सोमवार, 27 मार्च 2017

साधारण-शुभ संवत्सर,नीति-प्रीति दे जन- जन पर।।

नव जीवन का उल्लास लिए,रग-रग में नव राग लिए।साधरण-शुभ संवत्सर कर- कमलन यश-हार लिए।।धर्म-अर्थ को साथ किये,काम लाय हुलसाय हिये।बन अलकनंदा पयप्रसविनी जन जन को सम्मान दिये।।आस पूर पूर जन का,मान भरे मनका-मनका। नित नूतन उपहार मिले सबको रबका।।कामना हमारी हो साधारण पर शुभ संवत्सर।हमरा नव वर्ष है तो हम नीति प्रीति राखे जन जन पर।।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

धीर वीर बलजीत का ऊँचा सदा हो माथ।।


शेरगढ़ संस्कृत विद्यालय का एक वीर।
दे रहा है आज हर अपनों को हरा पीर।।
अवध वासी बलजीत जो हैं बहुत धीर।
आज पुण्य काल में किया हमें गम्भीर।।2
हो रहे निवृत्त सेवा से इस साल के साथ।
धीर-वीर बलजीत का ऊँचा सदा हो माथ।।
आन,बान व शान सदा सोहे इनके साथ।
इनकी हर कामना पूरे नित त्रिलोकी नाथ।।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

।।कौन अब गंगाधर बनेगा।।

जहाँ हो सब बनाने को आतुर,वहाँ तब बनने को तैयार कौन होगा।
हर पद-दल हर क्षण हराने को बेसब्र,तो बताये हार किसे स्वीकार होगा।।
कीचड़ उछालने फैलाने वालों मध्य,अब सच को कौन अंगीकार करेगा।
सर्वत्र फैल रहे द्वेष-हलाहल पीने को,कौन अब गंगाधर बनेगा।।1।।
हर थल पनप रही असमता-विषमता वर्ग -भेद,भेदन को कौन आयेगा।
हाय अन्याय पाप अपाचार समन हेतु,कौन कौन्तेय यहाँ अस्त्र धरेगा।।
जिस राज में सभी रथी-महारथी ही हो,वहाँ फिर सारथी कौन बनेगा।
दृश्य-अदृश्य कुकर्म-कालकूट को,गटकने कौन अब गंगाधर बनेगा।।2।।
मत्स्यान्याय मध्य जीने को बेवश का,अब यहाँ न्यायी कौन बनेगा।
माइट इज राइट के काइट को वसुन्धरा पर,कंट्रोल कौन करेगा।।
जिसकी लाठी उसकी भैस मध्य,लाठी लगाम लगाने कौन अब आयेगा।
हर गली-थली के मद-मतवारे के मद को पीने, कौन अब गंगाधर बनेगा।।3।।
सर्वहारा जहाँ सर्व हारा है हो रहा,वहाँ इसकी जय कौन अब लायेगा।
हमारी हताशा-निराशा-निशा मिटाने, कौन सूर सूर बन अब आयेगा।।
जहाँ बन्दी में मन्दी वहाँ सहज सानंदी का,
आनन्द हर कौन बन पायेगा।
निश्चित हर ही है हरि जो हर हार हरण को,यहाँ गंगाधर बन आयेगा।।4।।

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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

घोसले को त्यागना ही पड़ता है।

इस जहां की रीति यही है,जिसे हर को निभाना ही पड़ता है।
उड़ो कितनी ऊँची उड़ान, अंत में जमी पर तो आना ही पड़ता है।।
हैं अनन्त अनन्त में राहें,किसी न किसी को पकड़ना ही पड़ता है।
यहाँ आकर एहसान नहीं,निज प्रारब्ध को
भुगतना ही पड़ता है।।1।।
राज राजेश्वर हो या दीन-हीन निर्बल,चाल चलना ही पड़ता है।
राजा हरिश्चंद्र और विप्र सुदामा को भी, यहाँ याद करना ही पड़ता है।।
जन्म-कर्म के मर्म को निज नेह गेह में भी, नित झेलना ही पड़ता है।
जीवन-ज्योति जलाना है तो,घोसले को त्यागना ही पड़ता है।।2।।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

नया

आ रहा है नया साल कुछ काम तो कर ले नया।
इस जमी औ आसमा को तोहफ़े तो देवे नया।।
पर नवीनता की घिन्नी में न हो पुरातनता बया।
सुख-शांति की सरिता बहा बैर-भाव से करे हया।।
समय की कीमत है क्या इसे सब पहचाने सदा।
सरसता समरसता सदासयता सदाचरण सोहै सदा।।
जात पात विषबेल को नवभारत से मिटाये जरा।
डिग्रियों तले युवाओं को नौकरियां दिलाये जरा।।
सभ्य होने की ओट में फैलीअसभ्यता देखे यहाँ।
नव यन्त्र तन्त्र में रची बसी कुरीतिया मेटे यहाँ।।
छोड़कर सब क्लेश क्लैसिक कल्चर बनाये नया।
क्षेत्रवादी भावना तोड़ देशवादी भावना जगाये नया।।
हम मराठी गुजराती राजस्थानी बिहारी क्यो है यहाँ।
सम्पूर्ण भारतवासी एकसूत्र में बध भारतीय बने यहाँ।।
योग्यता का सम्मान कर अयोग्यता मिटाना है यहाँ।
काट सभी विषमता को योग्यता दीप जलाना है यहाँ।।
विपदा नशा नाश कर हर दिल सुआस भर देवे नया।
हर भारतीय एकता अखंडता समग्रता को रखें नया।।
मूलभूत सुविधाओं की हो न कभी इस धरा
पर कमी।
हर भारतीय तन मन दिल दिमाग हो महफ़ूज व धनी।।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

क्यों स्वहित साधन को ही है सब बाध्य

जो हैं अपने आस-पास सदा दिन-रात,
क्यों समझ न आये उनके दिल की बात।
वदन पर उजले चोले रख मन मटमैले,
क्यों रचते उलझन के ताने हौले-हौले।।1।।
कहने को हम परम विरागी परम त्यागी,
क्यों तन-मन अहनिसि तृष्णा-आग लागी।
नारी रक्षा देश सुरक्षा अच्छी व्यवस्था,
क्यों बगुला भगत सी ही है ये आस्था।।2।।
कुटिल क्रन्दन कर कर जोड़े-जोड़ें,
क्यों कुटिल मुस्कान-सूल सूल तोड़े।
रचना स्वहित की सब पर होती अमूर्त,
क्यों छल-छद्म, द्वेष-पाषंड में हैं विमूर्त।।3।।
चलते सम्हल सम्हल फस न जाय चोली,
क्यों सूरत इतनी भोली प्यारी सी है बोली।
शिव स्वरूप धर आशुतोष के पहन चोले,
क्यों शिवभक्त-भक्त साआस-पास डोले।।4।।
समीपता दीनता दिखाकर दिनों-दिन,
क्यों मछुवारे सा रत हैं मारने को जन-मीन।
दुराराध्य को बना नित परम असाध्य,
क्यों स्वहित साधन में ही हैं सब बाध्य।।5।।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

हे कृष्ण कृष्णता का कर नाश।।

शुरू कहाँ कहाँ खतम,
नब्ज है विचार का हरदम।
बा गर्भ नव जीवन सर्जन,
भूतनाथ तन राख थल मर्जन।।
आरम्भ  अन्त अन्तहीन,
हो जा मन तू आत्मलीन।
मीन मलिन मन माखे,
शुभ शुभांकर शत शाखे।।
स्व-पर पर की बात,
हैं अगनित अद्भुत रात।
सच मन मन्दिर तन उपवन हो,
राम धाम बनअंग अंग सुमन हो।।
दुःख दावानल सुख सागर सोच,
हर थल डूबे मन मन्द मोह मोच।
प्रारम्भ बिन्दु अनवरत चलकर,
सिंधु मा विगलित घुल मिलकर।।
ताप त्रय चहु दिशि चहु काल,
हर सब करे हर जन को बेहाल।
हे कृष्ण कृष्णता का कर नाश,
भरें आद्यन्त जन जन नव आश।।