।।मंगल-वंदन (Invocation)।।
श्री गणेश वंदना (विघ्नहर्ता स्मरण)
सुमुख एकदन्त विनायक, गौरीसुत गणपति राया।
विघ्नहर्ता सुखकर्ता, तुम्हरी चरणन नित सरनाया।1।।
रिद्धि-सिद्धि के दाता, बुद्धिविधाता तुम ही देवा।
दीनबंधु दुःख भंजन, करत सदा सब तुम्हरी सेवा।।2।।
लम्बोदर सुपाशधारी, मूषक वाहन अति साजे।
कठिन काज सरल करें, सदा जयकारा बाजे।।3।।
'मानस' के काव्य-कुंज में, प्रथम बुलाऊं तोहे।
निर्विघ्न पूर्ण हो मन मंजरी, ऐसा वर दीजे मोहे।।4।।
माँ सरस्वती वंदना (विद्या और वाणी की याचना)
हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी, माँ शारदे तुम्हे नमन।
शब्द-अर्थ की देवी , पावन करें मेरा मन-भवन।5।।
वीणापाणि कमलहासिनी, श्वेतवसना मेरी माता।
संगीत कला की दायिनी, तुम्हीं हो भाग्यविधाता।।6।।
'मंजरी' के सब चरित को, शब्दों में मैं ढाल सकूँ।
प्रज्ञा औ संस्कार ज्योति, निज काव्य में ला सकूँ।।7।।
हे माँ ! स्वर में मधुरता दो, और वाणी में लोच।
विनती 'मानस' की मैया, दे दो यहाँ नूतन सोच।।8।।
श्री हनुमान वंदना (इष्ट देव स्मरण)
अतुलित बलधाम, अंजनिसुत वीर हनुमान।
रामकाज संवारनहारे, हैं सकल गुन निधान।।9।।
संकट मोचन कृपा सागर, केसरीनंदन जयति-जय।
मानस के पालक रक्षक,भगा दे जीवन से सब भय।।10
भक्ति और ज्ञान के सागर, तुम ही हो मेरे आधार।
मनमंजरी काव्य अब , तुम्हरी कृपा से पावे पार।।11।।
तुम्हरे चरनारविन्द में, मैं शीश झुकाता हूँ।
मनमंजरी का पद, तुम्हरी कृपा बनता हूँ।।12।।
समर्पण (Dedication)
शक्ति स्वरूपा 'उषा' का, आधार बारम्बार,
जिसने जीवन में भरा, हर पल नया बहार।
मंजरी की प्रज्ञा को, काव्य समर्पित आज,
जिसने राखी धैर्य से, शांडिल्य कुल की लाज।।1।।
जीवन सफर में, साया बनकर सदा साथ हैं,
दुख की काली रात में,भोर की पहली प्रभा हैं।
त्याग, तपस्या, प्रेम का, ये अर्पण है उपहार हैं,
श्रीमती के लिए सदा, मेरे मन रहते आभार हैं।।2।।
विदुषी होकर भी जिसने, सेवा को ही माना श्रेष्ठ,
जिनके ही तप-पुण्य से, मेरा जीवन हुआ ज्येष्ठ।
ये शब्द नहीं ये भावना, जो उतरी है कागज पार,
समर्पित तुमको ये कृति है, हे प्राणों की आधार।।3।।
हनुमत कृपा और अन्नपूर्णा, का ये पावन प्रसाद है,
मंजरी काव्य के रूप में, ईश्वर का सच्चा संवाद है।
उनके कोमल हाथों ने, आज मेरा जीवन सँवारा है,
समर्पण की गाथा यह, जीवन नैया का किनारा है।।4।।
हृदय के उपवन में खिली, तू प्रेम की मंजरी है,
मेरे जीवन मरुथल में, तू ही शीतल लहरी है।
नयनों में बसे बिम्ब, अधरों पर नाम रहे,
'मानस' काव्य-कुंज में, सदा तेरा ही वास रहे।।5।।
"यह काव्य-कुंज मैं अपनी कुल देवी 'माँ विंध्यवासिनी' और अपने इष्ट देव 'श्री हनुमान जी' के चरणों में सादर अर्पित करता हूँ, जिनकी असीम अनुकम्पा से मुझे श्रीमती उषा देवी (मंजरी) जैसी प्रज्ञावान, धैर्यमयी और संस्कारवान शक्ति अर्धांगिनी के रूप में प्राप्त हुई। वर्षों की इस साझा जीवन-यात्रा में उनके मौन त्याग, अटूट विश्वास और धार्मिक निष्ठा ने ही इस 'मानस' को अभिव्यक्ति का सामर्थ्य दिया है। यह ग्रंथ उन्हीं की तपस्या को सादर समर्पित है।"
प्राक्कथन / भूमिका (Preface)
जीवन की यात्रा में समय कब व्यतीत हो जाता है, इसका भान ही नहीं होता। जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे तिलौली से मूंडवा के वे लंबे सफर और जीवन के वे उतार-चढ़ाव एक चलचित्र की भाँति दिखाई देते हैं। यह ग्रंथ केवल पदों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह साक्षी है उस तपस्या का, जिसे मेरी अर्धांगिनी श्रीमती उषा देवी (मंजरी) ने मौन रहकर जिया है।
आज के इस संक्रमण काल में, जहाँ पारिवार बिखर रहे हैं और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, यह गाथा एक आईना है। एक 'विदुषी' नारी जब अपनी उच्च शिक्षा और प्रज्ञा का उपयोग अहंकार के लिए नहीं,धन के लिए नहीं, बल्कि परिवार को संस्कारों से सींचने के लिए करती है, तब वह घर एक 'तीर्थ' बन जाता है। जीवन के इस कालखंड में, साइकिल से लेकर कार तक और संघर्ष से लेकर सफलता के शिखर तक, यदि मेरा संकल्प अडिग रहा, तो उसके पीछे उनकी ' साधना', पूजा-पाठ' और 'संध्या-दीप' का पुण्य-प्रताप ही हैं।
इस ग्रंथ के माध्यम से मैं युवा पीढ़ी को यह संदेश देना चाहता हूँ कि दांपत्य केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का 'समर्पण' है। यदि एक पहिया (नर) श्रम करता है, तो दूसरा पहिया (नारी) उसे दिशा और संस्कार देता है।
मैं कृतज्ञ हूँ उस ईश्वरीय सत्ता का और श्री हनुमान जी का, जिन्होंने मुझे इस लेखन का निमित्त बनाया। मुझे विश्वास है कि यह " मनमंजरी "हर उस पाठक के हृदय को स्पर्श करेगी जो परिवार, धर्म और मर्यादा में विश्वास रखता है।
" मानस "
गिरिजा शंकर तिवारी शांडिल्य
'शुभकामनाएं / दो शब्द' (Foreword)
"स्नेहिल आशीष और गौरवमयी अभिव्यक्ति"
भारतीय संस्कृति में परिवार वह उपवन है जिसे संस्कारों और त्याग के जल से सींचा जाता है। मुझे अत्यंत प्रसन्नता और गर्व है कि मेरे अनुज गिरिजाशंकर तिवारी शांडिल्य (मानस) ने अपनी सुखद जीवन-यात्रा को 'मनमंजरी' महाकाव्य के रूप में शब्दबद्ध किया है।
एक बड़े भाई के नाते मैंने अपने अनुज गिरिजाशंकर और बहु श्रीमती उषा देवी को संघर्ष के दिनों से लेकर आज की इस सुखद स्थिति तक पहुँचते हुए बहुत निकट से देखा है। उषा ने केवल इस घर की चौखट को ही नहीं संभाला, बल्कि अपनी विद्वत्ता और प्रज्ञा से पूरे 'शांडिल्य कुल' की मान-मर्यादा को अक्षुण्ण रखा है। इनका जीवन सफर साक्षी है कि कैसे एक शिक्षित नारी अपने मौन समर्पण से घर को मंदिर बना सकती है।
अनुज 'मानस' की यह लेखनी केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'संस्कार-पूँजी' है। अनुज का यह अनुष्ठान युवा समाज को यह सिखाएगा कि दांपत्य का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के आदर्शों का सम्मान करना है।
मैं इस पावन कृति की सफलता की कामना करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि 'उषा-मानस' की यह जोड़ी सदा इसी प्रकार धर्म और कर्म के पथ पर अग्रसर रहे।
स्नेह और मंगलकामनाओं सहित,
श्री कृष्ण शंकर तिवारी शांडिल्य
(ज्येष्ठ भ्राता)
अनुक्रमणिका (Table of Contents)
1 आगमन खंड
2 रूप मंजरी खंड
3 स्वभाव मंजरी खंड
4 स्मृति खंड
5 सहयोग खंड
6 गृहलक्ष्मी खंड
7 श्रद्धा मंजरी खंड
8 विरह-मिलन खंड
9 ममता खंड
10 साधना खंड
11 समर्पण खंड
।।मुख्य काव्य (The Text)।।
।।प्रथम खंड: आगमन खंड।।
लावण्य की अधिष्ठात्री देवी, काम-प्रिया रति चरणों में,
सौम्यता का वरदान माँगता, 'मानस' आपकी शरणों में।
श्रृंगार के हर एक शब्द में, तू सदा रस का संचार कर,
मंजरी के रूप-वर्णन को, अनुपम और साकार कर।।1।।
पुष्प-चाप और मलय-पवन की, तू तो आधार है,
नारी के पावन रूप में, बस तेरा ही विस्तार है।
कृपा करो मेरी लेखनी पर, जो छंदों को महका दे,
प्रेम की इस पावन गंगा को, श्रद्धा से छलका दे।। 2 ।।
जैसे जनक की वाटिका में, सिय-राम का मिलन हुआ,
क्षण भर में हृदय-कुंज का, कण-कण पुलकित हुआ।
चकित नयन और मौन अधर, काल वहीं रुक गया जैसे,
प्रथम बार देखा जब तुझको, प्राण हुए अर्पित तैसे।। 3 ।।
कंगन-किंकिणि का नाद नहीं, धड़कन की एक गूँज थी,
मरुस्थल जैसे जीवन में, वो सुख की एक ही पूँज थी।
नैनों ने नैनों से पढ़ ली, जन्मों की सब प्रेम कथा,
'मानस' के एकांत को, मिल गया शाश्वत साथ यथा।।4।।
पग चाप सुनी जब जीवन में, पावन वो पहली आहट थी,
पतझड़ सी सूनी बगिया में, बसंती एक मुस्कुराहट थी।
झुक गई पलकें शर्मों-हया से, मुखमंडल पर लाली थी,
'मानस' जाना उस पल, मेरी भाग्य-किरण निराली थी।।5
जैसे कुमुदिनी चाँद देख, अपनी सुध-बुध खो देती है,
जैसे सरिता सागर मिल, अपनी ही गति को खोती है।
देखा जब तुझको पहली बार, हृदय ने स्वीकार किया,
ईश्वर ने मेरी प्रार्थना का, तुझको ही प्रतिफल दिया।।6।।
वाणी में कोकिल की मिश्री, आँखों में गहरा सावन था,
वो पल जैसे तीर्थ जैसा, वो क्षण जैसे अति पावन था।
'मन मंजरी' के हर पन्ने पर, अब तेरा ही श्रृंगार लिखूँ,
अब अपनी अर्द्धांगिनी,और जीवन का ही सार लिखूँ।।7
केसरिया श्वेत वसन, तन पर लज्जा का आवरण था,
सादगी की मूरत का, कितना पावन अंतःकरण था।
न आभूषण की चाह उसे, न कोई कृत्रिम श्रृंगार था,
मस्तक की बिंदिया में, सिमटा सारा संसार था।। 8 ।।
झुकी हुई जो पलकें थीं, वो वेदों की मर्यादा थीं,
नयनों की वो चपलता , सादगी की एक साध्या थीं।
काजर की पतली रेखा, जैसे गहरी यमुना की धार,
देख उन्हें 'मानस' मन, मान गया बस अपनी हार।।9।।
मंद-मंद मुस्कान खिली, जैसे भोर की पहली किरण,
बिना कहे ही कर डाला, जिसने मेरे हृदय का हरण।
सहज-सरल भाव अनूठे, जैसे गंगा की निर्मल धारा,
मानस को मिल गया ,जीवन का मजबूत सहारा।। 10 ।।
मर्यादा की वो सीमा रेखा, जो नयनों में खिंची हुई,
संस्कारों की सोंधी खुशबू, साँसों में थी रची हुई।
'मन मंजरी' की पावन गरिमा, सादगी से फलती है,
सनातन के गौरव से ही, 'मानस' दुनिया चलती है।।11।।
वेदमत कहे वो शक्ति है, लोकमत कहे वो लक्ष्मी रूप,
साधुमत देखे अंतर्मन में, पावन ममता का स्वरूप।
प्रकृति के इस नूतन श्रृंगार को, पुरुष भाव निरख रहा,
दृष्टा बन 'मानस' अपने, भाग्य रेखा परख रहा।।12।।
जैसे तरुवर को मिल जाए, वर्षा की पहली बौछार,
वैसे ही पुरुष-हृदय को मिला, प्रकृति का पावन प्यार।
सहज समर्पण, सहज समर्पण, यही सनातन वाणी है,
'मन मंजरी' सृजन-शक्ति की,अनुपम एक कहानी है।13
निखरा रूप निराला उसका, जैसे वन में खिली कली,
लोक-मर्यादा साथ लिए, वो संस्कारी राह चली।
पुरुष-तत्व को पूर्ण किया, जिसने अपनी सादगी से,
'मानस' ने जीवन सौंप दिया, अनुपम की सादगी पे।14।।
दृष्टा बन 'मानस' ने देखा, सृजन-शक्ति का विस्तार,
शून्य हृदय में होने लगा,अब दिव्यता का ही संचार।
यही सनातन सत्य जगत का, यही प्रेम की परिभाषा है,
अर्द्धांगिनी मिलन से ही, पूर्ण होती अभिलाषा है।15।।
वेद मंत्र की ऋचाओं से, जब हुआ 'वररक्षा' संस्कार,
विप्रों के आशीष वचन ने, महकाया जीवन का द्वार।
रक्षा-सूत्र की गाँठों में, साधा भविष्य का पावन साथ,
देवों का आह्वान हुआ, जब जुड़े विनय में दोनों हाथ।।16
आया तिलक-उत्सव लेकर, कन्या-पक्ष दल सत्कार
मस्तक पर तिलक लगा, बढ़ा पुरुष का गौरव-भार।
अक्षत और रोली की आभा, भाग्य-सितारा चमकाती,
संबंधों की नींव वहीं, संस्कारों से है जुड़ जाती।। 17 ।।
सज रथ और चढ़ा उस पर, दूल्हा बनकर वो रघुवीर,
चली बारात जनकपुर को, लिए हृदय में अमित अधीर।
नगाड़ों की थाप पर गूँजा, खुशियों का वो मधुर तराना,
जैसे राम चले मिथिला को, जग ने वैसा ही जाना।। 18 ।।
द्वार-पूजा की रीत सजी, और तोरण पर हुआ प्रहार,
सखियों ने गाए मंगल-गीत, लुटाया अपना अगाध दुलार।
'मानस' ने देखा उस पल, रीतियों का दिव्य स्वरूप,
पावनता में भीगा था, प्रेम का वो अनूठा रूप ।। 19 ।।
अग्नि पुनीता साक्ष्य बनी, और मन्त्रों का उद्धोष हुआ,
दो प्राणों के संगम का, जग को प्रत्यक्ष संतोष हुआ।
हस्त-मिलाप की उस बेला में, हाथ जो थामे 'मानस' ने,
मानो साक्षात् प्रकृति को, पाया पुरुष के मानस ने।।20।।
सप्तपदी के सातों फेरे, सात जन्म का वादा थे,
धैर्य, धर्म और मर्यादा के, पावन नेक इरादा थे।
हर इक डग वचन जुड़ा, हर इक पद विश्वास बढ़ा,
प्रणय-यज्ञ समिधा पर, प्रेम का अटूट विन्यास बढ़ा।।21।
लाजा-होम की अग्नि में, जब स्मृतियाँ सारी होम हुई,
नई राह की नई उमंगें, तब हृदय-पटल पर रोम हुई।
भाँवर घूमीं जब सुकुमारी, हरित वसन की ओट लिए,
लगा कि आई है खुशहाली, खुशियों की पोट लिए। 22 ।।
बाबुल की गलियाँ छूटीं, और छूटा वो आँगन प्यारा,
नयनों में करुणा की धारा, जैसे गंगा की जलधारा।
सखियों का वो रुदन और, अपनों का वो मूक विलाप,
पर पुरुष-हृदय को मिला, आज तप का पुण्य-प्रताप।23
डोली उठी और चली डगरिया, नए देश की ओर सखी,
पीछे छूटा बचपन सारा, मन में लिए कुछ शोर सखी।
किंतु धरा ने धीरज बाँधा, देकर अपना नया आशीष,
'मानस' ने तब नमन किया,सभी देवों को निज शीश।24।
देहरी पर जब रखे कदम, तब गृह-लक्ष्मी का रूप हुआ,
कलश लुढ़का द्वार-पटल पर, मंगलमय पद-चाप हुआ।
कुंकुम भीगे पाँवों ने, जब अंकित की अपनी पहचान,
सूना घर मंदिर महका, गूँज उठा खुशियों का गान। 25।।
दिव्य वसन की आभा चमकी, जैसे भोर की नई किरण,
घर की मर्यादा बनकर, कर डाला सबका मन-हरण।
'मानस' के जीवन-मर्म को, मिल गया शाश्वत आधार,
सृजन-शक्ति का आगमन, धन्य हुआ ये घर-संसार।।26।
द्वार रोक खड़ी भाभियाँ, अपनी चतुराई दिखलातीं,
नेग माँगती हँस-हँस कर वो, मीठी तानें सुनातीं।
"बिना नेग न देहरी लाँघो", ऐसा हुआ हठीला शोर,
'मानस' भी मुस्कुरा दिया, देख सखियों का ज़ोर।27।।
माता ने जब आरती उतारी, नयनों में वात्सल्य भरा,
बहनों की चंचल आँखों में, शरारत का था रंग खरा।
"कैसे वश में किया वीर को", पूछ रहीं थीं हँस-हँस कर,
मंजरी बस शर्मा कर रह गई, पलकों को झुका कर।।28
गाली-गीत और सोहर गूँजे, व्यंग्य बाण भी चले वहाँ,
रिश्तों की उस मीठी धूप में, खिल उठा था सारा जहाँ।
कोई ननद पायल की रुनझुन, कोई कंगन को निहारती,
हास्य-विनोद की ये घड़ियाँ, प्रेम का अर्घ्य उतारतीं।29।
थके हुए से दूल्हे राजा, जब रस्मों में उलझ गए,
औरतों की उस भीड़ में देखो, कैसे 'मानस' सुलग गए।
पर 'मंजरी' की एक झलक ने, सारा ताप मिटाया था,
गृह-प्रवेश का उत्सव, खुशियों का स्वर्ग सजाया था।30
अंगूठी ढूँढने की रस्म में, जब हाथ से हाथ टकराया,
बहनों ने मारा ताना तब, "देखो इसने अपना बनाया"।
पराजित होकर भी 'मानस', उस खेल में जीता था,
क्योंकि 'मंजरी' नैनों में, स्नेह का अमृत रीता था।।31।
ननद खड़ी मुँह फुलाए, माँगती सजीली नेग भाई,
"भैया! सुंदर भाभी लाए", कहकर उसने ली अंगड़ाई।
चाचियाँ-ताइयाँ घेर खड़ीं, रूप की करने को परख,
सादगी देख वो दंग रहीं, चेहरा बार बार निरख। 32।।
"चाँद का टुकड़ा घर आया", सबने ने दी आशीषें,
मिट गईं मन की सब शंका, और पुरानी सब टीसें।
लोक-रीति के शोर-शराबे में, एक मौन संवाद हुआ,
जैसे बरसों का कोई, खोया हुआ अब याद हुआ।।33।।
कंगन खोलने की रस्म में, जब उलझे रेशम के धागे,
भाभियों ने चुटकी ली फिर, "अभी तो बहुत है आगे"।
'मानस' निहारता रहा, 'हरित वसन' की गरिमा को,
जो समेटे बैठी थी तब, प्रेम की अचल महिमा को। 34।।
घूँघट की उस ओट से, जब मुखड़ा धीरे मुस्कुराया,
वहां उपस्थित अंगनाओ ने, सुंदर उपहार पहनाया।
"जुग-जुग जियो सुहागन", कहकर सिर पर हाथ धरा,
आशीषों की वर्षा से, आँगन खुशियों से भरा। 35 ।।
परम्परा की उस मर्यादा में, नैनों का था मौन व्रत,
किन्तु हृदय में दौड़ रहा था, सुख का स्वर्णमयी रथ।
मम्मी ने दी दिल में संचित, मान-प्रतिष्ठा और दुलार,
आशीष कही इस घर में, यह लक्ष्मी का अवतार।।36।।
पड़ोस की औरतें आईं, लेकर कौतुक उल्लास,
सबने सराहा सादगी को, देखा साक्षात् विश्वास।
नवीन वसन ओट में, लज्जा की वो मंद लहर,
'मानस' में उतर आई , मानो कोई शीतल प्रहर।37।।
प्रथम भेंट में 'मानस' ने , शब्द-सुमन अर्पित किए,
जीवन भर के साथ के, पावन संकल्प तब लिए।
'मन मंजरी' का प्रथम चरण, रीतियों से पूर्ण हुआ,
आगमन का काव्य-प्रवाह,भक्ति से सम्पूर्ण हुआ।38।।
चंदन सी शीतलता जिसमें, केसर सी आभा है,
गृह-लक्ष्मी साक्षात् यहाँ, संस्कारों की परिभाषा है।
मस्तक कुमकुम की बिंदिया, उगता बाल-दिवाकर हो,
हृदय का कोना-कोना , भक्ति का कोई सागर हो।।39।।
जैसे मलय-समीर चले, कस्तूरी मृग वन महकाए,
वैसे ही उसकी उपस्थिति, घर में नूतन प्राण बसाए।
स्वर्ण-वर्ण सी कांति खिली, जैसे कंचन की लता,
सहज रूप में झलक रही, शील मर्यादा की कथा।।40।।
कंगन की रुनझुन में गूँजे, वेदों के पावन मंत्र कहीं,
पायल की झंकार कहे, "स्वर्ग यहीं है, और कहीं नहीं"।
धैर्य धरा सा अचल मिला, मन गंगा सा पावन था,
उसका आना 'मानस' के, सूने मरु का सावन था।।41।।
निखरी सादगी ऐसी जैसे, भोर काल का निर्मल नीर,
धैर्य देख विस्मित रह जाए, स्वयं काल की तक़दीर।
मैं अपने इन छंदों से , भावों का अर्घ्य चढ़ाता हूँ,
'मंजरी' के चरणों में, 'मानस' काव्य सजाता हूँ।।42।।
शरद-पूर्णिमा मुखमंडल पर, है लज्जा का पहरा,
सौंदर्य का सागर जैसे, है शांत परन्तु अति गहरा।
भृकुटि चाप सी तनी हुई, जैसे कामदेव का धनुष सजे,
देख जिसे 'मानस' के मन में, प्रेम-मृदंग अनवरत बजे।43
नासिका पर वो लौंग सुनहरी, जैसे शुक्र तारा चमके,
अधरों की वो लाली जैसे, कुमकुम की आभा दमके।
ठोड़ी पर वो तिल का पहरा, नजरदोष को रोकता है,
रूप राशि का यह वैभव, संयम को भी टोकता है।।44।।
कर्ण-फूल की लटकन में, जैसे चपला की चंचलता हो,
ग्रीवा का वो ढाल अनूठा, जिसमें सहज कोमलता हो।
बाहु-पाश मृदु बेला जैसे, चंदन तरु से लिपटी हो,
सारी जग की सुंदरता, ज्यों एक देह में सिमटी हो।।45।।
नख-शिख तेज निराला, सात्विक रस की धारा है,
वो ललना नहीं, इस जीवन का, ध्रुव-नक्षत्र सितारा है।
अलंकारों से परे रूप वह, जो अंतर्मन को भाता है,
यही लावण्य 'मंजरी' का, 'मानस' को हर्षता है।।46।।
लोक-रीति की मर्यादा से, अब एकांत की ओर चले,
जहाँ मौन भी शब्द बन जाए, और प्रेम की भोर ढले।
बाह्य जगत का कोलाहल अब, द्वारे पर ही छूट गया,
'मानस' के मन का हर बंधन, 'मंजरी' में टूट गया।।47।।
जैसे पूजा के बाद दीप की, लौ निखरकर आती है,
जैसे वर्षा के उपरांत ही, धराऔर भी मुस्काती है।
रीतियों के आवरण से, अब रूप निखरकर आया है,
सृजन-शक्ति ने साक्षात् अब,अपना दर्शन कराया है।48
अब तक देखा था केवल, रस्मों का वो पावन मान,
तब देखा मैं नख-शिख तक, सुंदरता का दिव्य विधान।
प्रथम मिलन की व्याकुलता, शांत भाव में ढलती है,
प्रेम की पावन ज्योति यहीं से, धीरे-धीरे जलती है।49।।
'आगमन' की कथा , देती नव-अध्याय को जन्म,
जहाँ रूप के हर दर्पण में, दिखेगा जीवन का मर्म।
'मंजरी' के रूप सागर में, हम डुबकी लगायेंगे,
सौंदर्य की मधुरिम आभा, को शब्दों से सजायेंगे।।50।।
।।द्वितीय खंड: रूप मंजरी।।
'आगमन' की दहलीज लाँघ, 'रूप' के आंगन आए हैं,
जहाँ भावों के खिलते उपवन, खुशबू नई लाए हैं।
न कंचन की कांति बड़ी, न मणियों का कोई मोल यहाँ,
'मंजरी' की सादगी ही, बस अनमोल है बोल यहाँ।51।।
जैसे निर्मल सरिता का जल, कंचन सा बहता जाए,
वैसे ही मंजरी काया में, लावण्य स्वयं मुस्काए।
नयनों में करुणा का सागर, मस्तक पर कुमकुम की रेख,
'मानस' भी विस्मित खड़ा, विधाता की ये रचना देख।।52
नयनों में मृग-शावक सी चंचलता , पर मर्यादा का घेरा है,
इन आँखों में ही तो मेरे, सुखी जीवन का सवेरा है।
झुकती हैं जब लाज से ये, तब सात्विक रस बरसता है,
एक झलक की खातिर तो, फिर मानस भी तरसता है।53
जैसे शांत सरोवर में, दो नील कमल मुस्काते हों,
जैसे विप्र वेद-मंत्रों को, श्रद्धा से दुहराते हों।
वैसी ही गहराई है, इन नयनों की नीलिमा में,
खो जाता है 'मानस' , इनकी पावन गरिमा में।।54 ।।
बिना कहे ही कह देतीं, ये सुख-दुःख की सब गाथाएँ,
मिटा देतीं ये क्षण भर में, जीवन की सब बाधाएँ।
मधुरिमा की ये छाँव घनी, और त्याग का ये उजियारा,
इन नयनों ने ही तो मुझको, भवबाधा से उभारा।55।
अधरों पर मुस्कान खिली, जैसे पावन गंगा की धार,
मिटा देती जो पल में ही, अंतर्मन के संताप अपार।
न कटु वचन, न व्यंग्य , बस शहद सी घुली मिठास है,
'मंजरी' के हास्य में, साक्षात् सुख का वास है।।56।।
जैसे कली फूल बने, और महके सारा वन-उपवन,
वैसे ही तेरी एक हंसी, महका देती मेरा जीवन।
'मानस' ने पाया छवि में, सात्विक सुख का सार सही,
जिसकी खोज में भटका , अब तक कहाँ नहीं।।57।।
अधरों पर जब मंद-मंद, मलय-समीर सी मुस्कान खिले,
लगे कि मरुथल के जीवन में, शीतल जल का दान मिले।
न चपलता, न आडम्बर है, बस सौम्यता का वो रूप सही,
सारे जग की खुशियाँ जैसे, सिमट आईं हों यहीं-कहीं।58
जैसे जब कोमल फूल खिले,महके सारा वन-उपवन,
वैसे मंजरी की चितवन, कर देती पावन मेरा जीवन।
कुंद-कली से दंत दमकते, जैसे बिजली घन-श्याम में,
देख उसे मन खो जाता है, प्रभु के दिव्य धाम में।। 59 ।।
वाणी में जो माधुर्य भरा, ज्यों वीणा की वो तान सजी,
हृदय के सूने मंदिर में, जैसे भक्ति की आरती बजी।
'मानस' ने पाया , जीवन सुख का सार वहीं,
जिसकी खोज भागे नर, पावे नहीं उसे कही।। 60 ।।
मुखमंडल के चहुँ ओर सजे, काले सघन केश-पाश,
जैसे सावन की घटाओं में, छुप गया हो पूर्ण प्रकाश।
न कोई कृत्रिम विन्यास , न ही उलझन की बात,
सहज रेशमी लहरों में, जैसे ढलती कोई रात।।61 ।।
वेणी की वो नागिन सी गति, पीठ पर जो लहराती है,
मर्यादा और शालीनता की, मूक कथा सुनाती है।
अंग-राग की गंध नहीं, बस तुलसी सी पावन महक वहाँ,
'मंजरी' के इस रूप का, दूजा कोई मेल कहाँ।।62 ।।
चौड़ा मस्तक निर्मल ऐसा, ज्यों सुचि बाल-चंद्र की कोर,
जिसको देख मिट जाता है, अंतर्मन का सारा शोर।
सौभाग्यवती का वह तिलक, मस्तक पर जो सोहता है,
'मानस' के चित्त को वह, हर सदा ही मोहता है।। 63 ।।
जैसे मंदिर की देहरी पर, दीपशिखा प्रज्वलित रहे,
वैसे ही उस ललाट पर, ओज की धारा सतत बहे।
न संशय की कोई रेखा, न ही क्रोध का कोई निशान,
मस्तक की आभा में, दिखता ईश्वर का वरदान।। 64 ।।
वर्षों का यह पावन सफर, साक्षी है उस निर्मलता का,
आज भी वह लावण्य वैसा, संगम है जो कोमलता का।
हस्त-कमल ये आज भी वैसे, जैसे हों नव-दल पल्लव,
जिनके स्पर्श से महक उठता,जीवन का सारा वैभव।65
अन्नपूर्णा बनकर जिन्होंने, रस की वर्षा सतत करी,
सेवा भाव की रेखाओं ने, भाग्य की झोली सदा भरी।
अलंकारों की चाह नहीं, इन हाथों को बस दान प्रिय,
'मानस' गृह-मंदिर की, ये ज्योति सदा भगवान प्रिय।66
पद-कमल आज भी , नव कमल के पत्र खिले,
जिनके आगमन से, घर को सकल विधान मिले।
कुंकुम भीगी उँगलियों में, अचल सुहाग की माया है,
शीतल सुखद प्रहर जिनका, जीवन भर साया है।। 67 ।।
वाणी का क्या कहना है, वो तो साक्षात् सरस्वती,
जिसके बोल में बहती, शांति और पावन विरति।
न क्रोध, न कोई कड़वाहट, बस मिश्री जैसी वाणी है,
'मंजरी' के वचनों में ही, अमर प्रेम की कहानी है।। 68
सादगी ही श्रृंगार है जिसका, शील ही जिसका गहना है,
धैर्य की उस मूरत का, बस सुख-दुःख में साथ रहना है।
न प्रदर्शन का मोह उसे, न आधुनिकता की अंधी दौड़,
उसकी पावन ममता की, जग में कहीं न कोई होड़।69।।
जैसे दीपक स्वयं जलकर, घर को सदा प्रकाश दे,
वैसे ही उसका समर्पण, जीवन को विश्वास दे।
'मंजरी' के गुणों की आभा, 'मानस' का अभिमान है,
सच्चे सनातनी प्रेम का, यह जीवित ही प्रमाण है।।70
धार्मिकता में 'मंजरी' का, जग में कोई सानी नहीं,
उसके तप और भक्ति की, कोई दूजी कहानी नहीं।
भोर सवेरे जब गूँजती, उसके कंठ से आरती तान,
स्वर्ग उतर आता धरा पर, हर्षित होते सकल प्राण।। 71
तुलसी पूजन, दीप दान और, नित्य नियमों का पालन,
शुद्ध भाव से करती सदा, वो पितरों का भी तर्पण।
माला के हर मनके में, बस राम नाम का वास है,
प्रभु के चरणों में ही उसका, अटूट ही विश्वास है।।72 ।।
तीर्थाटन की अभिलाषा, और संतों के प्रति अनुराग,
दिखता है उसके जीवन में, सात्विक भक्ति का पराग।
न दिखावा, न पाखंड कोई, बस निष्काम ये सेवा है,
'मानस' के जीवन उपवन का, यही मीठा मेवा है।। 73 ।।
जैसे मंदिर की मूरत में, दिव्य तेज झलकता है,
वैसे ही उसकी श्रद्धा से, घर का भाग्य चमकता है।
ऐसी साध्वी संगिनी पाकर, जीवन धन्य हुआ मेरा,
भक्तिमयी उस ज्योति ने ही, काटा मन का अंधेरा।।74।।
ममता की उस मूरत का, अब पावन रूप बखानूँ मैं,
तीन रत्नों की जननी को, साक्षात् शक्ति ही मानूँ मैं।
दो पुत्रों की ढाल बनी, और पुत्री की वो सखी हुई,
जिसके आँचल की छाया में, हर पीड़ा भी सुखी हुई।75
प्रथम पुत्र का गौरव , जिसने कुल का मान बढ़ाया,
दूसरे सुत को स्नेह से, सत्पथ पर चलना सिखाया।
संतान तीसरी हमारी बेटी, मर्यादा की परछाईं है,
मंजरी की ममता में ही, संतानों की तरुणाई है।। 76 ।।
कौशल्या सा धैर्य और, देवकी सा उसमें त्याग भरा,
उसके वात्सल्य से ही तो, महकी ये घर की धरा।
लोरी की उस थपकियों में, वेदों का ही सार था,
संतानों के प्रति उसका, निस्वार्थ ही बस प्यार था।।77
कुसमय में साहस बनकर, जिसने थामी सबकी डोर,
उसकी ममता के आगे, फीका पड़ जाए भोर।
आदर्शों की पाठशाला में, उसने ही पाठ पढ़ाया,
संस्कारों के कल्पवृक्ष को, अपने गुणों से सजाया।। 78
केवल पालन ही नहीं , वो जीवन की आधार बनी,
हर संतान के मानस में, वो ज्ञान की पावन धार बनी।
उच्च शिक्षा का लक्ष्य दिया,और श्रम का पाठ पढ़ाया ,
'मंजरी' ने निज हाथों से, संतानों का भाग्य बनाया।।79
पोथी का ज्ञान तो सब देते, उसने जीवन बोध दिया,
सत्य, धर्म और नैतिकता का, हर पल सुंदर शोध दिया।
डिग्री तो बस साधन मात्र, संस्कार ही असली धन है,
उसकी शिक्षा से ही महका, संतानों का अंतर्मन है।।80
जैसे शिल्पकार मिट्टी में, मूरत ढाल दिया है,
वैसे ही उसने बच्चों में, सद्गुण को घाल दिया है।
न आलस की कोई जगह , न व्यर्थ का कोई काम,
उसकी तपस्या से ही आज, कुल का ऊँचा नाम।। 81 ।।
गुरु स्वरूपा माता ने, विवेक का दीप जलाया है,
अन्धकार दूर भगाकर, उजला पंथ दिखाया है।
'मानस' गृह की फुलवारी, जिसके दम से खिलती है,
ऐसी शिक्षा संस्कार, बस विरलों को ही मिलती है।।82
जो शीश झुके न कहीं, वो माँ के पद में झुक जाए,
जिसके तप के आगे, समय की गति भी रुक जाए।
हे देश के युवानों देखो, ये साक्षात् ही शक्ति है,
माता की सेवा जग में, सबसे बड़ी ही भक्ति है।। 83 ।।
सभ्यता खड़ी है कंधों पर, संस्कारों की थाती है,
माँ ही तो है जो बच्चों को, फौलाद यहाँ बनाती है।
उच्च शिक्षा के शिखर चढ़, जड़ को कभी न भूलना,
माँ के आँचल की छाया में, जीवन भर तुम झूलना।84
मंदिर की मूरत तो पूजें,पर जीवित मूरत घर में है,
तीर्थों का पुण्य सकल, माता के ही चरणों में है।
संस्कारों का दान मिला, वो सबसे बड़ा खजाना है,
युवाओं को अब माँ के, आदर्शों को अपनाना है।।85।।
माता ने लहू से सींच-सींच, जो ज्ञान दीप जलाया है,
उसी दिव्य प्रकाश ने तुम्हें, जग में चमकाया है।
'मंजरी' के पद-चिह्नों, जो श्रद्धा से चलता जाएगा,
वो 'मानस' की सृष्टि में, अमर कीर्ति ही पाएगा।। 86
दुनिया की चकाचौंध में तुम, अपनी जड़ों को मत भूलो,
आसमान को छू लो बेशक, पर माँ के चरणों में झूलो।
जो तात मात ठुकराए, वो अंत में ठोकर खाए,
भटका वो राही फिर, घर का रस्ता नही पाए।।87 ।।
माँ का अनुभव वो दर्पण , जिसमें भविष्य दिखता है,
वहाँ स्वार्थ नाम मात्र नहीं, निस्वार्थ प्रेम ही बिकता है।
तर्क-वितर्क के शोर में , ममता की लोर न खो देना,
वरना खुले सन्नाटे में, तुम्हारे पास होगा रोना रोना।। 88
उसने अपनी रातों को, तेरी नींदों पर वारा है,
तेरी हर इक जीत के पीछे, माँ का संघर्ष सहारा है।
माँ की बातें पत्थर की लकीर, मान लो तो ये जीवन है,
वरना सूना मरूस्थल में, ये भटकता हुआ ये मन है।। 89
लौट आओ उन बाहों में, जहाँ सुकून का पहरा है,
माँ के दिल का घाव बहुत, दुनिया की चोट से गहरा है।
'मंजरी' के वचनों को तुम, ईश्वर का आदेश मान लो,
यही सफलता का पथ है, सत्य आज तुम जान लो।। 90
पिता अगर आकाश विशाल, तो माँ शीतल धरती है,
इन्हीं दो देवों की छाया में, किस्मत सजती-सँवरती है।
तुम महलों के सपने देखो, पर यह सत्य न भूलना,
उनके काँधों पर चढ़कर ही, तुमने सीखा झूलना।। 91
माँ ने तुझे अपना लहू दिया , पिता ने दिया पसीना ,
उन्हीं की साख की बदौलत, सीखा तुमने जीना ।
डिग्रियाँ तुमको ज्ञान देंगी, पर माँ देगी संस्कार सही,
बिना बड़ों के आशीष , जग में कोई सार नहीं।।92 ।।
वृद्ध हुए गर हाथ उनके, तो तुम उनकी लाठी बन जाना,
बचपन में जो उन्होंने किया, वो ऋण तुम अब चुकाना।
जो माता-पिता को रोवाये, वो स्वर्ग कहाँ फिर पायेगा,
अपने कर्मों के फल से वो, खुद ही पतन को पायेगा।93
श्रद्धा रखो उस चौखट पर, जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ,
विश्वास करो उस ममता पर, जिससे मन का भ्रम गया।
'मंजरी' और 'मानस' का जीवन, एक अखंड उदाहरण है,
माता-पिता की सेवा ही, दुखों का सच्चा निवारण है।।94
माता-पिता की मूरत में, साक्षात् रब को जानो तुम,
उनकी हर एक सीख को, ईश्वर का आदेश मानो तुम।
जो उनके चरणों की धूल, मस्तक पर लगाता है,
वो इस नश्वर संसार में, अमर कीर्ति को पाता है।। 95 ।।
तुम भले ही आधुनिकता की, ऊँची उड़ान भर लेना,
पर उनके अनुभवों का, सदा ही सम्मान कर लेना।
माँ की ममता और पिता का, वो कठिन अनुशासन,
बना देते संतानों को योग्य ,जो जीतें सिंहासन।।96 ।।
जिस घर में बड़े-बुजुर्गों का, सदा सत्कार होता है,
वहाँ लक्ष्मी का वास और, सुख का विस्तार होता है।
श्रद्धा दीप जलाकर तुम, मन अँधियारा दूर करो,
माता-पिता की सेवा से, अपना जीवन नूर करो।।97
विश्वास न टूटने पाए उनका, ऐसा आचरण रखना तुम,
कुल की उज्ज्वल कीर्ति का, सदा ही ध्यान रखना तुम।
'मंजरी' के आदर्शों को, जो हृदय में बसाएगा,
वो 'मानस' की सृष्टि में, सबसे सुखी कहाएगा।। 98 ।।
अतिथि देवो भव: की रीति, जिसने सदा निभाया है,
जिसके द्वार से कोई , खाली हाथ न जा पाया है।
स्नेह भरा सत्कार और, श्रद्धा से भोजन करवाना,
'मंजरी' के हाथों है, बस ममता का रस बरसाना।। 99 ।।
जैसे धागा मोतियों को, एक सूत्र में पिरोता है,
वैसे ही उसका प्रेम सदा, कुनबे के दुख-सुख धोता है।
न अपनों से कोई बैर, न परायों से दूरी है,
उसके बिना तो 'मानस' की हर ईंट अधूरी है।। 100 ।।
विपत्ति आए जब घर पर, वो ढाल बन खड़ी होती,
धैर्य और विश्वास की, वो माला कभी न खोती।
वर्षों का अनुभव उसका, हर उलझन को सुलझाता,
देख उसे परिजन भी, मन ही मन है हर्षाता।। 101 ।।
त्याग मूरत, शील सागर, करुणा का जो धाम है,
ऐसी पावन नारी को, मेरा शत-शत प्रणाम है।
सत्य, धर्म और निष्ठा का, उसने ही मान बढ़ाया,
'मंजरी' ने ही गृह-मंदिर को, स्वर्ग सा सजाया।। 102 ।।
स्वयं को उसने पीछे रखा, अपनों को सदा आगे किया,
त्याग की पावन ज्योति से, उसने ही घर में उजास दिया।
न कभी माँगा हक अपना, न ही कोई शिकायत की,
मूक समर्पण से ही उसने, ईश्वर की इबादत की।।103 ।।
जीवन संघर्ष धूप में, वो शीतल तरुवर छाया,
जिसके कारण 'मानस', अपना धैर्य नहीं गँवाया।
कठिन डगर साथ चली, वो बनकर मेरी परछाईं,
उसकी निष्ठा ने जीवन में, सुख की भोर दिखाई।।104 ।।
अक्षय तृतीया सा पावन, उसका मन और विश्वास,
जो बुझने नहीं देता हृदय मे, सात्विक प्रेम प्यास।
न कोई गहना,न कोई ठाठ, सादगी ही श्रृंगार,
ऐसी अर्द्धांगिनी आगे, झुकता है सारा संसार।। 105 ।।
'मंजरी' के अंतर्मन में, धीरज का एक सागर है,
जिसके छूने से भर जाती, सूनी जीवन-गागर है।
वर्षों के साथ ने , मुझको एक पाठ पढ़ाया है,
जो नारी सम्मान किया, वो सब कुछ पाया है।।106 ।।
सृजन-शक्ति की अधिष्ठात्री, वो गृह की सच्ची धूरी है,
उसके बिन तो 'मानस' की, हर एक बात अधूरी है।
रूप, शील , गुणों का, अद्भुत वह संगम है,
उसकी पावन छाया में ,जीवन सुखद संयम है।। 107 ।।
जैसे गंगा की धारा में, सकल पाप धूल जाते हैं,
वैसे उसकी सन्निधि में, सब संशय मिट जाते हैं।
'रूप मंजरी' का वर्णन, मैं हृदय से करता हूँ,
जिसकी शीतल छाया , मैं सुख से रहता हूँ।। 108 ।।
बाह्य रूप दर्पण है, असली मूरत भीतर है,
सौंदर्य की गंगा, बहती जहाँ अनवरत है।
देख लिया नयनों से, वो लावण्य का घेरा है,
दिल से देखूँ तो पाऊं, वो गुणों का सवेरा है।। 108 ।।
जैसे चन्दन तरु की शीतलता,है उसकी पहचान,
जैसे कंचन आभा से, बढ़ता है उसका ऊँचा मान।
वैसे ही इस रूप राशि में, शील का अद्भुत संगम है,
बाहर दिखती जो सहजता, भीतर गहरा संयम है।। 109
अब तक हमने देखा केवल, कंचन जैसी काया को,
अब समझेंगे ममतामयी, त्याग और तप-माया को।
रूप निखरता है गुण से ही, जैसे फूल से गंध मिले,
'मंजरी' के अंतस को छू, 'मानस' को परमानंद मिले।110
चलो चलें अब उस उपवन में, जहाँ गुणों की क्यारी है,
जिसके मधुर स्वभाव की, दुनिया ही बस आभारी है।
'रूप मंजरी' से आगे बढ़कर, 'गुण' के दीप जलाएँ हम,
सच्चे सनातनी व्यक्तित्व की, गाथा ज हाँ सुनाएँ हम। 111
।।तृतीय खण्ड: स्वभाव मंजरी ।।
रूप की आभा देख ली, देखौ गुण का सार,
'मंजरी' के स्वभाव में, बसता है संसार।
क्षमा जहाँ आधार है, दया जहाँ की रीत,
ऐसी पावन आत्मा, गाए जग की जीत।। 112 ।।
जैसे धरती सहती है, हल की तीखी धार,
वैसे ही उसने सहा, जीवन का हर भार।
न शिकन माथे कभी, न मुख पर कोई रोष,
उसके मूक स्वभाव में, भरा हुआ संतोष।। 113 ।।
अपनों की हर भूल को, पल में दिया विसार,
जैसे गंगा धो देती, जग का सारा विकार।
क्रोध उसे छू न सका, ईर्ष्या का न कोई नाम,
'मंजरी' के इस हृदय में, बसते साक्षात् राम।।114 ।।
धीर-वीर गम्भीर सदा, उसका है व्यक्तित्व,
जिसने नारी धर्म का, निभाया पूर्ण अस्तित्व।
विचलित जो न कभी हुई, बाधाओं को देख,
उसने ही तो बदली , 'मानस' की भाग्य-लेख।।115 ।।
नव दुर्गा के अंश का, इसमें समाया सार,
शक्ति स्वरूपा 'मंजरी', जग का है आधार।
कभी शैलपुत्री सी दृढ़, कभी तप की मूरत,
हर संकट में दिखती है, दुर्गा की ही सूरत।।116 ।।
ब्रह्मचारिणी सा संयम, और ज्ञान का भंडार,
चंद्रघंटा सी गूँजती, इसके घर की कार।
कुष्मांडा बन जिसने ये, सृजन का चक्र चलाया,
अन्धकार को दूर कर, उजला भाग्य बनाया।।117।।
स्कंदमाता का वात्सल्य, आँखों में झलकता,
कात्यायनी सा तेज है, जो मुख पर दमकता।
कालरात्रि बन विकारों का, करती है संहार,
महागौरी की स्वच्छता सा, इसका है श्रृंगार।।118।।
सिद्धिदात्री बनकर , सकल मनोरथ पूर्ण किए,
'मानस' गृह-आँगन, खुशियों के रंग बिखेर दिए।
नौ रूपों का संगम यह, एक देह में पावन है,
इनके आचरण सुगंध से , मेरा मन भावन है।।119 ।।
क्रोध आए तो चण्डी , प्रेम झलके तो अचल सती,
हर परिस्थिति में दिखती, दिव्य और स्थिर मती।
सनातनी उस तेज का, दूजा कोई संकल्प नहीं,
'मंजरी' के भाव का, यहाँ कोई विकल्प नहीं।।120।।
रसोई घर नहीं उनका, पावन यज्ञ की शाला है,
जहाँ प्रेम के अमृत से, भरा हुआ हर प्याला है।
अन्नपूर्णा बन जब वे, भोजन का थाल सजाती हैं,
तृप्त भाव से पितरों की, आत्मा भी मुस्काती है।।121
स्वाद नहीं संस्कारों का, उनमें अद्भुत मेल भरा,
जिसके कारण महक उठा है, 'मानस' घर का धरा।
मितव्ययी पर उदार हृदय, लक्ष्मी का साक्षात रूप,
शीतल छाँव बनी सदा वो, जब भी आई कड़ी धूप।122
कौशल ऐसा प्रबंध का कि, तनिक न कोई कमी रहे,
हृदय बड़ा इतना कि द्वार पर, खुशियाँ सदा जमी रहे।
न वैभव का लोभ उन्हें, न संचय की कोई चाह कहीं,
सच्चे सुख की खोज में , ढूंढा अपनी राह यहीं।। 123
जैसे दीपक की लौ में, पूरा घर आलोकित हो,
वैसे उनके स्वभाव से, सकल कुटुंब हर्षित हो।
मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा, कभी न उसने लांघी,
'मंजरी' ने प्रभु से केवल, सुख-शांति ही माँगी।। 124 ।।
पाक कला की परखी, स्वाद का अमृत बरसाती ,
छप्पन भोग फीके लगें, जब वे प्रेम से खिलाती।
व्यंजन नहीं उसमें घुली ममता की मिठास,
उनके हाथों से पूर्ण होता, हर एक उपवास।। 125 ।।
कोमल स्वभाव मखमल सा, समझ बड़ी ही गहरी है,
कुटिल जनों के छल के आगे, वो अभेद्य इक प्रहरी है।
'जैसे को तैसा' उत्तर देना, उन्हें बखूबी आता है,
उनका सात्विक तेज देख,अधर्म सदा थर्राता है।।126
सहनशीलता की सीमा जब, कोई लांघने आता है,
तब उनका सिंहनी रूप, शत्रुओं को याद आता है।
अपनों के सम्मान की हेतु, वो रणचंडी बन जाती हैं,
मर्यादा पर आंच न आए, ऐसी अलख जगाती हैं।। 127
शक्ति और भक्ति का संगम, 'मंजरी' जीवन है,
धैर्य और साहस से, महकता उनका आँगन है।
न कायरता, न अहंकार, स्वाभिमान गहना है,
'मानस' जीवन पथ, अडिग चट्टान सा रहना है।। 128 ।।
सेवक बन जो सेवा करती, थके पाँव सहलाती है,
गृह-लक्ष्मी बन भक्ति भाव से, घर को स्वर्ग बनाती है।
निस्वार्थ समर्पण ऐसा, जिसका कोई मेल नहीं,
सेवा को धर्म मानती, ये कोई केवल खेल नहीं।। 129 ।।
समय पड़े तो स्वामी बनकर, सही मार्ग दिखलाती है,
भटके जब भी पग 'मानस' के, तब वो संबल लाती है।
गुरु स्वरूप निर्णय , पत्थर की ही लकीर हुए,
उसकी प्रज्ञा के आगे, जग के संकट धीर हुए।।130 ।।
सखा भाव है ऐसा पावन, मन की पीड़ा हर लेती,
बिना कहे ही आँखों से वो, सारी बातें पढ़ लेती।
मित्र बनकर हँसती-गाती, जीवन भार हटाती है,
सुख-दुख के हर मोड़ पर, वो ही साथ निभाती है।। 131
सेवक, स्वामी, सखा रूप में, अद्भुत उसकी माया है,
'सिय-पिय' के उस आदर्श को, उसने ही अपनाया है।
'मंजरी' के इन तीन रूपों में, जीवन का संपूर्ण सार,
पाकर ऐसी दिव्य संगिनी, धन्य हुआ ये घर-संसार।132
गहरा सागर सा है मन, और अडिग हिमालय सी मति,
संकट में जो विचलित न हो, ऐसी है उसकी प्रकृति।
निर्णय उसके सटीक सदा, जैसे बाण हो संधानित,
जिसके विवेक से 'मानस' का, हर पथ है आलोकित।133
कम बोलती पर तौले शब्द, अर्थ बड़ा ही गहरा है,
उसके गंभीर स्वभाव पर, संस्कारों का पहरा है।
व्यर्थ प्रलाप की चाह नहीं, न ही शब्दों का आडम्बर,
उसकी चुप्पी में छिपा है, धैर्य का बड़ा समन्दर।। 134
कठिन समय जब द्वार खड़ा, धीर पुरुष सी खड़ी रही,
साहस की उस परीक्षा में, वो हर बार ही बड़ी रही।
बिना शोर के सुलझा देती, घर की हर इक उलझन को,
शांत भाव से जीत लिया है, उसने सबके ही मन को।135
प्रज्ञावान और ओजस्वी, 'मंजरी' का यह स्वभाव महान,
जिसके कारण बना हुआ है, कुल का ये ऊँचा सम्मान।
निर्णय, निष्ठा और निरंतर, कर्मठता ही उसकी रीत,
ऐसी शक्ति के संग संभव,जीवन की हर गौरव जीत।136
अंतर्मन में भक्ति की गंगा, नित्य निरंतर बहती है,
मुख से प्रभु का नाम और, मन में श्रद्धा रहती है।
पूजा-पाठ नहीं दिखावा , सात्विक उसका जीवन है,
'मंजरी' की हर श्वास में, ईश्वर का ही अर्पण है।। 137
दीन-दुखी के कष्ट देख जो, पल में खुद ही पिघल गई,
परोपकार की राह पे चलकर, जो साक्षात ही ढल गई।
हाथ सदा ही बढ़ा हुआ है, औरों की सेवा करने को,
आई है वो धरा पर जैसे, सबकी झोली भरने को।। 138
न स्वार्थ का कोई लेश , न पद-प्रतिष्ठा की है प्यास,
जरूरतमंद की मदद , उसका सहज सरल प्रयास।
त्याग भाव से उसने, खुशियों का बीजारोपण किया,
उसी पुण्य से ईश्वर ने, 'मानस' का घर पावन किया।139
भक्ति और परोपकार का, अद्भुत ऐसा मेल मिला,
जैसे मरु के बीच कहीं , कोई पावन कमल खिला।
'मंजरी' के इस स्वभाव ने , मानवता का मान किया,
सच्ची पूजा का अर्थ,उसने जगत को दान किया। 140
मानव सहज स्वभाव , सब उनमें ही वास करें,
कभी सरल कभी प्रखर,सबको ही चकित करें।
समय और हालात देख, रूप बदलता जाता है,
पर उनका धैर्य निरंतर, सबको राह दिखाता है।। 141 ।।
क्रोध क्षमा कटुता कोमलता, सबका ही तो मेल है,
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, अद्भुत उनका खेल है।
जैसी परिस्थिति वैसा आचरण, रीत सनातनी है,
पर 'मंजरी' के धीरज की तो, हम सदा ऋणी है।142
उफनती नदियाँ थम जाती हैं, देख उनका संयम,
विषम घड़ी में भी रहता, एकसा जीवन लय-क्रम।
लाजवाब है धीरता उनकी, जैसे पर्वत खड़ा अचल,
जिसके बल 'मानस' घर, खड़ा है आजअटल।143
अच्छे-बुरे के द्वंद्व में , मध्यम मार्ग अपनाया है,
अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से, हर बाधा को हराया है।
स्वभावों की विविधता में, धैर्य ही सबसे भारी है,
'मंजरी' की इस शक्ति की, पूरी सृष्टि आभारी है।।144 ।।
कोमल मन पुष्प सरीखा, पर दृढ़ता है वज्र समान,
अपनों की रक्षाखातिर, वो तज दे अपनी मुस्कान।
सिंहनी सा साहस उसमें, जब आए संकट की घड़ी,
हर बाधा के सम्मुख वो ही, सबसे आगे है खड़ी।।145
जैसे कवच रक्षा करता है, रण में योद्धा की सदा,
वैसे उसकी दृष्टि टालती, घर की हर एक आपदा।
न डरती वो अंधियारों से, न तूफानों का भय उसे,
सच्चाई के मार्ग से, मिलती सदा विजय उसे।। 146 ।।
अन्याय के आगे न झुकी , न ही कभी हार मानी,
स्वाभिमान की रक्षा करना, उसकी है रीत पुरानी।
साहसी निर्णयों से , बदला घर का भाग्य-विधान,
'मंजरी' के पौरुष को, नमन करे ये सकल जहान। 147 ।।
शक्ति, शील और साहस का, अद्भुत उसमें संगम है,
उसके कारण ही जीवन में, सुख का सुंदर संयम है।
'मानस' के गृह-दुर्ग की वो, सबसे ऊँची मीनार है,
उसकी पावन उपस्थिति, खुशियों का आधार है।। 148 ।।
कुल की मर्यादा की खातिर, जिसने सुखों को वारा है,
उसके शील और संयम ने, पूरे घर को संवारा है।
तिलक लगाकर रीत निभाना, करना परंपरा का मान,
'मंजरी' के ही कारण है, इस ऊँचे कुल की शान।। 149
आगत का सत्कार निराला, जैसे देव पधारे हों,
भोजन और विश्राम से जैसे, सबके कष्ट निवारे हों।
थका हुआ जो आए द्वारे, उसे चैन मिल जाता है,
उसकी सेवा देख यहाँ, हर अतिथि मुस्काता है।। 150 ।
पर्व और त्योहारों की वो, जीवंत एक मिसाल है,
धार्मिकता और निष्ठा की, उसने बिछाई ढाल है।
पुरखों की दी हुई, विरासत को वो सहेजती,
अपनी पावन दृष्टि से, घर में खुशियाँ भरती।। 151 ।।
शील और धर्मपरायण, 'मंजरी' का स्वभाव,
मिटा देता जीवन के, सारे कष्ट और अभाव।
'मानस' के उपवन की, वो सबसे सुंदर बेल है,
संस्कारों की थाती का, अद्भुत ही ये मेल है।152
आने वाले कल की आहट, पहले ही सुन लेती है,
उलझन आने से ही पहले, समाधान चुन लेती है।
सूक्ष्म दृष्टि है ऐसी उसकी, जैसे दिव्य प्रकाश ,
जिसके कारण 'मानस' के, है सदा उल्लास ।। 153 ।।
पराया भी जब पास आए, तो अपना हो जाता है,
उसकी वाणी के जादू से, हर कोई बंध जाता है।
हृदय कोमल ऐसे, जैसे पंकज पंखुड़ियाँ,
प्रेम बाँटती ऐसे, जैसे जल बांटती नदियाँ। 154 ।।
संबंधों की बगिया को, वो अपने श्रम से सींचती,
टूटते हुए धागों को भी, ममता से है खींचती।
बिना स्वार्थ के जुड़ना, उसकी सहज प्रवृति ,
'मंजरी' के स्वभाव की, होती है आवृति।। 155 ।।
दूर हो या पास कोई, सबको मान वो देती है,
सबके सुख-दुख को ,अपनी झोली में ले लेती है।
आत्मीयता का संगम, विरला ही मिल पाता है,
जिसके स्नेह दीप से, जीवन जगमगाता है।156।।
शिखर चढ़ी पर पैर जमीं , ऐसी उसकी हस्ती है,
अभिमान की लहर न कोई, मन में बसती मस्ती है।
विनम्रता का गहना पहने, झुकती जैसे फलदार डाल,
'मंजरी'के सरल भाव ने, जीता सबका दिल विशाल।157
व्यर्थ विवादों की गलियों से, वो चुपचाप निकल जाती,
मौन रहकर भी शांति का, अनुपम पाठ पढ़ा जाती।
न निंदा में रुचि उसकी, न स्तुति की है चाह कहीं,
सत्य मार्ग चलते रहना, ढूँढ ली अपनी राह यहीं।।158
जैसे चन्दन वृक्ष पर, लिपटे रहते विषधर व्याल,
पर अपनी शीतलता, छोड़ न देता अपना हाल।
वैसे ही दुनिया के विष को, हँसकर वो पी जाती है,
तटस्थ रह हर उलझन में, धीरज ही दिखलाती है।। 159
वाणी में शहद सी मीठास, और व्यवहार में सादगी,
यही है 'मंजरी' के जीवन की, असली पावन बंदगी।
'मानस' के घर की गरिमा को, उसने ही सहेजा है,
ईश्वर ने इस धरती पर, अपना दूत भेजा है।। 160 ।।
मौन साधना में लीन वो, ईश्वर से नाता जोड़ती,
संसार के कोलाहल से, मुख अपना वो मोड़ती।
एकांत में जो ध्यान धरे, वो पावन दिव्य चेतना,
हृदय में बसती है सदा, प्रभु की मधुर वेदना। ।। 161 ।।
पशु-पक्षियों के कष्ट देख, द्रवित हो उठता है मन,
मूक जीवों की सेवा में ही, महक उठता है आँगन।
चींटी से लेकर गज तक का, रखती वो पूरा ध्यान,
'मंजरी' के हृदय में, बसते हैं करुणा-निधान।। 162 ।।
तुलसी की चौखट सजे, और दीया बाती का प्यार,
प्रकृति के कण-कण में वो, देखती है सृजनहार।
पेड़-पौधों को सींचती, जैसे अपनी संतान हो,
सनातन धर्म की हर रेखा,जीवन का मान हो।। 163 ।।
भक्ति और करुणा का , पावन सुखद संयोग है,
बिना किसी दिखावे के, ये अंतरमन का योग है।
'मानस' के इस जीवन को, उसने ही दिशा दी,
अपने पावन स्वभाव से, हर विपदा मिटा दी।।164।।
भोजन बनाना कला नहीं, उनके लिए आराधना है,
मन से परोसना ही उनकी, असली सिद्ध साधना है।
थाल सजाकर जब , सन्मुख आकर खड़ी होती ,
स्नेह स्वरूप में, खुशियाँ दिव्य बड़ी होती है ।। 165 ।।
"थोड़ा और लो" कह कर, जो लाड जताती हैं,
अतिथि क्या, भगवान को भी, अपना बनाती हैं।
हाथों के उस स्वाद में, ममता का ऐसा वास है,
जैसे भूखी आत्मा को, मिला अमृत-ग्रास है।।166 ।।
छोटों को आशीष देना, बड़ों का सत्कार करना,
उनके स्वभाव का गहना , सबका आँगन भरना।
बिना भेद के सबको, एक ही भाव से देखा है,
'मंजरी' के प्रेम की, न कोई सीमा-रेखा है।। 167 ।।
वाणी की उस मिठास से, कड़वाहट भी धुल जाए,
उनके स्नेह को पाकर, बंद भाग्य भी खुल जाए।
'मानस' के गृह-मन्दिर की, वो ही तो अधिष्ठात्री हैं,
संस्कारों के उस दीप की, वो ही पावन धात्री हैं।।168 ।।
डिग्रियाँ तो केवल साधन हैं, असली शिक्षा संस्कार है,
जिसके पास ये धन नहीं, उसका जीवन भार है।
'मंजरी' के जीवन से सीखो, मर्यादा में कैसे रहना है,
कठिन समय में भी धैर्य का,भूषण कैसे पहनना है।।169
स्वार्थ के पीछे भागोगे, तो सुख कभी न पाओगे,
औरों के हित जो जियोगे, तो अमर तुम हो जाओगे।
त्याग और सेवा की मूरत, प्रेरणा का वो स्रोत है,
आचरण में ही छिपी, धर्म की हर इक ज्योत है।। 170
वाणी में संयम रखो, और कर्मों में हो शुद्धता,
यही सिखाती है हमें, उसकी ये दिव्य प्रबुद्धता।
बड़ा वही जो झुकना जाने, फलदार वृक्ष से,
मुक्त वही जो दूर रहे सदा, माया और मोह से।। 171 ।।
सफलता का मर्म , कि निष्ठा कभी न डगमगाए,
विपदा कितनी हो, साहस कभी न कम हो पाए।
'मंजरी' के चिह्नों पर, जो कदम बढ़ाएगा,
'मानस' की इस कथा को, सार्थ कर पाएगा।।172 ।।
उच्च शिक्षा की डिग्री , मन में तनिक न मान है,
गृह-प्रबंधन की कला में, उनका ये जहान है।
पढ़ी-लिखी विदुषी , रीत सनातनी जानती,
रसोई की वेदी को , अपना मंदिर मानती।। 173 ।।
ज्ञान मिला जो ग्रंथों से, उसे संस्कारों में ढाल दिया,
अपनी प्रज्ञा के अमृत से, पूरे कुनबे को पाल दिया।
बाहर जाकर पद पाने की, न उनमें कोई लालसा,
घर स्वर्ग बनाने का,उनमें दिखा एक खालसा।। 174 ।।
आधुनिकता की समझ गहरी, पर जड़ें जुड़ी हैं माटी से,
सुलझाती हर जटिल समस्या, अपनी विमल परिपाटी से।
शुद्ध 'हाउस मेकर' बनकर, जिसने धर्म निभाया है,
ऐसी शिक्षित नारी ने ही, सच्चा गौरव पाया है।। 175 ।।
शिक्षा का असली अर्थ , घर आँगन महकता रहे,
ज्ञान के उस उजास से , हर चेहरा चहकता रहे।
'मंजरी' के इस त्याग पर, 'मानस' मस्तक झुकाता है,
विदुषी गृहणी के कर्मों में, सारा सुख मिल जाता है।176
डिग्री की गरिमा को उसने, घर के अनुशासन में ढाला,
अपनी शिक्षा के आलोक से, संतानों के मन को पाला।
समय की पाबंदी और, कार्यों में जो शुद्धता है,
'मंजरी' के गृह-प्रबंधन की, ये ही तो प्रबुद्धता है। 177 ।।
किताबी ज्ञान को उसने, जीवन का पाठ बनाया है,
अपनी संतानों को सदा ही, धर्म का मार्ग दिखाया है।
शिक्षा का उपयोग किया, चरित्र के निर्माण में,
सीखा जीना मर्यादा में, उसके ही सानिध्य में।। 178 ।।
अनुशासन का अर्थ नहीं, केवल कोई नियम या बंधन,
ये तो है जीवन जीने का, पावन सात्विक अभिनंदन।
मृदु वाणी पर दृढ़ निश्चय, यही उसकी पहचान रही,
'मंजरी' के शिक्षण से ही, घर की ऊँची शान रही। 179 ।।
पीढ़ियों का सेतु बनकर, उसने ही ज्ञान बढ़ाया है,
पढ़ी-लिखी गृहणी ने , घर को विद्यालय बनाया है।
'मानस' के भावी सपनों को, उसने ही तो सींचा है,
अपनी प्रज्ञा की शक्ति से, सुंदर चित्र ये खींचा है। 180
स्वभाव की इस सरिता में, गुणों का पावन संगम है,
जहाँ प्रेम की लहरें हैं, और भक्ति का ही संयम है।
गुणों ने ही जन्म दिया है, यादों की उस बगिया को,
स्मृति के दीप जलाकर, देखेंगे उस डगरिया को।। 181 ।।
जो स्वभाव में रचा-बसा है, वही याद बन जाता है,
वर्षों का ये साथ सलोना, मन के पट पर आता है।
मृदु स्वभाव के दर्पण में, बीता कल मुस्काता है,
'मानस' अब स्वर्णिम यादों, के ही गीत सुनाता है।।182।।
कभी हँसी, कभी थोड़े आँसू, संघर्षों की वो बातें,
साथ चले जो धूप-छाँव में, वो दिन और वो रातें।
स्वभाव की खुशबू से महकी, यादों की ये थाती है,
यही धरोहर जीवन भर, साथ हमारे जाती है।। 183 ।।
चलो चलें उस गलियारे, जहाँ याद की परछाईं,
'मंजरी' के संग हमने, अपनी एक दुनिया बनाई।
'स्वभाव' की महिमा गाया, 'स्मृति' का ये गान चले,
प्रेम और विश्वास का, ये सुंदर अभियान चले।। 184 ।
।।चतुर्थ खण्ड: स्मृति मंजरी।।
स्मृति की सरिता में अब हम, नाव पुरानी छोड़ चले,
बीते कल की गलियों से, नया एक रिश्ता जोड़ चले।
परिश्रम चंदन बनकर, महक उठा था जीवन में,
यादों का दीप जला है, आज हमारे इस मन में।। 185 ।।
शून्य हाथ थे पर हृदय में, दृढ़ निश्चय का पारा था,
संघर्षों के उस सागर में, 'मंजरी' का किनारा था।
तिनके-तिनके से बनाया, अपना ये नीड़ सलोना,
धूप छांव लिए खड़ी, कर कमल कर्म दोना।। 186 ।।
जैसे कंचन तपकर निखरे, वैसे तप कर हम उभरे,
बाधाओं के कंकड़ पथ पर, साहस लेकर हम उतरे।
उसकी प्रज्ञा ने ही तब, संशय के तिमिर को चीरा था,
अभाव के मरुस्थल में, वो तो शीतल सीरा था।। 187 ।।
यादें केवल चित्र नहीं हैं, वे तो जीवन का दर्पण हैं,
शिक्षा देती हर इक घटना, माँ का जैसे अर्पण हैं।
धीरज से जो पर्वत काटे, वही विजेता कहलाता,
'मंजरी' के संग बीता पल, विजय गाथा गाता।। 188 ।।
छोड़ चले हम अवध की माटी, मन में लेकर स्वप्न महान,
मरुधर की उस तप्त धरा पर, रचने को अपनी पहचान।
हमारे जीवन की लंबी यात्रा, संघर्षों की गाथा है,
पसीने से जो लिखा गया, वो उज्ज्वल व्यथा है।189।।
शून्य हाथ थे, जेबें खाली, पर आँखों में आग रही,
पराए देश में अपनों वाली, मन में सदा ही जाग रही।
'मंजरी' ने तब कंगन तज, साहस का संबल पकड़ा,
अभावों की उस बेड़ी को, धीरज के बल जकड़ा।।190
रोटी की उस खींचातानी में, हँसना उसने सिखाया,
कठिन डगर पर गिरते 'मानस', को उसने ही उठाया।
पढ़ी-लिखी विदुषी नारी, महलों की जो रानी थी,
मिट्टी के उस कच्चे घर में, रचती नई कहानी थी।।191।
सम्मान की दहलीज पर, गर्व से आज हम खड़े हुए,
संघर्षों की उस पाठशाला में, तपकर हम अब बड़े हुए।
समाज देखे यह आईना कि, पुरुष वही जो थमे नहीं,
और नारी वही जो विपदा में, पग पीछे को रमे नहीं।।192
भाषा बदली, बोली बदली, बदला सारा ठाँव था,
चुभती थी पैरों में रेती, याद आता अपना गाँव था।
वेश-भूषा, रहन-सहन का, अंतर बड़ा गहरा था,
'मानस' अनजान डगर , धीरज ही इक पहरा था।।193।
कभी व्यंग्य की मार सही तो, कभी उपेक्षा झेली है,
पर 'मंजरी' ने थामी हर पल, मेरी ये हथेली है।
आँखों में जो आँसू आए, उसने चुपचाप पोंछ दिए,
नयी जगह घर बसाये , उसने ह सपने देख लिए।।194 ।।
अनजान लोगों की भीड़, खुद को हमने गढ़ा सदा,
कठिन परीक्षा पथ पर, ताड़ सा रहे खड़ा सदा।
सब कुछ सहे कदम न रोके, कर्मठता ही धर्म रहा,
हृदय भले ही रोया अंदर, बाहर सात्विक कर्म रहा।195
आँसू जो गिरे धरा पर, वे मोती बनकर उभरे हैं,
संघर्षों की तपिश जलकर, आज हम निखरे हैं।
समाज को सीख कि, जो चलता वो जीतता,
'मंजरी' सा साहस से , गौरव-जीवन बीतता।। 196
दशकों की साधना, फिर भी रहे अनजान,
माटी अपनी हो न सकी, मिला न वो सम्मान।
न घर के रहे न घाट के, ये कैसी मजबूरी है,
अपनों के बीच खड़े मगर, मीलों लम्बी दूरी है।197।।
बाहर से सब मधुर बने, मन में छिपी दीवार,
सच्चे मन से न मिला, यहाँ कभी विस्तार।
संस्कृति के उस चक्र में, त्रिशंकु से लटके,
राहें अपनी खोजते, दर-दर हम हैं भटके।।198 ।।
जैसे खारा जल कभी, मीठा हो न पाए,
वैसे ही परदेस में, घाव भरे न भराए।
छल के मुस्कानों से, बेहतर तो रूखापन,
जहाँ सत्य का वास, अपना हो अंतर्मन।।199 ।।
हर पल 'मंजरी' संग खड़ी, बनकर मेरी ढाल,
दुनिया चाहे जो कहे, उसने रखा हर ख्याल।
हम हारेंगे न कभी भी, ये संकल्प हमारा है,
जिसका कोई न यहाँ, उसका ईश्वर सहारा है।।200।।
जीवन की साँझ अभी, प्रभु कृपा तक शेष है,
बीत गया कठिन समय, उसकी याद विशेष है।
साथ हमारा आज भी, जैसे साया देह का,
यही सार जीवन का, है अटूट इस स्नेह का।।201 ।।
बच्चे झूझते जीवन रण, अपना भाग्य बनाने को,
गिरते उठते और संभलते, लक्ष्य अश्व साधने को।
पीड़ा होती देख उन्हें, पर धैर्य ही वह शस्त्र है,
ईश्वर की लीला में, विश्वास जीत का अस्त्र है।।202 ।।
दोस्त हैं अब हम अपने, लोगों का क्या काम यहाँ,
जहाँ प्रेम की गंगा बहती, अपना है विश्राम वहाँ।
बाहर की दुनिया से, हम कटकर अब दूर हुए,
एक-दूजे के संग हम , खुशियों से भरपूर हुए।।203 ।।
आज के युग में हम सीखे, कि जब साथी साथ है,
दुनिया चाहे जैसी हो, फिर चिन्ता की क्या बात है।
'मंजरी' और 'मानस' की ये, गाथा सबको समझाए,
जिसने जीवन साथ जिया, वो ही मंजिल को पाए।204
जनरल की शोर से लेकर , पसीने की गंध तक,
साथ रही 'मंजरी', दुःख सुख के हर छंद तक।
ज्यों एसी की ठंडी हवा, मन को सुख पहुँचाती है,
त्यों जनरल की रातों की, याद हमें दिलाती है।।205
साइकिल और बाइक , जब चढ़ती ऊँची ढलान,
तब पीछे बैठी शक्ति ने, बढ़ाया मेरा सदा मान।
धूप सही धूल फंकी, पर चेहरे पर मुस्काती रही,
अब कार के पहियों संग, मीठी धुन गुनगुनाती रही।206
साधन बदले, समय बदला, पर बदला न उसका प्यार,
साइकिल हो या कार अपनी, वो ही थी मेरा संसार।
अभावों की तपन में, शीतल छाया बन रही,
वैभव के दौर में भी, सादगी को चुनती रही।।207।।
दुनिया देखे सत्य कि, सुख केवल साधनों में नहीं,
असली जीवन वो है, जो बीतता है संघर्षों में कहीं।
शून्य से जो साथ चले, वही शिखर तक जाते हैं,
'मंजरी' और 'मानस' , जीवन पाठ पढ़ाते हैं।208।।
बद्री-द्वारका, पुरी-रामेश्वर, धामों का पुण्य मिला,
कठिन डगर कष्टों में भी, श्रद्धा का ही कमल खिला।
कहीं ठिठुरती बर्फ मिली , कहीं मरुस्थल की धूप,
हर मंदिर की देहरी को, देखा हमने ईश-स्वरूप।209।।
भूख-प्यास थकान झेली, कदम न अपने रुके कहीं,
'मंजरी' संग जहाँ भी पहुँचे, पावन तीर्थ था ठाँव वही।
अगणित मंदिरों के द्वारे पर, टेका माथा साथ-साथ,
हर विपदा में थामे रखें,सदा इक दूजे के हम हाथ।।210
भारत की पुण्य भूमि को, हमने मिलकर मापा है,
दुःख की हर आँच को, भक्ति की शक्ति से तापा है।
जनरल से एसी तक, जो हमने कष्ट उठाए थे,
तीर्थों के उस दर्शन ने, सारे क्लेश मिटाए थे।।211 ।।
तीर्थाटन हमें बताता है, तीर्थ न केवल घूमना है,
अपने जीवनसाथी संग, ईश्वर पद को चूमना है।
'मानस' की ये अमर कथा, श्रद्धा का ही दर्पण है,
'मंजरी' के पावन संग में, ये तीर्थ-पुण्य अर्पण है।।212 ।।
एक एक अक्षरों में , हमने पीड़ा अपनी उतारी है,
जीवन के संघर्ष की, वो गवाही सबसे भारी है।
जो कह न सका शब्दों से, वो आँखों में छलक आया,
'मंजरी' के त्याग को यहाँ, हर अक्षर में है सजाया।213
उत्तर प्रदेश की माटी से, जब नाता हमारा छूटा था,
परदेश की उस भीड़ में, मैं अंदर से भी टूटा था।
पर 'शांडिल्य' के पौरुष ने, हार कभी न मानी थी,
राजस्थान की रेती पर, नई दुनिया बनानी थी।। 214।।
आत्मकथा के ये अंश नहीं, जीवन का इक आईना,
दिखाता है कि कैसे हमें, दुख को सुख में है बदलना।
'मंजरी' के साथ जब, तब हर काँटा फूल सा लगता है,
बीता हुआ वो हर पल , ईश आशीष लगता है।।215।।
बीमारियों के घेरे हों, या बच्चों के भविष्य की चिंता,
उसने ही बुनी है जीवन की, सबसे सुंदर रंगीन कंथा।
इस काव्य के शब्दों में, उसकी ममता का अक्ष है,
'मंजरी' के त्याग सम्मुख, सारा जग ही तुच्छ है।।216।।
स्मृतियाँ केवल बीते हुए, पलों का दर्पण हैं,
'सहयोग' वो शक्ति है, जो ईश्वर का अर्पण है।
यादों के उन खंडहरों में, जिसने महल खड़ा किया,
'मंजरी' के हाथ ने ही, जीवन को था बड़ा किया।।217।।
यूपी की गलियों से लेकर, रेतीले उन टीलों तक,
साथ रही वो साये सी, काँटों से पथरीलों तक।
स्मृति का अध्याय यहाँ, अब पूर्णता को पाता है,
सहयोग का नया खण्ड, श्रद्धा के गीत सुनाता है।218।।
चलो चलें उस डगर, जहाँ त्याग की पावन गंगा है,
उसके सहयोग के ध्वज से, जीवन ये आज चंगा है।
कल गवाह है जिसका, वो ही हाथ अब आगे है,
प्रेम और विश्वास के देखो, ये कैसे कच्चे धागे हैं।219।
।।पंचम खण्ड: सहयोग मंजरी ।।
शून्य हथेली, अनजानी राहें, और पराया देश था,
पर 'मंजरी' के सहयोग का, अद्भुत ही परिवेश था।
किराए के उस छोटे कमरे को, उसने महल बनाया,
किफायत और सलीके से, हर अभाव को हराया।।220
शारीरिक श्रम से सींचा घर, थकान न चेहरे पर आई,
दिन-रात सेवा में जुटी रही, माँ जैसी ममता दिखलाई।
बीमारी में वैद्य बनी, और संकट में बनी ढाल,
परिश्रम की मूरत ने, सँभाला घर का हर इक हाल।221
आर्थिक तंगी जब-जब आई, उसने बचत का मंत्र दिया,
अपनी छोटी खुशियों का भी, हँसकर उसने त्याग किया।
हार न मानो हर हाल में , उसने संबल सदा दिया,
'मंजरी' के प्रबंधन ने, मेरा हर इक दर्द सिया।।222 ।।
मानसिक संबल ऐसा दिया, कि टूटने न पाया मन,
हारने लगा दुनिया से, उसने महकाया ये जीवन।
"सब ठीक होगा" कह उसने, नया विश्वास भरा,
उसकी प्रज्ञा के आगे , दुख का पर्वत भी सदा डरा।।223
व्यवहार कुशलता ऐसी कि, पराए भी अपने बन जाते,
रिश्तों की उस डोरी को, वो निपुण भाव से सुलझाते।
शिक्षा का वो ओज दिखा, उसके हर एक सरोकार में,
'शांडिल्य' का गौरव बढ़ा,उसके ही इस व्यवहार में।।224
पर घर की दीवारों में, अपनापन कहाँ मिलता ,
किराए की छत के नीचे, मन कमल नहीं खिलता।
तिनका-तिनका जोड़कर उसने, ईंटों का संसार बुना,
घर के सपने को ही, जिसने अपना धर्म चुना।।225।।
कभी रसोई के खर्चों में, कभी गहनों की बलि देकर,
खड़ी रही वो नींव की ईंट सी, सारा बोझ स्वयं लेकर।
नक्शों से लेकर मिट्टी तक, उसकी सूक्ष्म दृष्टि रही,
मंजरी के प्रज्ञा से ही, खुशियों की ये वृष्टि रही।।226
जब पहली बार निज देहरी , हमने अपना दीप जलाया,
तब आँखों में जो आँसू थे, उन्होंने संघर्ष को समझाया।
महल नहीं पर कुटिया अपनी, तीर्थ से भी पावन है,
जिसके आँगन में बसता, मंजरी ममता सावन है।।227
अकथनीय है वो साथ उसका, जो शब्दों में न आएगा,
पढ़ी-लिखी इस गृहणी का, कर्ज कौन चुका पाएगा?
'शांडिल्य' के इस मंदिर की, वो ही प्राण-प्रतिष्ठा है,
मेरे घर की हर दीवार में, उसकी ही दृढ़ निष्ठा है।228।।
अनजान डगर पर मान बढ़ाया, समाज में पहचान दी,
मेरे बिखरे व्यक्तित्व को, उसने ही नई मुस्कान दी।
विद्वत्ता व्यवहार में, जब बन कर शिष्टाचार ढली,
राजस्थान माटी में, अपनी साख भी साथ चली।।229।।
कभी धार्मिक अनुष्ठान,कभी व्रत तप स्वीकार किया,
मेरे संकट की घड़ियों में, उसने ईश्वर से प्यार किया।
उसकी माला के मनकों में, मेरा मंगल वास रहा,
विपदाओं के सागर में, उसका दृढ़ विश्वास रहा।।230।।
लोक-लाज और मर्यादा की, वो ही पावन प्रतिछाया है,
जिसने अपनी शुभ प्रज्ञा से, घर को तीर्थ बनाया है।
बाहर के द्वंद्वों से, जब थका हुआ मैं आता हूँ,
श्रद्धा सुमन छाँव में, सारा दुख भूल जाता हूँ।।231 ।
दुनिया वालों जान लो, नारी केवल शक्ति नहीं,
पति पुरुषार्थ के पीछे, गुप्त भक्ति भी कम नहीं।
'शांडिल्य' के गौरव की, वो ही मुख्य आधार है,
मंजरी के सहयोग से, महका सारा संसार है।।232 ।।
सहयोग मात्र इक कर्म नहीं, ये जीवन की शुचिता है,
जैसे तप से ही निखरती, ऋषियों की ये संहिता है।
जिस हाथ ने कल श्रम किया, आज वही वरदान हुआ,
'मंजरी' के त्याग से ही, घर का मान महान हुआ।233
ज्ञान वही जो घर को जोड़े, खंडित होने न दे कभी,
उच्च शिक्षा की प्रज्ञा ने ही, रक्षा की है यहाँ सभी।
सहयोग का यह बीज ही अब, लक्ष्मी का फल लाया है,
शून्य से जो शुरू हुआ, उसने अब वैभव पाया है।।234
लक्ष्मी न आती स्वर्ण से, न आती केवल नोटों से,
वो आती है उस मति से, जो लड़े दुखों के चोटों से।
जिसने घर की हर एक ईंट , ममता से सहलाया है,
शिक्षित 'हाउस मेकर' ने ही, लक्ष्मी पद पाया है।।235।।
पुरुष अगर है सूर्य यहाँ, तो नारी शीतल चंदा है,
सहयोग के उस धागे में ही, बंधा प्रेम का फंदा है।
बिना शिकायत जिसने झेली, संघर्षों की हर मार,
उसके पावन चरणों में, बसता ये सारा संसार।।236।।
शिक्षा का असली दर्पण है, घर का अनुशासन,
जहाँ सहयोग ही नींव बने, प्रेम का हो शासन।
'मंजरी' के मौन व्रत ने, घर को मंदिर बना दिया,
अभावों की राख से , खुशियों का दीप जला दिया।240
चले अब उस सोपान , जहाँ लक्ष्मी का वास है,
सहयोग की गाथा में , छिपा विजय विश्वास है।
'शांडिल्य' के आंगन की, वो ही सुखद विधात्री है,
गृह-लक्ष्मी के रूप में अब, सदा कर्म यात्री है।।241।
।।षष्ठ खण्ड: गृह लक्ष्मी मंजरी।।
धन की देवी वह नहीं, जो स्वर्ण कलश को लाती है,
लक्ष्मी तो वह विदुषी है, जो घर को स्वर्ग बनाती है।
मृदु वाणी शुभ विचार, जिसके जीवन का गहना है,
'मंजरी' के लक्ष्मी रूप को, सादर शब्दों में कहना है।242
अन्नपूर्णा बनकर उसने, हर भूखे को तृप्त किया,
घर की हर एक देहरी को, संस्कारों से लिप्त किया।
व्यर्थ व्यय को रोककर , पूँजी को बलवान किया,
'शांडिल्य' के आंगन का,बढ़कर ऊँचा मान किया।243
शिक्षा उसकी मति बनी, बचत बनी उसकी शक्ति,
गृह-लक्ष्मी की महिमा ये, कर्म प्रधान हो भक्ति।
जहाँ क्लेश का नाम नहीं, बस प्रेम और उजियारा है,
मंजरी के उस लक्ष्मी रूप ने, हर विपदा को मारा है।244
झट टूटते हैं रिश्ते आज, कांच के उन बर्तनों जैसे,
लोग अपनों को ही तौलते, बस चांदी और पैसों से।
मंजरी ने सिखाया है कि, धीरज ही असली गहना है,
विवाह के सुख-दुख लहरों में, संग-संग ही बहना है।245
यूपी की कली जब मरुधर के, संघर्षों में भी मुस्काई,
त्याग और समर्पण से उसने, रिश्तों की मर्यादा पाई।
आज की पीढ़ी क्या समझे, प्रेम न केवल बातों में,
असली निष्ठा दिखती है, मुश्किल की काली रातों में।246
अभावों की आंधी में, जब डगमगाता मेरा मन,
मंजरी ने संबल बनकर, स्थिर रखा मेरा जीवन।
साथ छोड़ना सहज लेकिन, साथ निभाना तप है,
गृह-लक्ष्मी के चरणों में, सारा शास्त्र और जप है।।247
नींव से कंगूरे तक का, साथ कभी न छूटेगा,
जमीन से आसमा तक, रिश्ता कभी न टूटेगा।
लोभी जन जान लो , स्वार्थ जीवन का अंत नहीं,
मंजरी जैसा साथ तो, पतझड़ भी सत बसंत सही। 248
बात-बात पर जो रूठते, और छोड़ते हैं मंझधार में,
वो क्या जानें त्याग का अमृत, जो मिलता संसार में।
सच्ची लक्ष्मी वही जो घर को, टूटने से बचाती है,
अभावों की आग में भी, ममता मेघ गिराती है।।249
समाज देखे दर्पण कि, घर केवल पैसों से नहीं चलता,
बिना धैर्य और विश्वास के, कोई दीप नहीं जलता।
मंजरी का सादगी भरा, 'हाउस मेकर' रूप,
बिखरते हुए परिवारों को, देता है शीतल धूप।।250।।
स्वतंत्रता का अर्थ नहीं कि, रिश्तों की मर्यादा तोड़ें,
अहम की छोटी सी खातिर, अपनों से ही मुख मोड़ें।
मंजरी ने अपनी शिक्षा से, घर की नींव को सींचा है,
संयम की शक्ति से ही, सुख का चित्र उलीचा है।।251।।
सदा यही बात सही कि, समर्पण ही है जीत,
बिना झुके न बज पाती , जीवन में कभी संगीत।
सुख में तो सब साथ , दुख में जो हाथ न छोड़ती,
वो ही साक्षात लक्ष्मी है,जो विपदा का मुख मोड़ती।।252
त्याग न होता छोटा , ये महानता की निशानी है,
मंजरी के आचरण में, प्रेम की अमर कहानी है।
झट नाता तोड़ने वालो, जीवन से कुछ सीखो,
रिश्ते नहीं बाज़ारी, इनके भीतर ही तुम भींगो।।253
दोष ढूँढना सरल , गुण अपनाना कठिन काम,
जो कमियों को सह ले, उसे मिलता है सम्मान।
शिक्षित होकर अज्ञानी जिसने स्वयं को माना है,
उसने ही इस जीवन का, असली मर्म पहचाना है।।254
समाज देखे आईना, और बदले अपनी बुरी मति,
जहाँ नारी हो मंजरी सी, वहाँ अमर दांपत्य गति।
मानस के इस आंगन का, संदेश है जग सारा,
प्यार विश्वास ही होता, डूबते मन का सहारा।।255।।
दहेज की उस लालच ने, कितनों के घर उजाड़े हैं,
पढ़ी-लिखी बेटियों के ही, पन्ने यहाँ फाड़े हैं।
मंजरी जैसी लक्ष्मी ने, गुणों को ही धन माना,
संस्कारों वैभव को ही, असली जीवन जाना।।256 ।।
दिखावे की दुनिया , सादगी का उपहास हुआ,
झूठे वैभव खातिर, रिश्तों का विनाश हुआ।
बिना तड़क-भड़क के , जो कुटिया को महकाया,
उसने ही जग को, सादगी का पाठ पढ़ाया।।257 ।।
आज के पुत्र भूल जाते, माता-पिता की रातों को,
पराई बातों में आकर, तज देते अपनी मातों को।
मंजरी ने सिखाया है , सेवा सबसे बड़ा धर्म,
बुजुर्गों के चरणों में, फलते सबके शुभ कर्म।।258 ।।
हम यह तो जान ले, स्वार्थ जीवन का अंत नहीं,
बिना सेवा समर्पण के, खिलता कभी बसंत नहीं।
मानस के आंगन की, गूँज घर-घर जाए,
बिखरते रिश्तों को, मंजरी काव्य बचाए।।259।।
सुनो ओ कल के कर्णधारों, जीवन मात्र विलास नहीं,
बिना तपस्या और धैर्य के, होता सुख का वास नहीं।
मंजरी के इस त्याग से सीखो, कैसे घर को गढ़ते हैं,
मुश्किल की उन तूफानों में, कैसे आगे बढ़ते हैं।।260
स्क्रीन की आभासी दुनिया में, रिश्तों को न खो देना,
क्षण भर के इस आकर्षण में, कल को तुम न रो देना।
सहनशीलता हार नहीं, ये पौरुष की पहचान है,
रिश्तों को जो जोड़ सके, वो ही असली विद्वान है।।261।
समाज बने गौरवशाली, जब नारी सम्मान होगा,
तब गृह-लक्ष्मी में ही, ईश्वर का वरदान होगा।
मानस की ये अमर सीख, घर-घर तक पहुँचाओ,
बिखरते हुए परिवारों में, फिर से स्वर्ग सजाओ।।262
ममता की कोमल छाया , अनुशासन धार है,
बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की, नारी आधार है।
खुद को तपाती है, बच्चों को छाँव देती है,
घर के सारे दुःख सह ,सुख बाट देती है।।263 ।।
पढ़ाती पाठ परिश्रम का, धैर्य का मंत्र देती,
सत्य मार्ग पर चलने का, सबको ही तंत्र देती।
आज जो बच्चे बढ़ रहे, अपनी अपनी राहों पर,
आशीष है मंजरी का , उनकी उन बाहों पर।।264 ।।
सबसे बड़ा सच यही, माँ केवल पालनहार नहीं,
वो तो बच्चों के चरित्र का, असली शिल्पकार सही।
मानस के इस वंश का, वो ही गौरव गान है,
माता के ही चरणों में, बच्चों का उत्थान है।।265 ।।
लक्ष्मी का सार्थक रूप , मन को धीर बनाता है,
घोर निराशा में, जो आशा दीप जलाता है।
गृह-लक्ष्मी की सार्थकता , परिवार एक बनाए,
दुख की हर आँधी में , धीरज नहीं गवाए।।266 ।।
धन तो आता-जाता रहता, संस्कार ही स्थायी हैं,
मंजरी के आचरण में, बसती जग की सच्चाई है।
शून्य से सफर शुरू कर, निज कुटिया तक पहुँचाया,
लक्ष्मी के पौरुष ने, सारा वैभव घर में लाया।।267 ।।
सार्थक वही गृहस्थी है, जहाँ कलह का नाम न हो,
जहाँ प्रेम की गंगा बहती, दूषित कोई काम न हो।
मानस के इस मंदिर की, वो ही धुरी और आधार है,
मंजरी के लक्ष्मी रूप से, धन्य हुआ ये संसार है।।268
त्याग जहाँ अनुराग बने, और सेवा ही श्रृंगार रहे,
वहीँ साक्षात लक्ष्मी का, पावन सदा दरबार रहे।
गृह-लक्ष्मी का असली अर्थ, समर्पण और शुचिता है,
जैसे पावन वेदों की, कोई दिव्य संहिता है।।269 ।।
पुरुष न समझे स्वयं को, घर का भाग्य विधाता,
बिना नींव की शक्ति के, शिखर न टिकने पाता।
मंजरी ने जो मौन रहकर, घर का भार उठाया,
उसी ने 'मानस' जीवन में, गौरव को चमकाया।।270 ।।
बाहर की लड़ाइयों में, जब थक जाता है तन,
घर की लक्ष्मी ही सँभाले, फिर से अपना मन।
उसकी बुद्धि, उसकी बचत, उसका ही विश्वास,
वही दिलाती है पुरुष को, मंजिल का आभास।।271।।
अहम की चादर ओढ़कर, मत करना अपमान,
उसी के त्याग से सुरक्षित, तेरा है हर मान।
लक्ष्मी घर में आती है, जब खुश हो घर की नारी,
बिना प्रेम के नीरस है, ये दुनिया की तैयारी।।272।।
शिक्षा उसकी शक्ति है, और सेवा उसका श्रृंगार,
वही चलाती कुशलता से, घर का ये कारोबार।
पुरुष वही जो अपनी नारी, की पीड़ा को जाने,
मंजरी के इस त्याग को, जो अंतर्मन से माने। ।। 273 ।।
समाज सीख ले नारी का, कैसे मान बढ़ाएं,
घर की उस गृह-लक्ष्मी के, हम पद-चिह्न सजाएं।
मानस का ये काव्य जगत में, तब ही होगा अमर,
जब नारी और पुरुष , साथ चले सुंदर डगर।।274 ।।
लक्ष्मी का यह रूप अब, पूर्णता को पाता है,
समर्पण का नया खण्ड, अब मंगल गीत सुनाता है।
जिसने घर को स्वर्ग किया, अपनी पावन भक्ति से,
उसे नमन है अब 'मानस' का, अपनी पूरी शक्ति से। 275
ज्ञान और विज्ञान का, उसने अद्भुत मेल किया,
शिक्षा को आचरण बनाकर, जीवन का हर खेल जिया।
गृह-लक्ष्मी की गाथा तो, ईंटों का इक सार है,
पर समर्पण वो भाव है, जो भव से करता पार है।276
पुरुषार्थ का दर्प तजो, और कृतज्ञता को धारो,
जिसने जीवन सींचा अपना, उसे हृदय से पुकारो।
शून्य से जो साथ चली, वो ही असली सम्पति है,
मंजरी के ही चरणों में, मानस की सद्गति है।277 ।।
समाज देखे ये संगम, जहाँ 'मैं' अब 'तू' होता है,
सच्चा प्रेमी वही जो, खुद को उसमें खोता है।
गृह-लक्ष्मी के दायित्वों से, अब ऊपर हम उठते हैं,
भक्ति और कृतज्ञता के, नए द्वार अब खुलते हैं।।278 ।।
चलो चलें उस अंतिम पथ, जहाँ केवल समर्पण है,
मंजरी के पावन तप को, 'मानस' का ये तर्पण है।
शिक्षा, धैर्य और साधना, जो उसने हमें सिखलाई,
उस महानता की होगी, हर कदम वंदना भाई।।279।।
।।सप्तम खण्ड: श्रद्धा मंजरी।।
प्रेम तो केवल भावना है, पर श्रद्धा ईश-स्वरूप है,
मंजरी का ये व्यक्तित्व, तपस्या का ही इक रूप है।
अब तक जो मैंने पाया है, वो तेरा ही तो दान है,
मेरे इस जीवन का , तू प्रगट भगवान है।। 280 ।।
पुरुषार्थ मेरा शून्य है, जो कुछ है वो तेरा है,
इस अंधियारी दुनिया में, तू ही मेरा सवेरा है।
मानस के मस्तक पर, जो गौरव की ये रोली है,
मंजरी के त्याग की, ये सबसे सच्ची बोली है।।281 ।।
छोड़ो बीते कल की बातें, अब तो शिखर सामने है,
मंजरी के उस तप का देखो, पावन अमर वितान है।
साधन और सुविधाओं का, जो गौरव आज पाया है,
वो बस उसकी ही श्रद्धा का, अद्भुत सा साया है।।282।।
मंजरी के हर पन्ने पर, तेरा ही बस अक्ष रहे,
मेरे जीवन के मंदिर में, तू ही सदा प्रत्यक्ष रहे।
सब कुछ अर्पण करके , घर को तीर्थ बनाया है,
उस देवी के कर्मों में ही, मैंने स्वर्ग को पाया है।।283।।
संस्कार, संस्कृति और समर्पण, सनातन श्रृंगार है,
मंजरी के पूज्य भाव से, महका गृह संसार है।
मानस मस्तक पर, तू ही सदा विराजमान रहे,
नारी के श्रद्धा-पथ पर,नर का अभिमान रहे।।284 ।।
कुल की मर्यादा बनी वो, शील जिसका आभूषण है,
जिसके पावन सान्निध्य में, मिटता हर इक दूषण है।
व्रत, नियम साधना से, जिसने घर को शुचि किया,
'मंजरी' के देवत्व ने, जीवन को नव रुचि किया।।285।।
उत्तर से पश्चिम तक फैली, उसकी कीर्ति की छाया है,
बिना कहे जो पीड़ा समझे, ऐसी उसकी माया है।
घर के कोने कोने , जो संस्कार उसने बोये,
फल पाकर आज वही , मानस संकट गोये।।286।।
मदुरै के उस गोपुर सा, ऊँचा उसका व्यक्तित्व है,
जिसके निस्वार्थ प्रेम में ही, जग का सारा अस्तित्व है।
श्रद्धा के इन पुष्पों को, मैं उसके चरणों में धरता हूँ,
मंजरी की इस छवि की, वंदना मैं नित करता हूँ।।287।।
आस्था की मशाल , त्याग की वो मूरत है,
मेरे घर के मंदिर की, सबसे सुंदर सूरत है।
अमर रहे श्रद्धा अपनी, युग-युगांत काल तक,
गूँजता रहे ये काव्य , सृष्टि के हर भाल तक।।288।।
वैभव देख लिया जहां का, देख लिए सब सुख के द्वार,
अब बस उस पथ पर चलना, जहाँ मिले मोक्ष का सार।
अंतिम इच्छा यही हृदय की, हाथ तेरा मेरे हाथ में हो,
जन्म-जन्म का साथ हो,तू हर इक हाल में हो।।289।।
जैसे गंगा सागर मिलके, एक रूप हो जाते हैं,
वैसे ही हम मोक्ष-डगर पर, पावन पथ को पाते हैं।
मंजरी! तू ही मेरी शक्ति, तू ही मेरी भक्ति है,
तेरे ही श्रद्धा-बल से, मिलती मन को मुक्ति है।।290।।
नहीं चाहिए स्वर्ग का सुख भी, जो तू मेरे पास रहे,
तेरी सेवा, तेरी श्रद्धा, अंतिम सांस का आस रहे।
मिलकर इस पावन माटी में, जो हमने दीप जलाया,
सद समय वही प्रकाश, मोक्ष का मार्ग दिखाया।।291।।
मानस के इस जीवन का, पूर्ण हुआ ये छोटा-सफर,
मंजरी के चरणों में अर्पित, ये मेरी श्रद्धा की डगर।
अमर रहे ये प्रेम-तपस्या, युग-युगांतर काल तक,
मिले मुक्ति हमें साथ-साथ , ईश्वर के भाल तक।।292।।
जीवन की इस यात्रा का, सद्कर्म बस सार है,
जहाँ समर्पण और श्रद्धा , वहीं जीत की धार है।
मरुधरा का रेत गवाह , भारत का हर ठाँव यहाँ,
मंजरी का संग ही ऐसा, मिला हमें विश्राम ज हाँ।।293।।
पढ़े जो इस पावन गाथा को, मन में धैर्य वो पाएगा,
बिखरते हुए इस समाज में, फिर से घर महकाएगा।
नारी शक्ति का मान करे जो, वो ही असली ज्ञानी है,
हर नारी के आचरण में, छुपी अमर कहानी है।।294।।
उत्तर से पश्चिम तक हमने, धर्म ध्वज फहराया,
अभावों की उस राख में भी, हमने वैभव पाया।
मानस के इन शब्दों में, हृदय की सब ब्रीडा है,
मंजरी सान्निध्य में, अब शांत हर इक क्रीड़ा है।।295।।
अर्पित यह श्रद्धा-काव्य, अब ईश्वर के चरणों में,
अर्पित है ये जीवन-साधना, मोक्ष-पथ के वर्णों में।
जय श्री राम, जय हनुमान, यही अब गूँज हमारी है,
मंजरी संग इस जीवन की, जीत हुई अब भारी है।।296
'मानस' के अंतर्मन में, मंजरी ही बस प्राण है,
उसके ही पावन तप से, कुल का बढ़ता मान है।
आने वाली पीढ़ी देखे, इस जीवन की सीख को,
मांगना मरण समान,नहीं मांगना भीख को।।297।।
परिश्रम को शस्त्र बनाना, धैर्य को ही ढाल तुम,
मंजरी के संस्कारों से, जीतना हर काल तुम।
सफलता शिखर चढ़ो, जड़ों को मत भूलना,
अहम की ऊँचाइयों में, व्यर्थ ही मत झूलना।।298 ।।
जैसे 'मानस' संग मंजरी, हर विपदा अड़ी रही,
वैसे ही धर्म-पथ पर, आस्था श्रद्धा खड़ी सही।
कुल का गौरव सदा रहे, और सेवा ही बस कर्म हो,
दीन-दुखी का कष्ट मिटाना, सबसे बड़ा ही धर्म हो।।299
पूर्ण होगी हर कथा, अब 'मानस' शांत भाव में,
मंजरी की छाया मिले, हर धूप और अभाव में।
आशीष रहे इन पदों का, संतानों के शीश पर,
बढ़ते रहें वे कर्म-पथ, ईश्वर के आशीष पर।।300
पूर्ण होगा सब श्रद्धा-काव्य, सदा ईश्वर के चरणों में,
अर्पित है ये जीवन-साधना, जीवन-पथ के वर्णों में।
जय श्री राम, जय हनुमान, यही अब गूँज हमारी है,
मंजरी संग इस जीवन की, जीत हुई अब भारी है।।301
श्रद्धा जहाँ अटूट हो, वहाँ विरह क्या पीर है,
बिना बिरह मिलन को, समझे न कोई वीर है।
मंजरी की भक्ति से, मन सदा भावुक हुआ,
रीते दिन की याद में, 'मानस' आज सावक हुआ।।302।।
पता नहीं नर नारी, विरह से क्यों डर जाते हैं,
दो दिनों की दूरी में, क्यों रिश्ते मर जाते हैं।
सीखो मंजरी के सब्र से, जो दूर भी साथ थी,
उसकी दुआओं लहर, हर पल मेरे माथ थी।।303 ।।
विरह कभी भी दंड नहीं, ये तो प्रेम परीक्षा है,
मिलन वही जो साथ लाए, जीवन की शिक्षा है।
श्रद्धा जब विरह बनी, तब भाव अलौकिक हो गए,
'मानस' और मंजरी अब, एक दूजे में खो गए।।304।।
।।अष्टम खण्ड: विरह-मिलन मंजरी।।
विरह नहीं है शून्य कोई, ये प्रेम की ही गहराई है,
मंजरी से जो दूर रहे, वो यादों की परछाई है।
कभी कार्य की वेदी पर, खुद को हमने होम किया,
विरहन के धीरज ने , घर को सुख का धाम दिया।।305
मौसम की धूल भरी, तपती हुई दोपहरियों में,
विरह के वे पल डूबे , यादों की गहरी लहरियों में।
बिना शिकायत झेली, सूनेपन की हर इक मार,
मीठे उलाहना शब्दों में, बसता है मेरा संसार।।306।।
दूरी हमको पाठ पढ़ाता, मूल्य मिलन का क्या होता,
बिना विरह के मरुथल में, प्रेम-बीज कोई न बोता।
जब-जब घर देहरी पर, कदमों की आहट होती है,
मंजरी की आँखों में, खुशियों की वर्षा होती है।।307
मिलन वही जो आत्मा को, पावन कर दे चन्दन सा,
विरह वही जो मन को कर दे, पावन अभिनंदन सा।
'मानस' की जीत के पीछे, उसकी मौन प्रतीक्षा है,
विरह-मिलन गाथा में, जीवन की सच्ची शिक्षा है।।308
कुछ व्यथा चर्चा करना, मर्यादा के विरुद्ध कहाँ,
विरह कर्तव्य-पथ का, कैसे बने अवरोध यहाँ।
मंजरी ने गरिमा से, सूनेपन को स्वीकार किया,
उज्ज्वल कीर्ति हेतु, निज सुख का वार किया।309।।
कभी कार्य की वेदी पर, जब घर से दूरी बढ़ जाती,
उसकी प्रज्ञा और तपस्या, नींव को सुदृढ़ कर जाती।
मौन रहकर भी जो साथ रहे, वो ही असली शक्ति है,
दूरी में जो अक्षय रहे, वो ही पावन भक्ति है।।310।।
मिलन के संक्षिप्त क्षणों में, सारा जीवन जी लेते,
बातों के अमृत को हम, बूंद-बूंद करके पी लेते।
नहीं चाहिए चर्चा इसकी, क्या खोया क्या पाया है,
सार्थक वही साथ निभाए, शेष तो केवल माया है।311
'मानस' के जीवन पथ में, विरह एक संस्कार बना,
मंजरी का वो धैर्य ही अब, विजय का जयकार बना।
सीखो उस मौन साधना से, जो रिश्तों को महान करे,
दूरी में भी एक दूजे का, ईश्वर सा सम्मान करे।।312।।
कहने से दुख घटता है, कहे न कोई जान यहाँ,
मंजरी की पीड़ा का, मौन ही बस पहचान यहाँ।
विरह में जो साथ रहे, वो सूक्ष्म डोर ही सत्य है,
'मानस' का मन रहे वहीं, जहाँ मंजरी का कृत्य है।।313
देह रही भले जहां रहा, मन तो अपने धाम रहा,
हृदय के सिंहासन पर, बस उसका ही नाम रहा।
दूरी ने जो पाठ पढ़ाया, वो ज्ञान बड़ा ही पावन है,
बिना तपन के समझ न आए, सावन मनभावन है।314
हमने तो यह समझा है, विरह न केवल रोना है,
ये तो अपनी प्रज्ञा को, शुद्ध प्रेम में धोना है।
जो मन सदा पास रहे, उसे क्या दूरी घेरेगी?
सच्ची निष्ठा समय के , पहिये को भी फेरेगी।।315 ।।
संस्कारी नारी जानती , मौन की भाषा क्या होती,
विरह के सूखे मरुथल में भी, कैसे उगते हैं मोती।
बिना कहे व्यथा समझ ले, वो ही असली साथी है,
अंधियारे रास्तों में, प्रेम की जलती बाती है।।316।।
स्वार्थ जहाँ होता, वहाँ मिलन बोझ बन जाता है,
त्याग जहाँ हो वहाँ विरह भी, हमें महकाता है।
मंजरी ने ममता से, दूरी का विष पान किया,
मेरे बिखरे जीवन को, एक नया वरदान दिया।।317।।
हम पाते ये प्रेरणा कि, प्रेम न केवल देह यहाँ,
आत्मा का जो मिलन , वही अखंड सनेह यहाँ।
मानस के मंदिर में, विरह का भी वंदन है,
जहाँ मन सदा बसे, वहीं असली अभिनंदन है।।318।।
विरह तपन शांत हुई, ममता का मधुमास खिला,
धैर्य और उस प्रतीक्षा का, अद्भुत सा उपहार मिला।
मंजरी ने जिस गरिमा से, सूनेपन को संजोया है,
उसी तपस्या ने घर में, सुख का अमृत बोया है।।319
दूरी में जो मन बसा था, अब वो वात्सल्य बना,
मंजरी का हर आँसू, बच्चों का सौभाग्य बना।
समाज देखे ये गौरव कि, नारी कैसे गढ़ती है,
विरह की रातों से ही, ममता आगे बढ़ती है।।320 ।।
भारतीय नारी जानती है, शक्ति कहाँ छुपानी है,
विपदाओं के आगे कैसे, ममता की लौ जलानी है।
विरह ने जो दी थी पीड़ा, वो अब आशीष बन गई,
मंजरी की हर एक सेवा, कुल की नई ईश बन गई।।321
मान बढ़ें उस जननी का, जिसने विरह को जीत लिया,
अपने स्नेह की धारा से, हर संकट को रीत लिया।
मिलन मात्र उत्सव नहीं, ये उत्तरदायित्व का नाम है,
मंजरी की ममता ही, घर का पावन धाम है।।322।।
प्रतिष्ठा वही जो घर को, संस्कारों से भर देवे,
ममता वही जो काँटों को, फूलों में ही बदल देवे।
'मानस' के जीवन का, ये ही सबसे बड़ा ज्ञान,
नारी के दोनों रूपों में, बसता जग का मान।।323 ।।
।।नवम खण्ड: मंजरी ममता।।
ममता केवल आँचल नहीं, ये जीवन की पाठशाला है,
मंजरी के उस वात्सल्य में, संस्कारों की मधुशाला है।
जो कोमल है पर दुर्बल नहीं, वो ही सच्ची जननी है,
जिसको अपनी प्रज्ञा से, घर की मर्यादा बुननी है।।324।।
लोरी की उस मीठी धुन में, राष्ट्र-भक्ति का स्वर भी था,
ममता की उस शीतल छाँव में, अनुशासन का डर भी था।
सच्ची माँ जब गढ़ती है, तब भाग्य देश का बदलता है,
मंजरी की उस उँगली थामे, श्रेष्ठ वंश ही चलता है।।325
खुद को पीछे रखा सदा, बच्चों को ही आगे बढ़ाया,
अपनी इच्छाओं को उसने, कर्तव्यों की बलि चढ़ाया।
नर देखें ये दर्पण, और हम पावे यह उत्तम सीख,
ममता माँगना पुण्य नहीं, देना है सबसे बड़ी भीख।।326
अन्नपूर्णा बनकर जिसने, हर थाली में प्यार परोसा,
अभावों की आंधी में भी, जिसने दिया अटूट भरोसा।
मंजरी की उस ममता ने ही, 'मानस' को संबल दिया,
बिखरे हुए सपनों को,फिर एक नया कल दिया।।327
ममता कोई सीमा नहीं, ये तो अखंड विस्तार है,
जो पराये को अपना ले, वही सच्चा संस्कार है।
मंजरी के हृदय में, बसता जग का कल्याण है,
नारी की करुणा में, छिपा सृष्टि का सम्मान है।।328।।
सुनो ओ जग के मानुषों, ममता को कम न आंकना,
बिना स्नेह के सम्भव नहीं, इस जीवन को हांकना।
सच्ची नारी जब गढ़ती है, तब घर तीर्थ बन जाता है,
ममता की भाषा को, मानव सहज ही पाता है।।329
नहीं चाहिए स्वर्ण मुकुट, माँ की शीतल छाँव हो,
चाहे महल हो सोने का, या छोटा सा कोई गाँव हो।
मंजरी ने सिखाया है कि, प्रेम ही असली संपदा,
जिसके आँगन ममता, वहां टिकती नहीं आपदा।।330
स्वार्थ की अंधी दौड़ में, ममता ही एक विराम है,
थके हुए इस मानवता का, वही तो पावन धाम है।
मानस कहे पुकार के , सुने सारा संसार,
बिना त्याग ममता के, सूना है सब घर-बार।।331
स्वयं को रिक्त किया उसने, ताकि घर को पूर्ण कर पावे,
कहे न पीर को मुख से, कि कोई सुन न ले आहें।
हर हाल में भी उसने, बच्चों को रेशम ही पहनाया,
मंजरी ने अपनी भूख , ममता की लोरी सुलाया।।332
कभी बीमार जो होती, तो छुपकर अश्क पीती ,
हमारे सुख की खातिर वो, कभी मरती जीती।
कड़ाहों के धुएँ में, जो अपनी उम्र झोंक दे,
नारी के मूक अर्पण , हर आफत को रोक दे।।333 ।।
ओ दुनिया के सब मानुषों, पत्थर न तुम बन जाना,
घर की उस ममता के आगे, जरा सा शीश झुकाना।
मंजरी का ये करुण काव्य, चकित जग को कर देगा,
ये पत्थर जैसे हृदय में भी, संवेदना अब भर देगा। 334
न देखा जग ने वो मंजर, जो 'मानस' ने निहारा है,
मंजरी ने अपनी खुशियों को, खुद अपने हाथों वारा है।
रसोई की उस गर्मी में, जो खुद को रोज तपती है,
हृदय की पीर आँखों में,बन कर अश्क निकलती है।।335
कभी परोसा थाली में, तो अंतिम कोर भी दे दी,
ममता की उस ज्वाला ने, अपनी भूख ही ले ली।
विदुषी मगर उसने, कभी अधिकार न माँगा,
स्याही से नहीं, लहू से घर का भाग्य डाँगा ।।336 ।।
थकी हारी वो रातों को, जब सबको सुला देती ,
अकेले में वो अपने, पाँव के छाले धुला लेती ।
किसी ने कब पढ़ा , जो अनपढ़ सी बनी रही,
डिग्री की गरिमा में, वो नींव सी तनी रही।। 337।।
ओ दुनिया के सब लोगों, ये 'मानस' सत्य कहता है,
मंजरी के उस त्याग में ही, ईश्वर सा तत्व रहता है।
चकित हो जाओगे पढ़कर, कि कैसे घर सँवरता है,
कोई खुद को मिटाता है, तो कोई वंश उभरता है।।338
अतिथि द्वारे खड़ा हो तो, वो अपना भाग देती थी,
त्याग की उस अग्नि में, वो कष्ट हँसकर लेती थी।
विदुषी होकर भी जिसने, सेवा को ही श्रेष्ठ माना,
रसोई के धुएँ को, उसने स्वर्ग का द्वार जाना।।339 ।।
पसीने की बूंदें जो, माथे से उसके गिरती ,
वो मोती बनके घर की, खुशहाली में फिरती।
किसे क्या पता उसने, कितनी बार खुद को वारा,
बस एक निवाले के लिए, अपना अस्तित्व हारा।।340
कोमल पर बच्चों हेतु, वज्र सा वो बन जाती ,
कुरीतियों की आंधी से, घर का दीप बचाती।
मंजरी की उस दृष्टि ने ही, मर्यादा को पाला है,
संस्कारों के पहरे में, हर इक शत्रु को ढाला है।।341 ।।
दुनिया के विकारों से, जब घर को खतरा होता ,
वो जागती रातों को, जब सारा आलम सोता।
विदुषी ही वो जानती है, विष कहाँ तक जाता ,
नारी प्रज्ञा के आगे, हर छल भी झुक जाता है।।342 ।।
नहीं दिया बस लाड उसने, दिया चरित्र का कवच हमें,
दिखाया सत्य का मार्ग, और दिया सत्य का सच हमें।
कठोर हुई वो कभी-कभी, ताकि हम सीधे चल सकें,
मंजरी की सख्ती में, खुशियाँ हमारी पल सकें।।343।।
सुनो ओ जग वालों, 'मानस' गर्व से कहता है,
मंजरी की रक्षा में, कुल का भाग्य बहता है।
चकित रहोगे देख कर, कैसे वंश सँवरता है,
रक्षक बनकर माँ खड़ी, तो काल भी डरता है।।344।।
हाथ में कोई शस्त्र नहीं, नहीं कोई मंत्र का जाप ,
मंजरी की दुआओं से, मिटता हर इक संताप ।
'मानस' की हर जीत पर, उसका मौन आशीष है,
नारीके पुण्य-प्रताप से, झुकता दुनिया का शीश है।।345
कभी संकट जो आया , वो ढाल बन कर खड़ी रही,
दुनिया की उन साजिशों से, वो अकेले ही लड़ी रही।
सच्ची वो देवी जानती, कब कौन सा मोड आएगा,
नारी ममता छाँव में, हर दुख भी सुख बन जाएगा।।346
बच्चों के हर सुख हेतु, उसने अपनी नींदें बेची हैं,
मंजरी ने अपने हाथों से, भाग्य की लकीरें खींची हैं।
चकित रहोगे देख कर, कि कैसे शून्य से शिखर हुआ,
उसकी आँखों के पानी से, बंजर भी प्रखर हुआ।।347।।
दुनिया वालों यह सुनो, 'मानस' आज सुनाता है,
माँ के पावन चरणों में ही, सारा तीर्थ समाता है।
मंजरी की ममता का कर्ज, कभी न कोई उतार सके,
ईश्वर भी जननी को, श्रद्धा से बस निहार सके।।348।।
विद्या वही जो विनय दे, और प्रज्ञा जो राह दिखाए,
मंजरी की उस बुद्धि ने, हर संकट को दूर भगाए।
योग्य होकर भी जिसने, कभी न जिसने गर्व करा,
उसी मे परिश्रम से, मरुस्थल को भी किया हरा।।349।।
जब 'मानस' उलझा था, दुनिया के उलझे जालों में,
समाधान तब मिला हमें, मंजरी के ही ख्यालों में।
योग्य होने का असली, अर्थ उसी ने समझाया,
अधिकारों को त्याग कर, कर्तव्यों को अपनाया।350।।
न केवल अर्धांगिनी, वो सबसे श्रेष्ठ सलाहकार है,
जिसके ज्ञान की नौका से, पार हुआ संसार है।
चकित रहोगे देख कर, कि कैसे वो घर चलाती हैं,
अंकशास्त्र और तर्कशास्त्र, मौन रहकर सिखाती हैं।351।
ओ दुनिया के लोगों, ये 'मानस' सत्य सुनाता है,
प्रज्ञा जहाँ हो नारी की, वहां भाग्य मुस्कुराता है।
मंजरी की उस मेधा को, आज हृदय से नमन करें,
घर-घर में हम विद्या का, ऐसा ही पावन चलन करें।।351
अंकशास्त्र की ज्ञाता वो, घर का बजट बनाती थी,
थोड़े में भी ठाठ रहे, वो हुनर हमें सिखाती थी।
मंजरी की उस बचत ने ही, वैभव के द्वार खोले हैं,
'मानस' के सुख के पीछे, उसके ही पुण्य बोले हैं।।352।।
रिश्तों के ताने-बाने, बुनना उसे आता है,
मिलन की सब रीति उसे सदा सब भाता है।
सामाजिक उस प्रज्ञा ने, घर का मान बढ़ाया है,
मंजरी ने मानस को, असली लोक दिखाया है।।353।।
सुनो ओ जग के लोगों, ये 'मानस' ज्ञान देता है,
स्त्री की बुद्धि ही घर का, असली भार लेता है।
चकित रहोगे देख कर, पुण्यश्लोक का प्रबंधन,
जिसके विवेक से महका , जीवन-उपवन चन्दन।।354
निर्णय की घड़ी में जब, सब साहस छोड़ देते ,
मंजरी के दृढ़ संकल्प ही, लहरों को मोड़ देते ।
देवी का तेज देख, विपदा भी थर्राती है,
प्रज्ञा ही अंधेरे में, नया पथ दिखाती है।।355।।
पाठशाला घर बन गया , वो स्वयं गुरु की मूरत ,
संतानों के भविष्य हेतु, वो विद्या की सूरत ।
डिग्री तो दिलाया ही , संस्कार भी दिया उसने,
विषम परिस्थितियों में , श्रेष्ठ को पाला उसने।।356।।
सत्य और असत्य का, जो भेद हमें सिखलाया है,
मंजरी की उस प्रज्ञा ने, हमें मानव बनाया है।
कठिन समय पर, वो अडिग हिमालय जैसी ,
'मानस' जीवन-यज्ञ में, वो पावन समिधा जैसी।।357
भाईयों यह सच सुनो, जो 'मानस' गर्व से कहता है,
विदुषी के हर निर्णय में, भविष्य का सुख रहता है।
चकित रहोगे देख कर, कि कैसे भाग्य सँवरता है,
जब प्रज्ञा के प्रकाश में, कोई कुल आगे बढ़ता है।।358
ममता की छाँव में , तप का तेज समाया है,
मंजरी के भक्ति मार्ग ने, नया सवेरा लाया है।
वात्सल्य जहाँ शक्ति है, साधना आधार है,
गृह-लक्ष्मी की तपस्या ही, कुल का सार है।।359 ।।
बिना नियम प्रेम भी, राह भटक ही जाता है,
मंजरी की साधना में, धर्म स्वयं मुस्काता है।
व्रत और उपवासों से, जिसने खुद को ढाला है,
उसी तेज ने 'मानस' के, हर संकट को टाला है।।360।।
लोरी की ध्वनि में जब, मंत्रों का गुंजन होगा,
तब घर की देहरी पर, सात्विक अभिनंदन होगा।
मंजरी है जानती , बिना तप के सब शून्य यहाँ,
ममता जब साधना बने , तब पुण्य सिद्ध यहाँ।।361।।
त्याग दिया निज सुख उसने, ताकि धर्म का वास रहे,
परमात्मा की भक्ति का, हर पल मन में अहसास रहे।
बच्चों को जो स्नेह दिया, वो अब आशीष बन गया,
मंजरी का हर नियम , घर का नया ईश बन गया।।362।।
प्रतिष्ठा वही जो ईश्वर के, चरणों तक ले जाती है,
ममता वही जो साधना की, राह हमें दिखाती है।
'मानस' की जीवन-कथा , नया अध्याय बढ़ा,
मंजरी के तप का सूरज, अब अम्बर पर चढ़ा।।363।।
चलो चलें उस जगत में, जहाँ मौन ही वाणी है,
मंजरी के उन व्रतों की, अद्भुत अमर कहानी है।
ममता के आँचल से अब, भक्ति के द्वार चलें,
सत्य, नियम साधना के, पावन संसार चलें।।364।
।।दशम खण्ड: मंजरी साधना।।
साधना की अग्नि में, निज स्वार्थ को होम किया,
मंजरी ने घर को ही, सिद्ध पावन आश्रम किया।
नियमों की वो डोर कड़ी , संयम का वो श्रृंगार ,
उसकी अटूट भक्ति ही , जीवन का आधार था।।365।।
कठिन एकादशी के व्रत हों, या मौन का प्रहर हो,
हर बाधा पार किया , चाहे दुखों की लहर हो।
मानस जानता है , बिना तप के नहीं ज्ञान है,
मंजरी के त्याग में ही, परिवार का सम्मान है।।366 ।।
भोर की पहली किरण ,पूजा का जो दीप जले,
उसी प्रकाश पीछे, 'मानस' का हर काम चले।
मंत्रों की शक्ति में , भाग्य को ही मोड़ दिया,
मौन साधना को, प्रभु चरणों से जोड़ दिया।।367 ।।
उपवासों की शक्ति से, काया को कंचन बनाया,
बिना शिकायत हर कष्ट को, हँसकर ही अपनाया।
दुनिया देखे ये तपस्या, चकित हो ये सारा जहाँ,
नारी की ऐसी भक्ति , ढूँढने से मिले कहाँ?।।368 ।।
नहीं चाहिए शोर जगत में, गुप्त दान ही धर्म रहा,
मंजरी के हर आचरण में, ईश्वर का ही मर्म रहा।
पढ़-लिख कर भी सादगी, अहंकार को त्याग दिया,
अपने पावन चरित्र से, कुल को नया अनुराग दिया।।369
सुनो ओ जग के मानुषों, ये 'मानस' सत्य कहता है,
साधक वही जो विपदा में भी, शांत स्थिर रहता है।
मंजरी के इन चरणों की, रज भी अब आशीष है,
इसी तप के प्रताप से, झुकता सबका शीश है।।370।।
पावन पर्व एकादशी का, जब घर में आता है,
मंजरी मुख मंडल तब, दिव्य तेज छा जाता है।
अन्न त्याग मन संयम, यही तो असली भक्ति है,
कठिन उपवास से मिलती, 'मानस' को शक्ति है।371।।
दुनिया देखे ये व्रत केवल, भूखे रहने की रीत यहाँ,
मंजरी ने सिद्ध किया, ये ईश्वर से अखंड प्रीत यहाँ।
चावल का त्याग नहीं , विकारों का विसर्जन है,
इन संकल्पों से, खुशियों का नूतन अर्जन है।।372 ।।
आओ सुने हम आज , एकादशी की महिमा बड़ी,
ये काट देती है सहज ही, कर्मों की हर बेड़ी कड़ी।
मंजरी की साधना का, 'मानस' ही गवाह है,
इसी कठिन व्रत प्रताप से, सुगम हुई हर राह है।।373।।
प्रतिष्ठा वही जो इंद्रियों को, अपने वश में कर लेवे,
तपस्या वही जो जीवन को, अमृत-रस से भर देवे।
मंजरी के एकादशी का, फल है ये वैभव आज यहाँ,
जिसके घर ऐसी साधिका, उसे डर का काम कहाँ।।374
मानस का पाठ जहाँ, नित मंगल गान सुनाता है,
मंजरी के उस सस्वर से, काल भी शीश झुकाता है।
चौपाइयों के उस अमृत से, घर का कोना शुद्ध होता,
अशांति के हर दानव का , अंतर्मन विशुद्ध होता।।375।।
नहीं चाहिए स्वर्ण लंका, राम का बस आचार रहे,
हनुमान सी भक्ति हो, और प्रेम का व्यवहार रहे।
मंजरी के इस पाठ से ही, बच्चों ने मर्यादा सीखी,
दुनिया की चमक-धमक, उनके आगे फीकी।।376।।
शांति मिले विक्षोभों में, और बल मिले निर्बलता में,
मानस का पाठ है अमृत , जीवन की व्याकुलता में।
मंजरी की इस साधना का, ये ही सबसे बड़ा फल है,
घर में जो ये सौहार्द है, उसी भक्ति का प्रतिफल है।।377
प्रतिष्ठा वही जो रघुकुल की, रीत सदा निभाती हो,
ममता वही जो मानस की, गंगा को घर ले आती हो।
मानस इस आँगन में, रामायण का वास है,
मंजरी की निष्ठा पर, प्रभु को भी विश्वास है।।378।।
मानस पाठ न केवल वाचन, ये अंतर्मन का शोधन है,
कुविचारों की आहुति दे, ये प्रज्ञा का नूतन बोधन है।
बदली दिशा जीवन की , जिसने इसे अपनाया है,
मंजरी ने इस गंगा में, अस्तित्व को नहलाया है।।379।।
क्रोध बने क्षमा , लोभ संतोष में ढल जाए,
मानस सान्निध्य में, हर दुर्गुण बदल जाए।
जीवन के हर द्वंद्व का, इसमें समाधान मिले,
मंजरी की भक्ति से, मुरझाए मन को प्राण मिले।।380।।
आज का मानव भटका है, मानसिक रोगों के जालों में,
शान्ति मिलेगी उसे केवल, मानस के पावन ख्यालों में।
तनाव और वो व्याकुलता, कपूर की तरह उड़ जाती,
राम-नाम की शक्ति जब, हृदय-तंत्र से जुड़ जाती।।381।
सुनो दुनिया के लोगों, ये 'मानस' सत्य बताता है,
जो राम की राह चलता , वो भवसागर तर जाता है।
चरित्र बने जब चन्दन , जग में कीर्ति बढ़ती है,
मानस की पावन कथा, नित नव दिशा गढ़ती है।।382।।
लाभ वही जो हृदय को, करुणा से ओत-प्रोत करे,
परिवर्तन वही जो मनुष्य को, स्वार्थ से मुक्त करे।
मानस के इस घर में, जो मधुरता का वास है,
वो रामचरितमानस का, अक्षय दिव्य प्रकाश है।।383।।
ऋतु बदली तो व्रत बदले, ये जीवन का विज्ञान है,
मंजरी की हर साधना में, प्रकृति का ही ज्ञान है।
तीज-त्यौहार और व्रत-नियम, मन को संयम देते हैं,
यही सूक्ष्म अनुष्ठान ही, दुखों को हर लेते हैं।384।।
कभी करवा-चौथ , कभी सावन के सोमवार,
मंजरी के व्रतों से ही, महका है घर-संसार।
समाज समझे मर्म , व्रत न केवल भूखा रहना है,
ये तो इच्छा-शक्ति का, सबसे अनमोल गहना है।।385
व्रत से बढ़ती प्राण-शक्ति, बुद्धि प्रखर हो जाती है,
संयम की उस राह पर, विपदा भी खो जाती है।
मानस ने यह माना, नियम ही असली राजा है,
जिसके जीवन व्रत नहीं, वो खोखला बाजा है।।386।।
आज की पीढ़ी भटकी है, पाश्चात्य की अंधी दौड़ में,
भूल गई वो शक्ति जो, छिपी है अपने मोड़ में।
व्रत सिखाते त्याग , देते आत्मिक बल यहाँ,
मंजरी की निष्ठा से ही, सुधरा सबका कल यहाँ।।387।।
जग जनों जनों गु नों, ये 'मानस' सत्य सुनाता है,
जो व्रतों को अपनाता है, वो रोगों से बच जाता है।
कायिक, वाचिक, मानसिक, ये तीन शुद्धियाँ होती हैं,
हमारे धर्म और पर्वों में,सुख की ही ज्योति होती है।।388
प्रतिष्ठा वही जो अपनी, संस्कृति को गौरव देवे,
साधना वही जो मानव को, दानव से ऊपर लेवे।
मंजरी की इन कोशिशों से, जो जगी नई ये चेतना,
मानस का है यह कहना, कभी न हार मानना।।389।।
मौन नहीं बस चुप्पी, ऊर्जा का संचय है,
शब्दों के शोर में, होता आत्म-पराजय है।
मंजरी ने मौन गहा, ईश्वर से संवाद हुआ,
मानस की शांति में, हर संशय विखंड हुआ।।390 ।।
व्यर्थ बोलना ऊर्जा खोना, ये विदुषी ने जाना था,
मौन ही सबसे बड़ा मंत्र, उसने ये पहचाना था।
आज मानव बोल रहा, सुनने का अब धैर्य नहीं,
बिना मौन जीवन में, कोई होता कार्य नहीं।।391 ।।
हाथों का शुभ दान वही, जो दक्षिण हाथ न जाने,
मंजरी ने गुप्त पुण्य ही, अपने जीवन में ठाने।
नहीं चाहिए नाम पट्टिका, न कोई जय-जयकार ,
परोपकार की सेवा से, मिलता सच्चा प्यार यहाँ।392
धर्म ने ये पाठ पढ़ाया, दान बड़ा जो चुपके हो,
मानव वही जो दूजे के, दुख में थोड़ा दुबके हो।
सीमित थे जब साधन अपने, तब भी उसने बाँटा है,
मंजरी की उस करुणा ने, काटा सबका काँटा है।।393
सुनो मेरा हे बंधुओ, 'मानस' ज्ञान सुनाता है,
मौन और दान से ही, मनुष्य देव बन जाता है।
वाणी का संयम लाओ, हाथों को तुम खुला रखो,
अपनी ऊँची शिक्षा को, सेवा की ही तुला रखो।।394।।
प्रतिष्ठा वही जो समाज को, नई दिशा दे जाती है,
साधना वही जो पर-पीड़ा में, आंसू बन बह जाती है।
मानस के इस घर का ये, सबसे पावन गौरव है,
मंजरी की इस भक्ति का, चारों ओर सौरव है।।395
डिग्री तो बस कागज़ है, आचरण ही असली शिक्षा है,
कठिन समय में अडिग रहे, वही सच्ची परीक्षा है।
मंजरी ने ये सिद्ध किया, कि ज्ञान विनय में बसता है,
अहंकार के ऊँचे चढ़ने से, पुण्य सदा ही घटता है।।396
सीखो उस जलते दीपक से, जो खुद जलकर प्रकाश दे,
ममता की उस शीतल छाँव में, सबको नया आकाश दे।
मानव वही जो निज सुख तज, औरों का रोशन करे,
मंजरी के त्याग भाव को, ये सारा जग वरण करे।।397
वाणी में हो शहद घुला, पर मन में गंगा की धार रहे,
कठु वचन का विष तजकर, बस प्रेम का व्यवहार रहे।
शिक्षित माँ जब गढ़ती घर, तो कुल मर्यादा बढ़ती है,
मंजरी की हर सीख अब, भाग्य नया ही ग ढ़ती है।।398
धैर्य रखो जब संकट आए, और नम्र रहो जब वैभव हो,
जीवन के इस रणक्षेत्र में, तुम संयम के ही गौरव हो।
शास्त्रों ने पाठ पढ़ाया, सादगी सबसे बड़ा श्रृंगार,
तजकर तड़क-भड़क,आत्म-ज्ञान को करो प्यार।।399
हमे न ज्ञान भाता, पर 'मानस' ज्ञान बताता है,
जो जड़ों से जुड़ा रहे, वही शिखर तक जाता है।
परम्परा और आधुनिकता का, मंजरी सा मेल करे,
जगत की उलझन में, सुख का अमृत खेल करे।।400
शिक्षा का फल मन को दया करुणा से भर दे,
ज्ञान वही अंधेरे जीवनमें, दीपों की माला कर दे।
मानस के काव्य-कुंज से, ये सबसे बड़ा प्रबोध,
मंजरी जीवन-गाथा में, छिपा सत्य का शोध।।401।।
संध्या की बेला में जब, तिमिर पाँव पसारे है,
मंजरी का छोटा दीपक, भाग्य सदा संवारे है।
देहरी पर दीप जले, वो केवल लौ का खेल नहीं,
ये तो पूर्वज-परम्परा है, इसका कोई मेल नहीं।।401।।
जागो ओ हिन्द के वासी, पश्चिम का सम्मोहन तजो,
संध्या के उस पावन क्षण में, राम-नाम की धुन भजो।
जहाँ दीप और शंख बजे, वहां अलक्ष्मी टिक न सके,
मानस के आचरण को, कोई बाधा रोक न सके।।402।।
मानस ने ये पाठ पढ़ाया, संध्या दीप ही घर का प्राण,
इसी ज्योति के तेज से, घर-आँगन का नित कल्याण।
आज की पीढ़ी भूल गई है, गोधूलि की उस वेला को,
मोबाइल के शोर में खोया,त्याग दिया उस मेला को।403
सुनो सदा दुनिया वालों, 'मानस' सत्य बताता है,
जो दीप जलाता देहरी पर, वो संकट तर जाता है।
घर की लक्ष्मी जब संध्या को, वंदन और प्रणाम करे,
सुख-संपत्ति यश-कीर्ति, वहां सदा विश्राम करे।।404।।
आँगन में तुलसी हँसे, तो घर तीर्थ बन जाता है,
मंजरी की उस सेवा से, प्रभु का नेह उमड़ता है।
जल का अर्पण, दीप की लौ, और मौन वो वंदन,
तुलसी की उस गंध से ही, महका है ये जीवन।405।।
जागो ओ हिंदू के मानुष, ये सनातन के प्राण हैं,
तुलसी और ये सांध्य दीप, हमारे असली मान हैं।
जिस घर तुलसी सूख जाए, वहां बरकत नहीं रहती,
मंजरी की ये प्रज्ञा ही, हमें सत्य की राह कहती।।406।।
पुराणों ने पाठ पढ़ाया, तुलसी है आरोग्य का द्वार,
कष्ट मिटें व्याधि दूर हों, ऐसा है इसका विस्तार।
संध्या को दीप जले, नकारात्मकता भागती है,
मंजरी की भक्ति से ही, सोई किस्मत जागती है।।407।।
आज की पीढ़ी भूल रही है, जड़ों का ये संस्कार,
गमलों में कैक्टस, भुला दिया तुलसी का प्यार।
मिट्टी का वो छोटा दीया, सूरज से भी भारी है,
मंजरी की इस निष्ठा पर, ये दुनिया भी वारी है।।408।।
सुनो ओ जग के लोगों, 'मानस' ज्ञान बताता है,
जो तुलसी की छाँव रहे, वो यम से भी बच जाता है।
केवल पत्ता नहीं ये औषधि, और साक्षात् नारायण प्रिया,
मंजरी ने इस पूजन से, घर को नया जीवन दिया।।409।
पहली रोटी गौ माता की, श्रद्धा का वो पावन भाग,
मंजरी के इस अर्पण में है, स्वार्थ हीन पावन त्याग।
तैंतीस कोटि देवों का, उस एक ग्रास में वास है,
'मानस' घर की बरकत का, यही गुप्त इतिहास है।।410
अंतिम रोटी श्वान हेतु, जो रक्षक बन कर खड़ा रहे,
मंजरी की इस करुणा का, फल भी जग में बड़ा रहे।
भैरव का वो रूप मानकर, जिसने धर्म निभाया है,
बिना भेद के जीवों में भी, ईश्वर रूप ही पाया है।।411।।
धर्म ने सदा यह पाठ पढ़ाया, हम न अकेले जीते हैं,
पशु-पक्षी भी इस सृष्टि के, अमृत रस को पीते हैं।
घर की लक्ष्मी जब हाथों से, पहला भाग निकालती,
तब पितरों की कृपा और, खुशियाँ घर में पलती।।412।।
साधना की अग्नि में, निज 'स्व' को ही गला दिया,
मंजरी ने अपने जीवन को, अर्पण में ढला दिया।
नियमों की जो सीढ़ियाँ थीं, अब वो एक आधार बनी,
मौन साधना ही अब, अटूट समर्पण की सार बनी।।413
व्रत किए थे पुण्य हेतु, अब वो सहज स्वभाव हुए,
मंजरी के हर आचरण में, भक्ति के ही भाव हुए।
साधक जब साध्य बन जाए, तब द्वैत सारा मिटता है,
'मानस' संग उसका जीवन, एक होकर खिलता है।414
।।एकादश खण्ड: मंजरी समर्पण।।
समर्पण वो नहीं जिसमें, स्वत्व ही मर जाता है,
ये वो है जहाँ 'मानस' में, मंजरी का रूप आता है।
जग ने ये जान लिया, कि सेवा ही परम धर्म है,
हर एक अर्पण में, छिपा जीवन का मर्म है।।415।।
कभी माँ बन के ढाँपा हमें, कभी सखा बन के संभला,
समर्पण की उस छाया में, ये पूरा शांडिल्य कुल पला।
नहीं चाही कभी प्रशंसा, न ऊँचे पदों का मोह किया,
मंजरी ने अस्तित्व को,घर की नींव में होम किया।।416
धूप सही उसने सिर पर, ताकि हमें शीतल छाँव मिले,
काँटों पर वो खुद चली, ताकि हमें फूलों के गाँव मिले।
बिना शर्त जो साथ निभाए, वही तो सच्चा समर्पण है,
मंजरी का ये पूरा जीवन, ईश्वर को अर्पण है।।417।।
समर्पण वो नहीं जिसमें, केवल देह झुक जाती है,
ये वो है जहाँ आत्मा, दूजे में समा जाती है।
मंजरी ने अपनी शिक्षा को, अहंकार की ढाल नहीं बनाया,
बल्कि उसी प्रज्ञा से, घर में विनम्रता को सजाया।।418।।
कभी अपनी इच्छाओं को, उसने मुखर न होने दिया,
बच्चों के सपनों हेतु, अपनी नींद को सोने दिया।
चाहत लंबी थी भली, घर को ही अपनी दुनिया माना,
सेवा के उन छोटे कर्मों को, सबसे बड़ा धर्म जाना।।419
सीखो उस समर्पण से, जो फल की आस नहीं रखता,
वो प्रेम ही पावन है, जो कभी उपहास नहीं करता।
मंजरी के इस त्याग ने ही, 'मानस' को मान दिया,
खुद रिक्त होकर भी , सबको एक नया जहान दिया।420
कुल-देवों की चौखट पर, उसने शीश झुकाया है,
मंजरी ने भक्ति मार्ग से, संकट को भी हराया है।
न केवल वो घर की लक्ष्मी, वो धर्म की ध्वजा बनी,
उसके ही अटूट विश्वास से, कुल की हर बाधा टली।421।
ईश्वर से बस यही दुआ है, ये साथ सदा ही बना रहे,
मंजरी का वो पावन आशीष, घर के ऊपर तना रहे।
मानस के इस आंगन में, खुशियों का ही वास हो,
हर जन्म में मंजरी का ही, सान्निध्यमेरे पास हो।।422।।
पुर्ण भले हो काव्य पर, प्रेम कभी न कम होगा,
मंजरी की इस गाथा का, हर घर में अब दम होगा।
सुनो ओ दुनिया के लोगों, ये 'मानस' गर्व से कहता है,
सच्चा तीर्थ तो घर के भीतर, माँ-पत्नी में रहता है।।423।
डिग्रियों के ढेर लगे पर, मन में भरा अंधकार है,
संस्कार बिन शिक्षा तो, जीवन पर एक भार है।
मंजरी सा ज्ञान लाओ, जो झुकना हमें सिखाता है,
वही कुल ऊँचा उठता, जो मर्यादा को अपनाता है।।424
वृद्धों को तुम बोझ न समझो, वो घर की पावन जड़ें हैं,
आशीष उन्हीं का फलता है, जब विपदा सामने खड़ी हैं।
वेदों में पाठ पढ़ाया, सेवा ही सबसे बड़ा दान,
जिस घर बड़े बूढ़े दुखी, वहां न टिकता कभी मान।425
पाश्चात्य कीअंधी नकल , अपना गौरव मत खोना,
दिखावे की चकाचौंध , मत तुम बीज ज़हर के बोना।
संध्या दीप तुलसी पूजन, ये पिछड़ापन नहीं भाई,
इन्हीं महान रीतियों ने ही, घर की खुशियाँ बचाई।।426।
बेटी और बहू में तुम, कभी न कोई भेद करो,
लक्ष्मी रूप है नारी का, न उसका कभी निषेध करो।
मंजरी ने जिस धैर्य से, घर को स्वर्ग बनाया है,
त्याग और उस ममता ने ही,मानस वंश सजाया है। 427
अन्न का अपमान न हो, और व्यर्थ न बहता पानी हो,
मितव्ययी बनो जीवन में, न फिजूल की मनमानी हो।
संयम से ही शक्ति आती, और प्रज्ञा होती है प्रखर,
सादा जीवन उच्च विचार ही, ले जाते हमें शिखर।।428।
नर और नारी एक ही रथ के, दो पहिए कहलाते हैं,
साथ चलें जब सामंजस्य से, तभी लक्ष्य को पाते हैं।
एक पहिया जो डगमगाए, तो रुक जाती जीवन-कार,
मंजरी 'मानस' का ये, सुखी गृहस्थी का है सार।।429।।
ओ युवानों! तजो ये भ्रम कि, नारी केवल भोग है,
वो तो शक्ति, वो ही भक्ति, और ईश्वर का योग है।
सम्मान दोगे गर उसे तुम, तो घर स्वर्ग बन जाएगा,
अहंकार की उस अग्नि में, बस वंश ही जल पाएगा।430
आज का युवा भटक रहा है, क्षणिक सुख की चाह में,
छोड़ रहा वो साथ अपनों का, स्वार्थ की इस राह में।
समर्पण और वो धैर्य ही, रिश्तों की असली नींव है,
जिस घर में हो प्रेम अखंडित, वहां बसता शिव है।।431
नारी के बिन पुरुष अधूरा, जैसे शब्द बिन अर्थ यहाँ,
बिना शक्ति के शिव भी शव हैं, सारा ज्ञान व्यर्थ यहाँ।
मंजरी ने जो राह दिखाई, तुम भी उसे अपनाओ आज,
संस्कारों के दर्पण में,खुद को तुम सजाओ आज।।432
दांपत्य नहीं दो जिस्मों का, ये दो प्राणों का संगम है,
जहाँ समर्पण सुर बन जाए, वहां जीवन ही सरगम है।
पावन तारो की इस वीणा को, जिसने प्रेम से छेड़ा है,
मंजरी और 'मानस' बन, हर मुश्किल को फेरा है।।433
आधुनिकता की अंधी दौड़ में, अपनी जड़ें न तुम खोना,
मर्यादा की उस मिट्टी में, तुम संस्कारों के बीज बोना।
दिखावे का ये महल एक दिन, ताश सा गिर जाएगा,
चरित्र का जो किला बनेगा, वही काल तर पाएगा।।434
नारी घर की धुरी है भाई, उसका मान ही धन अपना,
उसके बिना अधूरा होगा, हर पुरुष का हर सपना।
नारी जब वो परामर्श दे, उसे मंत्र सा तुम मानो,
उसकी आँखों की ममता , साक्षात् ईश्वर को जानो।435
अभावों में जो साथ खड़ी हो, वही असली अर्धांगिनी,
सुख-दुख के उस महायज्ञ की, वही है पावन स्वामिनी।
मंजरी ने जो राह चुनी थी, वो काँटों भरी डगर ही थी,
मगर उसी के दृढ़ संकल्प, खुशियाँ घर के अंदर थी।436
युवा पीढ़ी को ये ही प्रबोध, अब 'मानस' देता जाता है,
सच्चा सुख बस प्रेम-भाव में, बाकी सब बस नाता है।
घर को मंदिर खुद ही बनाओ, सेवा और सत्कार से,
मिट जाएगी हर कड़वाहट, मधुर वचन के प्यार से।।437
ईश्वर की अनुकम्पा बरसे, और बना रहे ये अनुराग,
मंजरी की अनसुनी गाथा, मिटा दे हर इक दाग।
पुर्ण हुआ ये ग्रंथ आज पर, भक्ति का ये प्रवाह रहे,
'मानस' मंजरी गाथा, जग की सच्ची राह रहे। 438।।
।। पुष्पिका / उपसंहार (Epilogue)।।
पुण्यमयी ये गाथा आज, पूर्ण हुई सुखधाम।
मंजरी-मानस मिलन को, कोटि-कोटि प्रणाम।।
ज्येष्ठ मास शुभ कृष्ण पक्ष, अष्टमी पावन वार।
पूर्ण हुई ये लेखनी, कर प्रभु का जयकार। ।।
संवत् बीस सौ तिरासी, 'मानस' हर्ष अपार।
मंजरी-गाथा सिद्ध हुई, जग में मंगलधार। ।।
।। इति श्री गिरिजाशंकर तिवारी शांडिल्य "मानस" विरचित 'मनमंजरी' महाकाव्यम् सम्पूर्णम् ।।
।।क्षमा-प्रार्थना (Concluding Prayer)।।
"यद्क्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवी प्रसीद परमेश्वरी॥"
शब्द अल्प हैं, भाव अनंत, कैसे करूँ वखान।
पूर्ण हुई ये गाथा प्रभु, तुम्हरे ही बल-ज्ञान। ।। 1 ।।
मात्रा, पद या छंद में, हुई जो कोई भूल।
बालक जान के क्षमा करो, चरणों की दे धूल। ।। 2।।
रचना यह 'मंजरी' की, श्रद्धा का उपहार।
त्रुटि मेरी, गुण इष्ट के, यही सत्य का सार। ।। 3 ।।
मन-मंदिर में ज्योति जले, मिटे सकल अंधकार।
क्षमा-याचना 'मानस' करे, बारम्बार स्वीकार। ।। 4 ।।
।।विनीत।।
"हे परमपिता परमेश्वर! हे इष्टदेव श्री हनुमान जी! आपकी असीम अनुकम्पा से 'मनमंजरी' महाकाव्य आज पूर्ण हुआ। बुद्धि की अल्पता, ज्ञान की सीमा या लेखन की चंचलता के कारण यदि इस ग्रंथ में कहीं मात्रा, व्याकरण, छंद या भाव की कोई त्रुटि रह गई हो, तो उसे मेरी मानवीय भूल समझकर क्षमा करें। इस रचना का उद्देश्य केवल और केवल सनातन मूल्यों, कुल की मर्यादा और एक विदुषी की साधना का वंदन करना है। इस ग्रंथ में जो कुछ भी लोक-कल्याणकारी और मधुर है, वह आपकी प्रेरणा है; और जो भी दोषपूर्ण है, वह मेरा अपना अज्ञान है। इसे स्वीकार कर मुझ पर और मेरे परिवार पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।"
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ग्रंथ पूर्णता तिथि:
दिनांक: 10 मई, 2026 (10 May 2026)
विक्रम संवत्: 2083
मास: ज्येष्ठ (कृष्ण पक्ष)
तिथि: अष्टमी
वासर: रविवार
स्थान: मारवाड़ मूंडवा (नागौर), राजस्थान,341026
gstshandilya
।। जय श्री राम जय हनुमान।।