बुधवार, 27 जनवरी 2021

।।दुष्ट/खल वन्दना।।

बहुरि बंदि खलगन सति भाए।जे बिनु काज दाहिनेहु बाए।। 
      आइए आज हम इस विषय पर अपनेआपको शामिल करते हुए विचार करें कि खल कौन? हो सकता है कि हम स्वयं इस श्रेणी में आ रहे हो तो भी हम नम्रता पूर्वक इस विचार पर विचार अवश्य करें और खलगन में शामिल होने से बचें।
        खल शब्द विशिख के ख और व्याल के ल से मिलकर बना है। विशिख का अर्थ बाण और व्याल का अर्थ सर्प होता है,ये दोने अकेले ही किसी के प्राणों के अंत करने में समर्थ हैं सोचिए अगर ये दोनों साथ है तब कितने भयानक होंगें।
          बात इनकी भयानकता से मानव को पूर्ण परिचय कराने का या इनसे हमें सचेत रहने का या इनके जैसा  नहीं बनने का या अन्य कुछ भी हो सकता है क्योंकि साधु चरित या महिमा अकथनीय है,साधु से किसी भी समाज को किसी भी प्रकार की रंच मात्र भी परेशानी नहीं होती।साधु महिमा कोई कह ही नहीं सकता जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा----
    बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी।कहत साधु महिमा सकुचानी।।
    सो मो सन कहि जात न कैसे।साक बनिक मनि गुन गैन जैसे।।
      विचित्र बात है न बाबा जो खल चर्चा तो विस्तार से कर रहे हैं लेकिन साधु के लिये साफ कह रहे हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश ,कवि शुक्राचार्य आदि,कोविद नारद-वशिष्ठ आदि भी साधु महिमा कहने में संकोच करते है तब मैं उनकी बात कैसे कर सकता हूँ।खल की बात तो जोर-शोर से बाबाजी कर रहे हैं, खल-वन्दना कर रहे हैं, हमें भी बता रहे है।शुरु की पंक्तियों के आधार पर ही हम विस्तार करें।साधु-संतों की वन्दना वन्दना के लिये किया उन्हें भूलाते हुवे खल वन्दना पर ध्यानाकर्षण किया और जोर भी दिया, सन्तों को तो भूल भी जाये पर खलों की वन्दना कभी न भूलें, खलगन अर्थात समष्टि रुप से इनकी वन्दना करें व्यष्टि की बात तो बाद में है।"सत्ये नास्ति भयं क्वचित" सत्य को कोई भय नहीं है मैं "सतिभाये"सच्चे मन से वन्दन कर रहा हूँ और इनके बारे में सच्ची-सच्ची कह भी रहा हूँ क्योंकि ये लोग बिना काज ही दाये-बाये होते रहते हैं मतलब स्पष्ट है खल "दाहिनेहु" अनुकूल यानि हितैषी के भी "बाये"प्रतिकूल यानि विरुद्ध हो जाते हैं।संसार की सामान्य रीति यही है कि आम लोग अनुकूल अर्थात हितैषी के अनुकूल रहते पर खल का क्या कहना।
       लेकिन हम स्वयं खल हो सकते है पर आज बाबाजी की उक्त पंक्तियों को और बाबाजी को आधार बनाकर खलों के बारे में विस्तार से बात करगें ताकि हम अपनी खलता से भी मुक्त हो सके और सम्भव हो तो अन्य को मुक्त कराते हुवे उन्हें  खलता और खल से बचा सकें नाममात्र भी अगर मैं अपने इस प्रयोजन में सफल हुवा तो मैं अपने और अपने इस लेख को धन्य समझूँगा।
         आइए अब हम खलगन और खल के बारे में और जानकारी प्राप्त कर स्वयं खल बनने और उनसे बचने का हर सम्भव प्रयास करें।
           साधु संग सुखदायी, परलोक प्राप्ति का साधन,भवसागर पार कराने वाला अन्यान्य लाभ देने वाला होता है वही खल संग दुःखदायी,भवसागर  में डुबोने वाला और अन्यान्य दुःख देने वाला होता है,अतः इन्हें पहचान कर बचने हेतु इनसे अलग रहने हेतु इन्हें त्यागने हेतु इनकी पहचान जानना अति जरूरी है,यद्यपि कि खल की पहचान अति कठिन है फिर भी उनके लक्षणों को यदि हम जानकर बचने का प्रयास करें तो हो सकता है कि सफलता मिले।
        बाबाजी ने तो एक ही पंक्ति में अपनी बात को गूढ़ ढंग से हमें समझा दिया पर मैं या मेरे जैसे मूड़ नहीं समझ पाए तो उनका क्या दोष। मैंने कोशिश किया जो सबके समझ में आ जानी चाहिये। इनका काम है दाहिनेहु बाये का अर्थात कभी इस पक्ष में कभी उस पक्ष में,कभी कही कभी कही,पहले अनुकूल फिर प्रतिकूल, अनुकूल के साथ भी प्रतिकूल।दाये-बाये एक मुहावरा भी है अर्थात जबर्दस्ती किसी के काम में कूद जाना,बिन माँगेसलाहदेना,विचारप्रगटकरना,अनावश्यक या अनधिकृत रुप से बोलना,करना,कहना,अपनी बात रखना दाहिने बाये होना,भले-बुरे काम में लगेरहना,भला काम भी बुराई के निमित्त ही करना,करने का विचार रखना,  इनका भला कार्य भी बनावटी ही होता है।कुछ उदाहरण से आगे बढ़ते हैं--
        बैर अकारन सब काहू सो।
       जो कर हित अनहित ताहू सो।।
स्पष्ट है और देखें---
        पर हित हानि लाभ जिन्ह केरे।
        उजरें हरष बिसाद  बसेरे।।
    यहाँ समझना ही पड़ेगा ,ये लोग परहित अर्थात दूसरों के हित को हानि और परहानि को लाभ कहतें हैं।दूसरों के उजड़ने में हर्षित होते हैं और बसने में दुःखी होते हैं, सोचें संसार के जो चार व्यवहार(1) हानि (2) लाभ (3) हर्ष और (4) बिसाद हैं वे इनके कितने विचित्र हैं।
         जब काहू की देखहि बिपती।
         सुखी भये मानहु जग नृपती।।
आगे तो देखें
          काहू की जो सुनहि बड़ाई।
          स्वास लेहि जनु जूड़ी आई।।
बात यही तक नहीं आगे भी है
          खलन्ह हृदय अति ताप बिसेषी।
          जरहि सदा पर संपत्ति देखी ।।
       खल स्वभाव अव्यवस्थित ही होता है अतः उनके बचन और कर्म पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।आइए हम बाबाजी की इन पंक्तियों पर थोड़ी चर्चा कर ले, पक्तियाँ यो हैं ----
        हरि हर जस राकेश राहु से।
        पर अकाज भट सहसबाहु से।।
     यहाँ विचार करना जरुरी है,हरि यानि भगवान विष्णु और हर यानि महादेव शंकर दोनों के संयुक्त जस यानि कीर्ति के जो राकेश यानि राका कहते हैं पूर्णिमा को राका का ईश अर्थात चन्द्रमा अब स्पष्ट है पूर्ण चन्द्रमा ही राकेश हैं अपूर्ण चन्द्रमा राकेश नहीं हो सकते क्योंकि अपूर्ण चन्द्रमा को राहु कभी भी छति नहीं पहुँचा सकता----टेढ़ जानि सब बन्दइ काहू।
              बक्र चंद्रमहि ग्रसई न राहू।। 
उस राकेश के लिए खल राहु के समान हैं। इन बातों को हम और भी स्पष्ट कर दे---
करहि मोहबस द्रोह परावा।संत संग हरिकथा न भावा।।
    खलों की एक बहुत विशिष्ट बात है आप सबने अवश्य ही देखा-सुना होगा,जब कभी भोले-भाले पंडित या व्यक्ति कभी हरि कथा या संत चर्चा करते है तब खल उनसे उल-जलूल,उल्टे-सीधे,निरर्थक नास्तिकता पूर्ण अटपटे सवाल पूछ कर विघ्न डालते ही रहते हैं और कभी-कभी सफल भी हो ही जाते है जैसे हर पूर्णिमा को राहु चंद्रमा को नहीं ग्रस पाता है लेकिन संधि पाते ही ग्रस ही लेता है ---ग्रसहि राहु निज संधिहि पाई-----
वैसे ही अवसर पाते ही खल मौका नहीं चूकते विघ्न डाल ही देते हैं।
   पर अकाज भट सहसबाहु से--होते हैं खलगन।
सहसबाहु की हल्की -फुल्की चर्चा मैं यहाँ कर रहा हूँ क्योंकि पूरी कथा लिखने से लेख सहसबाहु सा न हो जाय इस बात से डर रहा हूँ।पिता कार्तवीर्य का पुत्र सहस्रार्जुन नर्मदा तट स्थित महिष्मती राज्य का राजा भगवान दत्तात्रेय का परम शिष्य था शुरु में प्रतापी और सत्यप्रिय राजा रहा लेकिन कालान्तर में ---------प्रभुता पाई काहि मद नाही--------- मदान्ध हो गयाऔर सत्ता मद में मतवाला होकर कुमार्ग गामी बन गया,एक दिन महर्षि जमदग्नि की हत्या कर उनकी प्रिय कपिला गाय को लेकर चला गया-----प्रतिभट खोजत भट इस पर अकाज भट को अतुलनीय भट भगवान परशुराम जी ने इसकी सहस बाहुओं को काट कर इसका कल्याण किया।
    खलों की इन्द्रियों की करामात तो जरा आप भी देखे,गुने और समझे-- 
     जे पर दोष लखहि सहसाखी।
     पर हित घृत जिन्ह के मनमाखी।।
     इन्द्रियों का बादशाह -मन- खलों का मन हमेशा दूसरों के अहित करने और अहित चिन्तन में ही लगा रहता है उनके इन बातों के कारण भले ही दूसरों का बुरा न हो उनका खुद का नाश ही क्यों न हो जाये वे मानने वाले नहीं है।पर हित कारक घी---परहित सरिस धरम नहि भाई---अर्थात वह घी जो हमेशा हमेशा पर हित कारक ही कार्य करता है उस हितकारी का भी खल का मन माखी की तरह अहित हेतु स्वयं का नाश भी करने से पीछे नहीं हटता।
           सहसाखी  से आखी को ले आँख किसकी दुष्टों की दूसरों के दोषों को ध्यान पूर्वक देखने में सहसाखी की तरह अर्थात सहस्रों आँखों वाले इन्द्र की तरह खल खल कार्य रत रहते हैं। इन्द्र सहसाखी कैसे बने यह महर्षि गौतम और उनकी धर्मपत्नी गौतमी अहल्या की कथा से आप सब जानते ही होंगे अतः इस बात को रोकते हुवे  हम खलों के  मुख,कान और आँख  के इन सुप्रसिद्ध कार्यों को भी तो देखें----
       सहस बदन बरनै पर दोषा।
और----पर अघ सुनई सहस दस काना। अभी शान्ति कहाँ---सहस नयन पर दोष निहारा।
रुकते नहीं 
तेज कृसानु रोष महिषेसा।
          अघ अवगुन धन धनी धनेसा।
  इनका क्रोध तेज कृसानु ही नहीं बल्कि महिष+ईशा अर्थात महिषासुर की तरह है जिनका नाश महिषासुर मर्दिनी जगदम्बा ही करती हैं।ये  अघ और अवगुन के धन में कुबेर के समान धनाधिपति हैं। बाबाजी की आगे की बातों को भी आप देखे मनन करें---
      खल अघ अगुन साधु गुन गाहा।
      उभय अपार उदधि अवगाहा।।
      उदय केत सम हित सब ही के।
      कुम्भकरन सम सोवत नीके।।
       दुष्ट उदय जग आरत हेतू।
      जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।
पर अकाज लगि तनु परिहरहीं।
       जिमि हिम उपल कृषि दलि गरहीं।।
हाँ तो खल गुन समाप्त नहीं हो रहा है,इनका गुन अपार है इनका तो सोये रहना ही ठीक है अगर ये जग गये तो कुंभकरन और केतू बन जायेगें। इनका एक सिद्धान्त होता है-पराई बदशगुनी के लिए नाक कटवाना मतलब साफ है अपनी नाक कटे तो कटे दूसरों का अपशगुन होना ही चाहिये इनकी इस सोच को बाबाजी ने अच्छी तरह से हमारे सामने रखा है देखे तो सही, खल दूसरों के कार्य को बिगाड़ने के लिए निज तन त्यागी होते हैं कैसे जैसे (1)हिम+उपल=बर्फ का पत्थर (2)हिम=पाला (3)उपल=ओला ये  क्या करते  हम सब जानते हैं, ये कृषि अर्थात खेतों में खड़ी फसल को नष्ट करने के लिए फसलों पर गिरते हैं और उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयास करते है जबकि उनके इस प्रयास का उनके ऊपर क्या परिणाम होता वे स्वयं गरही अर्थात गल कर नष्ट हो जाते हैं, यह है खलों का सुन्दरतम कार्य।  
   आगे खलों के कहने ,सुनने और देखने की शक्ति भी हम जान ले--- और इनका वन्दन भी करे ताकि इनके कोप-भाजन बनने से बच जाय तो ठीक वैसे सम्भव तो नहीं है---
बंदौ खल जस सेष सरोषा।
              सहस बदन बरनई पर दोषा।
पुनि प्रनवौ पृथुराज समाना।
               पर अघ सुनइ सहस दस काना।।
बहुरि सक्र सम बिनवौ तेही।
                संतत सुरानीक हित जेही।।
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा।
                 सहस नयन पर दोष निहारा।।
  क्या बात है तीन लोक तीन राजा तीन गुण पाताल और धरती वालों के लिए दो-दो पंक्तियाँ ही और स्वर्ग    वाले के लिए चार पँक्तियाँ चलो इन राजाओं के बारे में तो आप जानते ही होंगे आगे इनकी और चर्चा कर लेगें,यहाँ हमें यह जानना जरुरी है कि खल इन राजाओं की तरह होते है अतःभाई हम यदि इनसे बचना चाहते हैं तो इनकी वन्दना करते रहें।
        बाबाजी आगे एक दोहा और एक चौपाई केद्वारा इनके प्रति अपनी और निष्ठा दिखाते हैं और हमे समझाते हैं---
   उदासीन अरि मित हित, सुनत जरहि खल रीति।
   जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।। 
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा।
          तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।
बायस पलिअही अति अनुरागा।
         होहि निरामिष कबहु कि कागा।।
   सारी बात एक तरफ खलों को समझें,खुदसुधरें,सतर्क रहें ,स्वच्छ रहें और सुरक्षित रहें अन्यथा इनसे बचना नामुमकिन है क्योंकि इन्हें शत्रु-मित्र से कोइ फरक नहीं पड़ता, इनको अगर पालते हो तो ध्यान रखना कि यदि कौवे को कितना भी स्नेह से रखा-पाला जाय वह सामिष ही रहेगा निरामिष नहीं हो सकता रहीमजी ने भी लिखा है----
    रहिमन ओछे नरन सो बैर भली नहि प्रीत।
    काटे चाटे श्वान  के दोउ भाँति बिपरीत।।
    इन बातों से तो यह हमें समझ ही लेना चाहिए कि दुष्ट जन से हमें सावचेत रहते हुवे अपने जीवन पथ और कर्म पथ पर आगे बढ़ते रहना है।
जय हिन्द, जय भारत, जय मानस प्रेमियों जय जय
                          ।। इति।।





 
          


शनिवार, 23 जनवरी 2021

।।श्लेष अलंकार।।

श्लेष अलंकार (प्रमुख शब्दालंकार)
परिभाषा:-
इक शब्द में जब रहते,चिपके अनेक अर्थ।
तब उसमें श्लेष होता,  जानो बनो समर्थ।।
    श्लेष का अर्थ चिपका हुआ होता है अर्थात जब काव्य में एक ही शब्द के कई अर्थ होतें हैं तब वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
      श्लेष अलंकार के प्रमुख दो भेद माने गये हैं।
(1) अभंग पद श्लेष अलंकार 
(2) सभंग पद  श्लेष अलंकार
(1) अभंग पद श्लेष अलंकार:-
          जहाँ पूर्ण शब्द द्वारा श्लेष प्रगट हो अर्थात जब शब्दों को बिना तोड़े या जोड़े ही श्लेषत्व प्रगट हो तब अभंग पद श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण:-
1:- मेरी भव बाधा हरे राधा नागरि सोय।
     जा तन की झाई परे श्याम हरित दुति होय।
   यहाँ हरित के दो अर्थ हरा और हर्षित हो रहे हैं,अतः इसमें अभंग पद श्लेष अलंकार है।
2:-रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।
    पानी गये न उबरे मोती  मानुष चून।
   यहाँ दूसरी पंक्ति के पानी के तीन अर्थ चमक, प्रतिष्ठा और जल हो रहे हैं,अतः इसमें अभंग पद श्लेष अलंकार है।
3:-जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई।
     दुर्दिन में आँसू  बनकर  वह आज बरसने आई।
यहाँ घनीभूत के दो अर्थ इकट्ठी और मेघ तथा दुर्दिन के भी दो अर्थ बुरे दिन और मेघाच्छन्न हो रहे है,अतः इन दोनों पदों में अभंग पद श्लेष अलंकार है।
4:-चरन धरत चिन्ता करत भावत नींद न शोर।
    सुबरन को खोजत फिरत कवि व्यविचारी चोर।।
यहाँ सुबरन के तीन अर्थ सुन्दर अक्षर,सुन्दरी और स्वर्ण हो रहे हैं,अतः इसमें अभंग पद श्लेष अलंकार है।
5:-जो रहीम गति दीप की,कुल कपूत की सोय।
     बारे    उजियारों  करे , बढ़े     अधेरो   होय।।
यहाँ दीपक और कुपुत्र का वर्णन  किया गया है। बारे और बढ़े शब्द दो-दो अर्थ दे रहे हैं।जैसे दीपक बारे, जलाने पर और कुपुत्र बारे, पैदा होने पर उजाला करता है। वैसे ही दीपक बढ़े, बुझ जाने पर और कुपुत्र बढ़े ,
 बड़े होने पर अंधेरा करता है,अतः इनमें अभंग पद श्लेष अलंकार है।
6:-तो पर वारौं उरबसी सुनि राधिके सुजान।
    तू मोहन के उरबसी  है उरबसी समान। ।
   यहाँ प्रथम पंक्ति में उरबसी के दो अर्थ हृदय में बसने वाली और उर्वशी अप्सरा हो रहे हैंअतः इसमें अभंग पद श्लेष अलंकार है।
7:-मंगन को देख पट देत बार-बार है।
 यहाँ पट के दो अर्थ वस्त्र और  दरवाजा हो रहे हैं, अतः इसमें अभंग पद श्लेष अलंकार है ।
(2) सभंग पद शब्द श्लेष अलंकार:-
          जहाँ शब्द को तोड़कर या शब्द जोड़कर  श्लेषत्व प्रगट हो वहाँ सभंग पद शब्द श्लेष  अलंकार होता है।
उदाहरण:-
1:-चिरजीवौ जोरी जुरे क्यों न सनेह गँभीर ।
    को घटि ए बृषभानुजा वे हलधर के बीर ॥
यहाँ बृषभानुजा राधा  को बृषभ+अनुजा बछिया और हलधर बलराम के बीर अर्थात भाई कृष्ण को हल+धर के बीर बछड़ा अर्थ देकर श्लेषत्व लाया गया है,अतः इसमें सभंग पद श्लेष अलंकार है।
2:-बन्दउँ   मुनि  कंज   रामायन  जेहि  निरमउ।
    सखर सुकोमल मंजु,दोष रहित दूषन सहित।
यहाँ सखर का अर्थ खरी-खरी अर्थात सत्य और स+खर, खर नामक राक्षस सहित अर्थ देकर श्लेषत्व लाया गया है,अतः इसमें सभंग पद श्लेष अलंकार है।
3:-अजौं तरयौना हि रह्यौ श्रुति सेवत इक-रंग।
    नाक-बास बेसरि लह्यौ बसि मुकुतनु कैं संग।।।               यहाँ तरयौना का अर्थ कान का आभूषण और तरयौ+ना,संसार सागर से पार नहीं हुआअर्थ देकर श्लेषत्व लाया गया है,अतः इसमें सभंग पद श्लेष अलंकार है।
    ध्यान रखें कि यहाँ श्रुति  से वेद तथा कान नाक से स्वर्ग तथा नासिका बेसरि से नीच प्राणी तथा नाक का आभूषण मुकुतनु से मुक्त पुरुष तथा मोती अर्थ देकर सम्पूर्ण श्लेषत्व लाया गया है जिसके कारण यह दोहा श्लेष अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है।
                  ।।     इति     ।।
        

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

।।यमक अलंकार।।

               ।।यमक अलंकार।।
यह प्रमुख शब्दालंकार है।
परिभाषा:- 
वही शब्द पुनि पुनि परे,अर्थ परे जब होय।
यमक अलंकार ही है,जान जाय सब कोय।।
अर्थात
   जब काव्य में एक ही शब्द बार-बार भिन्न-भिन्न अर्थ में आये तब वहाँ यमक अलंकार होता है। दूसरे शब्दों में एक शब्द की एकाधिक आवृत्ति अलग-अलग अर्थों में होने पर यमक अलंकार होता है।
इस परिभाषा से यह भी सिद्ध हो रहा है कि यमक अलंकार आवृत्तिमूलक अलंकार है।
        यमक का शाब्दिक अर्थ दो होता है अतः एक ही शब्द का कम से कम दो बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होना आवश्यक होता है, दो से अधिक बार भी भिन्न-भिन्न अर्थों में एक ही शब्द आये तो भी यमक अलंकार ही होता है।
       इसके दो प्रमुख भेद हैं।
(1)अभंगपद यमक अलंकार और
(2)सभंगपद यमक अलंकार
ध्यान रखें कि वाक्य आदि में प्रयुक्त शब्द को पद भी कहते हैं।
       (1)अभंगपद यमक अलंकार
परिभाषा:-
   जब शब्द, भिन्न-भिन्न अर्थों में स्पष्ट रुप से पूर्ण पद में  हो तो वहाँ अभंगपद यमक अलंकार होता है।
    अभंग का सीधा अर्थ है, प्रयुक्त पद को अलग-अलग करके या एक-दो पदों को जोड़करके अर्थ निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
उदाहरण:-
(1) कनक कनक ते सौ गुनी,मादकता अधिकाय।
      वा   खाये  बौराय  नर,    वा   पाये    बौराय।।
        यहाँ दो शब्द कनक और बौराय दो-दो बार आये है लेकिन केवल कनक कनक में ही  अभंगपद यमक अलंकार है क्योंकि इसी के दो अर्थ क्रमशः धतूरा और सोना हो रहे हैं। बौराय का एक ही अर्थ पागल होना, दोनों बार हो रहा है अतः बौराय में यमक अलंकार नहीं है।
(2) जेते तुम तारे तेते नभ में न तारे हैं।
यहाँ तारे के क्रमशःदोअर्थ मुक्ति देनाऔर तारा(stars) होने के कारण अभंगपद यमक अलंकार है।
(3) सजना है मुझे सजना के लिये।
यहाँ सजना के क्रमशः दो अर्थ सँवरना और पति/प्रेमी होने के कारण अभंगपद यमक अलंकार है।
(4) दई दई  क्यों करत है दई दई सो कबूल।
यहाँ दई दई के क्रमशः दो अर्थ हे भगवान हे भगवान और भगवान ने जो दिया है वह होने के कारण अभंगपद यमक अलंकार है।
(5) हरि बोले हरि ही सुने,हरि गे हरि के पास।
      हरि  हरि  में कूद गये, हरि  हो गये उदास।।
इस दोहे का अर्थ है मेढक ने बोला साँप ने सुना, साँप मेढक के पास गया ,मेढक पानी में कूद गया ,साँप उदास हो गया। इस प्रकार यहाँ हरि पद के भिन्न-भिन्न अर्थ होने के कारण अभंगपद यमक अलंकार है।
(6) मूरति मधुर मनोहर देखी।
     भयेउ विदेह विदेह विसेखी।
  यहाँ  विदेह  पद का क्रमशः राजा जनक और देह की सुधि भूला हुआअर्थ होने के कारण अभंगपद यमक अलंकार है।
             (2) सभंगपद यमक अलंकार
   जब शब्द भिन्न-भिन्न अर्थों में स्पष्ट रुप से पूर्ण पद में नहीं लिखे हो तब सभंगपद यमक अलंकार होता है।
    सभंग का सीधा अर्थ प्रयुक्त पद को अलग-अलग करके या एक-दो पदों को जोड़करके ही अर्थ निकलता   है। 
उदाहरण:-
(1) पच्छी परछीने ऐसे परे पर छीने बीर।
     तेरी बरछी ने बर छीने है खलन के।।
   यहाँ परछीने-पर छीने और बरछी ने-बर छीने में सभंग पद यमक अलंकार है।
 अन्य उदाहरण--
(2) माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर।
      कर का मनका डारि दे मन का मन का फेर।।
यहाँ मन का और मनका में सभंग पद यमक अलंकार है।
(3) कुमोदिनी-मानस-मोदिनी कहीं।
 यहाँ 'मोदिनी' में यमक  है।पहला मोदिनी 'कुमोदिनी' शब्द का अंश है, दूसरा स्वतंत्र शब्द है  प्रसन्नता  देने वाली है।
(4) पास ही रे हीरे की खान।
     खोजता कहाँ रे नादान।।
यहाँ ही रे और हीरे  में सभंग पद यमक अलंकार है।
(5) या मुरली मुरलीधर  की
      अधरान धरी अधरा न धरौगी।।
यहाँ मुरली अर्थात बाँसुरी, मुरलीधरअर्थात कृष्ण में मुरली की आवृत्ति  होने के कारण सभंगपद यमक अलंकार है। 
यमक अलंकार के विशेष उदाहरण भी देखते हैं---
(1) नाग चढ़ा जब नाग पर,नाग उठा फुँफकार।
      नाग  नाग  को  नागता, नाग  न मानें हार।।
   यहाँ नाग शब्द का यमक  देखने लायक हैं- नाग के अर्थ क्रमशः हैं--  हाथी, पर्वत, सर्प, बादल, पर्वत, लाँघना, जनजाति।अर्थात जब हाथी पर्वत पर चढ़ा, सर्प
फुँफकार उठा,वहाँ बादल पर्वत को लाँघ रहा था फिर भी जनजाति के लोग युद्ध में हार नहीं मान रहे थे।
(2)झलके पद बनजात से, झलके पद बनजात। 
    अहह दई जलजात से, नैननि सें जल जात।।   
    प्रथम पंक्ति में 'झलके' के दो अर्थ 'दिखना' और 'छाला' तथा 'बनजात'  के दो अर्थ 'पुष्प' तथा 'वन गमन'  हैं। अतः यहाँ अभंगपद यमक अलंकार है।और
    द्वितीय पंक्ति में 'जलजात' और 'जल जात' के अर्थ क्रमशः 'कमल-पुष्प' और 'अश्रु- पात' हैं जहाँ सभंगपद यमक अलंकार है।
                   ।।   धन्यवाद ।।

बुधवार, 13 जनवरी 2021

Direct and Indirect Narration

Speaker के कथन को दो प्रकार से व्यक्त किया जाता है।
1:-Direct रुप से उसकी बात को ज्यों का त्यों कहा या लिखा जाता है,जिसे direct narration या speech कहते हैं।
Example:-Ram said to Sita,"You are my friend."
यहाँ दो भाग दिखाई देते हैं, एक comma के बाहर होता है जिसे reporting part, clause या speech कहते हैंऔर इसकी क्रिया को reporting verb कहते हैं।
दूसरा भाग inverted commas के अंदर होता है जिसे मूलतः direct speech कहा जाता है जबकि इसी को reported part, clause या speech, भी कहते हैं।
2:-indirect रुप से उसकी बात को नियमानुसार बदल कर कहा या लिखा जाता है जिसे indirect narration या speech कहते हैं।
Example:-Ram told Sita that she was his friend.

    ।। Direct से Indirect बनाने के सामान्य नियम ।।
(a) reporting verb के बाद यदि कर्म हो या कर्म बनाने की आवश्यकता पड़ी हो तो उसे tell, tells, told, asked, ordered आदि में नियमानुसार बदलते हैं अन्यथा उसे ज्यों का त्यों रहने देते हैं।
(b) reporting part के कर्ता और कर्म को नहीं बदलते हैं।
(c)comma, inverted commas को गायब कर देते हैं।
(d)  reporting और reported part को जोड़ने के लिए that,if आदि का प्रयोग नियमानुसार करते हैं।
(e)that आदि के बाद यदि I या proper noun आये तो उसे बड़े अक्षर में लिखते हैं अन्य सभी को छोटे अक्षरों में लिखते हैं।
(f) tense, personal pronoun, near सूचक शब्दों में परिवर्तन उनके नियमों के अनुसार करते हैं।
(g) reported part सभी प्रकार के वाक्यों  को साधारण वाक्य में ही बदलते हैं।
(h) assertive,interrogative, imperative, optative और exclamatory sentences में परिवर्तन उनके नियमों के अनुसार करते हैं।

  (1)  Assertive Sentence साधारण वाक्य
(1)यदि reporting verb के बाद कर्म हो तो say to,says to,said to को क्रमशः tell,tell ,told में बदलते हैं।
(2)reporting और reported part को जोड़ने के लिए that का प्रयोग करते हैं।
(3)पूर्व के सभी नियमों का पालन करते हैं।
(4)आगे के नये नियमों को ध्यान में रखते हुवे परिवर्तन करते हैं।
         Tenses में परिवर्तन के नियम
(1)यदि reporting verb present  या future के किसी भी tense में हो तो reported speech की क्रिया का tense कभी नहीं बदलता है।
(2)यदि reporting verb past tense में हो तो reported speech की क्रिया का tense 1,2,3,4,5,6,क्रमशः 5,6,7,8,7और 8 में बदलता है
अन्य किसी क्रिया के tense में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
इसके लिए निम्नांकित chart की सहायता ले सकते हैं

यदि direct में हो           तो indirect में हो जाता है
1:-v1st,v1st s,es             V2nd    
2:-do, does                       did
3:-is,are,am                      was, were
4:-has,have                       had
5:-verb 2nd.                      had+3rd
6:-was,were                      had been 
7:-will,shall,.                    would, should
may,can                           might, could
8:-शेष क्रियाओं में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

Tense के नियमों के Exceptions

जब reported speech में  सार्वभौमिक सत्य,वैज्ञानिक सत्य,ऐतिहासिक तथ्य,आदत, कहावत मुहावरे आदि हो तो उनकी क्रिया का tense नहीं बदलता है।

        Personal pronouns में परिवर्तन

1:-reported speech के first person pronouns के कारक,लिङ्ग और वचन reporting speech के कर्ता के अनुसार बदलते हैं।
2:-reported speech के second person के pronouns के कारक,लिङ्ग और वचन reporting
speech के कर्म के अनुसार बदलते हैं।
3:-reported speech के third person के pronouns में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

    दूरी अथवा समय सूचक शब्दों में परिवर्तन

This.                          that
These.                        those
Here.                          there
Now.                           then
Ago.                           before
Today                         thatday
Tonight                     thatnight
Tomorrow                the next day
Yesterday                the previous day
Last                          the previous
Next                         the following
Thus                        so
Hence                      thence
Hither                      thither
Just                          then
 इस प्रकार से परिवर्तन सभी प्रकार के वाक्यों में करते हुवे उन वाक्यों के परिवर्तन के नियम लागू होतें रहते हैं।
जिन्हें अगले अंक में देखेंगे।