मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव उज्ज्वल जल धार सा सबका हो मन

मंगल जात सन दो हजार तेरह है रहा !
सद मंगल सब तरफ मंगल दे है कहा !!
बुध सद्बुध्दि दे दो हजार चौदह महा !
आवत जात सद्बुध्दि मंगला हो अहा !!१!!
नव वर्ष नित नूतन किसलय झहरे जीवन में !
ज्ञान मान नव तुलसी दल लहरे त्रिभुवन में !!
मंगल मूल फूल फल प्रतिपल विकसे तन में !
सत्य कर्म निष्ठा दधि दुर्बा गुण सिहरे रग में !!२!!
नव उज्ज्वल जल धार सा सबका हो मन !
नव गति नव लय नव नव भाव भरे हो तन !!
काम क्रोध लोभ मोह मद से विरत हो जन !
स्व सा सबका भाव हो भारत के कन -कन !! 

रविवार, 29 दिसंबर 2013

लानत

कबहु कतहु कैसे किससे कर्म धर्म करवावे कौन !
मुखर होगा कि मन मसोज कर रह जाएगा मौन !!
सत असत जानत मानत है नहीं व्यवहार आनत !
झूठ फरेब धोखा धड़ी घात प्रतिघात को है लानत !!  

पावकमय ससि स्रवत न आगी !

जय जय जय हे मम हनुमाना !तारक सीता तू जग जाना !!
आपसु आस विश्वास राम सा !गिरिजा के हैं आपु तात सा !!१!!
करू रक्षा इष्टदेव हनुमाना !जानकी जू भगत परसाना !!
समय प्रहार बज्र सम लागे !सारी ठगी तभी तो भागे !!२!!
लूट झूठ बल करते त्यागी !मानहु मोहि जानि हत भागी !!
गला विश्वास का हैं मरोड़े !भाई बन सुख शान्ति जोड़े !!३!!
है काल वश जगत गोसाई !सहोदर अन्य दूजा भाई !!
रवि किरण कभी आग समाना !पर जाड़े में परम सुहाना !!४!!
अमरित बरसे चन्दर सुख का !मंजर आगामय वह दुःख का !!
पावकमय ससि रमा भासती !हतभागी बन आग मागती !!५!!
कवि कुल कमल तुलसी ज़ुबानी !सदा सत्य सिख देय कहानी !!
समय शत्रु डर है भाग भागी !पावकमय ससि स्रवत न आगी !!६!!
 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जीवन एक सफ़र है

सोच समय ज्ञान देश तय करते कर्म क्षेत्र !
समय ज्ञान भावी वश बदल जाते है क्षेत्र !!
शौक मजबूरी पर लगा राज करे पर पर !
ये कराते है हमें कभी आराम कभी सफ़र !!
जनम करम मरन भूमि एक अनेक होती है !
भाग्य नचाती नाच नहीं कभी यह सोती है !!
चाहे अनचाहे भावी अपना काम कराती है !
जहां जाना जिसे उसे बिन चाहे ले जाती है !!
सफ़र कराती बात बनाती  साथ निभाती है !
सुन्दर सुखद सरस सपन साकार कराती है !!
अनचाहे चाहत बनवा उसे पूरा करवाती है !
होनी होकर रहे अनहोनी न होय सिखाती है !!
घर से दूर दूजो को अपना सगा बनवाती है !
सजोती सवारती तो बना काम बिगड़वाती है !!
बिगड़ा काम बनवाकर अद्भुत नाम कराती है !
हसती हसाती रोती रुलाती हर खेल खिलाती है !!
जीवन एक सफ़र है जो हर हेतु हर तरह का है !
सुखद है दुखद है मिश्रित है मनोहर भी तो है !!
आये जीवन में कैसा भी विकट समय !
धैर्य धरो होगा अनुकूल नहीं विस्मय !!
सफ़र जिन्दगी का अद्भुत वर्णनीय है !
पग पग पर पतित पावनी कथा जू है !!
गीत है संगीत है जीवन का आधार है !
विकास है परिष्कार है सबका सार है !!
आवश्यकता है मजबूरी है मिलन डोरी है !
इसके बगैर जीवन की कल्पना कोरी है !!
राजा सा जीवन जिनका प्रजातंत्र में है !
भावी सफ़र हेतु ये भी तो परतंत्र ही है !!
राजा हो या रंक सबको मारे भावी डंक !
अछूता नहीं कोइ जीओ जीवन हो असंक !!
सफ़र का क्या कहना सच यह जीवन सा !
प्रारम्भांत जीवन सफ़र है प्रकृति अंग सा !!
उत्थान पतन नव निर्माण का सफ़र अनवरत !
स्वीकार कर सच भावी डर न हो कर्म विरत !! 
 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

प्रभु की ही माया

अब हम ऐसा करे व्यवहार ,जो जन- जन में जगाये उदगार !
धैर्य-सहन करे मजबूत सब ,कुछ भी नहीं होता है तार- तार !!
आ गए जब इस जग में तो,एडजेस्ट करे मत कभी कोसे इसे !
करना ही है तो वो करे जग हित,याद रखे हर पल जग जिसे !!
इस धरा पर अपना अपना तो, करने भरने में लगे रहते सब !
छोड़ दे ये विवेक से आनंद पाए,पराये हित स्व कार्य करे जब !!
ईमान से इन्सान इन्सान हित ,जब रखता है दिल हरदम रत !
कीचड में कमल बन जग सरोवर,मनोहर पराग भरे  शत-शत !!
उसकी -इसकी किसकी सबकी ,नहीं करे स्तुति -निंदा सर्वत्र !
थक जायेगे हार जायेगे मरेगे ,हम सब करते कराते ये विचित्र !!
एकतारा से स्वर निकालना ,गुर ज्ञान बिन दुष्कर संगीत संसार !
वैसे ही शिक्षा सिख श्रम बिन ,दुनिया का हर कार हर को  है भार !!
ऐतिहासिक तथ्यों स्व इतिहास से, रखना है हरदम तारतम्य !
बिन इनके वजूद स्व ज्ञान मान ,स्व सही हो जाय अगम्य !!
 

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

शिक्षा

रोजगार नाग दंस से है अर्धविछिप्त समाज !
गिर रहा प्रतिभा का सम्मान हर जगह आज !!
आरक्षण कूटनीति से ये लेते निज रोटी सेक !
नित नवीन विकल्पों को देते बार-बार फेक !!
ये मद मस्त आतुर है करने को समाज पस्त !
जाति धर्म भाषा क्षेत्र में उलझा करे हमें त्रस्त !!
बेरोजगारी सुरसा बदाये नित निज भय आनन!
कोर्ट कचहरी क़ानून प्रहरी रोके भरती विधानन !!
कारण हो गया है सोचनीय दर्शनीय मंथनीय !
बद नीतियों से ही है बन रही दशा अकथनीय !!
शिक्षा की परीक्षा है या है यह परीक्षा की शिक्षा !
बिगाड़ दिए है खेल दे कर नाम इसे सर्व शिक्षा !!
अंगूठा टेक रहेना एक के नाम कर रहे साक्षर !
शिक्षित साक्षर बनो रहो भले शिक्षित निरक्षर !!
कूडा ढेर डिग्री बन रही है फाईलो में सज रही !
यूथो को कचरा मास्टर बनाने में लगी है सही !!
जो है शिक्षा सम्पन्न और सर्व ज्ञान के धारक !
वे ही हो सकते है हर समय यहाँ विद्या तारक !!
पर वाह कुसंग तू नसावे स्व साथ मिलावे कैसे !
नक कटी समाज नाक वाले की नाक कटावे जैसे !!
चले सत्रांक प्राप्तांक संयुक्तांक की भारी खेल !
पास होना तय हुआ मिटा अध्ययन का झमेल !!
आठवी तक तो किसी को नहीं करना है फेल !
शिक्षा स्तर सुधारने वाह रे सुन्दरतम खेल !!
शत प्रतिशत हो जायेगी भविष्य में साक्षरता !
भारत की गरिमा महिमा मंडित करे अक्षरता !!
साक्षर शिक्षित विलग विलग हैन्यारे इनके भाव !
असंख्य शिक्षितों का साक्षर सा बना देगे स्वभाव !!
शिक्षित सह शिक्षित साक्षर पा रहे है राज काज !
निश्चित ही समाज पर गिर रहा है यह गाज !!
मन मार कर रहा है आम आदमी जहर पान !
ऐसी क़ानून डालेगी कैसे देश हित  नव जान !!
शिक्षा स्तरीय या स्तरहीन विषय वस्तु युक्त !
स्तरीय बनाने को होते है नित नवाचार प्रयुक्त !!
शिक्षा प्रारम्भांत सबको मिल सुधारनी ही होगी !
नित नव ज्ञान विज्ञान से संचालित करानी होगी !!
तब जाकर गली गली अलख जगाएगी सद शिक्षा !
फहरे परचम भारत का सर्व सुलभ हो सद शिक्षा !!

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

भक्तो में भरो नित न प्रकाश

जग मातु भारत भारती ,चराचरो की भाग्य है सवारती !
अमल-धवल निज सा, दे दो दान में हमें हे माँ सरस्वती !!१!!
जुग कर जोर नमन बन्दन,स्वर वीणा सा दो वीणावादिनी !
नव गति लय ताल छंद नव,जुग का दो ज्ञान ज्ञानदायिनी !!२!!
वेदधारिनी कमालासिनी ,हर चर-अचर में भर भुवन भाव !
सचर सत्वर आलोकित हो,किसलय सा हो  मन में  भाव !!३!!
स्फटिक मनका माला सा,एक हो माली हो मलय सुवास !
नवकंज लोचनी पाद्पद्मिनी,मन हो नव राग का आवास !!४!
वागेश्वरी परमेश्वरी ,परम सुर करे वाग में नित निवास !
जन मन विमल हो विमला ,भक्तो में हो नित नव प्रकाश !!५!!

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

एक रूपता हो जब

दूर दुर्विचार हो सदाचार प्रछन्न हो !नजर नरक नाक नव निर्माण में रत हो !!
कुत्सित मन मालिन्य मुक्त हो ! परस्पर प्रीति प्रेम पावन पवन प्रतिपल हो !!
पवन पाप ताप से तन रहित हो !मलयानिल सा सदा सत्कर्म रत तन हो !!
परहित दूषित भावना दूषण मुक्त हो !परकाज बाधा जन बधिक सा बध्य हो !!
पथिक को मंजिल कर्म धर्म सुलभ हो !निष्कर्म की कुकामाना कष्ट कंटक हो !!
पर दुःख सुखी का सुख दुःख रूप हो !पर सुख सुखी दुःख दुखी जग वन्दनीय हो !!
सोच सर्व हिताय कर्म का मिलन हो !दम्पत्ती सा कर्म कर्मी एक दूजे में रत हो !!
फल सुलभ श्रमसाध्य मनोनुकूल हो !दृष्टि सोच हाव भाव न पर प्रतिकूल हो !!
सत्कर्म धर्म आचरण न कलंकित हो !मिटे जिसकी भावना पर को मिटाती हो !!
राम राज्य हो अन्धेरपुर नगरी न हो !धर्म न्याय समानता हो विषमता न हो !!
एकरूपता हो जब मन मलिन न हो !धैर्य क्षमा दया करुणा जीवन आधार हो !!
सोच सार्थक निरर्थक बकवास न हो !तब हर थल नाक ,हर जन नाकपति हो !!

रविवार, 22 दिसंबर 2013

आदत

जन जन की लत पाती रहती गत ,
सुघर सुघरी सद्गती दायक मत !
काने खोरे कूबरे है अंगो से बिगरे ,
विरले अयबी भले अनभले  सिगरे !
श्वान पालित अपालित रक्षित अरक्षित ,
पूछ टेड़ी की टेड़ी हो भले यह संरक्षित !
आदत अलग -अलग पहचान बनाती है ,
रवि चन्द्र सा जग,जग जगाती है !
आदत ही है जो इन्सान को इन्सान बनाती है ,
लत डाल लिया जो जैसा उसे वैसा बनाती है !
विविध अभिधान आदत से आदती पाते है ,
ईमानदार बेईमान सहिष्णु असहिष्णु होते है !
आदत स्थायी है अस्थायी है बनती है बिगडती है ,
सुधरती है सुधारती है स्वयं ही स्वभाव बनाती है !
स्वभाव से सुन्दर अभाव दूर करे सबका ,
बिगाड़  दे बना काम जब स्वभाव हो कड़का !
आहार बिहार मानो शक्तिवर्धक है आदत का ,
संगति संगीत गीत झलकाती रंग दंग आदत का !
आदत और वाणी आधार स्तम्भ है ,
पाने गवाने बनाने बिगाड़ने की कसौटी  है !
पाते पान प्रतिपल प्रसाद प्रवीण आदती ,
खाते लात लत से सुधारे नहीं है जो लती !
ताकत प्रमाद प्रभुता का गली का शेर है बनाती ,
इनके मुक्त होते ही इनको रक्त का आँसू रुलाती !
आनन्द नन्द नन्द नन्दन का क्रंदन कारक कंस ,
आदत के वशीभूत गया,दिया जब अगनित दंस !
आज भी विभिन्न आदती झेलते है कष्ट ,
नहीं तैयार करने को अपनी आदत को नष्ट !
समय पर चेत रे जन चेत ,
नहीं तो हो ही जाओगे खेत !
नशा नाश है हर पल आ रहा पास है ,
ताश आश पाश सा जकड सर्वनाश है !
जैसे भी कैसे भी इनसे ले लो निजात ,
होगा भविष्य तुम्हारा नहीं खाओगे मात !
आदत तो अपने आप बनायी- बिनासायी जाती है ,
आदत इन्सान जानवर में तो न्यारी न्यारे होती है !
आदत से सुयोधन बन गया दुर्योधन है ,
करता कराता नाश धन मान मन है !
आदत रवि चन्द्र की कर्म धर्म को जताती है ,
गीता भी तो कर्म धर्म फर्ज पर मरना सिखाती है !
आदत मानव को दानव मानव देव बनाती है ,
बैल को नंदी बना शिव शिवा संग पुजाती है !
मान अपमान की जननी का करे सम्मान ,
साद कर्म रत साद आदत से ही बने महान !

अमिय - गरल सु जग - जीवन


अमिय रूप भव- कूप सदा, बढायें महा मान !
जीवन तो नश्वर यहाँ ,अमर होय यश- गान !!१!!
कथनी- करनी जब एकै ,सुदृढ़ यश- भवन नीव !
अजर-अमर हो कर्म सब ,राम धाम वह जीव !!२!!
जगत- हलाहल में रहत ,करत धरत शुभ काम !
जगत- अमिय उस हित बनत ,नित नव रचना नाम !!३!!
जग- जहर वन्दनीय नित ,रत इस हित सब लोग !
मादकता में बहक चित ,सत सत भोगे भोग !!४!!
श्वेत- श्याम जु अमिय - गरल ,करत विलग ही काम !
सुबह सुखद जीवन करत ,चलत सकल दुःख शाम !!५!!
अमिय- गरल सु जग- जीवन ,कर्म रत है हर पल !
पय व रम सा सुखद- दुखद ,दे रहा सब को फल !!६!!

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

सिय राम मय सब जग जानी !

सिय राम मय सब जग जानी !
सुन्दर तथ्य तुलसी ज़ुबानी !!
राम से राम सिया से सिया !
इस धरा पर इनसा कथ जिया !!
किसको माने राम किसको सिया !
सारे कुए में है जब भांग दे दिया !!
नकारात्मक आकंठ दिखे प्रेम पिया !
सकारात्मक हेतु दिखाना है दिया !!
मर्द को राम नारी को कैसे माने सिया !
पर्दा बेपर्दा आदर्श-मर्यादा को है पिया !!
दीप दिखा दिनकर को खुद बदा लिया !
आस्तिक नास्तिक सा है काम किया !!
आस्था तोड़ सात्विक जीवन है जिया !
कबीर है जहा राम को भरतार किया !!
रैदास मीरा सूर आदि ने है गीत दिया !
शान्ताकार संसार को वाणी दे दिया !!
ईश्वर की अद्भुत रचना मानव रूप लिया !
देव-दनुज इस रूप हेतु तरसाते है जिया !!
देव भूमि तपो भूमि भूसुर जप जाग किया !
ज्ञाताज्ञात मनीषी देशहित लगाए है जिया !!
भारत-भारती सुसंस्कृत संस्कार है सिया !
धर्म पालन हेतु रामने एक पत्नी व्रत लिया !!
मोहन मन मोर, मन्मथ मान मर्दन किया !
संतो ने यहाँ परमहंस बन परम सुख लिया !!
पागल बेवकूफ कहलाने वाले सत्कर्मी है धरा !
पानी बिजली कोयला चीनी खेल चारा नहीं चरा !!
नमन नित नव नव रूप-नाम धारी राम सिया को !
त्यागी योगी यती तपी धारे सदा ही जो धर्म को !!
मानव -धर्म ही धर्म मानवता से प्रेम कर्म जहा !
दूषित मानसिकता निश्चित भस्मीभूत वहा !!
सिय राम मय बन जायेगे सब बाल-बाला !
करे प्रणाम सब सदा त्याग सब जंजाला !!

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

परिदृश्य

आज कल का परिदृश्य दिव्य दृश्य देखे ज़रा !
जिसमे सारे जहां से अच्छा का कृत्य है भरा !
तड़पते एक तरफ रोजी रोटी के लिए है लोग !
दूसरी तरफ मद मस्त भोग रहे है बहुत भोग !!
इस रंग बदलती दुनिया में सब रंग बदलते है !
दंग बदलते है चोला चंग चवर चंद बदलते है !
रंग बदलते इन्सान से गिरगिट मात खाते है !
मूल प्रवृत्ति से हट अब जीव जंतु भी जाते है !!
गुलमोहर-मन पलक झपकते लपकने को आतुर !
हीरा मोती चुगने वाले रहते है हर पल भयातुर !
सुख की चिंता केवल अपनी दूजा भले बदहाल !
नामी गिरामी काम- पिपासु से बदनाम देश काल !!
संत असंत पत्रकार जस्टीक नेता एकाकार !
बृद्ध युवा बालक पालक करे देश को शर्मसार !
कार्य कारण भौतिक विकास अर्थ की सुलभता !
आम को काम नहीं ख़ास काम वश है प्रभुता !!
भौतिकता-मशीन ख़ास के लिए बोरिंग करे !
जिससे फट रहे है नित काम के बड़े फव्वारे !
कामी लोभी लालची चाट रहे चासनी सा माल !
उच्च पदस्त माननीय करे यहाँ दानवी कमाल !!
जू रेगना बंद कर दी कामियो कलुषितो के कान !
शोषित हो आम नित जह तह बचे देश का मान !
बदसलूकी दोहरे रवैया-चरित्र करते है शर्मसार !
मार डाल जमीर को कृतदास बनाया है इन्हे मार !!
तिरंगी पट्टी केशरिया चुनरी धर करे वारे-न्यारे !
पद-मान आक्षेप-विक्षेप जनक जोर रखते सारे !
अमोघ लेगे पर कर्ण सा नहीं देगे कवच -खाल !
दुर्योधन सा सब खो कर चाहते होना माला- माल !!

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

स्वप्न

स्वर्णिम भविष्य के लिए ,मानवता विकास के लिए !
पंक में पंकज के लिए ,स्व व पर के लिए सबके लिए !!
स्वप्न होना स्वप्न आना ,स्वप्न पाना स्वप्न की ओर बदना !
स्वप्न बना कर लीन हो जाना ,स्वप्न बुनस्वप्न साकार करना !!
सकारात्मक प्रवृत्ति विचार विचारात्मक ,
एकात्म भाव से रत हो हो रचनात्मक !
त्यागो सपने जो नकारात्मक ,
सोचो शून्य में शून्य ही होता भाव विनासात्मक !!
सकल शास्त्र पारांगत ,दूषित दुर्निवार दानवता ,
सकल कला धारक ,पोषित प्राणपण कलुषता !
पौलस्त्य ने कलंकित की मानवता ,
राघवेन्द्र ने फिर भी दे दिया शुभता !!
स्वप्न एक दो नहीं सैकड़ो आते और जाते है ,
कितनो की कड़ी को कभी नहीं पकड़ पाते है !
रात के सपनों को तो हम प्रायः भूल जाते है ,
दिन के सपनों पर  तपित हो महल बनाते है !!
सोते सपने स्वर्णिम समय सजोये सवारते सुलाते है !
जगे जागते जग जगाते जोर जोर जेहन जलाते है !!
दो दो हाथ करने पर भी बा मुश्किल यथार्थ हो पाते है !
क्योकि दो-चार सौ में एक दो सपने ही सच हो पाते है !!
सार्थक सकारात्मक सपनों की सीदी विरले चढ़ पाते है !
निरर्थक नकारात्मक के पीछे सुख चैन छोड़ भागते है !!
मृग मरीचिका है नकारात्मक सपने जिसे नहीं पाते है !
प्रतिबिम्ब प्रतिपल सकारात्मक सपने सोच से सुलझ जाते है !!
दुस्वप्न स्वप्न नहीं वैसे ,कुकर्मी मानव नहीं जैसे ,
भाव भवन भाव शून्य हो ताकता निर्निमेष हो कैसे !
विखर जाय मानव का सब स्वर्णिम स्वप्न ही तैसे ,
मिट जाय सारे स्वप्न ,जन भरा हो जब मय से !!
स्वप्न न देखना बुरा या अच्छा ,प्रश्न गंभीर है ,
सुस्वप्न पर बदा कदम पूर्णता की सोच सराहनीय है !
स्वप्न देखना निश्चय ही जन जन के लिए समीचीन है ,
मानवता को लवरेज मानवता से किया जिसने वो माननीय है !!
होगा होगा पूरन काम वही जिसके हौसले बुलन्द है !
स्वप्न करेगे वही इस धरा का पूरा जो नहीं स्वच्छंद है !!

रविवार, 15 दिसंबर 2013

परीक्षा

जीवन एक परीक्षा है ,
हर मोड़ पे सम्हलना ,नहीँ उलझना यह इसकी इक दीक्षा है !
चंदन सा स्वभाव, न दे अभाव ,
घिसे बढ़े ,माथे चढ़े ,रखे समभाव !
जातक जात जतन जननी जनन प्रभु ईच्छा है ,
प्रेमाम्बु पय पान प्रारम्भ मान मानव मानव ईच्छा है !
जनक जननी जन्म भूमि ,कार्य कारण कर्मभूमि !!
मागते हक़ हरदम हमसे ,हमसे हो हमारे हो !
फर्ज हमारा है इनके लिए कि तन-मन हमारा इनमे लगा हो !
भ्रम -जाल में उलझाने को बहुपथगामी यायावर ईच्छा !
कदम कदम पर चौराहों सा ,बाहे फैलाएं खड़ी परीक्षा !
पर ईच्छा से संचालित नियति नटी नित नाच नचाती !
है पल सुलझो नहीं तो उलझो की है यह शोर मचाती !
सिख सिखाती गुरुवर सा ,माता सा यह पालन करती !
तरुवर-सरवर सम्बन्धी दे ,सेवा करती सतत धरती !
धरती की प्रीति परीक्षा पेखो तपती तड़पती तनय ताप से !
इम्तिहान के हर दौर से गुजर करे इन्तहां मोहब्बत आप से !
शिक्षा शिक्षण संस्थान से ,सेवा सर्वदा शबरी अबला से !
मान ,स्वमन मान मर्दन से, सिख नित निज जीवन से !
परीक्षा तो जीवन में देना ही पड़ता है !
कभी-कभी अपने आप से लड़ना भी पड़ता है !
बिन मागें मिल जाता कब !
श्रम साधना कर्म आराधना हो जब !
बिनु श्रम ,कर्म रहित पोषित करे पाप !
बिनसे बिनासाए सब मूल से अपने आप !
परिवार घर समाज गाव ,फैलाए जब अपना पाँव !
चारो चारो ओर से लेते समरथ भर परख ठाव ठाव !
परखते पारखी पर चखते चखना सा चतुर !
शुद्ध सम्पन्न स्वर्ण सा जन होता न आतुर !
कर बुलन्द खुद को तैयार रहो !
भले ही जीवन क्यों न परीक्षा हो !
चरित्र परचम सा फहरे जिस जन का !
कीर्ति पराग सा सुवासित उस सुजन का !
हर परीक्षा उसकी स्व ईच्छा सा देती रहेगी फल !
श्रम साधना चरित्र आराधना जिसका जीवन जल !! 

बुधवार, 20 नवंबर 2013

साथ

कौन करता सहायता ,अप्रत्याशित हर समय !
अपने पराये से दुर ,इंसानियत का विस्मय !!१!!
सु कर्म रत सु सोच पाता ,क्रिटिकल सचुएशन जब !
आता मानव मसीहा ,अपना बनाकर तब !!२!!
कहा कौन किसका नहीं ,पा पाता  है साथ !
कु करम करमी से भाग ,खिच ले नित निज हाथ !!३!!
समय समरथ दे पर हित ,स्वहित रत जन तल्लीन !
करवट ले जब तब यही ,करे सब कुछ मलीन !!४!!
अपना जब अपना होय, पर जन का का काम !
पराया ही अपना हो , तब अपना क्या नाम !!५!!
जब आपण आपण न हो ,आन आपण का होइ !
जब आन आपण हो जाय ,आपण आन का होइ !!६ !!
जहा सगो से मिले नित ,गम की नव सौगात !
आज कल कौन तैयार ,देने के लिए साथ !!७!!

शनिवार, 16 नवंबर 2013

बराबरी

अकल्पनीय अकथनीय कह सकते अकरणीय अशोभनीय है !
कथा सब जाति धर्म सम्प्रदाय पंथ वर्ण भेद की विचारणीय है !!
नेता अभिनेता नेत्री अभिनेत्री की विविध विपदा अवर्णनीय है !
सार भस्म सा समाज में किसी भी प्रकार बराबरी अभस्मीय है !!१!!
ताप त्रय विमोचन त्रिलोकी त्रास तारन तप्त आभा से विलग है !
क्षेत्र जाति भाषा धर्म रूप रंग वेश भूषा भजन भाजन से भुवन है !!
भारत भूमि भूषित भुवन भर भायप भगति भावना से भरत है !
राम रावण पांडव कौरव कृष्ण कंस- कथा जन जन से कहत है !!२!!
भीष्म भीम बली शकुनी सुदोदन छली कृप कर्ण महारथी है !
महाभारत पुराण गीता ज्ञान में संसार सार तारक सारथी है !!
जूथपति जाम्बवान बज्रांग पादशक्ति की किससे बराबरी है !
राम भ्राता भरत से कुरुवीरो कुरुवंशियो से कसमकस परी है !!३!!
बराबरी नित की नव नव कर ही ब्रह्मर्षि से राजर्षि ने करी है !
फिर भी करम धरम काम धाम हरदम हरी नाम से ही हरी है !!
प्राचीन नवीन मोटा महीन महिमा माया मद मोह कोह भरी है !
राग रोग भाग भोग भुवन भर भर रही नित नव नव बराबरी है !!४!!
काल कलि कल का का केहु करत करामती कु को कामी करी है !
कुकरी सुकरी भाग भोग जाग जोग जग जगाये जतन  जरी  है !!
राकपा माकपा सपा बसपा अपा भाजपा कांग्रेस से क्षत्रप परी है !
लोक तंत्र को लूट तंत्र बनाने में लगी लगन सबमे अब बराबरी है !!५!!

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

हिरनी

मन मचले तन डोले कथा हिरनी का अद्भुत तथ्य खोले !
सब सो गए शाम वनवासी कुंजो से आती ध्वनि बोले !!
बिपदा पुकारे काल हाथ पसारे सहारे को सहारा डाले !
जाग उठा वीर भुज भुजदण्ड ले झपटा काल पर काले !!१!!
काले को देख हतप्रद शिकार सुखप्रद काले आखे फारे !
तन मन चाहत बाल बाल  खाने की हिरन  पकड़ डारे !!
हिरनी छाया सी पुत्र की निकुंज से सब  देखे आखे फारे !
देखती दुखित दुखप्रद दृश्य दिल दुलारे दुलारे दर दुखारे !!२!!
हिम्मत न हार माँ आयी तो काले के हो रहे थे वारे न्यारे !
एक के साथ एक फ्री है  मन मयूर नाच नाच लड्डू फोरे !!
हिरनी लाल को देख धीरज खो रही हिम्मत कर कर जोरे !
धारा प्रवाह हिरनी आँसू से काले  मन अतीत में जा डोरे !!३!!
माता पिता हीन टूअर को याद आये स्वयं के काले दिन !
मान शावक स्वयं सोच डूबा हो गया उसका मन मलिन !!
माता पिता की साया को किसी पापी ने ले लिया था छिन !
रोया गिरा सरसा तरसा अपने पुराने दिनों को गिन गिन !! ४!!
पल पल पलटे परिदृश्य प्रकृति पकाती पूरी पकी पीर !
पल में मासा पल में तोला कभी खुशी कभी गम चीर !!
का करू का कहू कहते कंठ हिरनी आँसू से हो अधीर !
माता लालसा हिरनी पूरी दे सिघ आखों से हो गंभीर !!५!!
पर दुःख कातर संवेदनाहीन बन गया अब संवेदनशील !
 लिया प्रण जीवन का बह उठी नयन गंगा भर उठे झील !!
माँ बेटे सह हरषित देती आशीर्वाद मत करो मन मलीन !
झूम उठा सारा परिदृश्य संगम सा जहा गम हो जाते दीन !!६!!

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

हम कदम

एक कथा जय पराजय की सुख शान्ति तृप्ति तलाश की !
देवी दासी दायित्वों दुर्निवार दुस्वारियो दुखद दुर्विकल्पो की !!
 पति पत्नि सखा सखी स्वामी स्वामिनी सेवक सेविका की !
सोच विचार संतुष्टि त्याग तपस्या प्रेम घृणा लगाव इश्क की !!१!!
बिना विचारे पथ त्यागे नासमझदारी को समझदारी समझ की !
पर विकार विकार स्व विकार स्वीकार से स्वयं श्रेष्ट मानने की !!
हम कदम राही को हम सफ़र बना लेने की लगन पर ललकने की !
अपना सब स्वेच्छया समर्पण कर पर पर प्रत्यारोप लगाने की !!२!!
स्वयं ही विवेक खो सत असत से दूर हो गलत को सही मानने की !
स्व अनुकूल जब तक सब रहे तब तक अपने आप पर इटलाने की !!
धोखा को विश्वास स्नेह ईमान समझ उस पर इतराते रहने की !
सब कुछ दिन सा साफ़ होने पर स्वं की करतूती पर पछताने की !!३!!
हो रहा ऐसा ही है आज कल हर शहर हर गली गली हर स्थली !
इश्क मुश्क में नहीं समझते फेयर अनफेयर नव भौरे नव कली !!
ये तो एवरीथिंग फेयर एवरीवेयर मान बैठे माने बुजर्गो को ठली !
पर आदतन भौरे बदलेगे ही कली की बात जब इन पर आ चली !!४!!
तब कथा प्रेम का रूप छोड़ बलात्कार व्यविचार देह शोषण है बनी !
ऐसी हमने ही नहीं सबने ही है भाति भाति से अनेक कथा है सुनी !!
जज जनता शासन सरकार सब सोचे ऐसो की जड़ कैसे है काटनी !
लालच लोभ मोह में गिर गिर गिरना है तो कैसे कोई इनका धनी !!५!!
कहते हम हम कदम को रहने दो, हम कदम नहीं चाहते देवी दासी !
देवी नैसर्गिक अधिकारों से परे इन्हें दिखती मुरझाये पुष्प सा बासी !!
दासी का अधिकार छीन जाए अधिकारहीन जीवन को कैसे सह जासी  !
पति पत्नि सेवक स्वामी सखा एक दूसरे के यह इन्हें है कभी सुहासी !!६!!

सोमवार, 30 सितंबर 2013

सत्कर्मी ही सफलता को बरे

करम पथ सूल सा पथिक दुकूल सा उलझा !
जो जोड़ तोड़ मोड़ मरोड़ काट छाट में मजा !!
दिखे निश्चित सब तरह से सुलझा  सुलझा !
कलि काल प्रकृति सह रचता मजा की सजा !!१!!
दो बात है स्वकर्म रत विरत कर्म पथिक से !
जब सास तब आस लगाए रहे वे प्रकृति से !!
भ्रमजाल सुलझा मत उलझ स्वयं अमूल से !
 न होता अन्याय कभी इस धरा पर प्रकृति से !!२!!
सास आस आधार जीवन का जगती ताल में !
खुशबू बदबू का संज्ञान सास ले लेती पल में !!
डूबते को तिनका सहारा जब सास जेहन में !
डूब कर डूबो गए डूब गए कितने इस जहा में !!३!!
प्रायोजित आयोजित अप्रत्यासित योजना !
सफल थे कालकेतु तपीस कुत्सित योजना !!
केकी कंठ अहि सा निगले नित नव योजना !
नथने में रत कालीनाग सा है प्रकृति योजना !!४!!
केकी कंठी गुमराह करमी को करम पथ से करे !
आन मान प्रतिमान पर जो पग सदा आगे धरे !!
तपी कालनेमी जती रावन पूरन आस को बिफरे !
पर पर कटे खलो के सत्कर्मी ही सफलता को बरे !!५!!

शनिवार, 28 सितंबर 2013

घोड़ा और घास

सबकी कबकी आस सहज सरल जीवन हो पास !
जटिलता त्यागे करे न हम मानवता का ह्रास !!
अनजाने जाने जीवन  हर थल हो बिना त्रास  !
हम न बने कही घोड़ा कही पर न बने कोई घास !!१!!
जाति-वर्ग धर्म -सम्प्रदाय या जो भी हो बाधा !
दधीचि सा त्यागी बन हम दे दे उसको काधा !!
घोड़े सा चर चर चंचल मन करता नित आधा !
जन घास मन घोड़ा छोडो हो जाय सब साधा !!२!!
घोड़े सा है आतुर चरने को मानव मानव घास !
सत्ता शासन शासक की प्रभुता रखते जब पास !!
हो अभय  ये शनि राहू केतु सा लिए मन आस !
पावस पवन मेघ आप बूद से जरते जू जवास !!३!!
कौन है घोड़ा कौन है घास घोड़े घास का विश्वास !
घोडे घास की यारी हो तब तो फैलेगी घास ही घास !!
घास घोड़ा हो जाय जो और हो जाय जब घोड़ा घास  !
तो छोड़ देगा चरना घास घोड़े को यह कैसे विश्वास !!४!!
युग धर्म यही युग कर्म यही युग युग से हैं सब त्रस्त !
तोड़ना ही हो समाधान तब हमें इसमें होना है व्यस्त !!
सब तरफ सुख शान्ति हो हो सभी इस से विश्वस्त  !
जन जन जब जाग जाय तब घासी घोड़े होगे ही पस्त !!५!!

शनिवार, 21 सितंबर 2013

पञ्च दोहे

देखे दूरंगी रेख ,दुनिया दोहरि दौर !
नित पर सुख दुःख ही पेख ,त्यागे खुद निज ठौर !!१!!
काम दुर काम बस भूत ,लगन लगे व्यविचार !
कामाचारी का कूत ,बचा ले सदाचार !!२!!
कब बचेगा सदाचार ,जब सारे है चोर !
हर मन मिटा कदाचार ,हो स्वकर्म ही ठोर !!३!!
चोर गिने गिनाये सब ,पर गनकू भी चोर !
अंग बेअंग सभी अब ,करे इसी पर जोर !!४!!
समय काम धरम चोरी ,जाने सब अधिकार !
सब कुछ हो सहज मोरी ,याद नहीं निज कार !!५!!
         

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

शिकारी और शिकार

सिकवा सिकता सा सदा सोहे स्व स्वपरिवार !
तना तनी से केतु राहू सा बदता है नित रार !!
जब जाय जती जू जतावे जातरू सू सब सार !
तब होते सब कालनेमी सा शिकारी ही शिकार !!१!!
बंद मुठ्ठी से सरक सिकता सिखावे नित ज्ञान !
सिकवा को बना सिकता करे हम सच का भान !!
सरकता नित सिकता जू सब आन बान शान !
नहीं कर पाया कोई शिकारी- शिकार पहचान !!२!!
शिकारी भी हो जाता शिकार बिखर कर तार तार !
छोटे मोटे शिकार पा जब पर मान धन पर करे प्रहार !!
क्षणिक सुख शान्ति ईमान मान बेच जब करे व्यवहार  !
तब बून रहा नित नाश-जाल होने को निज ही शिकार !!३!!
अनाथन के नाथ बन जो करे छल कपट का व्यवहार !
चंड मुंड रक्तबीज सा हो भले होता उसका भी संहार !!
आख वाले अंधे बन करते हैं जब सब मिथ्याचार !
तब कठिन है समझना कौन शिकारी कौन शिकार !!४!!

हे गन नायक

जय जय हे गनेश तू पूजित मातु- महेश ,
सुचिता शुभता वेश जाने जन जनेश !
थारो न्यारो वेश है ज्ञान बुद्धि ज्ञानेश ,
राज रचो राजेश भलो भलाई के रमेश !!१!!
वासरमणि तम हरन हौ आपु विघ्न हरन ,
सुमुख हे एकदसन रमते बन सिन्दूर बदन !
प्यारो रूप गजकरन भाते शुभ सब सदन ,
जगे जागरन जतन जात जरे जोत जरन !!२!!
लम्बोदर विघ्नेश बिनायक हर हर दर्द हे गननायक
 नाश विनाश के नायक सुख शान्ति के तुम दायक !
सुरप्रिय सुन्दर सु लायक सुवासित तेरा है सायक ,
परे पद पद्म पापी पूरन पावे पल पल पायक !!३!!
अब तो आ जा गनराज मेवाती लाल बुलाता है ,
सुन जा हर एक राज जगतसुत राज बताता है !!
करिवर बदन भरो सदन भगत स्वगीत सुनाता है ,
दिखा जा वो अब मार्ग जो जग जमात जगाता है !!४!!

रविवार, 8 सितंबर 2013

हारे का हरि नाम

व्यथा कथा बन जाती सबकी,
जोर जवानी जब माने मन की!
ताने बाने जब बने हो तन की ,
तब क्या कहना उस जन की !!१!!
नहीं नीति नहीं सदाचरन ,
फलते फूलते हैं  कदाचरन !
सुरुचि का करता ध्यान धरन ,
देखता सुनीति का पल पल मरन !!२!!
माया बस जब शिव चतुरानन ,
कहा ठहरता तब तुच्छ मानव मन !
जोगि जती मुनि मन मनभावन ,
करते हैं अपावन को पावन !!३!!
उनकी याद न आती बली को ,
अहंकार स्वबल का छली को !
कुकर्म मद मस्त करे मली को ,
च्युत कदाचरन करे काली कली को !!४!!
हार हर हाल हरदम हमसफ़र हो,
हरि-हर हरावे तरसावे तार तार तरी हो !
मन-मानस मलिनता ही जब मूर्ति हो ,
सूख जाय काटा सा काटों की गति हो !!५!!
तब आयेगी आयेगी याद हरि नाम की ,
रुलायेगी याद उसको स्वयं काले काम की !
हो धाराशाही कहेगा कथा विधि वाम की ,
जब नहीं चलेगा कर्म पथ पर राम की !!६!!
जाये चाहें जहां आये न कोई काम ,
मुक्ति मिले न उसे जाये जिस धाम !
सच सुख शान्ति स्वनीड ही हो हर शाम,
जप रे मना हरि हरि है हारे का हरि नाम !!७!! 

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

आशा राम

राम श्याम सब दायक नाम ,सनातन धर्म के हैं ये शान !
सीता राधा मिटाये बाधा , हैं आदर्श सीताराम राधेश्याम !!
आशा पिपाशा विपाशा ताशा,खेले खेल खल फिर भी नाम !
चार नाम रस चारो धाम ,जपते ही मिलता है मुक्ति धाम !!१!!
सीताराम राधेश्याम वर्नाभिधान ,हैं जग पूजनीय नाम !
सत सत प्राभिधान जग के ,इनके वर्णों में आते काम !!
छोटा बड़ा नहीं हम कहते ,ये आशा आते आशा काम !
निराशा दुराशा गम भाग भगे,जो शरण इन दो के नाम!!२!!
प्रकृति नटी नित नाच नाचती,नचाती पल पल जन जन को !
वेश बदल छिन छिन छलती,छली छलाती चलाती जग को !!
प्रकृति अनंत में जो रमें,  वह आशा तुच्छ समझे रमणी को  !
जगह कहा द्रुम बाल जाल सा, जहा उलझाए निज लोचन को !!३!!
किमि कुवेश करि सके, जो रहते रत सत सदा जपते हरि नाम!
कालनेमि सा सुवेश,  कवनो युग मा आवे कदो न काम !!
रावन राहू संत देव बन, न लावो कदों हरि को अपने बाम !
पियो कालकूट कैलासपति, कमलाकर आशा आशा राम !!४!!

सोमवार, 2 सितंबर 2013

श्वास

कर देख लिया सारा जतन ,होना निश्चित है जग पतन !
ऐसा नहीं पतन नहीं मरन ,मरन है श्रेष्ट नहीं है पतन !!१!!
जब तक श्वास तब तक आस,शरीर शरीरी में श्वास वास !
अंतिम श्वास प्राण निकास ,प्राण पखेरू उड़ते शरीर विनास !!२!!
ध्रुव सत्य गिनती श्वासों की ,शोषक शोषण करे विश्वासों की !
समय कथा कहता कालो की ,कंचन कीर्ति कामिनी वालो की !!३!!
राजा रंक फ़कीर योगी संत, सत्य श्वास ही है सबका कंत !
कर्त्तव्यबोध बनाता महंत,शरीर शांत पर नहीं इसका अंत !!४!!
सुविचार कुविचार फलते हैं,इनको ही राम रावन कहते हैं !
कृष्ण कंस बन ये पलते है,शरीरी बाद विचार ही रहते हैं !!५!!
हर शरीर में हैं राम रावन ,कब कृष्ण कब कंस हो मनभावन !
रावन कंस दुःख दवानन ,राम कृष्ण हैं सुख शान्ति सावन !!६!
सबका समय थामे श्वास डोर,माने न माने तुम साहू या चोर !
सदकर्म कुकर्म रह धरा मचाते शोर,मत कुकर्म श्वासों को बोर !!७!!

रविवार, 1 सितंबर 2013

भोर

भोरवा भईल बिहान जागी सभे भईया किसान !
गली गली में हर मोड़ प परल बा बहुत काम !!
चहचहाई चिरई चेतावे हो गइल बा अब बिहान !
ह अराम हराम आलस छोड़ी कइल जा काम !!१!!
देखी रतिया गइल ओही तरे सब दुखवो जाई !
सुखवा बा मेहनत धाम करी काम सुखवो पाई !!
जे टुकुर टुकुर ताके फुदुके ओहु के त बारी आई !
अबहिन त बानी लायक त आपन बना के जाई !!२!!
इ सुन्नर सुघर सुघरी सुदेश दे घूमि घूमि सबके !
चेहरा देखावे रोज भोरवे निज घूघट उठाइके !!
जागी के पाई सुती के गवाई कहे ठुमका लगाइके !
सुख -सुन्दरी बतावे सबके सच झलक दिखाइके !!३!!

शनिवार, 31 अगस्त 2013

जग मातु मंगले सर्व मंगल दायिनी








अनन्त कोटि नमन मातु सर्व अघ निवारिनी !
परम साध्वी सती शिव प्रिया सदा  शिव दायिनी !!
भव भय हारिनी तू  भव भय बन्धन काटिनी !
आद्या आर्या जया भवानी दुर्गा दुर्ग नाशिनी !!१!!
चामुंडा वाराही लक्ष्मी ज्ञाना क्रिया रत्ना रत्न दायिनी !
अपर्णा सर्वविद्या दक्षकन्या कर कमल कमलासिनी !!
देवमातु देवप्रिया देवी दुर्गभा दुर्गमा दुर्ग साधिनी !
दुर्गमगा दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमोहा दुरूह दुःख दामिनी !!२!!
भक्त सुलभा भक्त प्रिये भक्त निभे भक्त भक्ति दायिनी !
कलि कार्य सिद्धि साधन सर्वेश्वरी सर्व कार्य विधायिनी !!
महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती महा मद मर्दिनी !
महामाया महामोहा महोदरी मुक्तकेशी मुक्ति दायिनी !!३!!
सर्वमंगला शंकरप्रिया शिवा शिवांगी शिवशक्ति साधिनी !
शरणार्थरक्षी शरनार्तभक्षी सर्वरूपा सर्वासाध्य साधिनी !!
सर्वमंत्रा सर्वयन्त्रा सर्वतंत्रा सर्वजन्त्रा सर्वयज्ञ यज्ञिनी !
सर्वदेशी सर्वज्ञा सर्वव्यापी सर्वगता सर्वदा सर्व नादिनी !!४!!
कुमारी कैशोरी युवती प्रौढा शस्त्रधरा शास्त्र धारिनी !
जल जाय जम जतन ज्वाला जू जात जग जामिनी !!
जयन्ती जयप्रदे स्वाहा दुःख हरे स्वधा सुख दायिनी !
जग मंगलं मंगला जग मातु मंगले सर्व मंगल दायिनी !!५!!
त्रिनेत्रा मन बोध भरे सर्व आश्रय दायिनी !
महातपी श्रम सत्य सखा सदानन्द रूपिनी !!
भव्या भाव्या अभव्या अनंता सुख साधिनी !
सत स्वरूपा सतहिते शूल पिनाक धारिनी !!६!!
अर्थ मिले सब साथ मिले जप दुर्गमार्थ स्वरुपिनी !
हर हर ताप हरसा हरसा जन चंड मुंड विनाशिनी !!
शत सुमन दुःख अर्पन तव कमल मंजीर रंजिनी !
नित नमन तव पाद पंकज दक्ष यज्ञ मद मर्दिनी !!७!!

रविवार, 18 अगस्त 2013

अन्धो में काना राजा

पाकर सुख क्षण भंगुर रहता है मद मत्त सदा !
कहता कहता करता न कुटिल काग सा  फ़िदा!!
सरदार सदा सबका सरदार सोचे सब युदा युदा !
ले दे कर चलते हैं  साथ है साथी सब मुदा मुदा !!१!!
काना ही सरदार जब साथी सारे सारे अंधे है!
संकीर्ण सोच स्वकेंद्रित सतासत सब धंधे हैं !!
बाजी जीत लक्ष्य शकुनी मामा सा ही कंधे हैं !
चरते भरते हैं बड़े ये तो बड़े काम के बन्दे हैं !!२!!
स्तर बड़ा अंधों का पर इनमें भी तो अन्तर है !
का सुनावे का दिखावे ये बड़े बड़े ही मंतर हैं !!
राजा का  रूप धर  कभी मदारी कभी बन्दर है !
घूट घूट घोट  घोटाला घोटू घोटक सारे अन्दर है !!३!!
प्रताड़ना पल पल पा पूजे पग परहेजी प्रजा !
यति सा समय पथ कंटक की मिले  सजा !!
काट छाट तोड़ फोड़ कर बजाते है ये बाजा !
जहां हैं सारे  अंधे होगा अंधों में काना राजा !!४!! 

रविवार, 11 अगस्त 2013

बेगम

प्रश्न विचार कर देखा है जब ,हमने पाया सवाल तो सवाल है तब !
रचना रचयिता की अद्भुत जब ,उसको भी घेरा है सवालों ने तब !!
देव दानव मानव अमानव सब ,नर मादा रूप धरना  ही होता जब !
नर सुख शांति सम्पन्न होता कब ,मादा हर लेती है  सारे गम जब !!१!!
स्त्री भार्या पत्नी अर्धांगिनी है ,बीबी प्रिया अति प्रिय बेगम भी है !
इनके रूप राशि कोटि काम कला पर ,हर पल न्यौछावर नर सदा है !!
सामने शत रूप धर रूपसी अरूप में,मर्द की मर्दागिनी तब बेदम है !
जो गम सारे दूर कर रूप रस डुबोकर ,वो रूपसी स्व नर की बेगम है !!२!!
पाथर सा पति पथ प्रस्तर पर गमन ,नहीं जो कभी भी होता सरल है !
पिघला पिघला निज प्रेम ताप सब ,करती रहती नित सब सुगम है !!
दर्द सब गर्व से सह सहगामिनी ,साथ साथ करती रहती सब सहन है !
हो योग्य ले लेने को गम शौहर ,तब तो वह नारी हो सकती बे गम है !!३!!
गम आँसू नहीं दिखे पी लेवे चुपचाप ,सिकवा शिकायत नहीं है पास !
जगमगाती ज्योति जू जहा जोहती ,जुमा जुमा जोग जोरू जर जास !!
कर्म पथ पग पड़े तब अड़े न ,चाहें आये कंटक दुःख द्वारे हर बार !
काट कष्ट कंटको को बिछा दे,सुख साधन सारे बेगम है बार बार !!४!!
परम पिता की परम कृति ,करती करम रचती नित नव नव रचना !
बेगम बीबी माता सेवक सखा सा ,हर गम   हरती हरि हर सा संरचना !!
सत सब सरल संसार में है,नहीं है पर है सुघर सरल बेगम बनना !
बेगम के होते न हो कोई गम ,शुरू करता वह मर्द तब बे गम रहना !!५!! 

शनिवार, 10 अगस्त 2013

भवन

भारती भारत भवन भुवन भर भरे भव भव भूषित भावना !
भस्मासुर भस्म भा भारतीय भारहीन भगत भक्ति भावना !!
नापाक पाक पर पड़ता  प्रगट पंच  पापी पाते पराजय प्रताड़ना !
बहु धर्म कर्म मर्म युक्त भारत भवन रहे भुवन भर सुहावना !!१!!
जिसने देखा सदन होकर मगन नित !
भवन घर मकान होम हाउस आवास हित !!
ईट भाटा गारा जहा लगा गजधर का चित !
लकड़ी लोहा काच ही से है मकान निर्मित !!२!!
गम सारा हरे सुख सारा सरे वो होता है घर !
पीड़ा दायक नहीं पीड़ा नाशक जो रखते सर !!
परम प्रेम पावन पूरित प्रीति पड़ती परस्पर !
बैर भाव त्यागी नेह गेह का ही हरदम है दर !!३!!
सुख सदन करे दुःख दमन प्यार पूर्ण परिवार मगन !
त्याग तप  तपस्या हरने  को आतुर  दूसरे का तपन !!
माता पिता भाई बहना करे  कृपा किंकर कर्म कथन !!
दुनिदारी दुःख दारिद दावानल दूर हो सदा शुभ सदन !!४!!
वास करते सुवास पद्म सा  पद्मावती सी घरनी जहां !
न्यौछावर हो सुख सारे दुःख निवरे  निश्चित ही  तहां !!
कोमल कमल कंठ कोकिल का कागा करकस का कहा !
वास पद्माकर का पद्मासिनी सह होता  हरदम वहा वहा !!५!!
शिव शिवा सदन है पुत्र करिवर वदन तात षडानन !
है सारे धूत अवधूत भभूत रमते पर सब है पावन !!
नन्दी सेवक स्वामी पशुपति धावन जहा दसानन !
साँप मूसक सस्नेह बसते बना भवन  मनभावन !!६!!

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

हर पग सफलताओं को चूमते

जिनके  हैं कर्म  -धर्म  साथ-साथ घूमते !
उनके हैं हर पग सफलताओं को चूमते  !!
बात है विचारना ,हर पल सवारना !
सपने अपने- अपने कर्म कथा को कहते !!
कल्पना के गहने ,पहन सदा सब रमते !
ये गहने गहने न हो हैं  सब इससे बचते !!
इन्हें छोड़ केचुली सा जो  निज पथ चलते !
यथार्थ पटरी रेल सा चल मंजिल टेशन उतरते !!
संभावनाये -कल्पनाये हैं अनन्त ,
स्वपनिल लोक सा इनमे भ्रमण करते !
मिलता न जीवन सफ़र का अंत ,
चाहें जहा जहा में हैं यायावर बनते !!
लक्ष्य पथ चुनकर ही हैं जब कदम बड़ते !
आखें न मुदकर सोच सोच हर पग रखते !!
सीता खोज लक्ष्य पा बाधा लंकिनी से न डरते !
विभीषण सहायक मिलें जब सत्कर्म हैं करते !!
निश्चित पथ पर निश्चित ढंग से जब हैं चलते !
तब बहुगामी पर हैं हर पग सफलताओं को चूमते !! 

सोमवार, 5 अगस्त 2013

करोडपति को देखा बनते खाकपति

देखा एक को नहीं अनेक को रोते गाते हँसते खेलते !
दुनिया दीवानी को अपनी अपनी कहानी पर तरसते !!
समय पर नहीं चेत दुःख दर्द पा सब कुछ गवा चेतते !
साम दाम दण्ड भेद से एकल फल अर्थ  फलित करते !!१!!
क करम करना धरम धरना को छोड़ होता करोड़पति !
धर्म त्याग न्यायान्याय से ही शीघ्र हो गया लक्ष्मीपति !!
रजनी का उल्लू दिन में डोल बोले हमी है कमलापति !
करे कुकर्म कुधर्म कदाचार  कामी कुटिल कुटिलपति !!२!!
बनाया सारा जहा अपना  सुख शान्ति रही हरदम सपना !
चार दिन की चादनी पर किया गुमान नहीं कोई कल्पना !!
घर ईट पाथर लौह लक्कड़ से बना कर लिया सुहावना !
पर घर में घरनी नही रही तो भूतो का डेरा ही पावना !!३!!
घरनी मरी पर है घर भरा पडा पूरन  है सब धन धान !
भाति भाति की सुविधा पर आती नही है किसी काम !!
पुत्र पुत्र बहु संग समय बना उनके लिए वृहद् सचान !
संचित सब संतान सम्हाले सुखी नहीं इनका जहान !!४!!  
जीवन ज्योति बूझ गयी नहीं मिला इनको आराम !
संतान सुखहीन  पुत्र गिर गया वशीभूत काम -धाम !!
ठगता ठगाता रहा दिन -रात खो दिया पूर्वजो का नाम !
एक एक  मिला ग्यारह करने में खुद भी रहा बदनाम !!५!!
भोला था भोला पति था पाया सब कुछ था किस्मत से !
पर नानी का धन जजमानी का धन नही रहता जतन से !!
तो पानी का धन बेईमानी का धन कैसे बचाए पतन से !
निसंतान  का धन विश्वासघात का धन डुबाये तन मन से !!६!!
सपना सजोये रचना करे मन में नित नूतन सृजन का !
पर नहीं था किस्मत में लाल यह विधान भगवन का !!
जो धन जैसे आत है सो धन तैसे जात सत्य कथन का !
समय होत बलवान लूट गया सब सामने अपने नयन का !!७!!
अपनो ने लूटा परायो ने लूटा लेकिन किसी के लिए नहीं छूटा !
जो छूटा वह सब अब परहित करने का बहाना बना कर छूटा !!
जिस जिस ने लूटा लूट गए सब नहीं हुआ उनमे  कोई मोटा !
समय दे सदगति सबको मैंने तो सबके हाथ में देखा सोटा !!८!!
रचना मायापति की मानव मन है माया के आधीन !
जो जैसा करम करे वैसा ही है फल सबको उसने दीन !!
अनजाने तो  क्षम्य जान बूझ का तो फल है मलीन !
कभी न करना ऐसा वैसा रे मन तभी रहोगे तू कुलीन !!९!!
ख़ाक पति था जो कभी जब ऐसे  बन जाय करोड़पति !
होना ही होगा उसे जमीदोज एकदिन बन कर रोडपति !!
खून आँसू रोते तब जब बिगड़ती है इनकी सब गति !
मैंने तो कई बार करोड़पति को देखा बनते खाकपति !!१०!!

रविवार, 4 अगस्त 2013

पागल

मैंने पाया सर्वत्र सदा खोया खोया खुद से रमता !
मद मस्त सदा किंकर्तव्यविमूढ़ सुकर सा दिखता !!
पाने को दाने खो होश इधर उधर गिरता पड़ता !
भूख मिटाने पाए नहीं दाने सड़क किनारे सड़ता !!१!!
वह और कोई नहीं है पागल हर कोई यही कहता !
पर सच और वह सब सम्पन्न कभी हुआ करता !!
उसका ठाट देख प्रतिभा पेख हर कोई तरसता !
दे दिया सब सबको अब इस अवस्था में रहता !!२!!
ज्ञानी ज्ञान शानी शान मानी मान शून्य हो जब !
विधि मार से समय चाल से हो जाय  संज्ञाहीन तब !!
लूटाया नहीं लूट लिया अपनो ही  ने जब उसका सब  !
लूट कर छोड़ दिया टूट कर बोल दिया उसे पागल तब !!३!!
पर हित पर  ब्रहम सा है न कोइ इस जहां !
पर जनहित रत नित जन अभी भी है यहाँ !!
स्व कर्मरत अडिग पथ पर रहता कौन कहां !
जब ईमानदार कर्तव्यपरायण पागल है यहाँ !!४!!
दूध की मख्खी सा भोजन के बाल सा जो स्वयं सदा !
पर को समाज संकट पथ कंटक बताने को है आमदा !!
जनतंत्र में जन शक्ति पा हो गया है आज वह विपदा !
कर रहा सब जगह सब नियंत्रण देखो पागल ही है सदा !!५!!   

शनिवार, 3 अगस्त 2013

अब पड़ रही पुरुष पर नारी भारी

प्रकृति पुरुष  का सपना !
यह विधि की अनुपम रचना !!
प्रकृति व नारी हैं पुरुष पर भारी !
युगों युगों तक ठेकेदारों से हारी !!
हारा नहीं हराया इसको ,मिलकर पुरुष संग नारी !
पर युग बदला समय बदला ,अब पड़ रही पुरुष पर नारी भारी !!
आने दो माँ मुझको ,दिखाउगी सबको कैसे अबला है भारी !
सह कर सब यातना मृद पात्र सा ,कह रही अब हमारी बारी !!
पुरुष रहा या रही  नारी सबने मिलकर गला घोटा है बारी बारी !
गर्भ में आयी तीसरी संतान भी जब हो गयी कन्या कुमारी !!
माँ के कष्ट पिता के ताने घर के उलाहने !
सभी परिस्थितियाँ लगी है तंग करने !!
कुमारी ने तब संभारी गर्भ में ही पारी !
माँ अब नहीं हारना हारेगी दुनिया सारी !!
अभिमन्यु ही नहीं मैंने भी पाया है गर्भ ज्ञान !
उससे भी बड़कर मै बनूगी है मेरा सपना महान !!
पिता सिख से चक्रव्यूह तोड़ा था अभिमनु !
ताना बाना से सिख ताना बाना तोड़ेगी मनु !!
माँ क्या समझाए माँ को समझाए मनु !
भूख प्यास दुःख दर्द देखा है जो तेरा तनु !!
आने दो अब मुझे आने दो हो गया सो जाने दो !
मै आ जाती हूँ तब होता है देखो हाथ दो दो !!
मेरा सामना  तो होगा माँ मै आउगी !
धैर्य धर दुःख झेल मै तेरा दुःख मिटाउगी !!
कन्या भ्रूण हत्यारों सहित उनके कुल को सबक सिखाउगी !
दहेज़ लोभी सुरसा का सब मान हरण करवाउगी !!
नहीं पायेगे साथ नारी का वे क्वारे कर जायेगे !
आने वाली नस्ल वे ट्यूब बेबी से ही बदायेगे !!
कहना केवल कहना है ,नारी पुरुष का गहना है !
माँ बेटी दादी नातिन पर सबसे भारी बहना है !!
भोग्या नहीं सुख आधार शिला !
जिस जिस ने मेरा जीवन लिला !!
उनके वंशज वंचित ,नहीं पाए सुख संचित !
पायेगे सब दुःख वे नहीं इसमे संसय किंचित !!
सब योगता होगी मेरे पर कृपाल !
बनेगी मेरी वही सर्वत्र महा ढाल !!
योग्यता का बन मिसाल मै ले लूगी सब पद विशाल !
राजनीति हो या हो कोई विभाग जन देखेगे मेरा भाल !!
सारे कामी क्रोधी कुटिल लालची को पग पग नाच नाचाउगी !
माँ आने दो मुझे आकर मै इनको इनकी औकात दिखाउगी !!
आज दुःख देख कल सब सुख तेरा !
माँ ले लो गर्भ से ही वचन मेरा !!
अभिमन्यु बन कर ये सब छिन्न -भिन्न !
यहाँ मनु तेरा लायेगी लायेगी युग नवीन !!
जानेगी तब तरस तरस दुनिया सारी !
अब पड़ रही पुरुष पर नारी भारी !!  

सोमवार, 29 जुलाई 2013

अन्तर है समानता है

बैल बैल में अन्तर है ,जैसे नन्दी और साड़ में !
अन्तर नहीं है सभी बैलो में ,
पर है प्रेमचंद के हीरा  मोती और आज के बैलो में !!
उपन्यास सम्राट ने आदमी को बैल और गधा कह डाला !
बैल और गधा की समानता दो बैलो की कथा में आदमी से कर डाला !!
वास्तव में समानता है ,अन्तर है ,
मानव मानव में ही महद अन्तर है !
कही कही तो बिल्कुल अन्तर नहीं है जानवरों और मानवों में !
समानता है आहार निद्रा भय मैथुन और दोनों की आक्रामकता में !!
धर्म धुरी धरा धारन हेतु ,सत्य श्रम निष्ठा कर्म पालन हेतु !
मानवता मानव को मानव बनाने हेतु ,दानव और पशु से अलग रखने हेतु !!
जब अन्तर नहीं प्रेमजी के जानवरों और मानवो में !
तो फिर अन्तर कैसे  जानवरों की प्रजातियों में !!
रीछ और भालू में है क्या अन्तर !
कहां है गधो और गदहो में अन्तर !!
कोई खच्चर है तो कोई टट्टू है ,कई मौलिक है तो कई वर्णशंकर है !
कोई गवई है तो कोई शहरी है ,कोई नगरी है तो कोई बाहरी है !!
कोई काला है तो कई धवरा है ,कोई अपना है तो कोई पराया है !
सच है  हम इस बात से घबराये है ,कि हम एक दूसरे के साए है !!
कोई दुबला है कोई पतला है ,कोई छोटा है कोई मोटा है !
कोई फेकू है कोई टेकू है ,कोई सुलझा है कोई उलझा है !!
कोई साफ़ है कोई गंदा है ,कोई आधा है कोई पूरा है !
कोई मानक है कोई पैमाना है ,कोई क्षणिक है तो कोई ज़माना है !!
कोई आज है कोई कल है ,कोई भूत है कोई वर्तमान  है !
कोई आस्था है कोई विश्वास है ,कोई ठग है कोई धोखेबाज है !!
कोई सच है कोई झूठ है ,कोई वर्तमान  कोई भविष्य है !
 कोई ज्ञात है कोई अज्ञात ,कोई पराया है कोई अपना है !!
कोई रात  है कोई दिन है ,कोई हकीकत है कोई सपना है !
कोई चरित्रवान है कोई चरित्रहीन है ,कोई पूर्ण है कोई अपूर्ण है !!
कोई लेता लेता है कोई देता देता है ,कोई लेता देता है कोई देता लेता है !
कोई लेता है तो देता नहीं है ,कोई देता है तो कोई लेता नहीं है !!
कोई जग जाहिर है कोई माहिर है ,कोई सर्पेंट है कोई सर्वेंट है !
कोई जानता है तब मानता है ,कोई मानकर ही जानता है !!
कोई सीमित अपनो तक तो कोई विस्तृत परायो तक !
कोई आशावादी है कोई निराशावादी ,कोई आस्तिक है कोई नास्तिक !!
कोई असली है कोई नकली ,कोई सदाचारी तो कोई कदाचारी !
कोई ज्ञानी है कोई अज्ञानी ,कोई मानी है कोई अभिमानी !!
कोई सब है अकेले यानि स्वयं में दोनों -------
नर हैं या हैं वे नारी उनको तुम चुनो !
इन सबमे समानता है या फिर अन्तर ,यह जानना ही है जंतर मंतर !!
कोई कहता है कोई सुनता है ,कोई चुनता है कोई गुनता है !
कोई जानता है कोई मानता है ,कोई पारखी है तो कोई परख है !
कोई बड़ा बड़ा है कोई छोटा छोटा ,कोई बड़ा ही छोटा है तो कोई छोटा ही बड़ा है !!
तो कोई छोटा बड़ा दोनों है ,पर है जरुर -----
तो फिर क्या अन्तर है हममे और तुममे --
अन्तर है तुम तुम हो हम हम हैं ,यह हमारा है वह तुम्हारा है ---
इसी का तो जबरदस्त रगडा है पर जो भी हो अन्तर नहीं है !!
समानता है -आये एक ढंग से जाए एक ढंग से ----
यहाँ का यही रह जाए सब जानते है सब मानते है !
अन्तर है -सर्व श्रेष्ठ और निकृष्ट में हार  और जीत में हानि व लाभ में,
जान बूझकर करने व अनजाने हो जाने में ठगने ठगाने पाने व गावाने में,
बनाने व बिगाड़ने में निर्माण व विनाश में !!
अन्तर है -कथनी और करनी में ----
धोखेबाजो की विश्वासघातियो की ठगों की लूटनेवालो की अन्यायियो की !
दोहरी चालवालो  की बेइमानो की झूठो की चोरो चिकारो की और नामर्दों की !!
अन्तर नहीं है -कथनी और करनी में ---
रसूक वालो की ईमानदारों की !
सच्चे और नेक आचरण वालो की !!
मर्दों की जुबान एक होती है -मिथक है -सच है -इसका वजूद है !
फिर भी सभी मर्द एक सा होते हैं क्या -या नहीं ,
अन्तर है मर्द मर्द में अन्तर नहीं है नामर्दों में !!
इसीलिए तो --
कोई हँसता है कोई रोता है ,कोई जगता है कोई सोता है !
कोई हँसाता है कोई रुलाता है ,कोई जगाता है कोई सुलाता है !!
क्या अन्तर है भूत वर्तमान भविष्य में -है भी -नहीं भी ----
मानव ही दानव था है और रहेगा पर सभी नहीं !
मानव ही मानव थे  है और रहेगे पर सभी नहीं !!
तो अन्तर कैसा और क्यों कहा कहा और कब कब ---
चौपाया और चारपाई में भाई और भाई में समानता है अन्तर है !
राम और भरत सा युधिष्ठिरऔर दुर्योधन सा अन्तर है !!
मानव और दानव में अन्तर तब तक !
मानवता आभूषण है मानव का जब तक !!
दानवता श्रृगार जब हमारी !
हम दानव से भी पड़ेगे भारी !!
समानता है जोड़ने और निर्माण में अन्तर है बिगाड़ने और विनाश में !
समानता है दौड़ने और दौडाने में अन्तर है भागने और भगाने में !!
जाति धर्म सम्प्रदाय भाषा भेष आदि में अन्तर है !
अन्तर नहीं है जब हम मानव है वसुंधरा ही कुटुम्ब है !!
अन्तर है तो इसे बनाए रखना भी है --क्योकि --
गागर गागर है और सागर सागर है हिम हिम है और हिमालय हिमालय है !
झूठ सच हार जीत हानि लाभ जीवन मरन जश अपयश दुःख सुख झेलना ही है !!
करिश्मा का इंतजार नहीं कर्म का करो सम्मान !
निश्चय ही अन्तर रहते ही बदा लोगे मान !!
अन्तर को पाटना समानता को लाना !
यही है सच्चे विकाश को बुलाना !!
इसके लिए स्व अनुशासन से मन पर विजय पाना !
समस्त अवगुणों को आवश्यक  स्व से दूर भगाना !!
पर को न देख स्व को देखे सच्चाई को पेखे !
कुछ भी नहीं रहा है पर सच्चाई रहेगी इसे ही सच लेखे !!
समानता है सच और सच्चाई में -अन्तर है झूठ और झुठाई में !
समानता है अच्छे और अच्छाई में अन्तर है बुरे और बुराई में !!        

रविवार, 28 जुलाई 2013

त्रिमातु की नव वन्दना



                      उमा रमा ब्रह्माणी अग जग रमनी सृष्टी सुहानी जग मातु कहासिन !
                      सुन्दर सहज सरल भासिन जो हैं  शिव विष्णु ब्रह्म बामांग सुवासिन !!
                      शक्ति धाम सर्व काम पूरिन जो है सदा दुःख दारिद सब कष्ट निवारिन !
                      वैष्णवन वैष्णवी शाक्तन शक्ति शैवन शिवा प्रभृत अभिधान धारिन !!१!!
                      जिनका रूप रूपसी सा देख खल सहज गरल रस पान कर धरा त्यागिन !
                      शुम्भ निशुम्भ चंड मुंड धूम्रलोचन रक्तबीज दुर्गा महिषासुर मर्दिन !!
                      नाम अनाम कुनाम सनाम धर असुर जग जब जब अत्याचार करिन !
                      सुवेष बनाय स्वाचरन से मानवता त्यागी का मातु तू है सर्व बिनासिन !!२!!
                      रमा समान रमा माँ सदा नारायण संग नारायणी पद्मांगी पद्मासिनी !
                      धन धान भरो मन मान भरो सुख शान्ति भरो जग जाग निस्तारिनी !!
                      सर्व मंगला मंगलकरनी भक्तो का हर हर कष्ट सुख भर सुमंगल दायिनी !
                      नित नवीन पद्मावाली सा सर्वांग सुवासित यश भरो हे मातु यशस्विनी !!३!!
                      ब्रह्माणी बर  बुद्धिदायिनी  विमला अमला कमला निर्मला  स्फटिक धारिनी !
                      सच है सदा नहीं कोई है तुझ सा जगत में  शुभ्र शुभ्रांगी शुभ्र हंसावाहिनी !!                    
                      शोषक शोषित ठग ठगाए पाए बिनाश धोखेबाज विश्वासघाती हे जग तारिनी !  
                      जन मन मंजू कर आसन सुधार धरा कर कर मति विमला हे मति दायिनी !!४!!
                      त्रिदेवी त्रिदेव प्रिया त्रिलोकी त्रिभुवन तारण तरन त्रय ताप तपन हरन !
                      त्रिपुर सुन्दरी त्रयलोक वन्दिता त्रिनिनादिनी त्रास हारिनी जग कारन करन !!
                      दिवाकर ज्यो हरे तम जगत का त्यों हे मातु तू हो जगत त्रास तारन !
                      त्रिमातु की नव वन्दना अर्पित त्रिपद कमल जेहि कर कमल सब दुःख समन !!५!!
                         

सोमवार, 22 जुलाई 2013

जटा कटाह युक्त देव



                                                   जटा कटाह युक्त देव ,भागिरथी धारिणी !
                                                   बाल चंद्रमा युक्त भाल ,हौ मोहि निस्तारिणी !!

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

धरती

धरा धरनी धरती  जन जन की चाहत भारती !
चौरासी लाख दृश्य अदृश्य योनि  पालन करती !!
सुख दुःख की अकूत विषमता स्व अंचल रखती !
सम भाव सदा आपदा बिपदा से परे रहती !!१!!
देश विदेश स्व या पर देश नर नरेश या नागेश !
केदार सार या बद्रीनाथ सबमे रखती सम भावेश !!
सनातन पुरातन परिवर्तन की इच्छा वृध्दि आदेश !
आवश्यकता धरा नित  पूरे अपूर्ण इच्छा रखे कामेश !!२!!
अन्न धन धान्य सदा भर जन जान प्राणी प्राण सेती !
जलचर नभचर थलचर उभयचर चराचर त्राण देती !!
सचर अचर  चर  को तार कर्मरत कर कर्म भाव भारती !
अनाचार कदाचार दुराचार व्यविचार से धाराशाही धरती !!३!!
चीटी से हाथी तक का पेट नित नवीन ढंग से भरती !
निज निर्धारित प्राकृतिक नियम पर घड़ी सा चलती !!
काल गति काल हो जब प्राकृतिक नियम चटकती !
आबाद आबादी का ह्रास क्षण में करती है धरती !!४!!
धरमशील तन मन धन से मिलते नहीं दिखावा करते !
सर सरिता सागर गागर बादल जल निज मार्ग करते !!
सुख संपति बिन बुलाये मेहमान बन धरमशील को धरते !
कर्मशील निज कर्मरत भाग्य विभव नव नव भरते !!५!!
करते दुष्कर्म वा सत्कर्म जननी सा हर हाल सदा सहती !
जग जननी जन जननी बन नवीनता संचार नित करती !!
आसन बसन बासन बन सुबासन सुबसन को सराहती !
दुर्व्यसन दुर्वासना को सहती पर नाश करती नित धरती !!६!!
  


सोमवार, 8 जुलाई 2013

मानव

मानव दानव सा करे जब आहार विहार !
हो जिस साधन से भरा उससे पाये हार !!१!!
रचता स्वयं नाश जाल होती ताकत पास !
सोचता विकास जिसको वही करता विनास !!२!!
समझ चतुर बन गया ठग ठग अपनो को रोज !
समय समेटे सकल सुख मिट जाये सब मौज !!३!!
स्व को सदा सम समझ जो असत से कर अर्जन !
भरे स्व स्वजनों का सब करे सबका तर्पन !!४!!
फूले फले जवास सा चूस चूस पर सार
पड़ते ही पावस बूद हो जाय तार तार !!५!!
दुहरी चाल पल पल चल चमक सकते कुछ पल!
दुधारी बन यह करनी करेगी विनास कल !!६!!
सुख शान्ति छिन जन स्वजन अपरजन या द्विजन !
मिले दुःख दैन्य व अशांति तुम्हे इसी जीवन !!७!!
लूट की ललक से लपक दे कोरा ही वचन
टूटे लुटे लाल लाल हो तेरा अधोपतन !!८!!
भक्षण इंसानियत का नित बन संसार से विरत !
जैसे भक्षण परिजन की करता बगुला भगत !!९!!
घात प्रतिघात है क्या विश्वासघात पाप !
सो कहते बचोगे रे आस्तीन का साप !!१०!!
कुपथ से विकास चाहत बनाती हे दानव!
सुपथ से सुदृढ़ ही सदा रहे हरदम मानव !!१०!!

शनिवार, 22 जून 2013

तीन दोहे

सागर सा धीर वीर जन ,रखे मर्यादा ध्यान !
आप आ जा सागर में , हरदम एक समान !!१!!
सब विकार बिहाइ पाय ,जल नदी से सागर !
विकार जन नसाय जाय ,ज्यो छेद से गागर !!२!!
चयन कर निज विचार से ,देकर अपना साथ !
बात पूरी सुचार से , नहीं टेक कर माथ !!३!!

मंगलवार, 21 मई 2013

राधेश्याम

कृष्ण कथा की का कथा समुझै नित मन लाय!
मिट जाय जग की व्यथा ज्यो तृषा जल पाय!!१!!
राधा राधा की धार धोवै सब अघ सार !
पा कृपा तू एक बार कर लो बेरा पार!!२!!
मातु पिता राधेश्याम धर मातु पिता रुप!
पालन पोषण जगत का करते कर हर स्वरुप!!३!!
देश काल लोक हित में पाकर इनका वचन!
होगा नहि अप्रत्यासित कुकंटको का दमन!!४
हम सब सदा करते नमन इनको भज दिन रात!
भारत की सवरे दशा हो जाय करामात!!५!!

शुक्रवार, 17 मई 2013

जीवन-जनक

जीवन हो सकल सुख साधन सम्पन्न,हो रहा आज है नर इस हेतु अघ सरन!
जीवन ज्योति जग मे जगमगाती सर्वदा,एक एक कर भले ही हो सब योनि गमन!!
जीवन अमृत को पा नर क्यो नित भूलता,सुख दुख दिन रात सा न्ही इसमे चयन!
जीवन जहर कर स्वमेव ही नित नव,आपदा जंजीर का क्यो करता नित आलिंगन!!१!!
मत्स्यान्याय हो रहा सबकी नजर सर्वत्र,द्वापर कथा आज व्यथा द्रोपदी चिर-हरन!
बाहुबली हस्त स्व चिराग हित नित रत,पर जीवन ज्योति का कर रहा है शमन!!
जीवन न्याय हैजीवन काल मे ही पूरन,करना है हिसाब चाहे करो जितना जतन!
जिसकी लाठी उसकी भैस है प्यारा कथन,किसके लिये इस पथ करते न्याय दमन!!२!!
जीवन लाल बन जीवन दान की कसम,लेकर करते सुकर सा निज पेट भरन!
कह रहा श्वान आज घूम-घूम गली-गली,देखो दोस्तो मुझे नही मरना मानव-मरन!!
मरना मारना मर जाना हर जीवन के,नव जीवन पाने के क्रम का है सदा बरन!
लूटना लूटाना लूट जाना इस जगत में,छूटना है सब साथ जाता तो नही है कफन!!३!!
जीवन लालसा सा लगा गले सब सबको,पूजा पाथर की कर ज्ञाताज्ञात से ले सबक!
जीवन पथ हो सहज सरल सुवासित,त्रिपथगा सा ठान लो जन तारने की सनक!!
कलयुग ही है काल नही मानव मन का,मत भरमो इसमे ले गफलत की भनक!
काट छाट कर छोटा बडा मत बनो कभी,बनना ही है तो बनो जीवन मे जनक!!४!!

बुधवार, 15 मई 2013

हे रिद्धि सिद्धि के दाता

जय जय जय वर दायक गन नायक,मंगल दायक शुभ शोभित सुन्दर बदन!
गिरिजा सुवन गण बन्दन गज बदन,विघ्न हारक सुखकारक त्रिपुरारी नन्दन!!
जन रक्षक जय,जय हे मंगल करन,सदा विपत्ति विनाशाक जय हे गज करन!
मोदक जो चढावे सब सुख पावे तुरत, जय जय जय हे गनेश असरन सरन!!१!!
विद्या दाता ज्ञान विधाता भक्तो के दुखहर्ता,सुख सम्पति नाना विधि दाता हे स्कन्ध के भ्राता!
हेरम्ब मद मोद सार सब संकट हर्ता,मातु पिता के दुलारे हो तू तू भक्तन के त्राता!!
सेवत ही सुजन की कामना पूरन कर्ता,अष्टसिद्धि नवनिधि  स्वामी तू तू धन के दाता!
मातु पिता भ्रातागण सब नित मोद भर्ता,रचना हो मंगलकारी हे रिद्धि सिद्धि के दाता!!२!
विनती सुनो हमारी हे त्रिपुरारी नन्दन,लोक सुवासित रचना हो जन मन रंजन!
नित नवीन नूतन नव आकृति बन्दन, शब्दार्थ रस भरो छन्द जैसे आखो में अंजन!!
मंगल रचना करे नित जगत नन्दन,दो शक्ति सदा इस जन को हे दुख विभंजन!
आतुर भय से जो जन करे सदा क्रन्दन,दूर करो सबका भय हे भव भय भंजन!!३!!

गुरुवार, 9 मई 2013

ॠतु परिचर्चा

मधु-माधव माह महाराज माहन माहै,मोहै मालती मलयानिल मार मानव मन!
बासंती बयार बतावे बनावे बतकही,बरबश बुलावे बहलावे बहु बहु बन!!
फुलै फलै फूल फल फहरत फबिफात,फहरावे फर फेरि फेरि फनिक फन फन!
सोना सी सोहै सुधरा सुधर सुघर सर,सुरासुर सुर साजे सजावे सब सनासन!!१!!
जीवन जोत जगावे जगती जगमगावे,जाडा जावे जन जनावे जोरि जोरि जागरन!
जाड जड जोडि जुगल कर अनवरत,जावे पर बतावे गीता ज्ञान हो नन्दा शरन!!
आवे ग्रीष्म गरमी ले अगवानी वैशाख ले,अबार हाल इहै तो जेठ शुरु का का तपन!
जेठ की दुपहरी क दाघ निदाघ का करी,सोच सोच आकुल छाया भागत छाया शरन!!२!!
आषाढ माह गरमावे त बरसा बुलावे,झिमिर झिमिर झक झोरि झोरि रोज बरसै!
सावन भादो नाम बरसा रितु सब जाने,सावन की कजली बिरहिनी के जिया तरसै!!
सिय बियोग में राम गति जाने जो जनावे,पपीहा नित चातक चातकी की बात करसै!
धरा धन्य धन धान ध्रुव धर धरोरुह,हरियाली हर हर मानव मानव हरसै!!३!!
क्वार माह खुशबू कातिक का बन गरम,टेर दे जन जन काम आई धरम करम !
नेह नित निबाहन नव राग बढावन,चतुरमास चहुदिसि होत पूरन परम!!
राग रोग भाग,भोग भागसु रजनी बढ,सुकरम हेतु बतावे गहनतम मरम!
तीज त्यौहार खुशियो को झूम कर मनावो,भूल जावो गम शरद सिखावे यह धरम!!४!!
पतझड पर प्रीति परम पावन पाय,अगहन पूस माह हेमन्त छाय जहा जाय!
कहनी का इनकी जोर दे पल प्रकृति की,धरोहर धरावे धरतीसुत से धाय धाय!!
भविष्य सुधर जाये हर उस जन का,सुधा सुधरम सुकरम का जो जो अपनाय!
भावी आवे ही आवे मेटि न जाय सब गावे,दुख सुख दिन रात जरा जवानी सु बताय!!५!!
शिशिर आगमन पूस के चरन धरन,माघ पूरा अपना हक छोड फागुन झलक!
कपावे तन मन पीपल पात सु सुबह,जम जाय जन जीवन प्रेमी प्रेयसी पलक!!
घर जवाई सु होय मान घटाय सूरज,राहत-रेवडी वास्ते लोग निहारे अपलक!
रहता नही दिन मान एक सा हरदम,रितुराज राजा सा पूर्ण करे जगायी ललक!!६!!  

बुधवार, 8 मई 2013

चिन्तन

चिन्तन से चिता में जात जन मन समझो,
आतुर दिन रात जिस हेतु मारन-मरन!
ईश्वर की रचायी माया इनसे भगाये,
उलझाये संसारी विषय मे धरते चरन!!
राग पैदा कर तन- मन में रचाये इन्हें,
सेवन असेवन दोउ हाल में कर जतन!
मेरी हो जाय सारी भोग्या बस यही कामना,
नचाये कठपुतली सा और कारन कवन!!१!!
शुरुवात काम क्रोध लोभ ममता की यह,
कामी हो असफल बिचारने में सत- असत!
बाधा कामना की भडकावे क्रोध को,
कहे करे सब निकृष्ट जो इसमें बरत!!
लालच बनावे सुजन को भी ठग मानव,
सत असत धर्माधर्म भूल सबको ठगत!
मोह ममता का बिगाडे समभाव नर का,
करवावे पक्षपात बनावे बगुला भगत!!२!!
अभिमानी स्वरुप वय गुण गन गान का,
रज तम त्याग सनकी बन पावे सनक!
मारग अपनावे बिचलो सुख- शान्ति छोड,
बुलावे क्रोध नीति न्याय विरुद्ध राग की भनक!!
लोभी मोही कामी स्वार्थी सुखभोगी इन्सान,
अभिमान से ही क्रोधी बने तुनक तुनक!
मूरख सा याद नाश करे विनाश सबका,
पा पाकर अपने मोह माया की एक झलक!!३!!
कामी को पियारी नारी उसकी कामी कामना,
लोभ जब हो धन मान की तोड देती कमर!
विषयी विषय विकार विनाश कर नित,
मुक्त मृग-तृष्णा से ईश कृपा से तर बतर!!
चिन्तन चिता से मोड मुख चलो कर्म पथ,
प्रेममय सुमन शोभित सामने सरवर!
लगा डुबकी प्रेम-सरवर बन सबका,
जमकर जीत जावो जगत में हर समर!!४!!

मंगलवार, 7 मई 2013

आज और कल

कहानी कल की यथार्थ आज का कल्पना करे कल की!
औरो की गाथा स्वं की व्यथा कथा आत्म प्रवंचना की!!
कंदुक  राज्य  त्रेता का द्वापर में अपनो का हडप लेने की!
आज अपनो की  परायो की सबकी अपना कर लेने की!!१!!
 माता बहन पुत्री की सीमा मर्यादा नर- नारी के बीच की!
जात एकान्त इन्द्रिय जात मारती मति मानव मन की!!
कल की कथनी, करनी आज की ,गली-गली आम जन की!
कल क्या होगा हाल सबसे बेहाल हमारे विद्वत जनो की!!२!!
पिता भाई पुत्र के संबन्ध गरिमा समर्पण त्याग सम्मान की!
एक दूसरे के लिए जिनको परवाह नहीं तन मन व धन की!!
खटास ला संबन्ध में दरार डाले रिश्तो में स्थिति आज की!
टूटने को आतुर सारी बेडियां बिगाड देगी रिश्ता कल की!!३!!
सत्तासीन सत्तातुर सोच सुधारो सुधरो सुनो समझो समीचीन!
अपनाओ अपना बनाओ मिटा भेद स्व -पर का हो अर्वाचीन!!
भविष्य की गर्त में मत जाने दो सिख लो प्राचीन से नवीन!
बचेगा आज-कल  दोनो जब न हो हमारा मन मलीन !!४!!

रविवार, 5 मई 2013

प्यास

अपनी अपनी कथनी करनी,अपनी अपनी प्यास!
आप चाहो तो करो पूरा केवल अपनी ही आस!!
इमली सी रंग स्वाद में निकालते सब भडास!
ईख शरबत भेली शक्कर दे हर हाल में मिठास!!१!!
प्यास पीने पाने मिटाने मरने मारने जमाने की!
सीमित असीमित दमित पालित इच्छित अनिच्छ्त की!!
निभाने-निभने,पालने-पलने व टालने-टलने की!
रखो यही जग में निरन्तर कुछ कर गुजरने की !!२!!
प्यास होगी धरा पर पूरी उडे भले आसमान !
मिले अन्न धरा पर ही चिडिया उडे सारे जहान!!
भूल भुलैया में भैया फस जाये सशरीर जुबान!
काम केन्द्रित कामी,खो देते सब मान सम्मान!!३!!
प्यास मित से अमित व जोगी से भोगी बनाता!
रोगी भोगी कामी बन क्यो ठगता और ठगाता!!
अतृप्त लालसा के चक्कर में क्यो फसताऔर फसाता!
सुकर्म पथी मजबूत आचरण से ही इसे बूझाता!!४!!

रविवार, 14 अप्रैल 2013

समय

समय पर हम जब करते जतन!
पुलकित हो जावे हमारा तन व मन!!
चुकते ही एक क्षण होवे हाल बेहाल!
जैसे अवसर चुके डोगरी नाचे ताल बेताल!!
ज्वार भाटा सा यह नही करता इन्तजार!
आप इसके इन्तजार मे चाहे हो जाये तार तार!!
कहते है ये तो टाइम टाइम की बात!
सीधा है अर्थ इसका टाइम की है शुरुवात!!
जन जीवन का समय दिन रात से!
कलरव का समय शाम प्रभात से!!
सुप्रभात से हो शुभारम्भ जब समय का!
सुधरे स्वयं सुधारे भाग्य जन जन का!!१!!
समय के चुकते ही रीता हो हाथ!
फिर काम न आये किसी का साथ!!
सुधीजन कहते  यही बात बार बार!
समय पर ही करो गरम लोहे पर वार!!
यह बात बताना क्यो जब सब जानते है!
क्योकि हम इसे व्यवहार मे नहि आनते है!!
टाइम टेन्स बन काल हो जाता!
जो किसी को कभी नही है भाता!!
गुनगुनाते भौरे चहचहाती चिडियां!
लहलहाते खेत खिलती कलियां!!
स्वचेतना से स्वमेव होता यह  कब!
पलन होता समय चक्र का चक्र जब!!२!!
समय सुहावन मन भावन स्व के समय पर!
स्व समय की अनुकूलता प्रतिकूलता की रुचिता पर!!
वही नदिया वही झरने वही गिरि बन का चमन!
थपेडे खा खाकर समय का देते सुख शान्ति-सुमन!!
पर उनके ही दामन में हमे मिलती अशान्ति!
खो देते समय की मार से जब वे अपनी कान्ति!!
करते जीव जन्तु जगत जंगल मेंसमय भोग!
इसका ही सदुपयोग दुरुपयोग बनाता सबका योग संयोग!!
समय को किल करना नही है केवल हत्या!
विजय पाता वही इस पर माने इसे जो आत्महत्या!!
विजयी होता जन वही समय पथ पर जो आगे चलता!
मुठ्ठी मे होता यह उसके जो समय-पिच पर सदा रमता!!३!
समय पर जगो सोओ निज कर्म पर आगे बढो!
दुर्गम शैल गिरि पथ कार्य -रथ पर निज चिह्न मढो!!
अग्रसोची अग्रकर्मा बन इसकी इज्जत करो!
समय की नव समय पर चला जग-जलधि तरो!!
अन्यथा चक्रावात झंझावात है तैयार इस जग में!
ऐसे कोटिक दुर्निवार लगे है नैया को डुबोने में!! 
समय पर चेत रे जन चेत जल्दी चेत!
मत हो तू संसार-समर में असमय ही खेत!!
समय की चेतना ही भरेगी समय रहते प्राण-वायु!
मजबूत हो सारे तन्त्र तेरे बन स्वचेतन स्नायु!!
मत कर गुमान बिना विजयी बने समय पर!
प्रहार करो रख रुचि स्वविकास हेतु पहर पहर पर!!४!!

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

सुर सुरा सुन्दरी

सुर सुरा सुन्दरी का अद्भुत संयोग !
सुख शान्ति हरता भरता इनका योग वियोग!!१!!
स्वर वाणी बन करता अनेक करामात!
मुख पर हो इसके बलहि पान पनहि बरसात !!२!!
सुरा मान अपमान का है सदैव गवैया !
किस तरह गले लगाया आपने ये भैया !!३!!
सुन्दरी के रुप अनेक बना लो सोच नेक !
सोच सुधरी यदि नहि तो मिले ठेक पै ठेक !!४!!
शुम्भ निशुम्भ संहारनि सुन्दरी की कहानी !
महिष मर्दिनी की कथा सुनते हम जुबानी !!५!!
सब जानते व मानते मात बेटी बहना !
बनती यह पत्नी भी एक सदपुरुष का गहना !!६!!
कापुरुष क्लीव सा नित इधर उधर मचलते !
सभी रिश्ते मर्यादा को कुकृत से मलिन करते !! ७ !!
गाते हर पल प्रियाप्रिय स्वानूभव का गान !
घर परिवार समाज में बराबर का योगदान !!८ !!
कन्या सुकन्या वीष्कन्या है तिसो पर भारी !
कल आज कल हर पल हर सुख शान्ति दे नारी !!९!!
कुल कलंकी कामिनी की कामना को कर कर !
करते कलंकित कुल कुल कामी कुमार कुवर !!१०!!
कामिनी दामिनी नामी नाम को तरसाती !
हर ले सब स्वजनो का सुख पाप पुंज बरसाती !!११ !!
दूसरा पहिया रथ का है निसन्देह नारी !
पहला पुरुष भले टूटे पर निभाती सारी !!१२!!
प्रेरणा प्रेम सुन्दरी सहे क्यो नित घात !
जूती समझे कापुरुष तेरी है यह मात !!१३ !!
दुर्गा दुर्ग बिनाशिनि यह हर सदगति दायिनी !
हरि हर पूजित सेवित नित दुनिवार निवारिनी !!१४ !!
आभा भर पराभव में ये जगमातु गिरिजा !
शंकर सुतो सा जग को है तुम्ही ने सिरिजा !!१५!!
सवत पराभव में हो पराभूत अमित सारे !
मित हू सबका होवे आप के वारे न्यारे !!१६!!

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

मदिरा,सुरा, शराब

मदिरा सुरा शराब सा है नहि कोइ नशा!
धन मान तन का राज व बिगाडती सब दशा!!
जब हो ललक झलक पाने की
टिकती नहि पलक सिवाय मय खाने की!
गिरते हर पल अपनी व अपनो की नजर
पर की नजरो से कब गिर जाते होती न इन्हे खबर!
एक ऐसी बला के सामने बल खाते लडखडाते
अपना सब कुछ गवाते बडबड बडबडाते!
अपने मन मे अपने आप को धन्य मानते
संसार की सबसे बडी बुराइ को गले लगाते!
जो निर्विवाद जननी है------
शराबी शबाबी कबाबी व चरित्रहीन इन्सान की!
जो पा नही सकता कही भीख भी
अपने व अपनो के मान सम्मान की!!
मत करो टच एक बूंद बिगाडती है यह लत !
सुधरे दूर हो मद से यह लालसा सत सत !!

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

यह वसन्त

नवगति नवलय नव ताल छन्द ले आया नव वसन्त !
दिख रहा नव नव रूप रंग इस धरा का दिग दिगन्त !!
मावट खेले खेल खलनायक सा दिखे न इसका अन्त !
प्रान्त केंद्र की नीति अनन्त कैसा होगा अब  यह वसन्त !!१!!
हर हर जन का कठिन कष्ट कर कर को कर्मरत !
सुधरे सबकी सुरत सुलझे समस्याये सत सत !!
सुगम हो अगम जन हो निगम छूट जाय सब लत !
ऐसा कर दे यह वसन्त की हो कुमति सब सुमत !!२!!
दो हजार तेरह से मिट जाय जड़ से तेरह का चक्कर !
हो न इस जग में  किसी अन्धविश्वास का फिक्कर !!
सो न जाय जप जुगो का हो न जोगो का टक्कर !
यह वसन्त अन्नपूर्णा बन दे हर भूखो को टिक्कर!!३!!
बासन्ती फाग जगाये जन जन की भाग !
भगाये भारत से दुखद आतंक की आग !!
जल जाय होलिका सा दुष्कर्मियो का राग !
प्रहलाद बन यह वसन्त लाये नव जप जाग !!४!!
 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

जितेगा वही होगा सिकन्दर!!


क्रिकेट की कहानी, कहना न जुबानी!
खेल खेलने से ही ज्ञात हो इसकी जवानी!!
सिलसिला हार का जीतो मे बदलो तब तो करे बात!
पङो प्रतिपक्ष पर प्रबल तभी बनेगी यह बात!!
नही खेलना देशहित तो छोङ दो खेलना!
बार-बार हार देखने से अच्छाहै इससे नाता तोङना!!
खेलो देश या विदेश रखो शान मान!
तभी होगी ये खिलाङियो तेरी सच्ची पहचान!!
एक-दो की जैसी पारियो से कर लेते हो पक्का स्थान!
वैसा ही सभी पारियो मे खेलो तब बने सच्ची पहचान!!
जानते है सभी यह बात अन्दर-ान्दर!
कही भी जो जितेगा वही होगा सिकन्दर!!

लेखनी

लेखनी है तभी तो सारे साहित्यसेवी जी रहे है !
साहित्य -साधना से सभी बिधायो को सी रहे है !!
जर जर हो रही चेतना को संवेदना दे रहे है !
नीलकंठ सा इस जगत में असार -विष पी रहे है !!

चापलूसी

सच बोले की फस जावोगे ,जाति की कमी बताते ही नजर आवोगे !
अभिव्यक्ति स्वतन्त्र है ,पर लोक-तंत्र में चापलूसी से ही बच पावोगे !

,फेसबुक

खुद छिप ,जानना पर को 
पर पर काट ,सेफ स्व को !
ऐसी हरकत ,न भा मित्र को 
बदनाम कर ,फेसबुक को !!

होनी अनहोनी

होनी क्या होकर रहती हैया हो जाने के बाद को होनी कहते है !
अनहोनी जब होती नहीं तो उसे अनहोनी क्यों सब कहते है !!
विषय विचारे हम सब मिल फिर भावी किसको कह सकते है !
जब पूर्व नियोजित है सब तब निनानबे के फेर में हम क्यों पड़ते है !

सुआस करो पूरी ,हर जन की हे पूरनधाम !!

हे केशव बृजबिहारी ,है आप सदा निष्काम !
भाल बिशाल अमिय ,मोहै देखी ललाम !!
मोरपंख शिर वैसे ,शशि सोहै जू शिवधाम !
सुआस करो पूरी ,हर जन की हे पूरनधाम !!१!!
हे वंशीधर नंदलाल ,तेरी छबि वारे कोटि काम !
रक्षक हर पल ,करे भक्षको का काम तमाम !!
तन मन धन सब अर्पित ,हे जन के सुखधाम !
सुआस करो पूरी , हर जन की हे पूरनधाम !!२!!
हे माधव मदन मुरारी ,कहू क्या हे कान्तिधाम !
 जनम जनम सुख पावे ,जन  ले ले तेरा नाम !!
गल माल सुवासित ,बाजूबंद बिराजे बाजूधाम !
सुआस करो पूरी ,हर जन की हे पूरनधाम !!३!!
हे मधुसूदन राधेश्याम ,हरे कृष्ण हरे राम !
हरते हर पापियों को,करते भक्त के हर काम !!
भक्त का कुछ हर न सके कोई ,हे त्राहि माम !
सुआस करो पूरी ,हर जन की हे पूरनधाम !!४!!

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

सुर ,स्वर या संगीत

सुर सनेही  स्वजन हित,दुर्जन होय बेसुध !
कोयल कागला का क्या ,भावे न पावे सुध !!१ !!
कोयल सुर सुध जगावे ,काग मान भगावे !
ये सुर से ही जगत में ,अलग हो जश पावे !!२ !!
जग जाग भोर में गावे ,सुंदर सुर सुनावे !
मन्दिर मस्जिद गिरजाघर ,देवो को जगावे !!३ !!
राजावो का तान सुर ,देवो का गान सुर !
तानसेन का जान सुर ,गायक का मान सुर !!४ !!
बिना गति लय ताल स्वर ,पा जाता अपमान !
समय संग सोभित सुर ,करे सबका सम्मान !!५ !!
जन जनेश जो सुर रत ,बनाये राहु सा गत !
अति से जो जन हो बिरत ,सुधारे उसकी लत !!६ !!
बिना सुर सामने खड़ा ,असुर हो या हो सुर !
जब हो सरल सादा सुर ,कर दे मान चुर -चुर !!७ !!
सुर सुर अथवा असुर सुर ,लोकत्रय हित सही !
जनतन्त्र की गरिमा में ,नेता सुर हो सही !!८!
बे सिर पैर सुर प्रयोग ,लाता है कुयोग !
बनती बात बिगाड़ता ,सोचे बिना प्रयोग !!९!!
सुर सम्राट सुर सम्राज्ञी ,बनना है अधिकार !
ऐसे प्रयोग से बचे ,जहा हो प्रतिकार !!१० !!
सुरेन्द्र भी जब डूबते ,सुर में है आकण्ठ !
तब पाते कष्ट अद्भुत ,गाते सभी सुकंठ !!११ !!
स्वविवेक सुर साधना ,सुचरित्र से सज्जन !
सुरच्युत स्वजन भी हो ,जाता कोपभाजन !!१२ !