत बिसारी सबहीं, लाज-शरम मन भावत नाहीं।
मधुर बचन अब कोउ न बोलै, कटु बानी में विष को घोलै॥
मर्यादा के बंधन टूटे, साँचो प्रेम गलिन में लूटे।
कलयुग के सुर ऐसे बाजे, कपट यहाँ सिंहासन साजे॥
दोहा:
मानस उजला वेश है, मन मलीन कुरुप।
छाया में बैठे सभी, बेचत अपनी धूप॥
27. घर की शांति और मोबाइल की माया पर
चौपाई:
घर-घर माहीं मौन पसारा, यंत्र बन्यो अब प्रान हमारा।
सुत-पितु मातु न बात बढ़ावैं, उँगली चलत स्क्रीन डरावैं॥
अंसुअन बहे तो कोउ न पुंछे, स्टेटस देखि के धीरज मुँछें।
झूठी दुनिया, झूठे नाते, रोवत-रोवत हँसते जाते॥
दोहा:
पास बैठि के दूर हैं, मन के टूटे तार।
मानस कैसी रीत यह, अजब भयो संसार॥
28. झूठी प्रतिष्ठा और कर्ज के दलदल पर
चौपाई:
देखि-देखी सब करत दिखावा, भीतर भले न एकहु पावा।
कर्ज उठाई के महल सजावैं, जग को अपनी आन दिखावैं॥
सुंदर चोगा, भीतर खाली, जैसे सावन सूखी डाली।
सादगी को सब मूर्ख बतावैं, चमक-दमक के पीछे धावैं॥
दोहा:
मानस महँगी गाड़ियाँ, सस्ते भये विचार।
किस्तों पर चलने लगा, आज यहाँ व्यवहार॥
29. निंदा रस और कलयुगी ज्ञानियों पर
चौपाई:
अपनी आँख की शुद्धि न करहीं, पर-अवगुण पर चश्मा धरहीं।
कीबोर्ड हाथ लै बनत विधाता, धर्म-नीति का ज्ञान बघाता॥
साधु सरल को मंद बतावैं, चतुर कपटी को शीश नवावैं।
सत्य विकल हो कोने रोवे, झूठ यहाँ मखमल में सोवे॥
दोहा:
गंगा-जल निंदक भये, मदिरा भई सुजान।
मानस उलटी धार में, बहते चतुर सुजान॥
30. दिखावे के रिश्तों और खोखले प्रेम पर
चौपाई:
मुख पर मीठी बानी बोलें, हृदय माहीं बस विष ही घोलें।
गरज परे तो पाँवन आवैं, काम भये फिर आँख दिखावैं॥
नेह-नाते सब स्वारथ तोले, कौड़ी बदले ईमान डोले।
कलयुग के सुर ऐसे बाजे, भीतर कपट, बाहर साज साजे॥
दोहा:
मानस धागा प्रेम का, उलझा बीच बाज़ार।
गाँठें इतनी पड़ गयीं, खुलत न अबकी बार॥
31. युवाओं की दशा और दिशाहीनता पर
चौपाई:
ग्रँथ-किताबें कोने रोवैं, रील देखि सब रैनि खोवैं।
बुद्धि-विवेक को ताले दीन्हे, फैशन के वश जीवन कीन्हे॥
संस्कारी जो बात सुनावै, मूर्ख कहि के जग ठुकरावै।
नकल करत पाश्चात्य पुराना, भूल गये निज गौरव गाना॥
दोहा:
मानस चंदन छोड़ि के, माटी मलते शीश।
रील्स माहीं खो गये, भूलि गये जगदीश॥
32. धन की अंधी दौड़ और घटती इंसानियत पर
चौपाई:
कंचन पीछे दुनिया धाई, भाई से लड़ि बैठो भाई।
तिजोरी भरन की मची है रारा, सूखी गयो संवेदना धारा॥
महँगी कोठरी, महँगी गाड़ी, मन की हवेली टूटी-फाड़ी।
इंसानियत अब सिसक रही है, तृष्णा की आग धधक रही है॥
दोहा:
मानस नोट बटोरते, बीती पूरी उमर।
कफ़न में जेब न होत है, जाई कहाँ लै कुबेर॥
33. कलयुगी न्याय और 'पैसे' के प्रभाव पर
चौपाई:
सत्य बिचारा कोने रोवै, झूठ यहाँ मखमल में सोवै।
पैसा देइ जो कोर्टे जाई, गवाह-वकील सब लेत सिकाई॥
दीन-दुखी की सुनै न कोई, लाठी जिसकी भैंस है होई।
धरम-करम सब कागज़ माहीं, धरनी विकल पर त्राण कहुँ नाहीं॥
दोहा:
मानस अंधा न्याय है, बिका हुआ है धर्म।
कुर्सी ऊपर बैठि के, भूलि गये सब कर्म॥
34. दिखावे के परोपकार और 'डिजिटल दान' पर व्यंग्य
चौपाई:
भूखे को इक टुकड़ा दीन्हा, सौ-सौ फोटो झटपट कीन्हा।
दान की महिमा ऐसे गाई, जैसे कोई जंग जीत आई॥
पुन्य कमावन का यह ढोंगा, ओढ़ि लिया सब साधु का चोगा।
गुप्त दान की रीत बिसारी, व्यूज के भूखे सब संसारी॥
दोहा:
मानस कीरति के लिए, करत धरम का काज।
देय अठन्नी हाथ में, माँगत जग का राज॥
35. घर के बुजुर्गों की उपेक्षा और 'तीर्थ' के ढोंग पर
चौपाई:
मात-पिता को कटु मुख बोलैं, चारो धाम में तीरथ डोलैं।
घर की गंगा प्यासी रोवै, बाहर जाइ के पातक धोवै॥
जीते जी नहिं पूँछे बाता, मरे बाद पिंडा सँग नाता।
श्राद्ध मनावन दुनिया आवै, वृद्ध जनक परछाईं तरसावै॥
दोहा:
मानस घर के देव को, कहुँ न मिलत सम्मान।
मूरत पूजत बैठि के, बन बैठे अज्ञान॥
36. जीभ के स्वाद (फास्ट फूड) और ढलती काया पर
चौपाई:
होटल माहीं महँगो खाहीं, घर की थाली मन को न भाई।
मैदा-रसायन भीतर डारें, वैद-हकीम को रोज निहारें॥
काया सुँदर चाहत सबहीं, श्रम की डगरिया चलतहु नाहीं।
जोग-सन्यासी टीवी देखें, चप्स-समोसा डाइन लेखें॥
दोहा:
रसना के वश भये सब, भूलि गये निज स्वास्थ्य।
मानस रोगी तन भयो, मनहूँ भयो असाध्य॥
37. शांति की झूठी खोज और अशांत मन पर
चौपाई:
शांति खोजन पहाड़ पर जाहीं, भीतर का मन शांत कहुँ नाहीं।
रील बनावन होड़ मची है, कुदरत की बस लाश बची है॥
मौन-साधना का ढोंग रचाते, वाई-फाई बिना छटपटाते।
एकांत ढूंढत भीड़ के माहीं, भ्रम में जियत लाज कछु नाहीं॥
दोहा:
मानस भीतर खोजिए, जहाँ राम का वास।
बाहर-बाहर ढूँढते, बीत गयौ इतिहास॥
38. 'स्टेटस' की गुलामी और खोखली अमीरी पर
चौपाई:
बँगला-गाड़ी सुंदर कीन्हा, मन का सुकूँ बेच कहुँ दीन्हा।
महँगी घड़ी हाथ चमकावैं, अपनों हेतु समय नहिं पावैं॥
सोफ़ा मख़मल घर में साजे, रिश्तों में पर काँटा बाजे।
बाहर सबरंग रूप अनूपा, भीतर दुख का घोर कुँआ पा॥
दोहा:
मानस महँगे वस्त्र पहन, घूम रहा संसार।
भीतर नंगा आदमी, विचारों से लाचार॥
39. बच्चों के बिगड़ते संस्कार और माता-पिता के 'लाड़' पर
चौपाई:
सुत को महँगो फ़ोन थमावैं, कहें कि हम आधुनिक कहावैं।
तोतली बानी गारी गावै, पिता देखि के मोद बढ़ावै॥
विनय-शर्म सब गए बिसारी, आदर की अब छूटी बारी।
जब बूढ़े भये जनक-जननी, बेटा सीखे अपनी करनी॥
दोहा:
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय।
मानस रोवत अंत में, बचपन देइ बिगोय॥
40. दिखावे की 'किताबी' पढ़ाई और घटती अक्ल पर
चौपाई:
अँगरेजी में गिटपिट बोलैं, ज्ञान का झूठा परदा खोलैं।
तुलसी-मीरा नाम न जानहिं, पाश्चात्य को ईश्वर मानहिं॥
रट-रट के सब डिगरी पावैं, नौकरी हेतु दर-दर धावैं।
बुद्धि बिकानी इंटरनेट माहीं, सोचन की शक्ति कहुँ नाहीं॥
दोहा:
मानस पढ़ि-पढ़ि के भये, चतुर सुजान अजान।
यंत्र चलावन सीख गये, भूलि गये इंसान॥
41. कलयुगी 'चमचागीरी' और स्वाभिमान के अंत पर
चौपाई:
साहेब की जो जूती चाटैं, जग में सुख की रोटी काटैं।
सच बोले सो लात ही खावे, चापलूस यहाँ माला पावे॥
स्वाभिमान को बेच कहुँ दीन्हा, टुकड़ों पर जीवन कर लीन्हा।
सच की ताकत क्षीण भई है, झूठ की महिमा प्रबल बही है॥
दोहा:
मानस झुकते वो नहीं, जिनके पास है प्राण।
मुर्दे झुक कर चल रहे, बन बैठे धनवान॥
42. पड़ोसियों की ईर्ष्या और झूठी हमदर्दी पर
चौपाई:
सुख देखि के पड़ोसी रोवै, अपनी विपदा भूलि के सोवै।
मुख पर पूछें कुशल-क्षेम भाई, पीठ पीछे करत सब बुराई॥
तरक्की देखि जिय जरत अनूपा, चाहें गिरो तुम गहरे कूपा।
संकट पड़ते ही हँसत हँसाते, झूठे आँसू आँख दिखाते॥
दोहा:
मानस जग का नियम यह, अजब भयो व्यव्हार।
जीत तुम्हारी खल रही, रोवत देखि सँसार॥
43 ब्याह के बाद बदलते रंग और माँ-बाप का अकेलापन
चौपाई:
ब्याह भयो तब बदले रँगा, भूलि गये जननी के सँगा।
जिन जनम दियो सो भये पराये, तिय के वश में शीश नवाये॥
कोठरी में बैठे मातु-पिता रोवैं, बेटा-बहू निज महलन सोवैं।
जिस आँगन में बचपन खेल्यो, उसी वृद्ध को बाहर ठेल्यो॥
दोहा:
मानस महलों में रहे, सुत-तिय सहित सानन्द।
कुटिया में सिसकें खड़े, बूढ़े मातु-पसन्द॥
44. पैसों के आगे झुकती नैतिकता और 'भ्रष्ट' आचरण
चौपाई:
लक्ष्मी देखि के धरम डोला, पाप कमावन झोला खोला।
ईमानदारी को मूर्ख बतावैं, घूस की रोटी चाव से खावैं॥
ईमान बेचकर कोठी बनाई, नरक के द्वारे कीन्हि कमाई।
कफ़न में जेब की आस लगाये, माया के पीछे प्रान गँवाये॥
दोहा:
मानस कौड़ी के लिए, बेचे बैठे प्रान।
माटी की इस देह का, करते सब अभिमान॥
45.दिखावे के 'मौन' और अशांत मन की दशा
चौपाई:
साधु बने पर क्रोध न छूटा, लोभ-मोह का भँवर न टूटा।
कंठी-माला कंठ सजाई, मन की कुटिलता दूर न जाई॥
दुनिया को उपदेश सुनावैं, निज जीवन में तनिक न लावैं।
दीपक तले अँधेरा भारी, ऐसी कलयुग की संसारी॥
दोहा:
मानस अंतर साफ़ बिनु, तीरथ-व्रत सब धूलि।
घट में राम को छोड़ि के, भटके दुनिया भूलि॥
46. 'वक्त' बदलने पर बदलते चेहरों का कटु सत्य
चौपाई:
जब लगि जेब में कंचन झलकै, मित्र-सगे सब द्वार पै ललकइ।
आदर-मान मिलै तब भारी, जग पूछे कि कैसि तैयारी॥
लक्ष्मी रूठी तो सब मुख मोड़ें, साया भी तब साथ को छोड़ें।
संकट में कोउ पास न आवै, परछाईं भी राह छुपावै॥
दोहा:
मानस उगते सूर्य को, पूजत है संसार।
ढलते ही मुख फेर लें, ये कलयुगी व्यव्हार॥
47. 'दिखावे की सुंदरता' और 'सस्ती शालीनता' पर चोट
चौपाई:
रूप सँवारन पालर (Parlor) जाहीं, मन की काई धोवत नाहीं।
महँगी क्रीम से मुख चमकावैं, गंदे बोल से विष बरसावैं॥
तन सुंदर पर जीभ कसाई, ऐसी नारी-नर कलयुग माहीं।
कपड़े छोटे, सोच भी छोटी, संस्कृति की कर दीन्ही लँगोटी॥
दोहा:
मानस उजली देह पर, मत करियो विश्वास।
भीतर कोयला भरा, बाहर गोरा मास॥
48. 'झूठी वाहवाही' और वायरल होने की सनक पर
चौपाई:
मान-बड़ाई की लगी बीमारी, व्यूज-लाइक के सब अधिकारी।
लाज-शरम सब खूँटी टाँगे, सड़कों पर सब ठुमका माँगे॥
माँ-बहन की इज्जत भुलाई, कैमरे आगे लाज गँवाई।
ट्रेंडिंग (Trending) में जो नाम आ जाई, समझें कि गंगा नहा आई॥
दोha:
मानस मर्यादा मरी, ज़िंदा रहा न कोई।
रील की अंधी दौड़ में, दुनिया अकल खोई॥
49. अंत समय का सत्य और मनुष्य का अहंकार
चौपाई:
मेरो-मेरो करत उमर सिहानी, अंत काल कछु काम न आनी।
कोठी-बँगला यहीं रहि जाई, चार कहार मिलि आग जलाई॥
कंचन-कामिनी सब कहुँ छूटे, जमराजा जब प्रान को लूटे।
तब काहे को गरब बढ़ावै, माटी में माटी मिलि जावै॥
दोहा:
मुट्ठी बाँधे आया था, हाथ पसारे जाय।
मानस इस संसार में, काहे रहा इतराय॥
50. कलयुग के 'न्याय' की अंतिम पराकाष्ठा
चौपाई:
साधु भूखा द्वारे डोले, पापी सोने के महलन डोले।
गौ माता जो कचरा खावै, कुत्ता गद्दे पर सुत जावै॥
धरम-नीति की बात जो भाषै, जग उसको पागल करि राखै।
कलियुग का यह चरित अनूपा, उजला राजा, अंधा कूपा॥
दोहा:
मानस उलटी रीत देखि, हँसत-रोवत मन माहिं।
जहाँ सत्य का आदर नहिं, तहाँ राम कहुँ नाहिं॥
51. 'रील' के दीवानों और 'सड़क दुर्घटना' की संवेदनहीनता पर
चौपाई:
मरत देखि कोउ हाथ न लावै, कैमरा खोलि के रील बनावै।
बहय रक्त कोउ सुधि नहिं लेई, लाइक हेतु सब साक्षय देई॥
तड़पत प्रान न कछु डरि आवा, डिजिटल दुनिया मनहिं लुभावा।
मानवता अब दफ़न भई है, स्वार्थ की आँधी प्रबल बही है॥
दोहा:
मानस जिय पत्थर भये, हृदय न उपजइ पीर।
व्यूज बढ़ावन के लिए, बेचत अपनी धीर॥
52. 'धर्म' के नाम पर व्यापार और दिखावे पर
चौपाई:
धर्म-कर्म अब बना तमाशा, भीतर भरी पाप की आसा।
लाउडस्पीकर शोर मचावैं, पड़ोसी की निद्रा उड़वावैं॥
वीआईपी दर्शन को धाई, लम्बी लाइन देखि कतराई।
पैसा देइ जो ईश्वर पावै, असल भक्त वह नहिं कहलावे॥
दोहा:
कंचन चढ़ि के देव गृह, मगन भये सब लोग।
मानस प्रभु को भूलि के, करहिं स्वयं को भोग॥
53. 'दोगली राजनीति' और 'जनता की बेबसी' पर
चौपाई:
चुनाव आवत हाथ जो जोड़े, जीतत ही फिर मुख को मोड़े।
मुफ़्त माल का जाल बिछावैं, देश को कर्ज की गर्त डुबावैं॥
जात-पात की रार बढ़ावैं, भाई-भाई को लड़वावैं।
महल खड़ा कियो अपना भारी, जनता की बस रहि गयी बारी॥
दोहा:
भाषण में अमृत झरे, कर्म जहर की खान।
मानस जनता पिस रही, नेता बने सुजान॥
54. 'आधुनिक प्रेम' और 'धोखे' पर प्रहार
चौपाई:
प्रेम नहीं अब खेल भयो है, पासवर्ड में साँच गयो है।
आजु यहाँ कल और कहीं पर, भंवरा डोलत नयी कली पर॥
वादा करहिं सात जनम का, टुटत सबद बस एक छिनक का।
हृदय तोड़ि के हँसत हँसाते, नये शिकार की राह तकाते॥
दोहा:
तन की चाहत प्रेम कहि, करत सबै व्यभिचार।
मानस पावन रीत को, कीन्हों मटियामेट बाज़ार॥
55. 'गौ-माता' बनाम 'कुत्ता' (आधुनिक पशु-प्रेम पर भीषण प्रहार)
चौपाई:
प्लास्टिक खाय के गैया मरती, सड़कों पर जो ठोकर चरती।
ताके दूध की चाय गटकते, चाय पिलाय के धरम पटकते॥
कुत्ता को जो कार बिठावैं, शैम्पू साबुन ताहि नहवावैं।
अपनी माई जो खॉसइ घर माहीं, ताहि दवा को पैसा नाहीं॥
दोहा:मानस कलयुग रीति देखि, बुद्धि गई बौराय।
कुत्ता सोवे गद्दे पर, कचरा खाए गाय॥
56. अर्थी पर रील और बिकती संवेदना (डिजिटल गिद्ध)
चौपाई:घर में कोऊ मरई जो भाई, रोवन छोड़ि के रील बनाई।
'माई चली गई' लिखि के डारें, लाइक देखि के आँसू संवारें॥
मरघट बना अब पिकनिक स्पॉटा, लाज-शरम का पड़ गया टोटा।
चिता की आग अभी नहिं ठंडी, व्यूज की सज गई पूरी मंडी॥
दोहा:मानस संवेदना मरी, उपजा घोर पिसाच।
अपनों की ही लाश पर, करत कलयुगी नाच॥
57. 'नारी स्वतंत्रता' की आड़ में अश्लीलता का व्यापार
चौपाई:तन के कपड़े छोटे कीन्हे, लाज-हया सब गिरवी दीन्हे।
ठुमका मारि के व्यूज कमावैं, ताही को आज़ादी बतलावैं॥
कुल की कीरति धूलि मिलाई, कैमरे आगे देह दिखाई।
जो टोके सो दुश्मन भाई, कलयुग की यह अजब पढ़ाई॥
दोहा:मानस गहना शील का, बेचो बीच बाज़ार।
नंगेपन को नाम दियो, 'आधुनिक विचार'॥
58. मुफ़्तखोर जनता और देश बेचने वाले नेता
चौपाई:मुफ़्त की बिजली, मुफ़्त का रासन, बिक गई जनता, सो गय सासन।
पाँच सौ रूपये हाथ में पावैं, देश का पूरा भाग्य लुटावैं॥
जात के नाम पै कटते-मरते, काम के नाम पै पानी भरते।
नेता लूटि के महल बनावा, जनता बैठि के भीख मँगावा॥
दोहा:मानस मुफ़्त के लोभ में, कौड़ी भयो ईमान।
भीख माँगती प्रजा है, नेता भये सुजान॥
59. 'कमाई' के भूखे कलयुगी गुरु और चेले
चौपाई:कथा बाँचि के नोट बटोरें, पाँच सितारा में आसन जोड़ें।
वीआईपी टिकट जो पावै, ताहि को प्रभु के निकट पहुँचावै॥
ग़रीब बिचारा धक्के खावे, खिड़की से ही शीश नवावे।
भक्ति का ऐसा धंधा चोखा, भगवान के नाम पै भारी धोखा॥
दोहा:मानस कथा बाज़ार भई, संत भये व्यापारी।
पैसा फेंको, पुन्य लो, देखि कलयुग की गारी॥
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60. 'दिखावटी नारी सम्मान' और 'दहेज की वेदी' पर प्रहार
चौपाई:बेटी ब्याहन को धन जोड़ें, नीति-धरम की मर्यादा तोड़ें।
तिलक-दहेज की लगी बीमारी, बिकत है दूल्हा बन के संसारी॥
लक्ष्मी कहि के बहू घर लावैं, दासी सम ताहि रोज खटावैं।
कम पड़ि जाय जो नोट की बोरी, मारि के बेटी कहें 'कमजोरी'॥
दोहा:मानस पूजत देवियाँ, नवरातर नौ रात।
घर की लक्ष्मी रो रही, देखि कलयुगी लात॥
61. 'फेक फेमिनिज्म' (झूठे नारीवाद) और पुरुषों के शोषण पर व्यंग्य
चौपाई:कानून की आड़ में खेल रचावैं, झूठे केस में फँसाय डरावैं।
निज अवगुण सब परदे पाछें, मर्यादा को पाँवन नाचें॥
सीधे नर को सूली टाँगें, आजादी के नाम पै ताँगे।
सत्य बिचारा थाने रोवै, स्वार्थ यहाँ मखमल में सोवै॥
दोहा:मानस न्याय की आड़ लै, करत जे व्यभिचार।
ऐसी 'आज़ादी' यहाँ, कर रही वंश उजाड़॥
62. 'दिखावे की फिटनेस' और 'प्रोटीन के डब्बों' पर करारी चोट
चौपाई:डब्बा भरि-भरि कैमिकल खाहीं, साँस फूलि जाय श्रम कहुँ नाहीं।
नस चमकावन इंजेक्शन डारें, यमराजा को रोज निहारें॥
छाती फुलाय के डोलत बीरा, भीतर बैठी भारी पीरा।
घर की रोटी जहर बतावैं, पाउडर खाकर देह बनावैं॥
दोहा:मानस नकली काया पर, काहे को अभिमान।
भीतर खोखला बाँस है, बाहर बने सुजान॥
63. 'मोबाइल की स्क्रीन' और 'बचपन की हत्या' पर प्रहार
चौपाई:मात-पिता फुर्सत जो पावैं, सुत के हाथ में फोन थमावैं।
लोरी-कथा सब बिसरई माहीं, यूट्यूब पर बचपन जाहीं॥
खेल-कूद सब गायब कीन्हा, आँखों पर चश्मा जड़ दीन्हा।
संस्कार की नींव न डाली, कलयुग की पीढ़ी भई खाली॥
दोहा:मानस जो बचपन यहाँ, स्क्रीन माहीं खोय।
तरुण भये जब डंडा मारे, तब काहे को रोय॥
64. 'शराब की दुकान' और 'बिकते स्वाभिमान' पर भीषण प्रहार
चौपाई:राशन हेतु जो लाइन लावैं, पौआ खातिर नोट बहावैं।
घर में बच्चा भूख से रोवै, बाप ठेके पर होश को खोवै॥
नाली माहीं साहेब सोवैं, इज्जत-आबरू सब कहुँ खोवैं।
ऐसी मदिरा कलयुग आई, मति-बुद्धि सब हरत सिकाई॥
दोहा:मानस कौड़ी की भई, पुरुष की औकात।
बोतल पीछे बिक गया, मर्यादा का पात॥
65. 'दिखावे की अंग्रेजी' और 'संस्कारों के पतन' पर घोर प्रहार
चौपाई:"मम्मी-डैडी" कहि जनम गँवाया, मातु-पिता का भाव न पाया।
अँगरेजी की पट्टी आँखों, भारत की संस्कृति को लाँघौ॥
"हैलो-हाय" में रीत पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी।
सासु-ससुर जो घर में आवैं, "प्राइवेसी" का रोना रोवैं॥
दोहा:मानस भाषा सीखिए, पर न बेचो संस्कार।
जड़ें कटीं जिस वृक्ष की, वह तो होत उजार॥
66. 'किस्तों' (EMI) पर टिकी झूठी रईसी पर करारा व्यंग्य
चौपाई:सैलरी आवत ही कटि जाई, बैंक वाले सब लेत सिकाई।
किश्त चुकावन में दम टूटे, बाहर ठाठ-बटाठ न छूटे॥
महँगी कार पै घूमैं बीरा, जेब कटी पर मन में हीरा।
सिबिल स्कोर (CIBIL Score) की पूजा करहीं, भीतर कर्ज़ के डर से मरहीं॥
दोहा:मानस उधार की चमक पै, फूलि रहे सब लोग।
सुख-चैन सब बिक गया, बचा सिर्फ़ अब रोग॥
67. 'दिखावे के पर्यावरण-प्रेम' और 'एसी' (AC) की विलासिता
चौपाई:फेसबुक पै जो पेड़ लगावैं, घर में दिन-भर एसी चलावैं।
कुदरत की जो बातें झाड़ें, काँक्रीट का महल खड़ाड़ें॥
बिसलरी पानी पी कर जींहीं, नदियों में सब कचरा दींहीं।
पर्यावरण का दिवस मनावैं, रील बनाय के फर्ज उतारैं॥
दोहा:
मानस धरती रो रही, देखि इंसानी ढोंग।
छाया सबको चाहिए, पर पेड़ न रोपे कौंग (कोई)॥
68. 'अस्पतालों' के व्यापार और 'मरीजों' की बेबसी पर भीषण चोट
चौपाई:वैद-हकीम अब भये कसाई, बिना नोट के छुवत न भाई।
टेस्ट पै टेस्ट लिखत हैं भारी, जैसे कोई लूट की बारी॥
लाश को भी जो वेंटिलेटर धरहीं, बिल बढ़ावन का धंधा करहीं।
मरी गयो जो निर्धन भाई, गहना-जेवर बेच चुकाई॥
दोहा:मानस सेवा उठि गई, बचा सिर्फ़ व्यापार।
तीरथ सम जो अस्पताल, बन गये अब बाज़ार॥
69. 'यूट्यूब और इंस्टाग्राम' की अंधी दुनिया (कंटेंट का अकाल)
चौपाई:प्रैंक (Prank) के नाम पै मूर्ख बनावैं, राह चलत को पकड़ि डरावैं।
व्यूज बढ़ावन को कछु करहीं, नाली माहीं कूदि के मरहीं॥
गाली-गलौज को टैलेंट बतावैं, लाखो-करोड़ो सब्सक्राइबर पावैं।
ज्ञान की बातें जो कोई बोले, ताकी वीडियो कोउ न खोले॥
दोहा:मानस कचरा बिक रहा, मखमल के इस दौर।
बुद्धि बिकानी नेट पै, बचा न कोई ठौर॥
70:दिखावे की अंग्रेजी और संस्कारों का पतन
चौपाई."मम्मी-डैडी" कहि जनम गँवाया, मातु-पिता का भाव न पाया।
अँगरेजी की पट्टी आँखों, भारत की संस्कृति को लाँघौ॥
"हैलो-हाय" में रीत पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी।
सासु-ससुर जो घर में आवैं, "प्राइवेसी" का रोना रोवैं॥
दोहा:मानस भाषा सीखिए, पर न बेचो संस्कार।
जड़ें कटीं जिस वृक्ष की, वह तो होत उजार॥
71.चौपाई:अपनी भाषा बोलत लाजा, अँगरेजी बन बैठो राजा।
'थैंक्यू-सॉरी' मुख से झाड़ें, रिश्तों की मर्यादा फाड़ें॥
पच्छिम की सब रीत चुराई, संस्कारी सब भई पराई।
पब और क्लब में रात बितावैं, घर की संध्या भूलि ही जावैं॥
दोहा:मानस कोरी जीभ पै, चढ़ी विदेशी धार।
मन मलीन भीतर भरा, बाहर शिष्टाचार॥
72.चौपाई:चरण छुवन को बैकवर्ड (Backward) मानहिं, घुटने टेक मटुक मुसकानहिं।
दादी-बाबा जो कछु बोलें, 'ओल्ड थिंकिंग' (Old Thinking) कहि विष घोलें॥
कान्वेंट में सुत को पढ़ावैं, 'ट्विंकल-ट्विंकल' रटवावैं।
राम-कृष्ण की कथा न जानहिं, कार्टून को ईश्वर मानहिं॥
दोहा:मानस तोतली बोलि में, बिसरयो सारा ज्ञान।
सूट-बूट की आड़ में, घूमत पशु अज्ञान॥
73.चौपाई:होटल माहीं काँटा-चम्मच, सीख गये पर छूटी समझ।
हाथ से भोजन छुवन न पावैं, जूठी रीत पै मोद बढ़ावैं॥
'थैंक गॉड' (Thank God) कहि शीश झुकावैं, अन्नपूर्णा को बिसरावैं।
डिग्री बड़ी और बुद्धि छोटी, पाश्चात्य की पकड़ी धोती॥
दोहा:मानस अन्धा अनुकरण, करत कलयुगी लोग।
गौरव अपनी संस्कृति का, समझ रहे सब रोग॥
74.चौपाई:वृद्धाश्रम की राह दिखावैं, खुद को 'मॉडर्न' (Modern) कहि इतरावैं।
कुत्ते को जो 'बेटा' बोलैं, जनक देखि के नैना डोलैं॥
जहाँ 'मदर-फादर डे' आई, साल में एक दिन प्रीत दिखाई।
बाकी दिन माँ तरसती बैठी, बेटा की अँगरेजी ऐंठी॥
दोहा:मानस ऐसी सभ्यता, लावे घोर विनास।
जननी-जनक रुलाय के, ढूँढ रहे सुख-रास॥
75.चौपाई:राम राम कहि मुख सुकुचाहीं, "गुड मॉर्निंग" कहि मोद बढ़ाहीं॥
तुलसीकृत रामायण खोई, शेक्सपियर पढ़ि रोवत कोई॥
निज गौरव को पिछड़ा मानहिं, दूजे की जूठन पहिचानहिं॥
संसकति की कबरिया खोदी, बन बैठे पाश्चात्य के लोदी॥
दोहा:मानस अपनी मात को, कहत गँवार नदान।
दूजी भाषा सीखि के, भूलि गये इंसान॥
76.चौपाई:खान-पान सब बदल्यो भाई, "डिनर-लंच" की महिमा छाई॥
चौका-चूल्हा भयो पराया, डाइनिंग टेबल पै मन आया॥
"प्लीज-थैंक्यू" का जाल बिछावैं, भीतर डाह की आग जलावैं॥
मीठी अंग्रेज़ी जो बोलै, पीठ पाछे सोई विष घोलै॥
दोहा:मानस ऊपर उजला, भीतर कपट अपार।
सूट-बूट पहिने घूमै, कलयुगी सँसार॥
77.चौपाई:"हाय-ब्रो" कहि मीत बुलावैं, भ्राता-भगिनी भाव न पावैं॥
रिश्तों के सब नाम मिटाए, "अंकल-आंटी" सबहिं बनाए॥
काका-ताऊ बिसरे ताता, "कज़िन" माहीं सिमट्यो सब नाता॥
घर को "हाउस" नाम दियो है, मन का "होम" उजाड़ दियो है॥
दोहा:मानस पावन नेह को, कीन्हों "बिजनेस" रूप।अँगरेजी के जाल में, डूबे चतुर सरूप॥
78.चौपाई:तीरथ-व्रत को अंधविश्वास बतावैं, "संडे-पार्टी" में हुल्लड़ मचावैं॥
गीता के उपदेश भुलाए, "मोटिवेशन" खोजन को धाए॥
संत-महातम देखि के हँसहीं, "पब-क्लब" की गलियन में फँसहीं॥
मर्यादा की कटि गई डोरी, कलयुग की यह सुंदर चोरी॥
दोहा:मानस पूरब छोड़ि के, पच्छिम भये दीवान।
अपनी ही माटी तजी, ढूँढत दूजो आसमान॥
79.चौपाई:जनमदिवस पर दीप बुझावैं, फूंक मारि कै कलयुग गावैं॥
केक काटि के कीचड़ मलहीं, अंधकार की राह पै चलहीं॥
वैदिक रीती सब बिसराई, "बर्थडे पार्टी" की आफत आई॥
तिलक-आरती भई पुरानी, भूलि गये सब वेदों की बानी॥
दोहा:मानस उजियारा तजि, करत अँधेरो काम।
ऐसी आधुनिक रीति को, दूरहु से प्रनाम॥
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।। जय श्री राम जय हनुमान।।