रविवार, 15 नवंबर 2015

केवल इंसा बने पंचतत्त्व सिखा जा रहा है।

अजी इस जहां में आज गजब हो रहा है।
सम्बन्धों में नित नव दरार पड़ रहा है।।
कौरव-पांडव सा जग सर्वत्र लड़ रहा है।
रिश्तों का बन्धन तार-तार हो रहा है।।1।।
भीष्म भी भाग्य- बन्धन बधा जा रहा है।
कृष्ण भी कलि ग्रास अब बना जा रहा है।।
खुली आँखो कायनात धृतराष्ट्र बन रहा है।
शकुनी मामा नित नव भांजा फ़सा रहा है।।2।।
पुत्री-कुंती सरेआम चिर हरण हो रहा है।
शक्ति सुत दुर्योधन सुख मदी हो रहा है।।
शक्तिधारी माया-मोह से मोहित हो रहा है।
फेसबुक मित्रो का फेस ओपन कर रहा है।।3।।
आपस में फ्रेंड जाति-जहर से नहा रहा है।
नेट सद विचारों से हट फट भटक रहा है।।
कर्ण कामी दुःशासन का ब्रदर बन रहा है।
बेगाना अपना ही शहर हमें लग रहा है।4।
अजी एक हो देखों गर्व गला जा रहा है।
निराशा नाश नेह-रथ आशा-अर्क आ रहा है।।
केवल इंसा बने पंचतत्त्व सिखा जा रहा है।
पंचतत्त्व हमें सत्य ज्ञान दिया जा रहा है।5।

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