बुधवार, 14 दिसंबर 2016

घोसले को त्यागना ही पड़ता है।

इस जहां की रीति यही है,जिसे हर को निभाना ही पड़ता है।
उड़ो कितनी ऊँची उड़ान, अंत में जमी पर तो आना ही पड़ता है।।
हैं अनन्त अनन्त में राहें,किसी न किसी को पकड़ना ही पड़ता है।
यहाँ आकर एहसान नहीं,निज प्रारब्ध को
भुगतना ही पड़ता है।।1।।
राज राजेश्वर हो या दीन-हीन निर्बल,चाल चलना ही पड़ता है।
राजा हरिश्चंद्र और विप्र सुदामा को भी, यहाँ याद करना ही पड़ता है।।
जन्म-कर्म के मर्म को निज नेह गेह में भी, नित झेलना ही पड़ता है।
जीवन-ज्योति जलाना है तो,घोसले को त्यागना ही पड़ता है।।2।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुकर्वार (23-12-2016) को "पर्दा धीरे-धीरे हट रहा है" (चर्चा अंक-2565) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जीवन की रीत तो यही है ... बहुत ख़ूब ...

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