"लोक-दर्पण"
भूमिका: लोक-दर्पण
संसार एक अथाः सागर, जहाँ लहरें शोर मचाती हैं,
'मानस' इन लहरों में, इंसान की सूरत छिप जाती हैं।
खोजी आँखें, मन मंथन, तब जाकर ये मोती मिलते हैं,
अहंकार के बाज़ार में,जहाँ बस मुखौटे ही खिलते हैं।।1।।
ना यह कोई कोरी कल्पना, ना शब्दों का बस जाल है,
यह युग-युग का सत्य है जो, हर दौर में बदहाल है।
दर्पण देख खुद का चेहरा, कुछ सीख ले ऐ मुसाफिर,
'लोक-दर्पण' में छिपी है, तेरी और समाज की तकदीर।
न यहाँ किसी की स्तुति है, न व्यंग्य का कोई द्वेष है,
सत्य की इस काँच पर, बस मानव का ही परिवेश है।
पढ़ना इसे तुम ठहर कर, जब मन में कोई शोर न हो,
यह आईना सच बोलेगा, चाहे दिल में कोई भी होर न हो।
भजन और मनोरंजन
मुझे गुमान न था कि यह शहर इतना सुहावना होगा,
सड़क पर नृत्य होगा और कोठे पर भजन गूँजता होगा।
संवाद और दूरी
कभी पत्रों की स्याही में घरों के हाल-चाल मिलते थे,
आज स्क्रीन की रोशनी में, पास बैठे लोग ही नहीं मिलते।
सादगी और दिखावा
कभी सादगी के लिबास में इंसान की पहचान होती थी,
आज ब्रांड के नाम पर, फटे कपड़ों में ही शान होती है।
आस्था और बाज़ार
कभी मंदिरों की घंटी से सुबह का आगाज़ होता था,
आज लाउडस्पीकर के शोर में, ईश्वर का उपहास होता है।
रिश्ते और समय
कभी चारपाई पर बैठकर पूरा परिवार बतियाता था,
आज फ्लैट में, हर शख्स खुद को अकेला पाता है।।
डिजिटल मोह
अपनों से दूर होकर अब हम स्क्रीन पर जिए जाते हैं,
दो पल की झूठी ख़ुशी के लिए खुद को ही पिए जाते हैं।
दिखावे की संस्कृति
दिखावे की चमक-धमक ने चेहरे पर नकाब पहना दिया,
सच्चाई खो गई कहीं, झूठ को अपना खुदा बना लिया।
बौद्धिक पतन
किताबें अब धूल फांकती हैं, रील पर ज्ञान का शोर है,
समझ की कमी का देखिए कैसा ये अजीब सा दौर है।
आधुनिकता
मकान तो बन गए बड़े, पर दिलों में जगह कम हो गई,
रिश्तों की गर्माहट खोकर, हर रूह जहन्नुम हो गई। ।
वृद्धाश्रम की पीड़ा
मकान के हर कोने में अब अपनों का ही अकाल है,
बूढ़े माता-पिता का कमरा, एक खाली खयाल है।
अधूरी संवेदना
सबके पास वक्त है रील पर ठहाके लगाने का,
मगर फुर्सत नहीं है घर में माँ के आंसू मिटाने का।
बदलता नज़ारा
सड़क पर सज गया तमाशा, कोठे पर भजन का शोर है,
देखो, इंसानियत के नीलाम होने का कैसा ये दौर है।
दिखावे की भूख
भरे पेट की फोटो डालकर, हम अपनी भूख मिटाते हैं,
इंसान मर रहा है पास में, और स्टेटस पर मुस्कुराते हैं।
टूटा विश्वास
खतों की वो महक खो गई, अब टाइप किए हुए शब्द हैं,
रिश्तों की ऊष्मा मर गई, बस दिखावे के ये सब दर्द हैं।
खामोश घर
चार दीवारी के भीतर, अब अपनों का ही कोहराम है,
जीते जी हम मर चुके हैं, बस सांस लेने का ही काम है।
शिक्षा और संस्कार
पहले गुरु की दृष्टि से शिष्य का जीवन संवर जाता था,
आज डिग्रियाँ खरीदकर, संस्कार का गला घोंटा जाता है।
अतिथि सत्कार
पहले अतिथि के आने पर , द्वार भाव से खुलता था,
आज वाई-फाई का पासवर्ड पूछना ही, दम तोड़ता है।
आनंद का स्रोत
पहले आँगन की मिट्टी में बच्चों का बचपन खिलता था,
आज डिजिटल गेम के शोर में, उनका सुकून पिसता है।
लोक-मर्यादा
पहले बड़ों की खामोशी में बच्चों का अनुशासन होता था,
आज बच्चों की ज़िद के आगे, पूरे घर का पतन होता है।
पर्व और उत्सव
पहले त्यौहारों में अपनों का साथ ही सबसे बड़ी खुशी थी,
आज फोटो के फिल्टरों में, रूह अब पूरी तरह भूखी है।
सेवा और उपेक्षा
पहले बुढ़ापे की लाठी बेटा को माना जाता था,
आज बेटा वृद्धों, आश्रम का रास्ता दिखाता है।
शिक्षा और गुरु
गुरु के पास बैठकर कभी विद्या का मान होता था,
आज डिग्रियों की भीड़ में, चरित्र का अपमान होता है।
भोजन और प्रेम
हाथ की रोटियों में कभी माँ के प्यार का स्वाद था,
आज मशीनी थाली में, बस भूख का ही विवाद है।
खेले और मैदान
धूल भरे मैदानों में कभी बच्चों का मेला सजता था,
आज चारदीवारी के अंदर, बचपन अकेले ही लजता है।
त्यौहार और अपनापन
मिलकर होली-दीवाली में कभी घर का द्वार खिलता था,
आज अपनों की जगह , बस एक मैसेज मिलता है।
कहानियाँ और अनुभव
दादी की मीठी बातों में कभी पूरा संसार सिमटता था,
आज गूगल स्क्रीन पर, सच बस धुंधला सा दिखता है।
श्रम और सुख
पसीने की मेहनत में कभी नींद सुकून की आती थी,
आज एसी के कमरों में भी, बेचैनी ही चैन चुराती ।
रिश्तों की मर्यादा
बड़ों के सम्मान में कभी झुककर शीश नवाया जाता था,
आज तर्क अहंकार से, अपनों का मान गिराया जाता है।
आजीविका का ढंग
पसीने की कमाई में कभी बरकत का वास होता था,
आज कागजी माया के पीछे, चैन का उपहास होता है।
साझा चूल्हा
सबके मिल-बैठकर खाने में कभी प्यार का स्वाद था,
आज अलग-अलग थालियों में, अकेलेपन का विवाद है।
प्रकृति और जीवन
पेड़ों की शीतल छाया में कभी चैन से सोया जाता था,
आज कंक्रीट के जंगल में, सुकून कहीं खोया जाता है।
ज्ञान और विवेक
शब्दों की गहराई में कभी अर्थ का भंडार मिलता था,
आज सतही सूचनाओं में, ज्ञान का आधार हिलता है।
पड़ोस का नाता
दुख-सुख में पड़ोसी कभी अपना साया बनकर आता था,
आज दरवाजों के पीछे, इंसान खुद में सिमट जाता है।
आधुनिकता और अकेलापन
हजारों दोस्त जुड़े हैं, आज ऑनलाइन की इस भीड़ में,
अकेलापन छुपा है फिर भी, हर घर की तंग सी सीढ़ में।
सपनों की उड़ान
पंखों को हौसला देकर, कभी आसमान नापा करते थे,
आज कागजी कामयाबी में, खुद को ही मापा करते हैं।
समय की गति
घड़ी की टिक-टिक में , जिंदगी की धड़कन होती थी,
आज भागते वक्त की अंधी दौड़ में, रूह कहीं खोती है।
बदलता नजरिया
चेहरे के भावों में कभी, सच का आईना दिखता था,
आज फिल्टरों की माया में, झूठ भी सच सा बिकता है।
आजीविका का शोर
नाम कमाने की होड़ में, सुकून कहीं पीछे छूट गया,
दौड़ने के इस नए चलन में, अपनों का हाथ ही टूट गया।
शब्दों का मोल
कभी मौन में भी संवाद के गहरे अर्थ निकल आते थे,
आज कोलाहल भरे शब्दों में, जज्बात ही दम तोड़ जाते।
आधुनिकता और जड़ें
मिट्टी की सोंधी महक को आज कंक्रीट ने है दबाया,
'मानस' , भागते रहे और अपना ही घर पराया पाया।
डिजिटल दिखावा
झूठे फिल्टरों के पीछे, चेहरे अब ओझल होने लगे हैं,
'मानस' जो साथ थे, अब सोशल मीडिया पर रोने लगे हैं।
संवाद की मूकता
मौन में जो संवाद था, वो शब्दों में अब कहाँ मिलता है,
'मानस' मन ये सोचकर, आज हर अपना ही तड़पता है।
समय की मार
घड़ी की सुइयों के साथ, हमने अपनों को पीछे छोड़ा है,
'मानस' कलम पूछे, क्या हमने सुख का दाम ही तोड़ा है?
बदलती परम्परा
चौखट पर जो दीप जलते थे, अब मोबाइल की रौशनी में खोए हैं,
'मानस' दुखी है देख के, कि हम जागकर भी अब सोए हैं।
स्वार्थ और परोपकार
दूसरों की मदद में कभी निस्वार्थ भाव का रस होता था,
आज हर सेवा के पीछे, 'मानस' स्वार्थ का कस होता है।
जीवन की गति
रुककर कभी हम सांझ ढले, तारों को निहारा करते थे,
आज मशीनी दुनिया में, 'मानस' खुद को हारा करते है।
सांस्कृतिक विरासत
लोक-गीतों की थाप पर कभी पूरा गाँव झूम उठता था,
आज डीजे के शोर में, 'मानस' अपना ही संगीत उठता है।
आत्म-चिंतन
एकांत में बैठकर कभी खुद से बातें होती थीं,
आज भीड़ के कोलाहल में, 'मानस' यादें खोती हैं।
प्रकृति का प्रेम
आँगन के उस बरगद तले, हम शीतल छाँव पाते थे,
आज कृत्रिम रोशनी में, 'मानस' निज साया भूल जाते हैं।
त्याग की भावना
छोटा हिस्सा भी अपनों को देकर हम तृप्त हो जाते थे,
आज जहान पाकर 'मानस' और ज्वाला जल जाते हैं।
शिक्षा का बाज़ार
कभी ज्ञान की भूख में विद्यार्थी दर-दर फिरा करते थे,
आज डिग्रियों के नाम पर, 'मानस' बाज़ार सजे मिलते हैं।
परोपकार का रूप
कभी बिना कहे जो मदद को हाथ बढ़ाया करते थे,
आज कैमरे में, 'मानस' पुण्य भी बिकवाया करते हैं।
तर्क और विश्वास
कभी बड़ों की सलाह को अंतिम सत्य माना करते थे,
आज तर्क के तर्कों में, 'मानस' रिश्तों को नकारा करते हैं।
वृक्ष और मानव
कभी छाँव देने वाले पेड़ों को हम अपना पूज्य मानते थे,
आज कंक्रीट की ईंटों के लिए, हरियाली को हटाते हैं।
न्याय की भाषा
कभी पंचायत के फैसले में इंसान का विवेक बोलता था,
आज कागज़ी पेचीदगियों में, सत्य का गला घोंटता हैं।
आभार की अभिव्यक्ति
कभी मौन मुस्कान में ही हृदय का आभार व्यक्त होता था,
आज शब्दों के शोर में,'मानस' भाव ही उपेक्षित होता हैं।
स्वार्थ का बढ़ता दायरा
पराया दुःख अपना समझकर, कंधे पर ढोया जाता था,
'आज अपने ही स्वार्थ के पीछे, इंसान ही सोया जाता हैं।
आधुनिकता की अंधी दौड़
सुकून की तलाश में हम, नए रास्तों पर चलते रहे,
इस भाग-दौड़ में, हम अपनों से ही दूर चलते रहे।
कला का बदलता स्वरूप
गीत के सुरों में कभी, हृदय की पीड़ा छलकती थी,
' आज मशीन की धुन पर, रूह भी कहाँ पिघलती हैं।
नैतिकता की कसौटी
कभी वचन की कीमत पर, राज-पाट भी छोड़े जाते थे,
'आज मामूली फायदे के लिए, सारे नातें तोड़े जाते हैं।
प्रकृति का उपहास
मिट्टी की सोंधी खुशबू के लिए, खेतों की धूल फांकी थी,
आज एसी के कमरों में, हमने कैसी जिंदगी आँकी हैं।
नींद और मशीनी दौर
सिरहाने मोबाइल रखकर, रातों में हम जागते रहते हैं,
'सपनों की जगह अब नोटिफिकेशन में भागते रहते हैं।
बाज़ार का प्यार
बाज़ारों की चकाचौंध में, अब अहसास भी बिकने लगे हैं,
'मानस' की व्यथा, कि हम अपनों से ही दूर छिपने लगे हैं।
शहर की दौड़
मंजिल की धुन में हम, रास्तों का मज़ा भूल गए,
, इस भीड़-भाड़ में, हम खुद की ही तौल भूल गए।
शब्दों का संचय
चिट्ठियों के अल्फ़ाज़ों में, कभी रूह का वास होता था,
' संक्षिप्त शब्दों में, बस संवाद का उपहास होता है।
बदलते संस्कार
घर की दहलीज पर कभी, संस्कार का दीप जलता था,
आज फैशन की चकाचौंध, हर रस्म का दम निकलता है ।
इंटरनेट और इंसानियत
डिजिटल स्क्रीन के पीछे हम संवेदनाएँ भी भूल गए,
'मानस' की व्यथा, अब अपनों से ही हम दूर हो गए।
समय की रफ़्तार
घड़ी की सुइयों के साथ हमने सुकून को दांव लगाया है,
इस भाग-दौड़ में हमने अपना ही वजूद गँवाया है।
सांस्कृतिक खोखलापन
विदेशी चकाचौंध में हम अपनी जड़ें ही काट रहे हैं,
'मानस' , हम खुद ही अपना अस्तित्व बाँट रहे हैं।
बदलती मित्रता
मतलब के दौर में दोस्ती की परिभाषा बदल गई है,
'मानस' देखे, मित्रता बस जरूरत की सीढ़ी बन गई है।
पर्यावरण का तिरस्कार
ईंट-पत्थर के घरों के लिए हम कुदरत को उजाड़ते रहे,
'मानस' रोए, अपनी ही आने वाली नस्लों को मारते रहे।
दिखावे की राजनीति
झूठे वादों के मंच पर, आज सच का गला घोंटा जाता है,
'मानस' पूछे, क्या ईमान भी अब पैसों में तोला जाता है?
वृद्धावस्था और एकांत
कभी बुजुर्गों की कहानियों से पूरा घर महक जाता था,
'मानस' शांति के नाम पर हर बुज़ुर्ग अकेला रह जाता है।
स्मार्टफोन और नींद
आधी रात तक डिजिटल दुनिया में हम खोए रहते हैं,
'मानस' कहे, चैन की नींद अब किताबों में हम न पाते हैं।
व्यापार और ईमानदारी
कभी ज़ुबान की कीमत पर सौदे पूरे किए जाते थे,
मानस आज कानूनी कागज़ों में क्यों ईमान बिके जाते हैं?
यातायात और संयम
सड़क पर चलते हुए कभी एक-दूसरे को रास्ता देते थे,
'मानस'आज हर पल जल्दी में,हम आपस में ही लड़ते हैं।
पर्व और बाज़ार
कभी घर की बनी मिठाइयों में त्यौहार का असली नूर था,
'मानस' , आज डिब्बाबंद मिलावटों में सब कुछ बेनूर है।
फैशन और पहचान
कभी कपड़ों से सादगी और व्यक्तित्व झलकता था,
'मानस' , आज ब्रांड के पीछे, इंसान ही कहीं बदलता है।
सपनों का मोल
आधी रात को जागकर जो हमने खुद से किए थे वादे,
'मानस' देखे, आज हकीकत के बाज़ार में हैं वो आधे।
मौन की ताकत
भीड़ में शोर बहुत है, पर अंदर सन्नाटा गहरा है,
'मानस' कहे, इस चुप्पी में ही सत्य का असली पहरा है।
मिट्टी का ऋण
जिस खेत में खेलकर अपनी जवानी बिताया करते थे,
'मानस' रोए, आज उसी जमीन को टुकड़ों में बेचते हैं।
नदी और जल
कलकल करती नदियाँ जो कभी प्यास बुझाया करती थीं,
आज जहरीले कचरे से वो खुद को भी नहीं बचा पाती हैं।
बीतते दिन
सूरज की पहली किरण से कभी उम्मीदें जग जाती थीं,
आज ढलती शाम के साथ ही हिम्मतें हार जाती हैं।
ईमान का तराजू
कभी जुबान की साख पर बड़े-बड़े सौदे पके थे,
' आज कागजी दस्तखत के पीछे ही ईमान छिपे हैं।
इंटरनेट का ज्ञान
किताबों को धूल में छोड़, हम रील के ज्ञान पर अटके हैं,
'मानस' हँसे, देखो कैसे हम गूगल के चक्कर में भटके हैं।
दिखावटी दावत
फोटो खिंचवाने को ही अब, हम मेज़ पर सजाते हैं,
'मानस' , स्वाद से पहले हम लाइक्स को चख जाते हैं।
महंगाई और शौक
जेब में फूटी कौड़ी नहीं, पर हाथ में आईफ़ोन चमकता है,
'मानस' , दिखावे के कर्ज में, इंसान का दम घुटता है।
नींद और शार्ट्स
आधी रात को भी उंगलियाँ स्क्रीन पर ही फिसलती हैं,
'मानस'शॉर्ट्स की लत में, आँखों की रोशनी पिघलती है।
शादी और रील
दुल्हन के गहनों से ज्यादा, कैमरे पर ध्यान रहता है,
'मानस', रस्मों के बीच अब, बस रील का गुमान रहता है।
फिटनेस का शोर
जिम की सेल्फी ही अब सेहत की असली पहचान है,
'मानस' हँसे, पसीने से पहले, फिल्टर की ही आन है।
दिखावे की दौड़
मेज़ सजी है पकवानों से, पर पेट अभी भी खाली है,
'मानस' कहे, इस दिखावे के युग में, रूह भी बेहाली है।
डिजिटल मोहमाया
स्मार्टफोन की कैद में सिमटा, अब सारा संसार है,
'मानस' , अपनों की भीड़ में, खोया हर एक यार है।
समय का चक्र
कल जो अपनों की बातों में, घंटों बीता करते थे,
'मानस' हँसे, आज हम 'स्टेटस' डालने में ही डरते हैं।
परोपकार की नीलाम
एक हाथ से जो मदद की थी, उसे दुनिया ने अब देखा है,
'मानस'की टीस,दान भी बस शोहरत की एक रेखा है।
आधुनिकता का चश्मा
महंगे ब्रांड के चश्मे से, दुनिया अब हम नाप रहे,
'मानस'सादगी के पुराने सच से, क्यों अब हम भाग रहे?
नींद और शार्ट्स
आधी रात को भी आँखों में, नीली रोशनी की चमक है,
'मानस' देखे, रील के शोर में, सुकून की कहाँ दमक है?
आधुनिक फैशन
फटे हुए कपड़ों को पहनकर, हम स्टाइल का नाम देते हैं,
'मानस', सादगी के उस पुराने सच को हम भूलते जाते हैं।
दिखावटी मुस्कान
तस्वीरें खिंचवाने के लिए अब हम कृत्रिम होंठ हिलाते हैं,
'मानस' , भीतर के दर्द को हम फिल्टर में छुपाते हैं।
पड़ोसी का रिश्ता
कभी चारदीवारी के पार से भी,सुख-दुख साझा होता था,
'मानस' ,आज पड़ोसी के नाम से ही,हर इंसान डरता है
आस्था और पर्यटन
तीर्थों की पवित्रता अब, सेल्फी के शोर में खो गई है,
'मानस', श्रद्धा की वो पुरानी लौ, अब कहीं सो गई है।
अध्यापक और छात्र
कभी गुरु की डांट में ही, छात्र का भविष्य संवरता था,
'मानस' आज कानून के डर से, गुरु ही छात्र से डरता है।
बचपन की गलियाँ
कंचे और गिल्लियों की वो रौनक,अब यादों में सिमट गई,
'मानस' बच्चों की मासूमियत, स्मार्टफोन में लिपट गई।
दिखावटी सादगी
महंगे ब्रांड के कपड़ों पर, अब सादगी का टैग लगा है,
'मानस' दिखावे के बाज़ार में, असलियत बुरा फसा है।
नींद की कीमत
रात भर , सोशल मीडिया की दुनिया में खोए रहते हैं,
'मानस' , हकीकत में हम चैन की नींद कहाँ सोते रहते हैं।
दूरी का बहाना
घर के पास रहकर भी, हम एक-दूसरे से कोसों दूर हैं,
'मानस' , टेक्नोलॉजी के जाल में, हम खुद ही मजबूर हैं।
ईमानदारी का ढोंग
कैमरे के सामने हम, दान-पुण्य की बातें करते हैं,
'मानस' , पीठ पीछे हम, अपना ही स्वार्थ भरते हैं।
शिक्षा की दौड़
डिग्री तो ले ली हमने, पर समझ पर अकाल पड़ा है,
'मानस', रटने की इस होड़ में, विवेक कहीं पीछे खड़ा है।
त्यौहारों का शोर
घर की शांति को छोड़, अब हम भीड़ में सुख तलाशते हैं,
'मानस' मशीनी शोर में,हम अपनी ही खुशियाँ तराशते हैं।
स्वार्थ का चश्मा
बदलती आँखों में अब बस अपना ही नज़ारा दिखता है,
'मानस'आज इंसानियत का मोल भी बाज़ार बिकता है।
नींद और शून्यता
बिस्तरों पर सिमटी दुनिया में,अब सपनों का अकाल है,
'मानस', आज इंसान अंदर से ही कंगाल है।
अधूरा संवाद
ज़ुबाँ से निकले शब्द अब, हवा में ही दम तोड़ जाते हैं,
'मानस'आज के संवाद बस एक-दूसरे को छोड़ जाते हैं।
कृत्रिम हँसी
कैमरे की चमक के पीछे, गमों का एक गहरा डेरा है,
'मानस' आज के उजाले में, क्यों इतना घना अंधेरा है?
समय की बर्बादी
हाथ की लकीरों से ज्यादा, हम स्क्रीन की चमक देखते हैं,
'मानस' , हम अपने ही कल को आज, खुद ही फेंकते हैं।
रिश्तों का बोझ
चार दीवारी बड़ी हो गई, पर दिलों का फासला बढ़ गया,
'मानस' रोये , हर रिश्ता अब औपचारिकता में जड़ गया।
लालच का विस्तार
हाथ फैलाकर जो माँगा था, उसे अब भी हम कोस रहे,
'मानस' अपनों के साथ , आज हम खुद को भी खोस रहे।
समय की चाल
धूप ढले, छाँव सिमटी, पर हम भागते ही जाते हैं,
'मानस' वक्त तो वही है, हम ही दिशा भूल आते हैं।
दिखावे का मुखौटा
चेहरे के पीछे जो चेहरा है, वही अब राज करता है,
'मानस' मुखौटों के दौर में कौन सच का साहस करता है?
मानवता का मोल
खून के रिश्ते आज कागज़ों की दरार में बँट गए,
'मानस', हम इंसान होकर भी, पत्थर के लकीर बन गए।
आस्था का बाज़ार
सच्ची श्रद्धा अब भी वही है, जो मौन में बसती है,
'मानस' कहे, शोर-शराबे में तो, बस आस्था ही पिसती है।
अहंकार की ऊँचाई
सोने के महल बना लिए, पर मन की खिड़की बंद कर ली,
'मानस' , हमने दौड़ की खातिर, दुनिया ही चंद कर ली।
सपनों का बोझ
पलकों के पीछे बुनते थे, जो कभी खूबसूरत से ख़्वाब,
'मानस'हकीकत के बाज़ार में, सब बिक गए बे-हिसाब।
मौन की भाषा
शब्दों के कोलाहल में, जो खो गई थी एक खामोशी,
'मानस' आज उसी सन्नाटे में, छिपी है रूह की मदहोशी।
परिवर्तन का शोर
बदलाव के इस दौर में, हमने जड़ें ही काट डालीं,
'मानस'आज उजाड़ के बदले, हमने इमारतें ही पालीं।
स्वार्थ का चोला
परोपकार का चोगा पहनकर, अपना ही गुण गाते रहे,
'मानस' , हम सेवा के नाम पर, खुद को ही बढ़ाते रहे।
समय का अदृश्य हाथ
घड़ी की सुइयों ने तो बस, वक़्त का पैमाना बनाया है,
'मानस' भागते भागते,खुद को खोने का जाल बिछाया है।
अहंकार की ऊँचाई
सोने की ईंटों पर जो हमने, अपने घर का अभिमान बुना,
'मानस' ज़मीन का ऋण भूलकर हमने आसमान ही चुना।
स्मृतियों का अकाल
तस्वीरें तो बहुत हैं गैलरी में, पर दिल में यादें कम हैं,
'मानस' पूछे ये खुशियाँ भी अब महज एक भरम हैं?
शिक्षा और संस्कार
डिग्री की ऊँची डिग्री ने विवेक को ही बौना कर दिया,
'मानस' सादगी के पुराने सच को, हमने कोना कर दिया।
मौन का वजन
शोर भरे इस जग में देखो, मौन अब कोई नहीं सहता है,
'मानस' जो सब कुछ बोल दे, असल में क्या कहता है?
भविष्य की चिंता
कल की चिंता के चक्कर में, आज का निवाला बेस्वाद है,
'मानस' जीने के नाम पर, बस कटने की ही फ़रियाद है।
अहंकार की छाया
खुद को बड़ा समझने की दौड़ में, हम छोटे हो गए हैं,
'मानस' ऊँचाई की चाह में, हम अपनी जड़ें ही खो गए हैं।
वस्तु का मोह
चीज़ें बढ़ती गईं घर में, पर मन का खालीपन नहीं भरा,
'मानस' पाने के चक्कर में, खुद को ही खोने पर धरा।
प्रकृति का मौन प्रतिशोध
हमने पत्थरों की इमारतें तो खड़ी की, पर मिट्टी का अपमान किया,
'मानस' व्यंग्य करे, प्रकृति के आँगन में, हमने काँटों का ही काम किया।
अपनों में अनजानापन
पास बैठे हैं सब, पर मोबाइल की स्क्रीन के पीछे छुपे हैं,
हम सब अब, एक-दूसरे के लिए भी अनजाने रूप हैं।प
उम्मीद का भ्रम
सूरज उगने की खुशी है,पर ढलने का डर क्यों पालते हैं,
'मानस' हम अपनी ही परछाईं को ही खुद ही टालते हैं।
कृतज्ञता का अभाव
जो मिला है उसे भूलकर, जो नहीं है उसके लिए रोते हैं,
'मानस' हम चैन के बदले, बस शिकवे ही ढोते हैं।
बुढ़ापे की उपेक्षा
अनुभव की गठरी ढोते, जो साया कभी साथ चलता था,
'मानस', आज उसी काँपते हाथ को, हर कोई भूलता है।
सत्य का बाज़ार
सच को खरीदने की कोशिश में, हमने ज़मीर को गिरवी रख दिया,
'मानस' व्यंग्य करे, बिकने की इस होड़ में, हमने खुद को ही बिकवा दिया।
परिवर्तन का मायाजाल
नदी की धारा तो वही है, बस हमने रास्ते बदल दिए हैं,
'मानस' हमने सच में, या बस अपने वास्ते, बदल दिए हैं?
इच्छाओं का अंतहीन जाल
प्यास बढ़ती रही, पर हम सागर में भी प्यासे रहे,
' जो पास था उसे छोड़कर, हम दूर की आस में दास रहे।
ज्ञान और घमंड
किताबें तो बहुत पढ़ लीं, पर पढ़ने की कला हम भूल गए,
'फलदार वृक्ष की तरह झुकने के बजाय, हम पत्थर जैसे फूल गए।
धैर्य की कमी
धूप का इंतज़ार किए बिना ही, छाँव की बात करते हैं,
हम तो अब अपने ही कल की, आज ही बारात करते हैं।
अस्तित्व की दौड़
नाम कमाने की इस भीड़ में, हमने नाम ही खो दिया,
'मानस'जो चिराग रोशन था उसे हमने ख़ुद ही डुबो दिया।
भ्रम की बेल
सच की धूप से बचने के लिए, हमने झूठ की छाँव चुनी है,
'मानस' हमने अपनी ही खुशियों की, कटीली बेल बुनी है।
अपेक्षा का काँटा
दूसरों से उम्मीद की हमने, अपना घर सजाने की खातिर,
'खुद की नींव खोदी, किसी और को गिराने की खातिर।
वक्त की तड़प
हाथों से रेत फिसलती रही, हम मुट्ठी कसते ही गए,
'मानस हम वक्त की दौड़ में,अंतिम सांसों तक हँसते गए।
आडंबर का शिखर
मंदिर की ऊँचाई नापी हमने, पर मन के कपाट बंद रखे,
हमने प्रभु के नाम पर, अपने ही अहंकार से छंद रखे।
स्मृति का बोझ
बीते हुए कल की यादें, आज की चौखट पर भारी हैं,
'मानस' क्या ये यादें ही, हमारे वर्तमान की लाचारी हैं?
मौन का उपहास
भीड़ में सब चिल्ला रहे हैं, पर सुन कोई नहीं रहा,
'मानस' , इस दौर में, सच का अब कोई नहीं रहा।
कर्म की विडंबना
फल की चिंता में बीज बोना, हम वक्त से पहले सीख गए,
'मिट्टी का कर्ज चुकाने की जगह, बिकने की तकनीक सीख गए।
परोपकार का प्रदर्शन
दाएं हाथ ने मदद की तो, बाएं ने उसे रिकॉर्ड किया,
'मानस'हमने पुण्य को भी आज,पब्लिसिटी से बोर्ड किया
नींद की दरिद्रता
महंगे गद्दों पर लेटे हम, फिर भी करवटें ही बदलते हैं,
'मानस' , चैन की नींद को अब, हम गोलियों में ढलते हैं।
शब्दों का दिवालियापन
कोश में शब्द तो लाखों हैं, पर भावों का अकाल पड़ा है,
'आज हर एक रिश्ता, बस औपचारिकताओं पर खड़ा है।
अहंकार का आईना
तारीफ़ के आईने में , हम खुद को ख़ुदा समझ बैठे,
'अपनी ही परछाईं के पीछे, हम रास्ता भी भूल बैठे।
अतीत का बोझ
कल की गलतियों को, आज भी माला सा पहनते हैं,
'मानस' हम भविष्य के बाग में, शिकवे ही बोते रहते हैं।
शांति की खोज
शहर की भाग-दौड़ छोड़कर,पहाड़ की शांति ढूँढने चले,
'मानस' , हम अपने अंदर का शोर, साथ ही ले चले।
परिस्थितियों का गुलाम
हालात की बेड़ियाँ पहनकर, आज़ादी का ढोंग करते हैं,
'मानस' हँसे, हम खुद ही अपने ही, पैरों में लोहे भरते हैं।
अनकहा दर्द
भीड़ में हँसते चेहरे के पीछे, एक सन्नाटा पलता है,
इस दिखावे के युग में, हर शख्स अकेले ही जलता है।
अधिकारों का अंधापन
हक माँगने की बारी आई, तो हम दहाड़ कर चिल्लाते हैं,
'मानस'अपना फर्ज निभाने ,हम कोसों दूर भाग जाते हैं।
अनुभव की उपेक्षा
सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊपर गए,नीचे के पायदान भूल गए,
'मानस हम अपनी ही बनाई हुई, पुरानी रवायतें भूल गए।
समय का अदृश्य क़र्ज़
हर घड़ी जो हम काट रहे हैं, वो ज़िंदगी का ब्याज है,
क्या खुद से मिलना ही सबसे बड़ा काज है?
नसीब की चादर
मेहनत को छोड़कर हम, लकीरों को ढूँढते रहते हैं,
हम तो अपनी नाकामियों भी, क़िस्मत का नाम देते हैं।
उपलब्धि का भ्रम
ऊँचाइयों को छू लिया पर, ज़मीन से नाता तोड़ दिया,
'मानस'हमने अपनी जड़ों को ही, राह में कहीं छोड़ दिया।
सांत्वना का खेल
दूसरों को मशवरे दिए, खुद की उलझनें सुलझाने में,
'मानस', हम उस्ताद बने बैठे हैं, औरों को आजमाने में।
परिधान और पहचान
पहने हुए जो कपड़े हमने, वो हैसियत तय करते हैं,
'क्या इंसान की कद्र अब, बस बाज़ार ही तय करते हैं?
मौन की गवाही
सच्चाई अक्सर दबी रहती है, शोर की ऊँची दीवारों में,
'सत्य तो जीता है बस, अनकही सी उन पुकारों में।
स्वप्न का दिवाला
कल जो आग सीने में थी, वो आज बुझी सी राख है।
मानस इस भागती दौड़ में, बस एक अधूरा सा शाख है।
अस्तित्व की तलाश
हम भीड़ का हिस्सा बने रहे, खुद को खोने के डर से,
'मानस' पहचान मिलेगी खुद को, बस अपने ही अंदर से।
तकनीक और तन्हाई
पास बैठकर भी हम 'मैसेज' में बातें बुनते हैं,
'मानस' अब हम धड़कन नहीं, नोटिफिकेशन चुनते हैं।
स्वार्थ का भूगोल
जहाँ दिखे फायदा अपना, वहीं सर झुकाते हैं,
'मानस' हम मतलब के नक्शे खुद ही बनाते हैं।
समय का अदृश्य क़र्ज़
हर सेकंड जो बीता, वह उम्र का एक हिस्सा था,
'मानस', इस भाग-दौड़ में, कौन सा अपना किस्सा था?
पहचान का मुखौटा
आईने में खुद को नहीं, हम अपनी छवि सजाते हैं,
इस फिल्टर की दुनिया में, हम हकीकत भूल जाते हैं।
आस्था का बाज़ार
भीड़ बढ़ी तो लगा, जैसे ईश्वर भी बिकने लगा,
' दिखावे की चकाचौंध में, सादगी का मन सिसकने लगा।
अधूरा संतोष
दौड़ में सबसे आगे हैं, पर सुकून कहीं पीछे छूट गया,
'मानस', जिस लक्ष्य के लिए दौड़े, वही रिश्ता टूट गया।
सुख की अंधी दौड़
दौड़ रहे हैं सब यहाँ, बस एक मुकाम पाने की खातिर,
मानस हमने उम्र गुज़ार दीऔरों कोआजमाने की खातिर।
सुख की परिभाषा बदली, अब घर में दिखावा ही सजा है,
मानस चीख कर बोले, सुकून आज खुद से ही खफा है।
हाथों में हैं दुनिया की ख़बरें, पर मन है कोसों दूर बड़ा,
'मानस' इंसान खड़ा है भीड़ में, पर अंदर से है चूर बड़ा।
बनावटीपन की ओट
चेहरे पर मुस्कान सजी है, पर मन में एक सूनापन है,
'मानस' इस दुनिया में, अब हर रिश्ता ही एक उपवन है।
फूल तो खिलते हैं कागज़ के, खुशबू कहीं खो जाती है,
दिखावें की इस सतह पर, सच्चाई भी शर्मा जाती है।
घर के भीतर कलह पालकर, बाहर शिष्टाचार ओढ़ते हैं,
'मानस'ज़मीन को छोड़कर,हम सपनों के महल जोड़ते हैं।
तस्वीरों में हम चमक रहे, पर रूह कहीं मुरझाई है,
समय गवाही दे रहा, हमने खुशियों की परछाईं बनाई है।
सच बोलने का साहस अब, जैसे एक जुर्म सा लगता है,
'मानस' कहे, इस भीड़-तंत्र में, झूठ ही सबसे चमकता है।
आईना तो बस साफ़ है, पर देखने वाले के इरादे मैले हैं,
मानस इस पन्ने पर, हम सब ही अपने आप में अकेले हैं।
समर्पण
यह 'लोक-दर्पण' समर्पित है, उस हर एक सचेत मन को,
जो भीड़ की अंधी दौड़ में भी, ढूँढता है अपनेपन को।
समर्पित उस राहगीर कोजो खुद की तलाश में निकला है,
सत्य की तीखी धूप में जो, आईने सा निखरा-निखरा है।
समर्पित मौन विवेक को जो दिखावे का शोर नहीं करता,
जोअपनी गलतियों परहँसने का साहस हर बार करता है।
समर्पित है पुरानी यादों को, जो जड़ों का बोध कराती हैं,
उन आने वाले कल कोजो आईना फिर से दिखाती हैं।
और अंत में, समर्पित है स्वयं 'मानस' के उस विचार को,
जो अडिग है, सदा-सर्वदा, सत्य के इस लोक-दर्पण को।
समर्पण: आने वाली पीढ़ी के नाम
यह 'लोक-दर्पण' सौंपता हूँ, आने वाली नई नस्ल को,
जो ढूँढ रही है रोशनी, इस अंधी और धुंधली फसल को।
तुम बढ़ना इस राह पर, पर अपनी नींव को याद रखना,
शोर के बाज़ार में भी, अपने विवेक को आबाद रखना।
हम तो बस एक कड़ी हैं, जो इस जड़ से तुम्हें जोड़ेगी,
यह पुस्तक कल की पीढ़ी केहर भ्रम के पन्नों को मोड़ेगी।
मत गिरना दिखावे की इस कृत्रिम चमक और माया में,
सत्य खड़ा है अडिग आजभी,तुम्हारी अपनी ही काया में।
हमने जो बोया है, उसे अब फल में बदलना तुम,
इतिहास की उन सीढ़ियों पर, साहस से आगे बढ़ना तुम।
मुखौटों इस भीड़ में, अपना असली चेहरा बचाए रखना,
'लोक-दर्पण' के आईने में, खुद को सदा सजाए रखना।
तुम कल का सूरज हो, इस धरा का गौरव बढ़ाना तुम,
जहाँ हम थक कर रुक गए, वहाँ से मशाल जलाना तुम।
यह न सिर्फ शब्द हैंये मेरी पीढ़ी का एक छोटा सा सार है,
इसे सहेज कर रखन,क्योंकि यह सत्य का एक उपहार है।
न डरना भीड़ से तुम, न अकेलेपन से घबरा जाना,
भीतर के उस सत्य को तुम, लोक-दर्पण में खुद ही पाना।
सँभाल कर रखना इसे, आने वाले हर दौर के लिए,
यह विरासत है तुम्हारी, आने वाले हर शोर के लिए।
मिट्टी की सौंधी खुशबू को, अपनी साँसों में बस लेना,
बीते हुए उन पुरखों के, संस्कारों का कर्ज न भूलना।
भीड़ तुम्हें बहकाएगी, पर तुम ठहरे हुए दरिया से रहना,
सुनना दुनिया की सबको, पर अपने मन की ही कहना।
मुखौटों की इस भीड़ में,असली चेहरा बचाए रखना,
'लोक-दर्पण' के आईने में, खुद को सदा सजाए रखना।
गलती हो तो झुक जाना, पर सत्य पर तुम अड़ जाना,
जोअंधकार हम छोड़ गए अपनी ज्योति से उसे जलाना।
उपसंहार: आईने की विदाई
पन्ने ये अब सिमट रहे, पर बात अभी अनकही रही,
'लोक-दर्पण' के सफर में, बस एक छोटी सी नमी रही।
दर्पण हमने दिखाया तुम्हे,अब खुद से तुम खुद को देखो,
भीड़ की इस आपाधापी में, अपने मन का कोना लेखो।
हमने तो बस शब्द पिरोए, सत्य का अक्स सजाने को,
एक आईना रख दिया है, भीड़ से तुम्हें बचाने को।
दोष न देना आईने को, गर चेहरा तुम्हें बुरा दिखे,
सुधार लो अपनी फितरत, गर सच तुम्हें फिर जुदा दिखे।
यह तो केवल एक पड़ाव है, राह तुम्हारी शेष अभी,
भीतर के उस शोर को सुनना, आज की इस रैन कभी।
साफ रखना दिल का शीशा, धूल न इस पर जमने देना,
'लोक-दर्पण' की सीख को, अपने रग-रग में बसा लेना।
अब बंद करो ये पन्ने सारे, पर दृष्टि को तुम खुला रखना,
खुद के ही इस वजूद को तुम, सदा ही तुम तुला रखना।
नाराज़ न होना कभी हमसे, गर सच कड़वा लग जाए,
यह आईना है, न कभी थकता, न ही कभी यह झुक पाए।
संसार का नाटक चलता, बस अपनी भूमिका निभाना,
कभी पथ भूल जाते हो तो लोकदर्पण पर आ जाना।।
manascharcha
।। जय श्री राम जय हनुमान।।
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