बुधवार, 28 नवंबर 2012

कुर्सी, कंचन, कामिनी

कुर्सी, कंचन, कामिनी फलित इच्छित चाह !
ज्यो-ज्यो ये सब पास हो, टिकती नही निगाह!!

कुर्सी की यह लालसा ललक बढाऍ जोस !
कट गया उस सामाज से, जिन पर किया भरोस !!

कन्चन से परेशानी रहे, ना हरदम पास !
देता सुख-दुख सब यह, काहे का विश्वास !!

कामिनी की कई बात, बढाती रहे चमक !
कब कैसी हो जाये, ना पाये कोई भनक !!

गिरिजा शन्कर तिवारी

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