रविवार, 24 मार्च 2024

।।शार्दूलविक्रीडितम् छंद हिन्दी एवं संस्कृत दोनों में।।

    ।।शार्दूलविक्रीडितम् छंद हिन्दी एवं संस्कृत दोनों में।।

      यह उन्नीस वर्णों वाला समवृत्त वर्णिक छंद है। यह वृत्त/छंद अति छंद परिवार का अतिधृति छंद है।काव्य में शार्दूलविक्रीडित अत्यन्त प्रसिद्ध छन्द हैं। संस्कृत जगत में इस छन्द में अगणित श्लोक है।समवृत्त होने के कारण चारों चरण समान लक्षण युक्त हैं। इसके प्रत्येक चरण में 19 तथा चारों चरणों में कुल 76 वर्ण होते हैं। 
लक्षण - 
सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम्।
 या
सूर्याश्वैर्मसजस्तता: सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ।”
व्याख्या:
             शार्दूलविक्रीडित में शार्दूल का अर्थ बब्बर शेर
और विक्रीडित का अर्थ उसकी क्रीड़ा अर्थात् उछल कूद। शायद इस छंद में वर्णों की उछल कूद को देखकर ही
हमारे आचार्यों ने इसका नाम 'शार्दूलविक्रीडित' रखा है।
इस छन्द में जो इस प्रकार का भाव व्यक्त किया गया है वही बात उसके लक्षण में 'व्यक्त होता है - सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम्' अब प्रश्न उठता
कि इसका गायन करते समय आपकी साँस कहाँ-कहाँ विश्राम लेगी तो इसका उत्तर छन्द के लक्षण 'सूर्याश्वैर्यदि शब्द में प्राप्त होता है। जिसमें सूर्य और अश्व इन दो
शब्दों से जो सांकेतिक संख्या है उन संख्या वाले अक्षर पर साँस विराम लेगी। 
  अब सूर्य कहते है आदित्य को, हमारे पुराणों में जिनकी संख्या 12 बताई गयी है।धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ये कश्यप ऋषि की दूसरी पत्नी अदिति से उत्पन्न हुवे इसलिए आदित्य कहलाए जिनके नाम हैं : विवस्वान्, अर्यमान, पूषा, त्वष्टा, सविता, भाग,धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम अर्थात् भगवान वामन।इन्हीं के आधार पर
वर्ष के 12 मास नियत हैं ।इस प्रकार 'शार्दूलविक्रीडित छन्द में प्रथम विराम/यति प्रत्येक चरण के 12वें वर्णों पर होगी।
     अब दूसरा विश्राम 'अश्व' संख्या पर होगी।
 ऋग्वेद में कहा गया है- ‘सप्तयुज्जंति रथमेकचक्रमेको अश्वोवहति सप्तनामा’ यानी सूर्य एक ही चक्र वाले रथ पर सवार होते हैं, जिसे 7 नामों वाले घोड़े खींचते हैं. सूर्य के रथ में जुते हुए घोड़ों के नाम हैं- ‘गायत्री, वृहति, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप और पंक्ति।ये 7 नाम 7 प्रकार के वैदिक छंदों के भी हैं।
इसलिए इस छन्द में द्वितीय विराम/ यति सातवें अक्षरअर्थात् प्रत्येक चरण के अंतिम वर्ण 12+7=19वें वर्णों पर होगी ।
परिभाषा:
     जिस श्लोक/पद्य के प्रत्येक चरणों में मगण, सगण, जगण, सगण, तगण , तगण और एक गुरु के क्रम में वर्ण हो और बारह एवं सात वर्णों पर यति हो उसमें। शार्दूलविक्रीडितम् छंद होता है।
उदाहरण:
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1:याकुन्देन्दुतुषार हार धवला या शुभ्रवस्त्रवृता,
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यावीणा वरदण्डमण्डितकरा याश्वेतपद्मासना।
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याब्रह्माच्युतशंकरप्रभृति भिर्देवैः सदा वदिन्ता,
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सामांपातुसरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

2: खर्व स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम् , प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्ध मधुप व्यालोल गण्डस्थलंम् । दंताघात विदारि तारि रूधिरैः सिन्दूरशोभाकरम् ,
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ।।

3:यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके,
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा,
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्‌॥

4:ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमल प्रध्वंसनं चाव्ययं
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा।
संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं
धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्‌॥

5: पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञान भक्तिप्रदं, 
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरशुभम् । 
श्रीमदामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये,
ते संसार पतङ्ग घोर किरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ॥

6:यास्यत्यद्य शंकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया, 
कण्ठः स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलषश्चिन्ताजडं दर्शनम् 
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः, 
पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः॥
    उक्त सभी श्लोकों में प्रथम श्लोक की भांति ही उनके सभी चरणों में क्रमशः मगण, सगण, जगण, पुन: सगण, उसके बाद दो तगण तथा अन्त में एक गुरू वर्ण हैं और 12वें एवं 7वें वर्णों के बाद यति हैं। अतः सभी 
शार्दूलाविक्रीडित छन्द के श्लोक हैं। 

हिन्दी:

हिन्दी में भी इस छंद के लक्षण एवं परिभाषा 
संस्कृत की तरह ही हैं।

उदाहरण=

माँ विद्या वर दायिनी भगवती, तू बुद्धि का दान दे |

माँ अज्ञान मिटा हरो तिमिर को, दो ज्ञान हे शारदे ||

हे माँ पुस्तक धारिणी जगत में, विज्ञान विस्तार दे |

वाग्देवी नव छंद हो रस पगा, ऐसी नयी ताल दे ||
।।धन्यवाद।।

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