मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव उज्ज्वल जल धार सा सबका हो मन

मंगल जात सन दो हजार तेरह है रहा !
सद मंगल सब तरफ मंगल दे है कहा !!
बुध सद्बुध्दि दे दो हजार चौदह महा !
आवत जात सद्बुध्दि मंगला हो अहा !!१!!
नव वर्ष नित नूतन किसलय झहरे जीवन में !
ज्ञान मान नव तुलसी दल लहरे त्रिभुवन में !!
मंगल मूल फूल फल प्रतिपल विकसे तन में !
सत्य कर्म निष्ठा दधि दुर्बा गुण सिहरे रग में !!२!!
नव उज्ज्वल जल धार सा सबका हो मन !
नव गति नव लय नव नव भाव भरे हो तन !!
काम क्रोध लोभ मोह मद से विरत हो जन !
स्व सा सबका भाव हो भारत के कन -कन !! 

रविवार, 29 दिसंबर 2013

लानत

कबहु कतहु कैसे किससे कर्म धर्म करवावे कौन !
मुखर होगा कि मन मसोज कर रह जाएगा मौन !!
सत असत जानत मानत है नहीं व्यवहार आनत !
झूठ फरेब धोखा धड़ी घात प्रतिघात को है लानत !!  

पावकमय ससि स्रवत न आगी !

जय जय जय हे मम हनुमाना !तारक सीता तू जग जाना !!
आपसु आस विश्वास राम सा !गिरिजा के हैं आपु तात सा !!१!!
करू रक्षा इष्टदेव हनुमाना !जानकी जू भगत परसाना !!
समय प्रहार बज्र सम लागे !सारी ठगी तभी तो भागे !!२!!
लूट झूठ बल करते त्यागी !मानहु मोहि जानि हत भागी !!
गला विश्वास का हैं मरोड़े !भाई बन सुख शान्ति जोड़े !!३!!
है काल वश जगत गोसाई !सहोदर अन्य दूजा भाई !!
रवि किरण कभी आग समाना !पर जाड़े में परम सुहाना !!४!!
अमरित बरसे चन्दर सुख का !मंजर आगामय वह दुःख का !!
पावकमय ससि रमा भासती !हतभागी बन आग मागती !!५!!
कवि कुल कमल तुलसी ज़ुबानी !सदा सत्य सिख देय कहानी !!
समय शत्रु डर है भाग भागी !पावकमय ससि स्रवत न आगी !!६!!
 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जीवन एक सफ़र है

सोच समय ज्ञान देश तय करते कर्म क्षेत्र !
समय ज्ञान भावी वश बदल जाते है क्षेत्र !!
शौक मजबूरी पर लगा राज करे पर पर !
ये कराते है हमें कभी आराम कभी सफ़र !!
जनम करम मरन भूमि एक अनेक होती है !
भाग्य नचाती नाच नहीं कभी यह सोती है !!
चाहे अनचाहे भावी अपना काम कराती है !
जहां जाना जिसे उसे बिन चाहे ले जाती है !!
सफ़र कराती बात बनाती  साथ निभाती है !
सुन्दर सुखद सरस सपन साकार कराती है !!
अनचाहे चाहत बनवा उसे पूरा करवाती है !
होनी होकर रहे अनहोनी न होय सिखाती है !!
घर से दूर दूजो को अपना सगा बनवाती है !
सजोती सवारती तो बना काम बिगड़वाती है !!
बिगड़ा काम बनवाकर अद्भुत नाम कराती है !
हसती हसाती रोती रुलाती हर खेल खिलाती है !!
जीवन एक सफ़र है जो हर हेतु हर तरह का है !
सुखद है दुखद है मिश्रित है मनोहर भी तो है !!
आये जीवन में कैसा भी विकट समय !
धैर्य धरो होगा अनुकूल नहीं विस्मय !!
सफ़र जिन्दगी का अद्भुत वर्णनीय है !
पग पग पर पतित पावनी कथा जू है !!
गीत है संगीत है जीवन का आधार है !
विकास है परिष्कार है सबका सार है !!
आवश्यकता है मजबूरी है मिलन डोरी है !
इसके बगैर जीवन की कल्पना कोरी है !!
राजा सा जीवन जिनका प्रजातंत्र में है !
भावी सफ़र हेतु ये भी तो परतंत्र ही है !!
राजा हो या रंक सबको मारे भावी डंक !
अछूता नहीं कोइ जीओ जीवन हो असंक !!
सफ़र का क्या कहना सच यह जीवन सा !
प्रारम्भांत जीवन सफ़र है प्रकृति अंग सा !!
उत्थान पतन नव निर्माण का सफ़र अनवरत !
स्वीकार कर सच भावी डर न हो कर्म विरत !! 
 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

प्रभु की ही माया

अब हम ऐसा करे व्यवहार ,जो जन- जन में जगाये उदगार !
धैर्य-सहन करे मजबूत सब ,कुछ भी नहीं होता है तार- तार !!
आ गए जब इस जग में तो,एडजेस्ट करे मत कभी कोसे इसे !
करना ही है तो वो करे जग हित,याद रखे हर पल जग जिसे !!
इस धरा पर अपना अपना तो, करने भरने में लगे रहते सब !
छोड़ दे ये विवेक से आनंद पाए,पराये हित स्व कार्य करे जब !!
ईमान से इन्सान इन्सान हित ,जब रखता है दिल हरदम रत !
कीचड में कमल बन जग सरोवर,मनोहर पराग भरे  शत-शत !!
उसकी -इसकी किसकी सबकी ,नहीं करे स्तुति -निंदा सर्वत्र !
थक जायेगे हार जायेगे मरेगे ,हम सब करते कराते ये विचित्र !!
एकतारा से स्वर निकालना ,गुर ज्ञान बिन दुष्कर संगीत संसार !
वैसे ही शिक्षा सिख श्रम बिन ,दुनिया का हर कार हर को  है भार !!
ऐतिहासिक तथ्यों स्व इतिहास से, रखना है हरदम तारतम्य !
बिन इनके वजूद स्व ज्ञान मान ,स्व सही हो जाय अगम्य !!
 

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

शिक्षा

रोजगार नाग दंस से है अर्धविछिप्त समाज !
गिर रहा प्रतिभा का सम्मान हर जगह आज !!
आरक्षण कूटनीति से ये लेते निज रोटी सेक !
नित नवीन विकल्पों को देते बार-बार फेक !!
ये मद मस्त आतुर है करने को समाज पस्त !
जाति धर्म भाषा क्षेत्र में उलझा करे हमें त्रस्त !!
बेरोजगारी सुरसा बदाये नित निज भय आनन!
कोर्ट कचहरी क़ानून प्रहरी रोके भरती विधानन !!
कारण हो गया है सोचनीय दर्शनीय मंथनीय !
बद नीतियों से ही है बन रही दशा अकथनीय !!
शिक्षा की परीक्षा है या है यह परीक्षा की शिक्षा !
बिगाड़ दिए है खेल दे कर नाम इसे सर्व शिक्षा !!
अंगूठा टेक रहेना एक के नाम कर रहे साक्षर !
शिक्षित साक्षर बनो रहो भले शिक्षित निरक्षर !!
कूडा ढेर डिग्री बन रही है फाईलो में सज रही !
यूथो को कचरा मास्टर बनाने में लगी है सही !!
जो है शिक्षा सम्पन्न और सर्व ज्ञान के धारक !
वे ही हो सकते है हर समय यहाँ विद्या तारक !!
पर वाह कुसंग तू नसावे स्व साथ मिलावे कैसे !
नक कटी समाज नाक वाले की नाक कटावे जैसे !!
चले सत्रांक प्राप्तांक संयुक्तांक की भारी खेल !
पास होना तय हुआ मिटा अध्ययन का झमेल !!
आठवी तक तो किसी को नहीं करना है फेल !
शिक्षा स्तर सुधारने वाह रे सुन्दरतम खेल !!
शत प्रतिशत हो जायेगी भविष्य में साक्षरता !
भारत की गरिमा महिमा मंडित करे अक्षरता !!
साक्षर शिक्षित विलग विलग हैन्यारे इनके भाव !
असंख्य शिक्षितों का साक्षर सा बना देगे स्वभाव !!
शिक्षित सह शिक्षित साक्षर पा रहे है राज काज !
निश्चित ही समाज पर गिर रहा है यह गाज !!
मन मार कर रहा है आम आदमी जहर पान !
ऐसी क़ानून डालेगी कैसे देश हित  नव जान !!
शिक्षा स्तरीय या स्तरहीन विषय वस्तु युक्त !
स्तरीय बनाने को होते है नित नवाचार प्रयुक्त !!
शिक्षा प्रारम्भांत सबको मिल सुधारनी ही होगी !
नित नव ज्ञान विज्ञान से संचालित करानी होगी !!
तब जाकर गली गली अलख जगाएगी सद शिक्षा !
फहरे परचम भारत का सर्व सुलभ हो सद शिक्षा !!

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

भक्तो में भरो नित न प्रकाश

जग मातु भारत भारती ,चराचरो की भाग्य है सवारती !
अमल-धवल निज सा, दे दो दान में हमें हे माँ सरस्वती !!१!!
जुग कर जोर नमन बन्दन,स्वर वीणा सा दो वीणावादिनी !
नव गति लय ताल छंद नव,जुग का दो ज्ञान ज्ञानदायिनी !!२!!
वेदधारिनी कमालासिनी ,हर चर-अचर में भर भुवन भाव !
सचर सत्वर आलोकित हो,किसलय सा हो  मन में  भाव !!३!!
स्फटिक मनका माला सा,एक हो माली हो मलय सुवास !
नवकंज लोचनी पाद्पद्मिनी,मन हो नव राग का आवास !!४!
वागेश्वरी परमेश्वरी ,परम सुर करे वाग में नित निवास !
जन मन विमल हो विमला ,भक्तो में हो नित नव प्रकाश !!५!!

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

एक रूपता हो जब

दूर दुर्विचार हो सदाचार प्रछन्न हो !नजर नरक नाक नव निर्माण में रत हो !!
कुत्सित मन मालिन्य मुक्त हो ! परस्पर प्रीति प्रेम पावन पवन प्रतिपल हो !!
पवन पाप ताप से तन रहित हो !मलयानिल सा सदा सत्कर्म रत तन हो !!
परहित दूषित भावना दूषण मुक्त हो !परकाज बाधा जन बधिक सा बध्य हो !!
पथिक को मंजिल कर्म धर्म सुलभ हो !निष्कर्म की कुकामाना कष्ट कंटक हो !!
पर दुःख सुखी का सुख दुःख रूप हो !पर सुख सुखी दुःख दुखी जग वन्दनीय हो !!
सोच सर्व हिताय कर्म का मिलन हो !दम्पत्ती सा कर्म कर्मी एक दूजे में रत हो !!
फल सुलभ श्रमसाध्य मनोनुकूल हो !दृष्टि सोच हाव भाव न पर प्रतिकूल हो !!
सत्कर्म धर्म आचरण न कलंकित हो !मिटे जिसकी भावना पर को मिटाती हो !!
राम राज्य हो अन्धेरपुर नगरी न हो !धर्म न्याय समानता हो विषमता न हो !!
एकरूपता हो जब मन मलिन न हो !धैर्य क्षमा दया करुणा जीवन आधार हो !!
सोच सार्थक निरर्थक बकवास न हो !तब हर थल नाक ,हर जन नाकपति हो !!

रविवार, 22 दिसंबर 2013

आदत

जन जन की लत पाती रहती गत ,
सुघर सुघरी सद्गती दायक मत !
काने खोरे कूबरे है अंगो से बिगरे ,
विरले अयबी भले अनभले  सिगरे !
श्वान पालित अपालित रक्षित अरक्षित ,
पूछ टेड़ी की टेड़ी हो भले यह संरक्षित !
आदत अलग -अलग पहचान बनाती है ,
रवि चन्द्र सा जग,जग जगाती है !
आदत ही है जो इन्सान को इन्सान बनाती है ,
लत डाल लिया जो जैसा उसे वैसा बनाती है !
विविध अभिधान आदत से आदती पाते है ,
ईमानदार बेईमान सहिष्णु असहिष्णु होते है !
आदत स्थायी है अस्थायी है बनती है बिगडती है ,
सुधरती है सुधारती है स्वयं ही स्वभाव बनाती है !
स्वभाव से सुन्दर अभाव दूर करे सबका ,
बिगाड़  दे बना काम जब स्वभाव हो कड़का !
आहार बिहार मानो शक्तिवर्धक है आदत का ,
संगति संगीत गीत झलकाती रंग दंग आदत का !
आदत और वाणी आधार स्तम्भ है ,
पाने गवाने बनाने बिगाड़ने की कसौटी  है !
पाते पान प्रतिपल प्रसाद प्रवीण आदती ,
खाते लात लत से सुधारे नहीं है जो लती !
ताकत प्रमाद प्रभुता का गली का शेर है बनाती ,
इनके मुक्त होते ही इनको रक्त का आँसू रुलाती !
आनन्द नन्द नन्द नन्दन का क्रंदन कारक कंस ,
आदत के वशीभूत गया,दिया जब अगनित दंस !
आज भी विभिन्न आदती झेलते है कष्ट ,
नहीं तैयार करने को अपनी आदत को नष्ट !
समय पर चेत रे जन चेत ,
नहीं तो हो ही जाओगे खेत !
नशा नाश है हर पल आ रहा पास है ,
ताश आश पाश सा जकड सर्वनाश है !
जैसे भी कैसे भी इनसे ले लो निजात ,
होगा भविष्य तुम्हारा नहीं खाओगे मात !
आदत तो अपने आप बनायी- बिनासायी जाती है ,
आदत इन्सान जानवर में तो न्यारी न्यारे होती है !
आदत से सुयोधन बन गया दुर्योधन है ,
करता कराता नाश धन मान मन है !
आदत रवि चन्द्र की कर्म धर्म को जताती है ,
गीता भी तो कर्म धर्म फर्ज पर मरना सिखाती है !
आदत मानव को दानव मानव देव बनाती है ,
बैल को नंदी बना शिव शिवा संग पुजाती है !
मान अपमान की जननी का करे सम्मान ,
साद कर्म रत साद आदत से ही बने महान !

अमिय - गरल सु जग - जीवन


अमिय रूप भव- कूप सदा, बढायें महा मान !
जीवन तो नश्वर यहाँ ,अमर होय यश- गान !!१!!
कथनी- करनी जब एकै ,सुदृढ़ यश- भवन नीव !
अजर-अमर हो कर्म सब ,राम धाम वह जीव !!२!!
जगत- हलाहल में रहत ,करत धरत शुभ काम !
जगत- अमिय उस हित बनत ,नित नव रचना नाम !!३!!
जग- जहर वन्दनीय नित ,रत इस हित सब लोग !
मादकता में बहक चित ,सत सत भोगे भोग !!४!!
श्वेत- श्याम जु अमिय - गरल ,करत विलग ही काम !
सुबह सुखद जीवन करत ,चलत सकल दुःख शाम !!५!!
अमिय- गरल सु जग- जीवन ,कर्म रत है हर पल !
पय व रम सा सुखद- दुखद ,दे रहा सब को फल !!६!!

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

सिय राम मय सब जग जानी !

सिय राम मय सब जग जानी !
सुन्दर तथ्य तुलसी ज़ुबानी !!
राम से राम सिया से सिया !
इस धरा पर इनसा कथ जिया !!
किसको माने राम किसको सिया !
सारे कुए में है जब भांग दे दिया !!
नकारात्मक आकंठ दिखे प्रेम पिया !
सकारात्मक हेतु दिखाना है दिया !!
मर्द को राम नारी को कैसे माने सिया !
पर्दा बेपर्दा आदर्श-मर्यादा को है पिया !!
दीप दिखा दिनकर को खुद बदा लिया !
आस्तिक नास्तिक सा है काम किया !!
आस्था तोड़ सात्विक जीवन है जिया !
कबीर है जहा राम को भरतार किया !!
रैदास मीरा सूर आदि ने है गीत दिया !
शान्ताकार संसार को वाणी दे दिया !!
ईश्वर की अद्भुत रचना मानव रूप लिया !
देव-दनुज इस रूप हेतु तरसाते है जिया !!
देव भूमि तपो भूमि भूसुर जप जाग किया !
ज्ञाताज्ञात मनीषी देशहित लगाए है जिया !!
भारत-भारती सुसंस्कृत संस्कार है सिया !
धर्म पालन हेतु रामने एक पत्नी व्रत लिया !!
मोहन मन मोर, मन्मथ मान मर्दन किया !
संतो ने यहाँ परमहंस बन परम सुख लिया !!
पागल बेवकूफ कहलाने वाले सत्कर्मी है धरा !
पानी बिजली कोयला चीनी खेल चारा नहीं चरा !!
नमन नित नव नव रूप-नाम धारी राम सिया को !
त्यागी योगी यती तपी धारे सदा ही जो धर्म को !!
मानव -धर्म ही धर्म मानवता से प्रेम कर्म जहा !
दूषित मानसिकता निश्चित भस्मीभूत वहा !!
सिय राम मय बन जायेगे सब बाल-बाला !
करे प्रणाम सब सदा त्याग सब जंजाला !!

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

परिदृश्य

आज कल का परिदृश्य दिव्य दृश्य देखे ज़रा !
जिसमे सारे जहां से अच्छा का कृत्य है भरा !
तड़पते एक तरफ रोजी रोटी के लिए है लोग !
दूसरी तरफ मद मस्त भोग रहे है बहुत भोग !!
इस रंग बदलती दुनिया में सब रंग बदलते है !
दंग बदलते है चोला चंग चवर चंद बदलते है !
रंग बदलते इन्सान से गिरगिट मात खाते है !
मूल प्रवृत्ति से हट अब जीव जंतु भी जाते है !!
गुलमोहर-मन पलक झपकते लपकने को आतुर !
हीरा मोती चुगने वाले रहते है हर पल भयातुर !
सुख की चिंता केवल अपनी दूजा भले बदहाल !
नामी गिरामी काम- पिपासु से बदनाम देश काल !!
संत असंत पत्रकार जस्टीक नेता एकाकार !
बृद्ध युवा बालक पालक करे देश को शर्मसार !
कार्य कारण भौतिक विकास अर्थ की सुलभता !
आम को काम नहीं ख़ास काम वश है प्रभुता !!
भौतिकता-मशीन ख़ास के लिए बोरिंग करे !
जिससे फट रहे है नित काम के बड़े फव्वारे !
कामी लोभी लालची चाट रहे चासनी सा माल !
उच्च पदस्त माननीय करे यहाँ दानवी कमाल !!
जू रेगना बंद कर दी कामियो कलुषितो के कान !
शोषित हो आम नित जह तह बचे देश का मान !
बदसलूकी दोहरे रवैया-चरित्र करते है शर्मसार !
मार डाल जमीर को कृतदास बनाया है इन्हे मार !!
तिरंगी पट्टी केशरिया चुनरी धर करे वारे-न्यारे !
पद-मान आक्षेप-विक्षेप जनक जोर रखते सारे !
अमोघ लेगे पर कर्ण सा नहीं देगे कवच -खाल !
दुर्योधन सा सब खो कर चाहते होना माला- माल !!

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

स्वप्न

स्वर्णिम भविष्य के लिए ,मानवता विकास के लिए !
पंक में पंकज के लिए ,स्व व पर के लिए सबके लिए !!
स्वप्न होना स्वप्न आना ,स्वप्न पाना स्वप्न की ओर बदना !
स्वप्न बना कर लीन हो जाना ,स्वप्न बुनस्वप्न साकार करना !!
सकारात्मक प्रवृत्ति विचार विचारात्मक ,
एकात्म भाव से रत हो हो रचनात्मक !
त्यागो सपने जो नकारात्मक ,
सोचो शून्य में शून्य ही होता भाव विनासात्मक !!
सकल शास्त्र पारांगत ,दूषित दुर्निवार दानवता ,
सकल कला धारक ,पोषित प्राणपण कलुषता !
पौलस्त्य ने कलंकित की मानवता ,
राघवेन्द्र ने फिर भी दे दिया शुभता !!
स्वप्न एक दो नहीं सैकड़ो आते और जाते है ,
कितनो की कड़ी को कभी नहीं पकड़ पाते है !
रात के सपनों को तो हम प्रायः भूल जाते है ,
दिन के सपनों पर  तपित हो महल बनाते है !!
सोते सपने स्वर्णिम समय सजोये सवारते सुलाते है !
जगे जागते जग जगाते जोर जोर जेहन जलाते है !!
दो दो हाथ करने पर भी बा मुश्किल यथार्थ हो पाते है !
क्योकि दो-चार सौ में एक दो सपने ही सच हो पाते है !!
सार्थक सकारात्मक सपनों की सीदी विरले चढ़ पाते है !
निरर्थक नकारात्मक के पीछे सुख चैन छोड़ भागते है !!
मृग मरीचिका है नकारात्मक सपने जिसे नहीं पाते है !
प्रतिबिम्ब प्रतिपल सकारात्मक सपने सोच से सुलझ जाते है !!
दुस्वप्न स्वप्न नहीं वैसे ,कुकर्मी मानव नहीं जैसे ,
भाव भवन भाव शून्य हो ताकता निर्निमेष हो कैसे !
विखर जाय मानव का सब स्वर्णिम स्वप्न ही तैसे ,
मिट जाय सारे स्वप्न ,जन भरा हो जब मय से !!
स्वप्न न देखना बुरा या अच्छा ,प्रश्न गंभीर है ,
सुस्वप्न पर बदा कदम पूर्णता की सोच सराहनीय है !
स्वप्न देखना निश्चय ही जन जन के लिए समीचीन है ,
मानवता को लवरेज मानवता से किया जिसने वो माननीय है !!
होगा होगा पूरन काम वही जिसके हौसले बुलन्द है !
स्वप्न करेगे वही इस धरा का पूरा जो नहीं स्वच्छंद है !!

रविवार, 15 दिसंबर 2013

परीक्षा

जीवन एक परीक्षा है ,
हर मोड़ पे सम्हलना ,नहीँ उलझना यह इसकी इक दीक्षा है !
चंदन सा स्वभाव, न दे अभाव ,
घिसे बढ़े ,माथे चढ़े ,रखे समभाव !
जातक जात जतन जननी जनन प्रभु ईच्छा है ,
प्रेमाम्बु पय पान प्रारम्भ मान मानव मानव ईच्छा है !
जनक जननी जन्म भूमि ,कार्य कारण कर्मभूमि !!
मागते हक़ हरदम हमसे ,हमसे हो हमारे हो !
फर्ज हमारा है इनके लिए कि तन-मन हमारा इनमे लगा हो !
भ्रम -जाल में उलझाने को बहुपथगामी यायावर ईच्छा !
कदम कदम पर चौराहों सा ,बाहे फैलाएं खड़ी परीक्षा !
पर ईच्छा से संचालित नियति नटी नित नाच नचाती !
है पल सुलझो नहीं तो उलझो की है यह शोर मचाती !
सिख सिखाती गुरुवर सा ,माता सा यह पालन करती !
तरुवर-सरवर सम्बन्धी दे ,सेवा करती सतत धरती !
धरती की प्रीति परीक्षा पेखो तपती तड़पती तनय ताप से !
इम्तिहान के हर दौर से गुजर करे इन्तहां मोहब्बत आप से !
शिक्षा शिक्षण संस्थान से ,सेवा सर्वदा शबरी अबला से !
मान ,स्वमन मान मर्दन से, सिख नित निज जीवन से !
परीक्षा तो जीवन में देना ही पड़ता है !
कभी-कभी अपने आप से लड़ना भी पड़ता है !
बिन मागें मिल जाता कब !
श्रम साधना कर्म आराधना हो जब !
बिनु श्रम ,कर्म रहित पोषित करे पाप !
बिनसे बिनासाए सब मूल से अपने आप !
परिवार घर समाज गाव ,फैलाए जब अपना पाँव !
चारो चारो ओर से लेते समरथ भर परख ठाव ठाव !
परखते पारखी पर चखते चखना सा चतुर !
शुद्ध सम्पन्न स्वर्ण सा जन होता न आतुर !
कर बुलन्द खुद को तैयार रहो !
भले ही जीवन क्यों न परीक्षा हो !
चरित्र परचम सा फहरे जिस जन का !
कीर्ति पराग सा सुवासित उस सुजन का !
हर परीक्षा उसकी स्व ईच्छा सा देती रहेगी फल !
श्रम साधना चरित्र आराधना जिसका जीवन जल !!