शनिवार, 18 जनवरी 2014

मन

जग धारा में बहना सुख दुःख सहना रह अतृप्त !
काम कोह लोभ मोह चाहे-अनचाहे करे संलिप्त !!
बहाने बहाते सच को हो कर शत असत में लिप्त !
मन मार मार डाले चलाये कर को कर स्व लिप्त !!१!!
मन डोले तन डोले होले होले कदम डोले हो किंकर !
मन के दास-दासी बन नाचे जग का हर नारी-नर !!
मन राजा कृतदास सा मान हमें काटे हमारा पर !
मन का राजा बन हो जाय सफल पग पग पर !!२!! 
 

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

आप हरे संताप पाप ताप

निज सुख दुःख से हट देखे थोड़ा पर को !
सच बात  भारी भरकम माने  अपने को !!
 सुधरेगी सब जब मिटा देगे भय भूत को !
समरसता समानता से एक माने सब को !!१!!
का हे दुखी पर पाप से झेल रहा तू संताप !
निज कर्म धर्म के पाप का सहना तू ताप !!
जग जीवन दिने वाले रखते हर पल नाप !
शरनागत होते आप हरे संताप पाप ताप !!२!!  

सोमवार, 13 जनवरी 2014

भव भय त्राता

जानत तुम्ही मानत तुम्ही मनावत तुम्ही दिन राता !
सदा सन्दर्भ हो लायक जब जब हम तुम बनावे बाता !!
प्रेम कथा न बने व्यथा जब जहान जुड़ करे जग राता !
पद पद्मो में बन्दन दूर करो जग क्रंदन भव भय त्राता !!१!!  

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

पोषक

अब तबके तबके वाले करते कहते निराले !
फास गले की जैसे-तैसे झट दूजे में है डाले !!१!!
पोषक बन सदके सजदा करते सदा सबके !
कर्म-धर्म के पायक ही सायक होवे जनके !!२!!
खटकीरे सा लोहू अर्जित जनके धन गटके!
शोषक या तोषक पर मोचक दिखते सबके !!३!!
जाने माने पहचाने कुछ अनजाने भयसे !
शोषक को ही मोचक माने किस कारनसे !!४!!
पोषक-मोचक भाव भरे भय भव मन मे !
केचुली है छोड़,जोड़ हर मोड़ मिल तन में !!५!!      

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

पत्ता पत्ता

रचना रचयिता की सब,सबके लिए!रचना=सृष्टी ,काव्य !रचयिता =ईश्वर ,काव्यकार !
सम भाव भूषित भू भवन के लिए !
कमल सा सभीको खिलने के लिए !
जग वट घर है जू हर विहग के लिए!!१!!
यूं तो मानते अद्भुत वट पत्ता पत्ता !
खेल खिलाये अद्भुत सबको है सत्ता !
प्याज सा रुलाये छेड़ते ही हर छत्ता !
 नाच नचाये साच दिखाए ले लत्ता !!२!!
बट अन्यन यूनियन बनाना सिखाती !but,onion,union!
सघे शक्ति कलियुगे का पाठ पदाती !
आम को तरसाती ख़ास को हरषाती !
रचना अपनी हर हर को बात बताती !!३!!हर=प्रत्येक,ईश्वर !
पतझड़ हटा जीवन में ऋतुराज लाती !
पावन सलिला सा सब सुख भर जाती !
आते जाते मन मंदिर पावन कर जाती !
बरसा बन जीवन में हरियाली फैलाती !!४!!


   
  

रविवार, 5 जनवरी 2014

परत दर परत

समाज से सब,सब से  समाज संवेदना सारहीन तार-तार !
व्यवस्था- व्यथा को हादसा कह सहते पाते दर्द बार-बार  !! १ !!
संस्कार ,व्यवहार ,आहार ,विहार सब रो रहे बिफर-बिफर !
आचरण से जहा पूजे जाते  वही आचरण जब होवे  जहर !!२!!
सेवा मेवा को बहा कर सेवक-सुत सत सत बरसावे कहर !
दे वेदना नित अपनो को पाते खाते बरसाते फैलाते जहर !!३!!
बात मानव समाज की ,खोलो ज़रा इसकी परत दर परत !
अहिंसा के पुजारी यहाँ दिख रहे है हर गली हिंसा में ही रत !!४!!
त्रिभंगी ,त्रिपुरारि  पर पड़ते ये भारी कर करामात न्यारी !
सराफत -चादर में सिमट-लिपट झपट लूटन की तैयारी  !!५!!
 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

सच है यहाँ गाते सब धर्म सब ग्रन्थ गीता हो जन हिता !

राम राम कहि कर्म बिचारही जल बिनु मीन सा हो मूक !
निज सोच समझ ज्ञान अज्ञान विवेक से हुई कहा चूक !!
कैसे कैसे दोस्त-दुश्मन दोगली चाल से बदतर करे लूक !
बिजली के नंगे तार सा नंगा हो झटके से सब करे टूक !!१!!
एक नहीं अनेक बार ,बार-बार हर बार करते तार-तार सब !
फिर भी क्यों आस है कि सुधर कर सुधार देगे बिगड़े फब !!
अब बात करामात की उचित ढंग से दंड देगे ही इन्हे रब !
डर नही भगवान का कुलकलंकी कापुरुष किंपुरुष को जब !!२!!
तैयार है हम सुधरने सुधारने को हर पल छोटी बड़ी भूल !
लालच बला सूल रहती तैयार खून सा निकालने को मूल !!
निसंतानी-बईमानी की सम्पत लिपट खिल रहे जो फूल !
चाटेगे धूल मिल मिट्टी जायेगे इनके सारे सपने स्थूल !!३!!
देर-अंधेर,न्याय-अन्याय बीच रब सच का झूठ का नहीं !
मान मर्दक मद मारक मारुति दुख निवारे सब का सही !!
दुर्गा दुर्ग साधिनी साधक साध्य साध संहारे दुष्ट है मही !
जिसका कोई नहीं उसका खुदा करे नीर क्षीर  हर कही !!४!!
विचारना सवारना भूल सुधारना सुधरने का मंत्र मूल !
बात बन जाय समाज में बिन जाय तो नहीं पकडे तूल !!
कथ्य अकथ्य वाद विवाद परिवाद संवाद असंवाद भूल !
पर पर काटक कष्ट कंटक राम दंड से फाँके सकूल धूल !!५!!
भूल अपनी सुधारे सुधरे मत जले स्वं ही चिन्ता-चिता !
हानि लाभ जीवन मरन यश अपयश देता है परम-पिता !!
खल संहारक सुजन तारक दे तुमको कृपा उसको रिता !
सच है यहाँ गाते सब धर्म सब ग्रन्थ गीता हो जन हिता !!६!!  

बुधवार, 1 जनवरी 2014

सकल परम गति के अधिकारी

कृत कर्म कृत काल में सभी माने सही !
काल काल है जाने जन पर माने नहीं !!
सत असत स्वभाव वश फैले हर कही !
दिखता दिन रात गुन दोष है इस मही !!१!!
निज करम धरम को ही मानते भारी !
पर खोट देखन में रत है दुनिया सारी !!
विरत धरम करम रत निनानवे झारी !
पाखंडी भी बन पंडित देवे ज्ञान भारी !!२!!
फैलावे जग जंजाल जगावे जुग जारी !
सरम त्याग बे सरम चाहते सुख सारी !!
बेवकूफ है इनकी नजर श्रम शर्म कारी !
गुन त्याग अवगुन गह की ये महामारी !!३!!
पूरब प्रतीक पिछड़े पन पुरातन पारी !
पाश्चात्य आग में लिपट सुखी  भारी !!
खुद जल जलावे सबै कपटी नर नारी !
पर है सकल परम गति के अधिकारी !!४!!