मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

पंचदस छंद

अंगना की ज्योति फैली, अंगना का रुप देख!
जिस तरह रवि ज्योति देख, फैल जाय अरुण रेख !!१!!

बौरौ पर भ्रमर जैसे,करे सदा रस पान!
वैसे ही नर रुपों की,चाहते मधु पान !!२!!

जटाकटाह युक्त देव,भागिरथी धारिणी!
बाल चन्द्रमा युक्त भाल,हौं मोहि निस्तारिणी !!३!!

सत्यासत्य प्रियाप्रिय है,क्रूराक्रूर संग्रहि!
व्यय अव्यय सगुणयुक्त,वेश्या नृपनीति हि !!४!!

कर कान्ति युक्त मुझको,हे देवाधि महान!
मिले शुभ कंचन कामिनी,करते रहे सम्मान !!५!!

अचैतन्य दिनमणि जैसे,सहे न सूर्यपाद!
तो तेजस्वी नर कैसे,सह सकता परमाद !!६!!

विजयी होवे पुण्यात्मा,रस व्यक्त कवीश्वर!
भय नहीं जिनके यश मे,वृद्धावस्था मृत्युकर !!७!!

अज्ञानी ज्ञानी प्रसन्न आसानी से होय!
प्रसन्न न कर सके ब्रह्मा, अल्पज्ञान को गोय !!८!!

ब्रह्मकृत मौन आवरण,मूर्खता को गोय!
विद्वत समाज मे कभी,यह मूर्ख भूषण होय !!९!!

कंचन बरन की बुलबुल, काहे को मनहीन!
मन मे है यह सोचती,उल्लू से क्यो हीन !!१०!!

जॉत-पॉत की ऑच यह,करेगी कौन काम!
मानवता डुबोयेगी,तब होगी यह शान्त !!११!!

आचरण की दुहाइयॉ,उपदेशों तक लिप्त !
पुलिस पुतरिया पातकी,किसके है ये मित्त !!१२!!

जन जन की नीद हराम,यह किसका है काम!
कुर्सी तश्करी भ्रष्टाचार,नेता नमक हराम !!१३!!

अध्यापकों की अध्यापकी,छात्रों की पढाई!
खुल जाती है कल्लई,कङी परीक्षा आई !!१४!!

खुद को धिक्कारती शिक्षा,प्रतिभा खङी हताश !
राजनीति पंगु होगी,ढोते-ढोते लाश  !!१५!!






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